Thursday, 16 June 2016

commentry on indian political system

रसोई गैस / कल की बात है ,उनने दोपहर अचानक कहा कि रसोई गैस के बर्नर का पाइप टूट गया है ,इसे आज ही बदल दें या मरम्मत करा लें , चूल्हा बीस साल पुराना  बलु लाइन का था ,लेकिन था चकाचक ,सो मैंने बर्नर की तलाश में शहर के प्राय हर दुकान को तलाशा ,दूसरे बर्नर  के लिए ,उसे न मिलना था और न ही मिला ,फिर देशी इंजिनियर अर्थात ठठेरा के पास दूसरा बर्नर के नीचे वाले पुर्जे को ठीक कराकर उनको सौंप दिया, मतलब यह कि अगर आप ब्रांडेड कंपनियों के वस्तु खरीद रहे हों ,तब लगे हाथ दुकानदार से उसके कल पुर्जे/पार्ट्स वगैरह भी खरीद लें , क्योंकि आजकल बाजार का फंडा यह है कि कंपनियां खास अवधि के बाद उक्त माल का उत्पादन बंद कर देती है और जरूरत के वक्त वह आपको मिलती नहीं !  

कांग्रेस का कैसे उत्थान होगा ? झारखण्ड को एक उदहारण माने, तब जाहिर होगा कि कि 'राजनीती के प्रति उसकी स्पष्ट दिशा अर्थात नीति का आभाव है ' राज्य सभा के चुनाव होना है और इसका गठबंधन राजद, जदयू और झाविमो के साथ है ,लेकिन यह यहाँ झामुमो के उम्मीदवार को समर्थन कर रही है ,क्या तटस्थ / बहिष्कार बेहत्तर विकल्प नहीं होता कांग्रेस के लिए ! सीधी सी बात है , चुनाव में विधायकों के 'लार ' टपकने और भाजपा को नीचा दिखाने की प्रवृति ने कांग्रेस को जनाधार से वंचित करने में अहम भूमिका निभाई है । 

क्या वाकई राहुल गांधी चालू माह में सोनिया गांधी के स्थान पर कांग्रेसध्यक्ष होने जा रहे हैं ? 

राहुल गांधी कांग्रेस प्रमुख के पद पर विराजते हैं,तब तय मानिये 'तदर्थ नीतियों' की बाढ़ आ जाएगी , ऐसी स्थिति में कैसे पार्टी का उत्थान होगा ? मुख्य समस्या कांग्रेस की राजनीती में यही है !

राजनैतिक प्रतिदन्दिता में भाजपा अर्थात नरेंद्र मोदी की दिलों इच्छा है कि अर्थात नारा है कि "कांग्रेस मुक्त भारत " इसके जवाब में कांग्रेस नेतृत्व को चाहिए कि वह अपने अतीत में जाये और नए तेवर के साथ रचनात्मक संघर्ष में कूद जाये ,जिसमे " संपन्न भारत, सबल देश " नारे में अन्तर्निहित अवधारणा को आत्मसात करे । 

झारखण्ड/कांग्रेस के प्रोमिनेन्ट लीडर योगेन्द्र साव (पूर्व विधायक) को हजारीबाग प्रशासन ने जिला बदर कर दिया है और प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व खामोश है ,  ऐसे में कैसे पार्टी अपने खोये जनाधार को प्राप्त कर पायेगी ?  

अपने समय में स्वपन सुंदरी के रूप में चर्चित सिने तारिका हेमामालिनी को देखिये ,जब मथुरा कांड में कल  दो पुलिसकर्मियों सहित चौबीस लोग मारे जा रहे थे ,तब वह अपने बदन की नुमाइश का फिल्मांकन किये फिल्म को यु ट्यूब में उसे लोड करने में मस्त थी ! मौजूदा काल में वह मथुरा की भाजपाई सांसद है । 

लोकतंत्र की खूबसूरती और बदसूरती मूल रूप से यही है कि जाहिल/विद्वान तथा चरित्रवान/चरित्रहीन समान रूप से प्रतिस्थापित होने के अवसर पा जाते हैं ! 

आप माने या न माने ,नरेंद्र मोदी के साथ एक बात जबर्दस्त रेखांकित हो गई है ,और यह है उनके विदेशी दौरे के कीर्तिमान , इसके पहले के प्रधान मंत्रियों के परराष्ट् गमन कभी चर्चा के विषय नहीं बने अर्थात मोदी के गूढ़ कूटनीतिक कदमों के रहस्य क्या हो सकते हैं ,जरा सोचिये दोस्तों - पूंजी निवेश/रोजगार तो  कोई भी बता सकता है , लेकिन मकसद इससे इतर भी है, उसे समझने की कोशिश करें ! 

क्या आपको नहीं लगता कि देश में राजनीती का अर्थ " मक्कारी " में तब्दील हो गया है ? 

मथुरा कांड और मथुरा जैसी स्थितियां पुरे देश के हिस्सों में हैं , सस्ती राजनैतिक लोकप्रियता के आड़ में कैसे कैसे गोरखधंधे चल रहे है , इससे स्थानीय नेताओं से ज्यादा कौन समझ सकता है ! 

यह समाचार कथा, मधु कोड़ा के मुख्य मंत्रित्व काल की है , कोड़ा को मेदिनीनगर आना था ,और वह निर्धारित दिन को टाउन हॉल में कार्यक्रम को उद्घाटन करके चले भी गए ,मगर कुछ ऐसा उस दरम्यान घटा कि मत पूछिए -
कोड़ा काल भ्रष्ट संदेहों को  लेकर उन दिनों देश भर में चर्चित था , प्रेस से बचने की उनकी हरचंद कोशिश रहती , सो डालटनगंज के स्थानीय पत्रकारों ने तय किया कि उन्हें घेरा  जाये । 
कोड़ा, समारोह  को संबोधित किये ,फिर कुर्सी पर पांच मिनट बैठे, इसके बाद नजरे चुराते हुए खिसकने लगे , जिसे संवाददाताओं ने ताड लिया  , फिर खबरनवीसों की  टोली  उन्हें पकड़ने के  लिए पिल पड़ी । इस दौरान तेज़ गति से चलते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्टर फैयाज अहमद ने उनको आवाज दी - सीएम साहब ,सीएम साहेब ,दो मिनट प्रेस के लिए भी समय दें , चलते चलते कोड़ा ने कहा कि सर्किट हाउस में हम बात करेंगे , आप सभी वहीँ चलिए , इस मौके पर मैं भी मौजूद था ,मैंने कहा -कोड़ा जी ,अहमद साहेब सिर्फ पत्रकार ही नहीं हैं बल्कि प्रोफ़ेसर भी हैं ,जरा मिल लीजिए ,फिर ऐसा मौका नहीं मिलेगा ! 
    " हाँ , हाँ वही तो मैं कह रहा हूँ ,सर्किट हॉउस में प्रेस से बातचीत हो जाएगी " यह सुनना  था कि तपाक से मेरे मुंह से निकला -- " शर्म नहीं आती झूठ बोलते , मिनट टू मिनट में कहाँ ठहराव है सर्किट हॉउस , मुख्य मंत्री की कुर्सी को पैतृक सम्पति समझ रखा है क्या ? 
 तबतक कोड़ा अपनी सवारी में तेजी से चलते हुए बैठ  चुके थे , जहाँ से चियांकी हवाई अड्डे से उड़न खटोले में बैठकर रांची के लिए फुर्र हो गए । 
 बाद में इधर पत्रकारों में यही खुसुर-पुसुर होती रही ,जाने कैसे -कैसे मुख्य मंत्री हो जाते हैं ! 
 
न्यायविदों से एक सवाल -- आपराधिक मामले में राज्य अर्थात पुलिस/ सीबीआई वगैरह जाँच एजेंसी की भूमिका में रहती है , क्या कभी अदालतों ने विचार किया है कि अनुसन्धान अफसर के  आरोप पत्र में अभियुक्तों के हित में बेतरतीब, अतार्किक ,साक्ष्य जैसे प्रक्रिया को कमजोर जान बूझकर रखे जाते है ! ताकि इसका लाभ अवांछित तत्व को मिल सके ! कहने का मतलब कि राज्य/सरकार  की बातों  पर ही अदालत प्राथमिकता के साथ क्यों गौर करती है ? 

लोकतान्त्रिक सत्ता और मुख्य मंत्री के आवास पर सन्नाटा ! यह क्या जाहिर करता है ? जी हाँ, झारखण्ड़ के मुख्य मंत्री रघुबर दास के रांची में कांके रोड स्थित बंगले का है यह दृश्य ........ 

झारखण्ड/ झाविमो के छ विधायकों के नाम विधान सभा की सूची में भाजपाई के रूप में दर्ज़ है ,तो चुनाव आयोग में इनके उल्लेख झाविमो के विधायक के तौर पर उल्लेखित है ,जाहिर है कि आयोग निर्वाचित होने के बाद भर सिर्फ एक मरतबे ही सूची जारी करती है ,तब अचरज कैसा ? बदली स्थिति में झाविमो के उक्त छ विधायकों ने दल-बदल कर भाजपा में शामिल हो गए ,जिसकी पुष्टि विधान सभाध्यक्ष ने की है ,फिर इसमें उच्च न्यायालय क्या कर सकता है ,हकीकत में दोनों एजेंसियों की सूची सही है । झाविमो की दाखिल याचिका पर एक नजर.... 

उच्च्तम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने ठीक ही कहा है कि कार्यपालिका अर्थात सरकार अर्थात प्रशासन अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली क्रिया- विधियों को खुद तटस्थ तरीके से क्रियांविंत करे, तब अदालत को दखल देने के अवसर नहीं मिल पाएंगे । लोग आते हैं तभी न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है । बात तो सही है ! 

झारखण्ड/ रघुबर दास के मुख्य मंत्री बनने के पूर्व और पद संभालने के बाद के व्यवहारों में क्या फर्क आपको नजर नहीं आता !

किस्सा कुर्सी का/आंधी फिल्म का नाम आपने सुना होगा ,कैसे उस ज़माने में कांग्रेसी तत्वों ने इन फिल्मों को लेकर नाच किया था ,काफी कुछ ऐसा ही है फिलवक्त के निर्मित फिल्म " उड़ता पंजाब " का मसला ,जिसमे ड्रग में डूबे पंजाब की तस्वीरों का चित्रण है और संयोग से सूबे में अकाली/भाजपा गठबंधन की सत्ता है । सोचिये--इस वितण्डा की वजह क्या हो सकती है ? 

कूटनीति/अमेरिका के साथ भारत की होती गलबहियां से ज्यादा खुश फहम होने की जरूरत नहीं है ,उसके राष्टहित बदली विश्व राजनय से उपजी स्थितियों का प्रतिफल है । कभी सोचा है ,इस अमेरिका ने लोकतान्त्रिक भारत को नजर अंदाज करके आधी शताब्दी तक पाकिस्तान को गले लगाए रखा था और अब पाक की उपयोगिता उसके के लिए समाप्त प्राय ; है ! 

कूटनीति / भारत ने जब १९९८ में दूसरी बार परमाणविक परीक्षण किया था ,तब दुनिया में काफी शोर हुए थे ,इस गलत फहमी को दूर करते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज ने कहा था - भारत का दुश्मन पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन  है , क्या आज की अंतर्राष्टीय राजनीती में यह सच साबित होती नहीं प्रतीत होती ! 

झारखण्ड/ सरकारी हॉस्पिटल में इन दिनों डकैती हो रही है , मुफ्त में दवा तो मिलती नहीं लेकिन डॉक्टर मामूली झख्म में चार -पांच सौ रूपये की दवा लिखने से हिचकते नहीं ! मानो वह खुद दवा कंपनियों के एजेंट बन गए हों । ऐसा ही एक मसला आज मुझे उस वक्त देखने को मिला ,जब अचानक मेदिनीनगर सदर अस्पताल में कदम रखा तब मालूम हुआ कि पौने दस अपराह्न तक डॉक्टर अपने सीट पर नहीं बैठे थे और उनके क्लिनिक में मरीज इनके इंतजार में जहाँ-तहां खड़े-बैठे हैं ,तभी सिविल सर्जन को मैंने फोन से उनके अनुपस्थिति की जानकारी दी ,तब वह बोले कि ' देखता हूँ ,डॉक्टर क्यों नहीं बैठा है । ' खैर, किसी तरह चिकित्सक पहुंचे ,फिर दनादन पर्चियों में  बाहरी औषधियों के नाम लिखने लगे ,यह टेबलेट अस्पताल में मिल जायेगा ,बाकि बाजार से खरीद लें , उत्सुकतावश मैंने एक लड़के से पर्ची लेकर बाहर के दुकान में दवाइयों के दाम पूछा ,तो मालूम हुआ कि यह चार सौ पच्च्पन रूपये का है ,जबकि लड़की को हल्का जांघ में दाने निकले थे ,तो सरसरी तौर पर गर्मी के प्रभाव से प्रभावित प्रतीत था । यह कमाल काले रंग के डॉक्टर ने किया था ,जिसे पहचानने में मुझे हुआ । लाख का वेतन फिर भी काम में संजीदगी नहीं ,यह है सरकारी सेवा का स्वरूप --  

केंद्रीय मंत्री वेंकट नायडू ने कुछेक दिन पहले नरेंद्र मोदी को ईश्वर का विशेष तोहफा बताया था ,जिसे भारत को किस्मत से मिल गया है । इससे आपके जेहन में क्या तस्वीर उभरती है ? 

बिहार/ शासन क्या होता है ,यह तो देशवाशियों को इंटरमीडियट के नतीजे के बाद हुई सख्त कार्रवाई से पत्ता च ही गया होगा ! 

कोलिजियम व्यवस्था उस काल में न्यायपालिका में साकार हुई थी ,जब  लुंज-पुंज अर्थात मिली-जूली सरकार थी अर्थात १९९३ में ,जिसके कार्यपालिका के मुखिया पीवी नरसिंह राव थे ,अब सोचे जरा --

'डियर' शब्द को लेकर कोहराम मचाने वाली स्मृति जुबैर ईरानी पर यह कहावत  एकदम सटीक बैठती है -चोर के दाढ़ी में तिनका , बिहार के शिक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में उक्त शब्द का प्रयुक्त करके उनको अपमानित नहीं किया ,बल्कि 'अपनत्व' का इजहार किया है , यह ईरानी को नहीं भूलना चाहिए कि वह  एक देश के सार्वजनिक क्षेत्र के गंभीर पद पर बैठी है ,जिसे सभी जानते हैं कि यह नरेंद्र मोदी की मेहरबानी से मानव संसाधन मंत्री हैं ,तो क्या सिर्फ मोदी ही इनको डियर कहने के लिए अधिकृत हैं या उनके शौहर या कोई तीसरा भी  ,इस मुद्दे को महिला की आड़ में स्मृति को बात का बतगंड बनाने से  बाज  आना चाहिए । 

कूटनीति/ भारत और चीन के दौत्य रिश्ते में जमीन -आसमान का फर्क है , रणनीतिक दृष्टि से भारत के समक्ष चीन कहीं नहीं टिकता है ,उसके अपने सारे पड़ोसियों से अनबन खास रूप से भारत के लिए मुफीद है ,लेकिन भारत के साथ केवल पाकिस्तान ही तनातनी में है । 

बचपन मेरा लातेहार में बीता है , दोस्तों के साथ खेलते हुए मेरे मुंह से सिर्फ एक मित्र के  लिए 'डियर' शब्द मेरे जिह्वा से निकला था ,जो बार- बार मिलने के बाद उसके लिए ही संबोधित होता था ,उसका नाम अजय कुमार अग्रवाल है ,जिसे प्यार से हम 'आजु' कहते थे , मित्र मण्डली में यह होड़ रहती थी कि संजय हम सभी को भी डियर शब्द से पुकारे ,लेकिन ऐसा नहीं हो पाता था , कालांतर में प्रियंका ने मुझे डियर कहा ,मैंने नहीं ,अब मत पूछिए कि प्रियंका कौन है , अगर आप जानना ही चाहते हैं ,तब नियमित रूप से मेरे पोस्ट को पढ़ा करें ,आप जान जायेंगे , इधर एक और के लिए मुझसे डियर शब्द अनायास उच्चरित हो गया ,जानते हैं आप इसका उत्तर में मुझे रूखा जवाब मिला ,इसे आप क्या कहेंगे ? 

क्या मजाक है ? सुना आपने , नरेंद्र मोदी ने इलाहबाद में कहा कि -विकास देखना हो तो झारखण्ड चले जाइये ,हद हो गई ,इधर मुख्य मंत्री रघुबर दास ने घोषणा भी कर दिया कि राज्य में रिश्वतखोरी/भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है ! क्या देश में डॉ गोयबल्स का पुनर्जन्म हो गया है  दोस्तों  ! मेदिनीनगर -रांची पथ के १६५ किमी सड़क का ही जरा मुआयना कर लें ,विकास की क्या गति है ,पत्ता चल जायेगा ! 

कभी देश की राजनीती में लालू प्रसाद यादव 'हल्की /सतही बातों  को गंभीर और गंभीर मुद्दों को हल्का ' करने के विशेषज्ञ माने जाते थे ,लेकिन अब बदली स्थिति में इस मानसिकता के अनेकों शख्स पैदा हो गए हैं ,जिनको यथार्थ परक राजनीती से कोई लगाव नहीं है ,जरा अपने आस-पास सक्रीय राजनीतिज्ञों से पूछिए कि ' आप राजनैतिक क्षेत्र में क्यों हैं ? जवाब सुनिए और उनके क्रिया-कलाप देखिये ,वास्तविकता का पता चल जायेगा ! 

हुड्डा सरकार (हरियाणा ) से ज्यादा अबतक विज्ञापित रकम किसी ने खर्च नहीं किया , उसके क्या हश्र विधान सभा के चुनाव में हुए ,उसे आपने देख लिया , अब  संप्रगनीत सरकार के चमक-दमक पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है ,तो क्या इसका लाभ भाजपा को भविष्य के चुनावों में मिल पायेगा ?

कूटनीति/दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाले देशों में भारत और अमेरिका शुमार है ,फिर अमेरिका ,भारत की उपेक्षा करके कैसे आधी शताब्दी तक चीन को तरजीह देता रहा ! परिवर्तित विश्व राजनय किस ओर इशारा करता है ? हड़बड़ी में कहीं मोदी सरकार "राष्ट हित" को नजर अंदाज न कर दे ! राष्टहित ही वह स्थायी तत्व हैं ,जो किसी राष्ट/राज्य के वैदेशिक मामले में नीति का निर्धारण करने अपूर्व योगदान  देते हैं और यह राष्टहित क्या है ,इसे पहचानने की कला विरलों में ही होती है ,इतिहास देखिये -पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रखर /अधुनातन राजनेता भी चीन से मात खा गए ! 

Thursday, 2 June 2016

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 बिहार/ राजद विधायक को बलात्कार के मामले में क्या दुर्दशा हुआ नितीश राज में आपने देखा और अब जद(यू) विधान पार्षद के बेटे को हत्या के जुर्म में उनको कैसी-कैसी मुसीबतें झेलनी पड़ रही है ,वह भी सामने है ,इधर सिवान में पत्रकार हत्या कांड में कैसी त्वरित करवाई हो रही है ,यह भी किसी से छिपा नहीं है ,फिर कैसे लोग राज्य की विधि-व्यवस्था पर पक्षपात पूर्ण रवैये अपनाए जाने के आरोप मढ़ते हैं ,समझ में नहीं आते  ! 

दुनिया "शक्ति" की भाषा ही समझती है ,इसे नरेंद्र मोदी से बेहतर कौन समझ सकता है ! 

झारखण्ड/ चतरा में मारे गए पत्रकार को लेकर खुलासा है कि कथित रंगदारी टैक्स नहीं देने की वजह से उसकी हत्या हुई , इसमें खास चिंता की बात है कि उनसे जब टीपीसी ने कथित रूप से लेवी की मांग की तब, उन्होंने पुलिस को इत्तिला क्यों नहीं की ? क्या पुलिस पर उनको भरोसा नहीं था ? 
याद कीजिये कुछ साल पहले जी न्यूज के दो विज्ञापन अधिकारी नवीन जिंदल से सौ करोड़ रूपये की मांग इसलिए किये थे कि उनके गोरखधंधे को पर्दाफाश नहीं किया जा सके । इस बातचीत को उक्त उद्दोगपति ने टेप/वीडियोग्राफी भी चालाकी से किया था , मामला सामने आने पर काफी हो-हंगामे हुए थे , उक्त चैनल के परिचालक तो जेल की हवा खाने से बच गए लेकिन विज्ञापनकर्मी बने दोनों पत्रकार कारागार में कई क़ानूनी जद्दोजहद के बाद पहुँच गए ,इस मामले में क्या फलाफल है ? 

मौलिक चिंतन/ बात आज की ही है , अधिवक्ता मुकुल चौबे ,इनके जूनियर मोहन पत्रकार अमरेंद्र और दो-तीन वकीलों के साथ आज की मौजूदा राजनीती पर बहस हो रही थी ,जिसमे मैं भी शरीक था , यह बातचीत चौबे के चैंबर में थी ,इसी क्रम  में उन्होंने कहा - वोट के सवाल जब सामने आते हैं ,तब लोग जाति / धर्म को खोजने लगते हैं  और जब अभियुक्त बनके समाज में व्यक्ति आता है ,तो उम्दा वकील की तलाश करते हैं ,इसी तरह मरीज को भी बेहतर डॉक्टर की खोज/सेवा की जरूरत होती है ,इसमें राजनीती लोग क्यों नहीं देखते ? बात वाकई दमदार मौजूद भाइयों को लगी , मैंने भी सहमति प्रकट की । सोचिये ऐसा क्यों होता है ? मुझे याद आता है महान लेखक एनसी चौधरी की बात ,जिन्होंने काफी पहले कहा था -भारतीयों के खून में ही भ्रष्टाचार है अर्थात देश की मिटटी में ही भ्रष्ट तत्व मौजूद हैं ! 

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा के उप चुनाव के नतीजे से मुख्य मंत्री रघुबर दास को यह पत्ता चल गया होगा कि हमेशा दो और दो के मिलने से चार नहीं होता ! सामाजिक स्थितियां/ संवेदना बराबर राजनीती को प्रभावित करती आई है और भविष्य में भी करती रहेगी । यह मूलत; विज्ञानं नहीं है ,जिसे परिमापित किया जा सके । 

चार राज्यों के विधान सभा के चुनाव में भाजपा को खोने को कुछ नहीं था ,बल्कि हल्की सफलता भी उसे अन्य से ज्यादा कामयाबी के रूप में प्रतीत है ! 

मन बैचेन है,कुछ काम करने को मन नहीं कर रहा ,इसकी वजह क्या हो सकती है ,मुझे अनुभूत नहीं हो रहा, जो बातें फिलवक्त आपसे हो रही है यारों ,बेमन से है , लगता है इस आभासित दुनिया ने भी मुझे बहकने में मददगार बन गई है ,इसलिए सोचता हूँ ,इसका परित्याग कर दूँ और यह कुछ-कुछ पिछले डेढ़ सालों से दिल में हलचल मचाए है ,सलाह दें ,क्या करूँ ताकि सामान्य तरीके से रह सकूँ --

क्या चीन को इतनी क्षमता है कि वह पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था की जिम्मेदारी उठा सके ? पाक परजीवी देश है ,इसकी आर्थिकी अमेरिकी मदद पर निर्भर है ! फिर क्यों नहीं वह पाक को उपेक्षा करने की कूटनीतिक रणनीति की ओर कदम बढ़ाता ? 


तमिलनाडु/एम करूणानिधि " ललच " के रह गए । एग्जिट पोल ने उनकी गठबंधन को बढ़त दे ही दी थी । 
क्या कार्ल मार्क्स ' हिंसक ' थे ? 

वो " आसु " गीतकार हैं, पल में छन्द/गीत/नग्मे/शायरी रच देने में सानी नहीं है उनकी, 'ओठों' में नैसर्गिक मुस्कराहट ऐसी कि कोई भी कुर्बान होने में खुद को सौभाग्य समझे , वैसे नग्मेनिगार को भला कौन नहीं सान्निध्य चाहेगा ? 

केरल में वीएस अच्युतवर्धन को मुख्य मंत्री न  बनाकर माकपा भारी गलती कर रही है, अच्युतवर्धन पूर्व मुख्य मंत्री रह चुके हैं ,राष्टवादी सोच के वाहक के रूप में उसकी राज्य ही नहीं ,देश में अलग पहचान है । ऐसे में पी विजयन को पार्टी मुख्य मंत्री के दायित्व सौंपती है ,तब यह आने वाले कल में अंदरूनी संघर्ष को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए ! 

भाजपा ,असम में चुनावी कामयाबी पाकर ज्यादा नहीं इतराए,यही उसके लिए ठीक होगा ,अगले वर्ष उत्तर प्रदेश-पंजाब विधान सभाओं चुनाव होश ठिकाने लगा देगा ,हार / जीत की स्थितियां हमेशा भिन्न रहती है ,खासकर लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्वरूप में ,इसे शाह -मोदी भी समझते होंगे ! 

दिग्विजय सिंह ने ठीक ही कहा है कि कांग्रेस को पूरी तरह से चीड़ -फार की जरूरत है ,ताकि वह मौजूदा और भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सके ,अब अात्म मंथन की आवश्यकता नहीं है ,लेकिन इसके ठीक उलटे अमरनाथ जैसे चाटुकार कहते हैं कि चार राज्यों के चुनाव परिणाम को सोनिया/राहुल की क्षमता को आंकने से बचा जाये । ऐसे में कांग्रेस कैसे पुनर्जीवित हो पायेगी ! 

कांग्रेस में हताशा इतनी है कि पार्टी में जान डालने अर्थात गति देने के लिए उत्तर प्रदेश के आसन्न विधान सभा  के चुनाव में राहुल/प्रियंका को प्रोजेक्ट करके की आवाज उठा रहे हैं और इसकी हवा प्रशांत किशोर जैसे पार्टी के रणनीतिक प्रचार विषेशज्ञ दे रहे हैं ,कहाँ दोनों भविष्य के प्रधान मंत्री  के ख्वाब में कांग्रेसियों के बीच थे ! 

क्या आपको नहीं लगता कि बसपा प्रमुख मायावती अपने चाल -ढाल से ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पोषक है अर्थात सामंती संस्कृति की वाहक है ! 

क्या आपको यह अनुभूत नहीं होता कि देश में राजनीतिक क्षेत्र में  आपराधिक तत्वों के  प्रवेश करने के लिए न्यायपालिका भी एक जिम्मेदार है ? क्यों नहीं अदालतें समय की नजाकत को देखते हुए त्वरित सुनवाई करके अवांछित तत्वों को राजनैतिक अधिकार से वंचित करने में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिये योगदान देती है ! 

वो, साहित्य की लड़ी हैं और हम " जीवन मूल्यों " के पुजारी ,ऐसे में क्या इनमे मेल हो सकता है ? 

देश के निचले कतार के नेताओं को भ्रष्टाचार  अनुभव काफी होते हैं अर्थात इससे रूबरू रहते हैं ,फिर सांसद/विधायक निर्वाचित होकर कैसे इसकी उपेक्षा करते हैं ? क्या यह पूंजी का खेल नहीं है ?  

चीन ,स्थल मार्ग के जरिये समुन्द्र को छुआ और भारत समुन्द्र के रास्ते भूमि को पाया ,फिर कैसे ग्वादर और चाबहार को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ बल्ले -बल्ले करने पर उतारू हैं ? 

क्या मैं सचमुच बिंदास हूँ ! जैसा कि गत रात अपने शहर शताब्दी मार्केट में बैठकबाजी कर रहे स्थानीय नटों/ पत्रकारों ने मुझे अपने बीच अचानक पाकर मुझे याद किया । 
मैं नित्य की भांति रात को अपने आवास लौट रहा था ,तभी कानों में भैया, संजय भैया की आवाज आई , घूमकर देखता हूँ ,तो मार्किट के प्रांगण में भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष मनोज सिंह ,दिलीप तिवारी संग ,पत्रकारों में ब्रजेश तिवारी ,संजीव नयन , अविनाश समेत अन्य बैठकी जमाए हुए थे , तब थोड़े देर के लिए मैं भी वहां जम गया , मेरे बैठने के साथ ही बीच पहले से चल रहा विषय पर बातचीत थम गई और लगे मेरे बारे में ही चर्चा करने वह भी पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा , जिलाधीश पूजा सिंघल ,आराधना पटनायक ,सुबोधनाथ ठाकुर जैसे विशिष्ट व्यक्तियों के साथ हुई आँख -मिचौली ,धींगा-मुश्ती ,आमोद-प्रमोद  के क्षणों की बखान बड़े चाव से करने , कैसे मुंडा के प्रेस कांफ्रेंस का बायकाट  हुआ, सिंघल को कैसे चुभन हुई ,आराधना होली  कैसे मैंने रंग के बाबत किया ,ठाकुर को मैंने धमकी और बेइज्जत किया ,इन्हीं सब पर गप्पें होती रही । 
इस बातचीत के दौरान पहले चाय, फिर चना के बाद पिली वाली कोल्ड ड्रिंक का दौर चलता रहा और जब बैठक ख़त्म होने लगी तो तिवारी ने यह कहकर प्रशंसा की ,कि इसी अदा  पर तो हम आप पर फ़िदा हैं संजय भैया , क्या वाकई मैं मैं बिंदास हूँ ,सोचता हूँ तो --

प्रधान मंत्री नरेंद्र दास दामोदर मोदी की पिछले दो सालों की सबसे बड़ी उपलब्धि /कामयाबी यह है कि देश में केंद्रीय/संघ स्तर पर भ्रष्टाचार की गति थम सी गई है ! इससे इत्तर कुछ भी नहीं --

लोकतान्त्रिक सरकार की खूबियों का पत्ता तब होता है ,जब नौकरशाही अर्थात लोक प्रशासन अपनी जिम्मेदारी को समझे ! 

आप राजनैतिक क्षेत्र में गुंडों ,बदमाशों ,आवारों  और लथेरो से लड़ सकते हैं ,लेकिन आपराधिक तत्वों से नहीं ! क्योंकि इनके जेहन में किसी भी तरह से अपने हित के लिए 'हत्या' जैसे कृत्य छिपी रहती है और इसी से सामाजिक-राजनैतिक समाज खौफ खाता है । क्या भारतीय समाज के मौजूदा स्थिति में यह सच नहीं है ? 

उत्तर से मायावती ,तो दक्षिण से जयललिता के  बीच पूर्व से ममता का चेहरा क्या उन दोनों से ज्यादा जगमग नहीं है ? पहले के दोनों महिला नेत्रियों के चेहरे पैसे-कवडी के मामले में जो दागदार हैं ! मगर ममता के साथ ऐसा  नहीं दीखता ! 

उत्तर प्रदेश/ मायावती के संग भाजपा पूर्व में गलबहियां कर चुकी है , तो क्या इस बार 
विधान सभा के चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव के साथ रंगीन मिजाजी की फिजा होगी ! २०१७ में इस सूबे में चुनाव होना है । 

झारखण्ड/ चतरा पत्रकार हत्याकांड में दर्ज़ प्राथमिकी के नाम में से एक अभियुक्त के नाम उसमे से हटाने के एवज में कथित पुलिस अधीक्षक को दस लाख रूपये दिए जाने की कोशिश में गिरफ्तार उग्रवादियों के बाद यह सोचना पड़ता है कि आखिर कैसे हिम्मत हुई कातिलों को रिश्वत देने की ! इसका मतलब साफ है कि पूर्व में चतरा पुलिस नक्सली/उग्रवादी के साथ लेन -देन करती रही है ! तभी तो ऐसा मामला पहली दफे पकड़ में आया ! अर्थात जुर्रत की ! 

एक बात बताएं मित्रों--क्या प्यार -मोहब्बत में भी " वक्त " का महत्व होता है ? जहाँ तक मैं समझता हूँ ,यह " नैसर्गिक " प्रक्रिया है ! 

पाक की नागरिक सरकार या कहिए सैन्य प्रमुख ने भी परमाण्विक शक्ति के भारत के बाबत इस्तेमाल की बात नहीं की , बल्कि निदरलैैंड के एक चोर वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ने धमकी दी , जो वहां परमाणु बम के जनक के रूप मेंख्यात है ! 

केंद्रीय दूर संचार मंत्री हैं रविशकर प्रसाद ,मूल काम में  दिलचस्पी नहीं , हल्कि  बातों में ज्यादा दिलचस्पी इनकी है ,देश के अस्सी फीसदी इलाकों में बीएसएनएल बदतर अवस्था में है , दुरूस्त करने की कोई चिंता नहीं ,और अब वह डाक से 'गंगा जल' बेचेंगे !है  न मोदी के काबिल मंत्री  की प्रवृति तारीफ करने लायक ! 

दिल में आग लगा के , भाग जाना उनकी फितरत है ! 
सोचा था कि उनको भूल जाऊ , मगर हर रह गुजर ,उनके घर के सामने है , 
दुनिया पगलाई है , ज़माने के रूप   देखकर,
आप भी मत बदल जाना , मेरी यायावरी देखकर !!  

Sunday, 15 May 2016

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आंध्र प्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी ए मोहन के पास से आठ सौ करोड़ के अचल-चल संपति का उत्भेदन कोई केंद्रीय एजेंसी ने नहीं किया है ,बल्कि राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने किया है ,इसके लिए राज्य सरकार बधाई के पात्र है ,लेकिन हमारे यहाँ अर्थात झारखण्ड में इसके अस्तित्व में आने के बाद एक भी आईएएस पकड़ में नहीं आ सके हैं ,जबकि भ्रष्टाचार के मामले में यह देश भर में अव्वल है , क्यों ?

आगस्ता उड़न खटोले में कांग्रेस की स्थिति 'जल बिन मछली ,नृत्य बिन बिजली' जैसी प्रतीत है । देखिये - गुलाम नबी आजाद ,कहते हैं कि उनकी सरकार के कार्यकाल में ही कंपनी को काली सूची में डालकर सौदा रद्द कर दिया गया था, तो तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी सरकार के समय में कंपनी को काली सूची में डालने व् सौदे को रद्द करने की प्रक्रिया  की गई थी , अब सवाल उठता है कि सच कौन बोल रहा है ,आजाद या सिंह ,या फिर मोदी सरकार  ! 

मई दिवस अर्थात मजदूर दिवस के मौके पर नरेंद्र मोदी ने  खुद को 'मजदूर' बता कर मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर दिया है कि " वह अभी भी गत लोक सभा चुनाव की मन:स्थिति से उबर नहीं पाए हैं " जबकि शनै ; शनै पैरों तले जमीन उनकी खिसक रही है ,इसकी भान उन्हें नहीं है ! वह अबतक 'दार्शनिक दुनिया' में ही खोये हुए हैं ! 

अरविन्द केजरीवाल अब चर्चा में बने रहने के लिए निम्न हरकत पर उतर आये प्रतीत हैं , क्या आपको नहीं लगता  कि मंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक प्रमाण पत्र की मांग सूचनाधिकार के तहत करके सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के कोशिश की है ! 

सुब्रह्मण्यम स्वामी को भाजपानीत केंद्रीय सरकार ने निर्वाचन के जरिये उनको उच्च सदन (राज्य सभा ) में नहीं भेजकर ,मनोनयन के माध्यम से सांसद बनाया है , इसके पीछे क्या मकसद हो सकता है ?

मायावती ,दलित को थामे है ,तो मुलायम सिंह यादव ,अहीर जमात को कसकर पकड़ें हैं ,इसमें अल्पसंख्यक समाज झुनझुना लिए घूम रहा है ,ऐसे में भाजपा/कांग्रेस उत्तर प्रदेश  चुनाव में कहाँ पर है ,इसकी खोज कर लीजिये ,परिणाम सामने होगा ! 

मुझे प्रतीत होता है कि नरेंद्र मोदी के जीवित रहते अब दूसरा कोई प्रधान मंत्री नहीं हो सकेगा ! 

क्या आपने कभी  कल्पना की थी कि देश में " बगैर विचारधारा " वाली पार्टी भी 'सत्ता' में आ सकती है ? दिल्ली में सत्तासीन 'आम आदमी पार्टी' के बारे में आपका क्या ख्याल है ?

क्या आम आदमी पार्टी (आप) को 'यथार्थवादी' विचारधारा की राजनैतिक पार्टी कहा जा सकता है ! 

क्या आपको नहीं लगता कि राहुल गांधी , कांग्रेस के चूक गए नेताओं की कतार में शामिल हो गए हैं ! 

" प्रियंका गांधी " कांग्रेस के लिए 'कोहिनूर' हैं , फिर इनके इस्तेमाल तुरूप के पत्ते के रूप में पार्टी कब करेगी ? फ़िलहाल ,यक्ष सवाल कांग्रेस जनों के बीच यही है । गर्त में जाती कांग्रेस को इनके सक्रीय राजनीती में कदम रखने से , क्या पार्टी को कोरामिन (ऊर्जा) मिल सकती है ! 

उच्च्तम न्यायालय ने मध्य प्रदेश संदर्भित चिकित्सा शैक्षणिक संस्थाओं के मामले में कहा है  कि चिकित्सा /चिकित्सक ' पेशा ' है ,व्यापर नहीं ,अब जरा अदालत को साफ -साफ बताना चाहिए कि दोनों में क्या फर्क है ? 

अब सुब्रह्मण्यम स्वामी को वैध तरीके से बक-बक करने के लिए उपयुक्त मंच मिल गया है ! ज्ञातव्य है कि भारतीय विधायिका के सदस्यों पर 'सदन' के भीतर किसी भी तरह के अभिव्यक्त बातों / विचार  को लेकर केस/मुकदमा नहीं हो सकती अर्थात उसमे अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती । 

मैंने सुब्रमण्यम स्वामी को बक -बक करने वाले नेता के रूप में दो दिन पूर्व निरूपित किया ,तो कुछेक मित्रों को नागवार लगा ,ऐसा ही मुझे तब बुरा लगा था ,जब प्रियंका गांधी ने गत लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के एक बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देने से यह कह कर इंकार कर दी थी कि ' वह तुच्छ बातों के लिए जवाब नहीं देती ' इस तुच्छ शब्द को लेकर मोदी ने ' नीच ' शब्द के रूप में निरूपित इतने जोर से किया ,गोया वह दलित हों और इस 'नीच ' शब्द से मायावती इतनी विचलित हुई कि उन्होंने मोदी से खुद की 'जाति ' स्पष्ट करने की मांग कर डाली । और मित्रों आप स्वामी को भले सिर्फ नाम से जानते होंगे ,मगर वह मुझे व्यक्तिगत रूप से भी जानते हैं ,मेरे पोस्ट अगर नियमित रूप से पढ़ते होंगे तो आपको ऐसा आभास अवश्य हुआ होगा ! 

सोनिया गांधी ,मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के नेतृत्व में पिछले दिन दिल्ली में 'लोकतंत्र बचाओ मार्च' बगैर बरसात के छाता ओढ़ने जैसा क्या आपको नहीं लगता ! 

अरविन्द केजरीवाल अब जरूरत से ज्यादा किच -किच करते नजर आते हैं ,यह इनके और 'आप" के सेहत के लिए ठीक नहीं है । 

झारखण्ड/ पांकी और गोड्डा विधान सभा के उप चुनाव में स्थानीय भाजपाई खुद को उपेछित महसूस करते दीखते हैं ,सबसे दिलचस्प बात है कि पांकी में अधिसंख्य कांग्रेसी /भाजपा के नेता-कार्यकर्त्ता खुद अपनी- अपनी पार्टी उम्मीदवार को जीतते नहीं देखना चाहते ! गजब है इनकी अंदरूनी राजनितिक लड़ाई के स्वरूप ! 

उत्तराखंड पर सर्वोच्च अदालत का फैसला स्वाभाविक है ,यह इसलिए कि जब राज्यपाल ने सरकार को २९ अप्रैल तक विश्वास मत हासिल करने की तारीख मुकर्रर कर दी थी ,तब केंद्र सरकार को क्या जरूरत थी ,राष्टपति शासन के लिए कदम उठाना ,यहाँ यह दलील कदापि नहीं चलेगी कि राज्यपाल ने बाद में भेजे अपनी रपट में संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न होने की आशंका प्रकट की थी ,अतएव ,राष्टपति शासन लाजिमी था !

महिमा मंडन खुद को करने का क्या नई तरकीब ईजाद की है मुख्य मंत्री रघुबर दास ने , जनता की गाढ़ी कमाई को कैसे लुटाई जाती है ,इसे देखना हो ,तो आज के अख़बारों में विज्ञापित "स्थानीयता" संदर्भित बातों को देखें/पढ़ें । 

जिस तरीके से उत्तराखंड के मामले में भाजपानीत केंद्र सरकार की फजीहत हुई है ,उससे जाहिर है कि पार्टी और सरकार के नेतृत्व में मानसिक रूप से कमजोर तत्वों का प्रभाव बढ़ गया  है ! 

आपको एकबार फिर सावधान करते हुए आगाह कर रहा हूँ कि " अराजक माहौल में ही तानाशाही प्रवृति का जन्म होता है । " भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में हो रहे आहिस्ते-आहिस्ते हो रहे बदलाव पर ध्यान देना शुरू कीजिये ,अन्यथा ! 

कई मित्र मुझे मैसेज भेज-भेज हर रोज टीका-टिप्पणी की अपेक्षा मुझसे करते हैं ,उनसे सिर्फ यही कहना है कि " मैं भी आपकी तरह हाड़-मांस का एक लोथड़ा हूँ ,इसलिए हर बात /चीज पर अपने विचार रख नहीं सकता " विशेष आप खुद समझदार हैं --

विजय माल्या को एक  "  प्रतिमान " मानिये तो जाहिर होगा कि देश में गैर निष्पादित परिसम्पत्तियां दिसंबर २०१५ में ३ करोड़ ६१ हजार थी,  सितमबर २००८ में यह ५३ हजार ९१७ करोड़ का एनपीए था ,इसमें ७७७० कारोबारी दिवालिया घोषित थे ,जिसे वित्त मंत्री अरूण जेटली विलफुल डिफालटर कहते हैं ,सवाल है कि जब ऐसा है ,तब सरकार /रिजर्व बैंक क्यों नहीं इनके संपत्तियों को अधिगृहीत करके उनको दण्डित करने में पहल करती है !

झारखण्ड/ क्या भाजपा कथित तौर  पर विधान सभा के गोड्डा -पांकी उप चुनाव बगैर ' चिरकुट' नेताओं के भरोसे जीत पायेगी  ? याद है आपको रघुबर दास ,मुख्य मंत्री के पद पर बैठते ही स्थानीय कार्यकर्त्ता /नेताओं को चिरकुट शब्द से विभूषित किये थे और आज उनके समर्थन/ सहयोग के लिए 'घिघियाते' नजर आ रहे । देखें ,नतीजे क्या आते हैं ? आखिर सत्ताधारी होने का कुछ भी तो लाभ मिलने की उम्मीद जो बंधी है ! 

मालेगांव विस्फोट कांड से प्रज्ञा ठाकुर को अब राष्टीय जाँच एजेंसी (एन आई ए ) ने मुक्त कर दिया है । आखिर माजरा क्या है ? कभी एजेंसी के आरोप पत्र में वह दोषी ठहराई जाती है ,तो कभी पूरक चार्जशीट दाखिल करके ठाकुर को मुक्त किये जाने की सुचना अदालत को देती है । जरा विचारिये जनाब , यह आने वाले कल के व्यवस्थापकीय( राजनैतिक/सामाजिक )  हालात के संकेत तो नहीं है ! 

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस समर्थक कहते हैं कि उप चुनाव में उनका मुकाबला झामुमो से है ,तो भाजपा के लोग कहते हैं कि उनकी लड़ाई झामुमो से है ,इसका मतलब यही निकलता है कि झामुमो उम्मीदवार कुशवाहा शशिभूषण मेहता ने निशाने पर तीर मार दिया है  !   अर्थात ----    

कूटनीति / भारत के आतंकवाद पर बातचीत करने को पाकिस्तान तैयार नहीं है , वह कश्मीर समस्या पर वार्ता किये जाने पर जोर दिए है , इसका अर्थ यह हुआ कि इस्लामिक देश होने और कश्मीर में मुसलमानों की अधिसंख्य आबादी को धर्म के नजरिये से देखना चाहता है ,तब दो पड़ोसियों के मध्य रिश्ते सुधरेंगे कैसे ? अगर धर्म आधारित कूटनीतिक सिद्धांतों को विश्व राजनय में प्रश्रय मिला तब ,दुनिया में कैसी उथल-पुथल होगी ,इसकी कल्पना क्या पाक अर्थात इस्लाम/मुस्लिम  प्रभावित देशों के हुक्मरानों ने की है !     

पहले चतरा ,फिर सिवान और अब कौन ! दरअसल ,कारपोरेट संस्कृति  के वजह से पत्रकारों पर जीवन का संकट उत्पन्न है । मुफ्फसिल/कस्बाई पत्रकारिता में स्थानीय संवाददाता विज्ञापन एजेंट/दलाल बन गए हैं ! पत्रकारिता मुख्य तौर पर निजी पूंजी पर आश्रित है ,जिनकी परवाह पूंजीपतियों को प्राय ; नहीं होती । सरकार भी सिर्फ इसकी उपयोगिता को सस्ते लुभावन के जरिये वाहवाही लूटने में तल्लीन है ,भौतिकवादी असर का प्रतिफल है कि इस बारे में किसी तरफ से गंभीर चिंतन/विचार.प्रयास नहीं होते --

झारखण्ड/ खबर है कि  पांकी विधान सभा के उप  चुनाव में भाग ले रहे प्रमुख राजनीतिक दल के मुख्य  उम्मीदवार ने  जिला परिषद के  एक महिला सदस्य को चुनाव के बाद " सबक" सीखा देने की धमकी दी है ! यह चेतावनी ज्यादा यारी के बाद अर्जित संपत्ति/ख्याति से  बढ़ती महत्वकांक्षा से उपजी है ,जिसमे जहर ही जहर है अर्थात दोस्ती में दरार आने के बाद रिश्ते खतरनाक होने तय है अर्थात वह मित्रता बाघ -बकरी की रही है । वैसे, यहाँ आपको बता दूँ कि उक्त महिला पंचायत प्रतिनिधि ठेके/कारोबारी की अर्धांगिनी है ,खुद के स्थानीय चुनाव के वक्त धमकी देने वाले प्रत्याशी के विरोधी उम्मीदवार के सहयोग लेकर जिला बोर्ड के चुनाव जीत गई और जब विधान सभा के उपचुनाव के मौसम आये ,तब उसे भी धोखा देकर "सत्ता मंच " के साथ जुड़ गई ----धन्य है गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली यह  राजनीतिज्ञ !

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा क्षेत्र के मतदाताओं को चाहिए की ' वे धीर-गंभीर उम्मीदवार को ही अपना भाग्य विधाता चुने ' अन्यथा डालटनगंज क्षेत्र वासियों की तरह रोते रह जायेंगे ! 

मैं लेटी थी , वह लेटा था, 
मैं नीचे थी ,वह ऊपर था ,
वो देता था , मैं लेती थी, 
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वह मेरा राज दुलारा था ,
 रहस्यवादी / छायावाद के प्रमुख स्तम्भ कवियत्री महादेवी वर्मा के बहुचर्चित उक्त काव्य में आज के आभासी संसार में काफी महत्त्व है । तब नेट वगैरह नहीं थे ,लेकिन संकेत होते थे ,तात्पर्य यह कि नैसर्गिक रोमांच ,प्रेम ,वात्सल्य के मध्य गजब की तारतमयता होती थी , मगर आज के वर्चुअल वर्ल्ड में सिर्फ छलावा ही छलावा है । 
कल्पना करें ,जब महादेवी उस कविता को पहली बार बनारस की गोष्ठी में पाठ करते हुए दो पंक्तियों के पश्चात थोड़ा रुक गई ,तब क्या दृश्य /सन्नाटा होंगे  । वर्मा के अंतिम पंक्ति में ही यह रहस्य बेपर्द हुआ कि वह उनका अपना बेटा था । इसके पहले मंच में विराजमान कवि और श्रोता की उत्कंठा इतनी तीव्र थी कि लोग  उस काव्य पाठ को कुछ और ही समझ गए थे और आज की इस अभासी दुनिया में कौन किसकी परवाह करता है ,यह सोचना ही बेकार सा प्रतीत है ! 

Thursday, 28 April 2016

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भारतीय कूटनीति में अब गुणात्मक बदलाव के संकेत हैं अर्थात जैसा को तैसा के तर्ज़ पर चीनी उईगर मुस्लिम नेता को दिया वीसा ,तो पाक के प्रति अचानक लचीले रूख के अवलंबन से अब तेज़ कूटनीति के ही आसार दिखेंगे और इसके फलाफल भी तेज़ी से घटित होंगे ,इसके लिए भारत लाभ-हानि दोनों को झेलने/ग्रहण /अंजाम देने-करने के लिए अपने को तैयार कर  रहा है --

लोकतान्त्रिक व्यवस्था के संसदीय प्रणाली की सत्ता में राष्टपति / राष्ट प्रमुख सिर्फ " राज " करता है , "शासन" नहीं ,इसकी भी समझ उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को नहीं है ,काफी चिंता जनक स्थिति को बयां करता है । राज्य में राष्टपति लागू किया जाना अवैध है ,तब इसके लिए आलोचना के पात्र संघ/केंद्र सरकार है ,न कि राष्टपति के पद पर आरूढ़ व्यक्ति प्रणव मुखर्जी , राष्टपति कैसे संघ सरकार /मंत्रिमंडल के सलाह/परामर्श को ठुकरा सकते हैं, यदि वह पहली बार अपनी सहमति/हस्ताक्षर देने /करने से इंकार करते हैं ,तब फिर पुन ; उसी सिफारिश को उनके पास सरकार प्रस्तुत करती है ,तब वह हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य हैं ,नहीं किये जाने पर उसे राष्टपति की सहमति मान लिया जाता है । ऐसी संवैधानिक प्रावधानों के तहत कैसे मुखर्जी साहेब इंकार कर सकते थे ? ज्ञातव्य है कि संसदीय सत्ता में मंत्रिमंडल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है , न कि राष्टपति के प्रति ,इसका भी उक्त न्यायालय ने ख्याल नहीं किया । आखिर " वैक्तिव " रूप में राष्टपति प्रणव मुखर्जी से भी गलती हो सकती है ,ऐसी टिप्पणी का क्या तुक ? क्या आपको इन सन्दर्भों में नहीं प्रतीत होता कि पिछले कुछेक अर्से से न्यायपालिका अपनी क्षेत्राधिकार से आगे बढ़कर अनावश्यक विवाद को जन्म दे रही है ? 

देश में आपने अक्सर सुना होगा कि राष्टपति/ राज्यपाल , सरकारों को निश्चित अवधि में विश्वास प्राप्त करने के हिदायत/निर्देश देती रही है । क्या ऐसा कहने के अधिकार उन्हें है ? नहीं, इसका कोई  संवैधानिक मूल्य नहीं है ,इसके बावजूद प्रधान मंत्री/ मुख्य मंत्री उक्त हिदायतों को इसलिए मानने के लिए विवश होते हैं कि " उसमे इतना नैतिक बल " अंतर्निहित है कि उसकी उपेक्षा करना किसी सरकार के लिए असंभव तो नहीं ,लेकिन मुश्किल जरूर होता है ,यह उस स्थिति में ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ,जब संविद सरकार की सत्ता होती है । 

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस हो या भाजपा ,इन दोनों का मुकाबला तो झामुमो प्रत्याशी डॉ शशि भूषण मेहता से ही होना तय है  अर्थात अबतक के सामाजिक समीकरण में डॉ मेहता ही अन्य उम्मीदवारों पर भारी पड़ते दिख रहे हैं !

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा के  उप चुनाव में भाजपा पास दमदार उम्मीदवार का टोटा है ,तो कांग्रेस के पास दिवंगत विधायक के पुत्र का आसरा है । ऐसी स्थिति में कैसे दोनों झामुमो के डॉ शशिभूषण मेहता से जीत की होड़ कर पाएंगे ? 

मैंने कहा -नहीं ,नहीं  उनने कहा-- ' ऐसे कैसे हो सकता है , आप पहली बार मिले हैं, पी कर ही जाना होगा' मैंने पुन :  कहा-  'फिर कभी मुलाकात में पी लेंगे'  उन्होंने जोर देकर कहा - "कल को किसने देखा है ,आज भेंट हुई है तो आज ही क्यों नहीं ' यह सुनना था कि मुझे आभास हुआ कि 'उनके मन में तूफान चल रहा है ,तभी तो उनके मुख से अनायास वैसी बात निकली'  क्षणभर के लिए मैं सिहर उठा और अबतक मेरे कानों में वो  शब्द गूंज रहे हैं , सोचता हूँ कि  कहीं उनने कोई ऐसा-वैसा कदम न  उठा ले ! 

कूटनीति/चीन सरकार द्वारा घोषित उईगर मुस्लिम  आतंकी ईसा को दिए गए भारतीय वीसा  को सरकार ने रद्द कर दिया है , आपके नजरों में मोदी सरकार का यह कदम कैसा है ?

झारखण्ड/ पांकी विधान सभा के उप चुनाव में झामुमो-कांग्रेस के उम्मीदवार करीब -करीब तय हैं ,फिर भाजपा के प्रत्याशी तय करने में देर का मतलब क्या है ? क्या भाजपा आयातित उम्मीदवार के बल  चुनाव जीतने की कसरत कर रही है ?

झारखण्ड/ गोड्डा में थोड़ा संशय है ,संदेह इसलिए कि वहां उलट-पुलट होते रहे हैं ,लेकिन पांकी में भाजपा की उप चुनाव में हार निश्चित है !  

झारखण्ड/ क्या पांकी विधान सभा क्षेत्र के लोग डालटनगंज की तरह अधकचरे प्रतिनिधित्व को अपनी नुमाइंदगी करना पसंद करेंगे ,जैसा कि दो राष्टीय पार्टियों से युवा लेकिन अनुभवहीन उम्मीदवारों के उप चुनाव में कूदने की बात सामने आई है ।

झारखण्ड/ मेदिनीनगर- शहर में अवांछित तत्वों की दुस्साहस इतनी बढ़ती जा रही है कि उसका एक शिकार होते-होते मैं खुद बचा हूँ । वाक्यां गत रात तक़रीबन दस बजे की है ,हर रोज की भांति मैं जेलहाता निवास से सुदना स्थित अपने आवास की तरफ कदम बढ़ा रहा था ,तभी रेलवे ओवरब्रिज  मध्य पहुँचने पर अचानक बाइक में सवार दो युवक मुझे घेरते हुए स्टेशन जाने  रास्ते पूछने लगे ,जिसे बताते हुए मैंने अपनी चाल तेज़ कर दी । अंकल ,अंकल कहते हुए तभी पीछे बैठा हुआ शख्स उतरा और एक झपटे में मुझे गला दबाने में ताकत झोंक दी ,इस अप्रत्याशित  हमले से खौफ खाकर मैंने अपने बचाव में उसके जबड़े पर कसकर मुक्का दे मारा ,जिससे वह गिर पड़ा , फिर तेज़ आवाज में दौड़ते हुए ब्रिज के नीचे पहुंचा ,लेकिन तबतक दोनों भाग चुके थे ,शोर सुनने पर आस-पास के लोग जमा हुए ,फिर उनको ढूंढने की बात हुई ,खैर ,इस वारदात में मेरे  गर्दन -चेहरे में बदमाश के नाख़ून गड़े , इस तरह की घटना ओवर ब्रिज पर पहले भी कई दफे हो चुकी है इसके बावजूद पुलिस सचेत नहीं रहती ,प्राथमिकी दर्ज़ कराने लिए कदम बढ़ाये ,मगर क्या बगैर प्रत्यक्ष नुक्सान के पुलिस कभी किसी के मामले आजतक दर्ज़ की है ! यह सोचकर मैंने इसकी उपेक्षा कर दी ।  यह हमला तात्कालिक था या फिर सुनियोजित ,इस बारे में  फिलवक्त निश्चित होकर कह नहीं सकता । 

झारखण्ड के पांकी विधान सभा के उप चुनाव में भाजपा द्वारा लाल सूरज को दिए गए टिकट को अगर " प्रतिमान " माने ,तो साफ जाहिर होगा कि यह पार्टी अब दल न होकर " गिरोह " में तब्दील हो गई है ! सूरज कल तक झामुमो के थे । 

कभी - कभी यह जीवन " निस्सार " होने की अनुभूति देती है , न जाने कब ,कौन ,क्या अनहोनी प्रत्यक्षमान  हो जाये ,निश्चित नहीं है ,शायद यह भौतिकवादी प्रवृत्तियों के प्रभावी होने की वजह से है ,या फिर और कुछ ,जिसमे एक लक्षण  "अभिसार" की प्रक्रिया भी है ! 

Friday, 22 April 2016

commentry on political system in india

क्या आपने गौर किया है ? अपने को इस्लामिक देश कहलाने में गौरवान्वित होने वाले दुनिया में ही सर्वाधिक हिंसा होते है !
कूटनीति - भारत के लिए पड़ोसियों में एकमात्र पाकिस्तान सिरदर्द है ,लेकिन प्रतिस्पर्धी चीन तो सभी पड़ोसियों से तीखा मतभेद है , ऐसे में चीन किस भ्रम में है ! वह भारत के विरूद्ध साज़िश रचने में पाक का सहारा लेता है ,मगर भारत उसे घेरने में जापान, ताइवान,वियतनाम ,सिंगापूर ,थाईलैंड ,दक्षिण कोरिया ,मलेशिया या समझें उसके ही पीली नस्ल वाले देशों साथ है ,इसलिए चिन से खौफ खाने की जरूरत नहीं है !

पेयजल/पानी संकट  से निजात पाने  का  एकमात्र उपाय और हल यह कि समुन्द्र में गिरते पानी को नदियों में बांध जहाँ-तहां बनाकर रोक दिया जाय अर्थात भगीरथ प्रयास की जरूरत है । 

आर्थिकी/ विजय माल्या एक नमूना है , आखिर विकास और उससे पैदा होने वाले रोजगार को ध्यान में रखकर सरकार/बैंक कबतक नब्बे फीसदी लोगों के अरमानों को कुचला जाता रहेगा ? जो बड़े कर्जदार हैं ,उनके संपत्तियों /उद्योगों/उपक्रमों को क्यों नहीं ,उनके ही कामगारों के बीच वितरित कर दिया जाता ? देश के टैक्सों से ही तो आखिर धूर्त कारोबारी/ अफसर/नेता/मंत्री वगैरह पलते हैं ,फिर व्यवस्था भी तो लोकतान्त्रिक है ,ऐसे में कठोर कदम उठाने से परहेज कैसा ?

अरस्तु ने कहा - मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है ,मगर हॉब्स ने कहा - नहीं , मनुष्य स्वार्थ से सामाजिक प्राणी है । अब बताइए ,दोनों में कौन सत्य के करीब है ?

मार्क्स ने कहा कि -दुनिया ,पदार्थ अर्थात अर्थ से गतिमान है अर्थात पैसे की ही महत्ता है ,लेकिन हीगल ने बताया कि -नहीं ,व्यक्ति की जीवन शैली में 'विचार' ही वह तत्व है ,जिससे संसार संचरित है । इन दोनों ,दार्शनिकों में किनका कथन सच प्रतीत है ? 

भारतीय राजनीती इतनी घटियापन में उतर गई है कि मत पूछिए , नरेंद्र मोदी से उनके माँ और पत्नी को कोई शिकायत नहीं है ,इसके बावजूद इन दोनों को लेकर विकृत मानसिकता  राजनीतिज्ञ जब-तब आलोचना/ व्यंग्य बाण करते रहते हैं । इनके हवाले से अगर कोई आपत्ति/विरोध  होती ,तब बात समझ में आता ,लेकिन अबतक वैसा कुछ भी सामने नहीं आया है , फिर मोदी की परस्पर रिश्ते को लेकर सार्वजनिक क्षेत्र/ चर्चा में ,हाय-तौबा क्यों ? 


झारखण्ड/ क्या आजसू सचमुच में घोषित स्थानीयता नीति के विरूद्ध है ? इस दल का शीर्ष नेतृत्व राज्य स्थापना काल से 'चिकनी-चुपड़ी' राजनीती करता रहा है ,फिर कैसे सत्ता से अपने को विलग रख सकता है ? याद है आपको , आजसू के चन्द्र प्रकाश चौधरी ,भाजपा विरोधी दल में मंत्री रहे है तो पार्टी प्रमुख सुदेश महतो ,भाजपा के साथ विरोधी बेंच पर बैठते रहे थे !दोगली  राजनीती का यह चेहरा --

पाकिस्तानी हुक्मरान/कूटनीतिज्ञ ,नरेंद्र मोदी को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं ,जितना जल्द पाक ,मोदी के व्यक्तित्व अर्थात प्रवृति  को जान ले ,उतना उसके अस्तित्व के लिए  में बेहतर होगा ,अन्यथा दुनिया से मिटने के लिए तैयार रहे ! अमरीका-चीन कुछ भी पाकिस्तान के काम नहीं आएगा । 

चीन के साथ भारत ने मसूद अजहर को लेकर जिस तरह की विश्व राजनय की नीति अपनाने की रणनीतिक चेष्टा कर रहा ,तय मानिए ,आने वाले समय में संयुक्त राष्ट संघ अप्रसांगिक हो जायेगा ! 

झारखण्ड/ क्या घोषित स्थानीयता नीति को लेकर प्रतिपक्ष रघुबर सरकार के विरुद्ध सशक्त आंदोलन कर पायेगें ?

इस आभासी संसार में भांति- भांति के जीव -जंतु विचरण करते हैं और इसमें कुछेक प्राणी ऐसे भी हैं ,जो इसे दिल से लगा बैठते हैं । इस बारे में आपके क्या ख्याल है ?

क्या आपको ऐसा प्रतीत नहीं होता कि बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार अब भाजपा के मुकाबले में खुद के चेहरे  चमकाने के खातिर अतिरेक भरी राजनितिक चालबाजियों को हवा दे रहे  हैं ! 

कांग्रेस  दोगली चाल देखिये -बंगाल में वामपंथ से नरम रिश्ते रखकर भविष्य की राजनीती के आसरे हैं ,तो केरल में वामपंथियों से खुल्ला विरोध में है !

कूटनीति/ क्या भारत "बाज़ारू माल " हो गया  है, जैसा कि चीन सरकार नियंत्रित अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' ने कहा है । उसके मुताबिक हमारा देश अमेरिका और चीन को रिझाने के प्रयास में है ,ताकि खुद को सुन्दर नारी(अंतराष्टीय  वधु) की तरह प्रस्तुत करके विकास/रोजगार के निमित्त पूंजी निवेश आकर्षित कर सके ! 

झारखण्ड/ राज्य में सड़कों पर अराजकता देखिए-रोज दुर्घटनाओं में मरने की ख़बरें आती हैं ,मगर सरकार/प्रशासन चेतने को तैयार नहीं , अराजकता का आलम यह है कि दो पहिया हो या चार पहिया या फिर भारी  गाड़ियां ,सभी के रोशनियाँ रोड़ों पर नहीं बल्कि छितराए हुए ऊपर की ओर है  तब लोग मरें नहीं तो क्या करें ? ध्यान रहे ,अधिकांश मार्ग दुर्घटनाओं में अस्सी फीसदी शिकार रौशनी में आँखों के चौंधियाने से होती है !

झारखण्ड/ बोकारो-हजारीबाग में हुए सांप्रदायिक दंगे नियोजित दिखे ,फिर कहां है राज्य का ख़ुफ़िया महकमा ,आखिर यह किस मर्ज़ की दवा है ? सरकार / पुलिस महानिदेशक डीके पांडेय की निगरानी में यह चूक एक बानगी भर है । पिछले डेढ़ सालों के आपराधिक/उग्रवादिक घटनाओं के तफ़सीलात में जायेंगे ,तब पाएंगे कि नब्बे फीसदी मामले सुनियोजित थे और इसके पूर्व सुचना/ जानकारी स्थानीय पुलिस/ख़ुफ़िया तंत्र को नहीं थी । फिर क्यों मुखबिरी / विशेष पुलिस अधिकारी (spo ) के ऊपर करोड़ों रूपये खर्च करने का क्या मतलब ? क्या इस मद में लूट होने की आशंका नहीं दिखती ?
 जिस देश में ,विशेषकर लोकतान्त्रिक सत्ता में लोग पानी के लिए 'बिलबिलाते' हों ,उस राष्ट में सरकार होने का कोई अर्थ नहीं !

लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सरकारें 'मूल काम' क्यों नहीं करने में दिलचस्पी लेती ? पानी ,बिजली,चिकित्सा और आहार ही तो मुख्य जरुरत राजा भोज से लेकर गंगुआ तेली तक को दरकार रहती है ,फिर भी इसे उच्च प्राथमिकता न देकर 'अय्यासी वाले' कामों में अभिरुचि लेती सत्ता नजर आती है ,ताकि उसमे ऊपरी आमद अर्थात कमीशन प्राप्त किया जा सके ! 

नरेंद्र मोदी बार -बार जोर देकर कहते हैं कि २१ वीं सदी भारत की होगी । इसके निहितार्थ अगर आप समझते हैं ,तब सोचिये जनाब ! इस शब्दावली के क्या तात्पर्य हो सकते हैं ?

झारखण्ड/ क्या आपने एक बार भी मुख्य मंत्री रघुबर दास को  मुख्य सचिव/पुलिस महानिदेशक से किसी आपत्तिजनक मामले/घटनाओं के बारे में जवाब -तलब करते देखा/पूछते पाया है ?

पी चिदबरम्ब क्या बोलेंगे इशरत जहाँ मामले में , यह वही शख्स है न ,जिसने केंद्रीय गृह मंत्री रहते मुसलमानों की तरफदारी करते हुए 'भगवा आतंकवाद' शब्द को गढ़ा था !
उत्तराखंड मामले में उच्च अदालत ने केंद्र सरकार/भाजपा को ऐसी चपत लगाई है कि मत पूछिए , संसदीय प्रणाली की सत्ता में जब राज्यपाल् ने विश्वास मत की तारीख तय कर दी थी ,तब उसके बीच में ही राष्टपति शासन थोपने की क्या जरूरत थी ? , लोग लोक-लाज और संवैधानिक स्थितियों का इतनी सतही  जानकारी  भाजपा के लीडरान को है ,यह मुझे नहीं मालूम था !
देश में अब वामपंथ की राजनीती के दिन लदने लगे हैं ! यद्धपि वाम दलों के पास बेहतरीन नेताओं की जमावड़ा है ,लेकिन दिक्कत है कि प्राय सारे  के सारे जन जुड़ाव से "वैक्तिव " रूप में कट चुके हैं और रही -सही कसर पूंजी पर आधारित राजनीती ने इनको राष्टीय स्तर पर अप्रासंगिक बना दिया है --
मुख्य मंत्री रघुबर दास के लिए गोड्डा-पांकी विधान सभा के उप चुनाव अग्नि-परीक्षा है ! क्या वह भाजपाई अंतर्विरोधों से उबर कर सरकार के डेढ़ सालों में किये गए कामों को लेकर उक्त चुनाव में अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे ?

Sunday, 10 April 2016

commentry on political system

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने वाशिंगटन में 'संयुक्त राष्ट संघ को आतंक के प्रश्न पर  अप्रसांगिक होने के   खतरे  ओर इशारा करके भविष्य की भारतीय कूटनीतिक कदमो के संकेत कर दिए हैं !' अब दुनिया अपने -अपने हितों के अनुरूप अभी से मित्र चुन ले ,तो बेहतर होगा । 

झारखण्ड/ राज्य में पहले लोहरदगा विधान सभा के उप चुनाव ने सत्ताधारी समूह को झटके दिए और अब पून ; गोड्डा/पांकी में उसकी पुनरावृति होने के आसार हैं , ऐसा सामाजिक समीकरण की स्थिति बताती है ! 

झारखण्ड/ मुख्य मंत्री रघुबर दास के लिए आसन्न गोड्डा /पांकी विधान सभा के उप चुनाव 'क्या वाटर लू ' सिद्ध होने जा रहे हैं ?

झारखण्ड-- पांकी/गोड्डा की सामाजिक स्थिति राजद और भाजपा के माफिक है ,जिसमे पांकी में 'शख्सियत'  एक जबरदस्त कोण है ,जिसे झामुमो पकड़ कर दोनों  खेल बिगाड़ सकती है अर्थात एक तरफ संप्रग   तो दूसरी तरफ राजग के बीच कल्पना के विपरीत परिणाम की 
संभावना भी उत्पन्न है !

क्या आपको नहीं प्रतीत होता कि " भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था (indian democratic system) मुर्ख बनाने वाली व्यवस्था में तब्दील हो गई है ? "

कला के क्षेत्र में "व्यभिचार" काफी है अर्थात कला का दूसरा स्वरूप व्यभिचार पूर्ण रिश्ते से है !

भारतीय बैंकों में भारतीय नागरिको द्वारा टैक्स चोरी अर्थात काला धन विदेशी बैंकों में जमा करने वाले देश द्रोही हैं ,यह जानते हुए कि हमारा देश 'विकसित नहीं बल्कि विकास उन्मुखी' है ,जबकि  जमा  पूंजी की दरकार सतत रूप से भारत को है । 

अमिताभ बच्चन ,ऐश्वर्या रॉय जैसे भारतीय नागरिक सार्वजनिक रूप से अर्थात सरकारों द्वारा "नायकत्व" के तौर पर प्रेरित किये जाने वाले शख्सियत रहे हैं ,फिर पनामा पेपर्स में विदेशी बैंकों में इनके धन पाए जाने से यह मालूम होता है कि अधिसंख्य सेलीब्रेटीज अर्थात चर्चित हस्तियों  के अपने -अपने गोरख धंधे रहे हैं ,फिर लोग प्रेरणा लें तो किससे ? 

सेठ लोगों का अर्थात पूंजीपतियों के विदेशों में धन जमा है , यह बात तो समझ में आती है ,जो कारोबारी हैं ,मगर जो गोल-गोल बात करने वाले राजनीतिज्ञ/क्रियाविद  हैं ,खासकर जिनके व्यक्तित्व फक्कडनुमा दिखती रही है ,उनके पास अकूत दौलत जमा रहने का  क्या मतलब ?

अगर नरेंद्र मोदी विदेशी धन के उजागर होने के बाद इसके चपेट में आये तत्वों के खिलाफ त्वरित कदम नहीं उठाते ,तब तय मानिये इनके व्यक्तित्व में शनै -शनै क्षरण होना शुरू हो जायेगा !

खबर है कि बिहार में 'स्काईट्रांन' के जरिये नितीश कुमार राज्य की परिवहन व्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन लाने के प्रति निशचय कर लिया है अर्थात खंभों के जरिये कारनुमा डिब्बे के जरिये चुंबकत्व के बल यह अट्ठारह-बीस फीट की ऊंचाई पर दौड़ेगी ,जिसे 'नासा' के ईजाद तरकीब से पूर्ण किये जाने हैं ,है न बुलेट ट्रेन का जवाब ,जो सस्ता और आसान होने के साथ  कम समय में दुरी नापने की कोशिश ,गति २६० किमी प्रति घंटा --

बिहार/ ताड़ी को प्रतिबंध से बाहर कीजिये मुख्य मंत्री नितीश कुमार जी ,कुछ सामाजिक संवेदनशीलता को बूझिये ,अन्यथा --

योगगुरू रामदेव के  दिमाग में भूंसा भी है ,यह मैं नहीं जानता  था ,मगर जब उन्होंने यह कहा कि ' कानून का ख्याल नहीं होता ,तो भारत माता की जय नहीं बोलने वाले लाखों के सिर कलम कर  देता' का अर्थ है कि यह शख्स  घोर अराजकतावादी है ,इसे कैद में होना चाहिए ! 

क्या झारखण्ड के पांकी विधान सभा के आसन्न उप चुनाव में भाजपा आयातित उम्मीदवार के बुते मैदान में कूदने पर विचार कर रही है ? 

झारखण्ड / राज्य में सरकारी तंत्र कैसे हैं ? इसे जानिए --पलामू जिले में के श्रीनिवासन के जगह पर कुछेक दिन पहले अमित कुमार जिलाधीश के रूप में पद  स्थापित हुए और पद ग्रहण के अगले दिन उन्होंने अचानक पांच प्रखंडों के निरीक्षण करके २७ कर्मचारियों के अनुपस्थित पाए जाने पर उनके एक दिन  वेतन काटने के आदेश दे डाले । सवाल है कि गैर हाज़िर रहने वाले सहायकों,लिपिको और अन्य कर्मियों के विरूद्ध प्रखण्डधिकरी (BDO) भी तो उक्त कदम उठा सकते थे ! फिर उपायुक्त ने लापरवाह,अकर्मण्य ,काम में दिलचस्पी नहीं लेने वाले प्रखंडाधिकारियों के ऊपर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की ?

जिन भारतीय नागरिको के विदेशी बैंकों में वैध-अवैध खातों में क़ानूनी -गैर क़ानूनी तरीके से 'धन' जमा है ,क्या उनको देशभक्त माना जा सकता है ? जबकि यह जानते हुए कि देश को फिलवक्त तेजी से विकास करने  लिए काफी पैसे की जरूरत है ! 

टीवी तारिका  प्रत्युषा बनर्जी की मौत को एक वाक्य  में समझिए कि 'वह चकाचौध की दुनिया में अपनी कामयाबी को संभाल नहीं पाने की वजह से शिकार हो गई ' ! 

लालकृष्ण आडवाणी की अर्धांगिनी कमला जी नहीं रहीं, यह जानकर मुझे काफी दुःख हुआ ,कभी मैं पंडारा पार्क में उनके पिछवाड़े के बंगले में रहा करता था ,बात १९९०-९४ की है ,अक्सर वह कुतूहलवश मुझे देखते हुए बोलती थी कि दिल्ली में क्या पाते हो , मेरा मजाकिया जवाब होता था ,आपको पाता हूँ  न , तब वह कर्कश आवाज में कहती थी ,आओ तुमको मिठाई खिलाती हूँ ,सचमुच में एक अनजान युवा के प्रति उनका स्नेह ऐसे उमड़ता प्रतीत होता ,जैसे में उनके अपना ही पुत्र था ,मेरी विनम्र श्र्द्धांजलि -- विशेष बाद में --

झारखण्ड/ गोड्डा और पांकी विधान सभा में क्रमश; एक में भाजपा डूबती-उगती रही है ,लेकिन दूसरे में आजादी के बाद अबतक एक भी खाता नहीं खोल सकी है , ऐसे में आसन्न उप चुनाव में कैसा रहेगा नतीजा ? यह जानना सत्ताधारी वर्ग के लिए काफी दिलचस्प होगा । 

झारखण्ड/ राज्य सरकार में अब तू -तू, मैं -मैं की शुरूआत हो चुकी है और यह शुरू किया है मुख्य मंत्री रघुबर दास ने ,जिसके प्रत्युत्तर में हाजिर हुए हैं उनके मातहत मंत्री सरयू राय !

कश्मीर में एनआईटी में हुए दो छात्र समूहों के बीच झड़प में स्थानीय पुलिस ने देश समर्थक छात्रों पर लाठियां भांज कर अच्छा  संकेत नहीं दिया है ,क्योकि पाक झंडे के साथ अपने को जोड़े छात्र समूह स्थानीय थे ,तब भविष्य  क्या होगा ,सोच ले मोदी सरकार --

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ,चीनी राष्टपति शी जिन पिंग के साथ अपने घर में एक  ही झूले में गलबहियां कर रहे थे ,तो अमरीकी राष्टपति बराक ओबामा के साथ अपने हाथों से चाय पिलाकर मिजाज पुर्सी में तल्लीन नजर आये थे , अब जबकि चीन ने मंसूर अजहर के सवाल पर संयुक्त राष्ट संघ में भारत को ठेंगा दिखा दिया ,तो अमेरिका ने लड़ाकू विमान/हेलीकाप्टर देकर पाकिस्तानं को सज्जित कर दिया । क्या यह मोदी की कूटनीतिक विफलता नहीं है ? 

बिहार/ राज्य में शराब बंदी लेकर कतिपय अर्थवेत्ताओं /राजनीतिज्ञों ने राजस्व की क्षति पर गहरी चिंता प्रकट की ,इसपर मुख्य मंत्री नितीश कुमार का जवाब था- लोक कल्याण से बड़ा राजस्व नहीं हो सकता । यथार्थ में राजकोष आखिर लोकतंत्र में क्या  मतलब ?  वाह नितीश ,तेरा जवाब नहीं -

इस सदी का सबसे बड़े 'नाटकबाज' का दुनिया में अभ्युदय हो चूका है मित्रों ,सावधान  !

क्या नरेंद्र मोदी आएसएस का मोहरा हैं ? नहीं ,जो सोचते हैं कि वह संघ के इशारों पर नाचने वाले कठपुतली मात्र हैं ,तो वे मुगालते में हैं । मोदी ,सिर्फ इतना भर आरएसएस का ख्याल करते हैं कि यह उनके महत्वकांक्षा में सहायक की भूमिका में रहे । इससे अधिक नहीं । मोदी को इतिहास पुरूष/ युग पुरूष होना है ,इंतजार सिर्फ प्रणव मुखर्जी के राष्टपति के पद से निवृत होने भर का है ,फिर देखिये इनकी तूफानी चाल !

साबुन / मैं हफ्ते भर से अपने शहर मेदिनीनगर में 'मोती' साबुन को तलाश रहा हूँ ,लेकिन मुझे लाख खोजने के बाद भी नहीं मिला । वैसे ,मैट्रिक के बाद मैं अफगान ऑटो के खस साबुन सेवन करने का अभ्यस्त हूँ , यह खोज मेरे लाडले की पहल पर थी ,जिसे मालूम था कि दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे वहां अफगान खस आसानी से उपलब्ध नहीं होता था ,तब विवशता में मोती के गुलाब इस्तेमाल किया  करता था ,सो उसे दिखाने के वास्ते उसे खोज मारा । लगता है मोती प्रचार/विज्ञापन के बाजार की भेंट चढ़ गया ! 

झारखण्ड/ राज्य के घोषित अधिवास नीति को लेकर विरोधी मुख्य मंत्री रघुबर दास का क्या बिगाड़ लेंगे ? आखिर खिलाफत करने वाले तत्व अर्थात प्रतिपक्ष/पक्ष के जेहन में क्या है ? है हिम्मत तो उसके बारे में अपने -अपने नजरिये को क्यों नहीं सामने रखते ? चित्त भी मेरी और पट भी मेरी ,ऐसा नहीं होता । दोगली /दोहरी राजनैतिक मंशा से लोगों को ज्यादा दिनों तक गुमराह नहीं किया जा सकता ! इसे विरोधी जितनी जल्द समझ लें ,उनके हित  में बेहतर होगा । 

Wednesday, 30 March 2016

commentry on indian political system


दाम्पत्य जीवन में आवारगी की तरह रहने वाले शशि थरूर क्या जाने कि "भगत सिंह " क्या थे ! 

झारखण्ड/ राज्य में कांग्रेसियों का दिमाग ख़राब हो गया है , वे आजकल लातेहार में लुटेरों के हाथों मारे गए दो पशु व्यापारियों के मामले को 'राष्टीय मुद्दा' बनाने की कोशिश में हैं , जो इत्तफाक से अल्प संख्यक समुदाय से जुड़े थे,जबकि यह विशुद्ध रूप से आपराधिक मामला है । इनकी चाल देखिये , कांग्रेस हत्या के शिकार परिवार को एक-एक लाख रूपये दिए ,उसे आश्रितों ने ले भी लिया ,लेकिन इसके पहले सरकार ने एक-एक लाख रूपये देने की पहल अनुग्रह राशि के तौर पर की ,जिसे ग्रहण करने से उनके परिजन यह कहकर  इंकार किया कि मुख्य मंत्री आकर उनसे मिले तब वह मानेंगे । क्या सामाजिक/राजनैतिक स्थिति है ?
झारखण्ड/ राज्य के शीर्ष नौकरशाह राजीव गौबा अब केंद्र सरकार की सेवा में हैं ,इनके मुख्य सचिव काल को आप किस रूप में देखते हैं ?
" मिस्टर प्राइम मिनिस्टर , बेतला नेशनल पार्क में १४ लंगूर इसलिए मर गए कि उनके पेट में पानी और भोजन नहीं थे ,यह मैं नहीं कह रहा , उनके हुए पोस्टमार्टम रिपोर्ट ऐसा कह रही है , क्या इसके बावजूद पलामू 'अकाल' क्षेत्र घोषित किये जाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है ? 
   ' वही तो बात करने के लिए यहाँ आया हूँ, बिहार को १८८ करोड़ रूपये के पैकेज राशि सूखे से निजात पाने के लिए दे रहा हूँ'
मेरे इस सवाल पर यह कहते हुए प्रधान मंत्री पीवी नरसिंह राव मेदिनीनगर के चियांकी हवाई अड्डे पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस से उठ गए । यह वाक्या १९९३-९४ की है ,जब पलामू में जानवर क्या आदमी क्या , सूखे/अकाल जनित प्रभावों से काफी मर रहे थे और सरकार अकाल की स्थिति तो मान ही  नहीं रही थी ,सूखे की विभीषिका भी मानने से परहेज कर रही थी । तब मैं uni का प्रतिनिधि था । 

देश में जहाँ कहीं भी अंतरधार्मिक व्यक्ति या व्यक्तियों के  बीच आपराधिक कृत्य होता है ,तो क्या वह सांप्रदायिक हो जाता है ? जैसा कि झारखण्ड के लातेहार जिले में विगत दिनों अल्पसंख्यक समाज के दो पशु व्यापारियों की हुई हत्या के मामले में कतिपय क्षेत्रों में प्रतिक्रिया हुई है ! इस सिलसिले में आज पलामू  जिला झामुमो के सचिव मनुव्वर जम्मा खान से स्थानीय मेदिनीनगर के वकलतखाना  में मुलाकात हुई ,तब उन्होंने कहा कि " आप कैसे कहते हैं कि पशु व्यापारियों की हत्या सिर्फ अपराध भर है ? उनका कहना था कि उनकी हत्या सुनियोजित है और यह असहिष्णुता से जुड़ा है और इसको शह देने वाले भाजपा और आरएसएस से जुड़े तत्वों का है । इसके प्रत्युत्तर में मैंने उनको जवाब दिया कि अगर हर आपराधिक वारदात को अंतरजातीय / अंतरधार्मिक नजरिये से देखा जायेगा ,तब कानून व् व्यवस्था के साथ न्यायिक क्षेत्रों में विकट स्थिति पैदा होगी ,जोर जबरदस्ती का साम्राज्य उत्पन्न होंगें और व्यवस्था  समक्ष हर वक्त संकटापन्न के हालात मौजूद रहेंगे । वैसे ,इन जैसे मामलों के लिए विपक्ष/पक्ष का अपना दृष्टिकोण तो दलगत आधार पर होते ही हैं जो आजकल दिख भी रहा है ! यह बातचीत थोड़ी लंबी खिंच गई जिसमे उन्होंने सवाल खड़ा किया कि "हिन्दुओं के लिए जैसे 'गाय' आस्था का प्रश्न है ,वैसे मुसलमानों के लिए 'सूअर' नापाक पशु है ,फिर इसकी खुलेआम मारे जाने और खाने की क्या जरूरत ? इसपर  भी प्रतिबन्ध लगना चाहिए । 

व्यवस्था अर्थात सिस्टम क्या होता है ,यदि इसे जानना है तो हाल में बिहार में घटित तीन मामलों का अध्यन कीजिये । पहला - सत्ताधारी वर्ग से बलात्कार में आरोपित एक विधायक(राजद) की क्या दुर्दशा हुई ,इसे बताने की जरूरत नहीं है । दूसरा - सत्ताधारी वर्ग के ही दो विधान मंडल सदस्यों  (जदयू) ने अलग-अलग विषयों पर ऊंट-पटांग बात कही ,फलत; दोनों पार्टी से तुरत निलम्बित हुए और तीसरा यह कि कुछेक दिन पहले एक मंत्री ने सजा -याफ्ता कैदी से जेल में जाकर मुलाकात की ,परिणामत;जेल अफसर मुअतल हुए । अब कितने लोग है ,जो जानते हैं कि " व्यवस्था का अर्थ अनुशासन है " ! 

झारखण्ड/ राज्य में अराजकता कैसी है ? इसे समझिए - पेयजल अफसर बाजार में है ,उसके नजरों में पाइप से पानी रिसता दीखता है ,वह उपेक्षा करके आगे बढ़ जाता है , बिजली अभियंता टहलने निकलते है और देखते है कि बिजली खंबा टेढ़ा है तथा बिजली के तार निचे झुके हुए हैं ,यह  कभी हादसे को अंजाम दे सकते है ,वह भी इसे नजरअंदाज   करते हुए चल देते हैं , डाक्टर सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त एवं घायल व्यक्ति को देखकर आगे बढ़ जाते हैं , पुलिस सामने मारपीट या कहिये अपराध होते देखते हैं ,उसे ओझल होने देते हैं ,फिर किसी के प्राथमिकी दर्ज़ कराने  के इंतज़ार करते हैं ,स्थानीय निकाय अफसर रोज गंदगी के अम्बार देखते रहते हैं ,मगर उसके समाधान की दिशा में पहल करने से कतराते हैं । उच्च राज कर्मी अपने मातहत कर्मचारियों को रोज आदेश/निर्देश देते हैं ,फिर उसके परिपालन भी हो रहा है ,क्या उसे संज्ञान में रखते भी हैं ?इसी तरह के नज़ारे प्राय  हर क्षेत्रों में हैं । सवाल है कि आखिर ऐसी  क्यों स्थिति उत्पन्न हो गई है ? 

क्या आपको नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी की केंद्रीय सरकार " राजकीय टैक्स वृद्धि" पर जरूरत से ज्यादा जोर दे रही है ?

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का यह बयान कि निजी क्षेत्रों में भी 'आरक्षण' लागू किया जाना चाहिए ,क्या आपको बचकाना  नहीं लगता ? अब उनको कौन समझाए कि निजी हल्कों में पूंजी निवेश भी निजी जोखिम पर होते हैं ,फिर सार्वजनिक क्षेत्रों की तरह इनके कारोबार 'कल्याणकारी अवधरणा' से उत्प्रेरित नहीं होते ,इनके लिए सिर्फ और सिर्फ मुनाफा ही मुख्य ध्येय होते हैं ,फिर आरक्षण कैसे ?

हे रामा गोरे ,
गोरे ये बहियां ,
में हरी-हरी चूड़ियां हे रामा , 
हरी -हरी , 
लीलरा पर शौभेला टिकुलिया , 
ये रामा ,हरी -हरी । 
चैत माह में गया जाने वाला यह लोक गीत मैंने किशोर वय के दौरान  लातेहार में रहने के दौरान सुना था ,जो आज भी दिल को गुदगुदाती है , उस काल में वहां अक्सर रईसों के आवास/प्रतिष्ठानों में "चैता गीत" के आयोजन होते रहते थे ,जो अभीतक मेरे मानस पटल में सचित्र अंकित पाता हूँ--

फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ,क्रिकेटर विराट कोहली की कौन लगती है ,जिसे मजाक बनाना उनको बुरा लगता है ? क्या अनुष्का ,विराट की 'व्यक्तिगत सम्पति' है ? जीवन में हर कोई का किसी से भावनात्मक रिश्ते होते हैं ,फिर कौन-कौन को किससे -कैसे प्रतिक्रिया करने पर रोक सकेंगे ! सार्वजानिक जीवन में यह सब हमेशा चलते रहने वाली प्रक्रिया है कोहली साहेब, दिल-दिमाग को जरा खोल कर रखिये - भारतीय सभ्यता-संस्कृति के विपरीत  पाश्चात्य जीवन शैली के अनुरूप आपके अनुष्का से रिश्ते हैं ,जिसे कई भारतीयों को बुरा लगता है, तो क्या आपको --  

वर्ष १९८४ में सिख विरोधी दंगे और २००२ में हुए गोधरा कांड के बाद हुई प्रतिक्रिया में क्या फर्क है ? दोनों में ही तो केंद्र और राज्य सरकार  उसे रोकने में अनमने  थी ! 

उत्तराखंड के बाद अब मणिपुर/हिमाचल की बारी है ,राजनीतिक अस्थिरता के लिए !