Monday, 21 May 2012

वन्य जीव संरक्षण की यह पहल


                   (एसके सहाय)
हाल में "ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्रोग्राम" (जीटीएपी)के कार्यशाला में यह बात रेखांकित होने के खास मायने है ,जिसमे कहा गया है कि भारत में विगत चार के दौरान बत्तीस बाघों की मौतें हुई है ,विशेष इसलिए कि मई २०१२ तक इसमें १४ बाघों के शिकारियों  के हाथों मारे जाने की रिपोर्ट भी शामिल है ,जो वाकई गंभीर और चिंता के विषय है .यह ब्रह्माण्ड के चराचर जीवों के प्रति मनुष्य के क्रूरता को प्रदशित करता है ,जबकि अब यह निर्विवाद रूप से सच है कि "मनुष्य और जानवरों के संघर्ष में हमेशा वन्य जीवन को ही नुक्सान उठाना पड़ता है" इसके बावजूद धरती पर मौजूदा वन्य प्राणियों के प्रति क्रूरता का भाव अब तक बना रहना खास चिंतनीय विषय बने हुए हैं | यह कार्यशाला पिछले १६-१७ मई को नई दिली के विज्ञान भवन में आयोजित थी ,जिसमे पूरे विश्व भर के देशों के प्रतिनिधिक वन्य प्राणियों की सुरक्षा में जुटे विशेषज्ञ उपस्थित थे |
             वन्य प्राणियों के बारें में फ़िलहाल भारत को ही देखें ,इसमें बताया गया है कि ३२ बाघों में मात्र १८ की मौत स्वाभाविक है ,याने बाकी दुर्घटनावश ,जिसमे शिकार भी एक प्रक्रिया है ,के वजह से इस कम होती प्रजाति के लिये खतरे से कम नहीं सिद्द हो रहे | इस कार्यशाला में यह तथ्य भी रेखांकित हुए कि वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवर्धन में नेपाल और रूस के बेहतर रिकार्ड है ,इसमें भी नेपाल में विगत तीन सालों में एक भी बाघ के नहीं मारे जाने की बात सामने है .जो इसके वन और वन्य जीव सुरक्षा के मामले में प्रतिबद्दता  को दर्शाती है ,जो प्रशंसनीय है | 
            वैसे ,भारत में बाघों के संरक्षण की दिशा में १९७२ में ही कदम बढ़ा दिए गए थे लेकिन वैज्ञानिक प्रविधि के अनुसरण में कोताही बरते जाने से इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले ,फिर भी, जो कदम उठाये जा रहे हैं ,उसमे अब पूरी तरह सजगता बरते जाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है | शुरूआती दौर में केवल १३ बाघ परियोजनाए क्रियान्वित थी ,जो अब बढ़ कर ४१ हो गई हैं और यह १७ राज्यों तक विस्तृत है ,इसमें तमिलनाडु के सथ्य्मंगालम और अंदर प्रदेश के कवल वन्य प्राणी अभ्यारण्य हाल में शामिल किये गए हैं |
           २००६ की गणना में १७०६ बाघों के पाए जाने की बात थी ,जिसमें उतरोतर वृद्दि की बातें सामने आई  हैं,लेकिन  २००८ में यह संख्या १४०० होने की बात सामने थी ,और अब यह तायदाद १७१० तक बताई गई है  इसलिए इसे  इसे ज्यादा उल्लेखनीय  माने जाने की तवज्जो में दर्ज नहीं है .यह इसलिए कि अवैध शिकार और व्यापार की आशंकाओं को पूरी तरह निर्मूल अर्थात रोक पाने में अब भी बाघ रिजर्व तैयार नहीं हो सके है ,यही कारण है कि जब - तब बाघों के मारे जाने की खबर आती रहती है | देश में कुल क्षेत्रफल का एक फीसदी भाग ही बाघों के लिये सुरक्षित है ,जिमें विस्तार की योजनाओं पर सरकार विचार कर रही है ,जैसा कि जी टी ए पी के उदघाटन के अवसर पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने संकेत दिए हैं |
        बाघ के संरक्षण और संवर्धन के अभियान में तेरह देश पूरी तरह सम्मिलित हैं ,जहाँ विश्व बैंक इन देशों में इन वन्य जीवों के लिये अपनी तरफ से वित्तीय मदद प्रदान कर रही है ,ऐसे में इस जानवर को विलुप्त होने से बचाने के लिये हर संभव पहल किये जाने की दरकार मनुष्य को है |यह मदद बैंक की २००८ से ही है और इसी के सौजन्य से पहला ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्लान की बैठक १० नवंबर २०१० को सेंट पीटर्सबर्ग में हुई थी और यह दूसरा कार्यशाला नई दिल्ली में संपन्न हुई है |इस बैठक में बाघों के बचाव ,संरक्षण एवं सुरक्षा के प्रति समर्पण भाव से कदम उठाये जाने पर बल दिए गए |  यहाँ यह भी उजागर हुआ कि जो बाघ पालतू हैं ,उसके भी जीवित रखने और इसमें प्रजनन क्षमता को बरकार रखने में मनुष्य कारगर नहीं है ,ऐसे में प्रकृति प्रदत आबो -हवा को इसके लिये इर्द - गिर्द बनाये  रखने पर मुख्य जोर दिए गए |
           फिलवक्त , विश्व में ५००० हज़ार पालतू बाघों के होने की बात कार्यशाला में उजागर हुई है ,जिसमें भारत का प्रदर्शन इसके रख -रखाव के बारे में काफी दयनीय है जिसे निचले सूची में अंकित किया गया है तथा जंगलों में विचरण करने वाले इस वन्य जीवों  की संख्या ३५०० बताई गई है ,जिसे २०२२ तक दुगुने अर्थात ७००० तक किये जाने का संकल्प लिया गया है | वैसे ,भारत में बाघों के लिये ५०००० वर्ग किलोमीटर का ही क्षेत्र अभी सुरक्षित है |

Sunday, 6 May 2012

अहसास सत्ता की


                        (एसके सहाय)
 स्थानीय सत्ता का ,क्या महत्त्व होता है ,इसकी अनुभूति कुछेक दिन पूर्व झारखण्ड के दौरे पर आये केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को हुई ,तभी तो उनके मुंह से अनायास निकला कि "वह अबतक देश में दो सरकारों के अस्तित्व को ही जानते थे लेकिन नहीं अब तीन सरकारें देश में हैं एक संघ ,दूसरा राज्य ओर तीसरा जंगल की सरकार , जिनके बिना कोई भी योजना क्रियांवित होना मुश्किल है |" यह बात जयराम ने लातेहार में पिछले तीस अप्रैल को दौरे करने के बाद रांची में पत्रकारों के समक्ष कही | साफ है कि योजना ,जिस किसी भी सरकार की हो ,उसका उग्रवाद प्रभावित राज्य ,इलाके में तभी क्रियान्वयन संभव है ,जब भूमिगत संघटन इसके लिये मंजूरी देते हों और  यह मंजूरी उसी उग्रवादी संघटन को मिलती है ,जिसमे ठेकेदार कंपनियों के प्रबंधन माओवादी सहित अन्य क्षेत्रीय प्रतिबंधित एवं सक्रीय उग्रवादियों से निर्माण कार्य के लिये अनुमति अपने बूते हासिल किये हो | खुद ,रमेश ने माना है कि राज्य में नौ सडकों का निर्माण इसलिए नहीं शुरू हो सका है कि उग्रवादी इसे बनने नहीं देना चाहते और यह सभी मार्ग उग्रवाद ग्रस्त क्षेत्रों में ही बनना है ,फिर इसे आसानी से कैसे बनाया जा सकता है ,यह केंद्र और राज्य साकार के लिये भारी सिरदर्द है |
        अतएव , अब जब मुख्य मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह राष्टीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के मौजूदा स्वरूप से तारतम्य जोड़ने और तादात्म्य सबंध स्थापित करने की बात ,राज्यों की सरकार से कहते हैं ,तब विरोध कैसा ? यह इसलिए कि देश की अंदरूनी हालात में एक साथ बाहरी और भीतरी संकट व्याप्त है , जिसमे बढती हिंसा के खतरे कम होने के असर दीखते नहीं ,तब इसका सामना और खात्मा कैसे किया जाये ,यह यक्ष प्रश्न वर्त्तमान व्यवस्था के समक्ष गंभीर रूप में उपस्थित है ,जिससे इंकार नहीं किया जा सकता |
       वैसे , कल याने छ मई को नई दिल्ली में  एन सी टी सी पर ,जो कुछ भी विचार राज्यों के मुख्य मंत्रियों की ओर से प्रकट किये गए ,उसमे आतंकवाद की गंभीरता को तो प्राय: सभी ने स्वीकार किया है ,जो यथार्थ में इसकी उपयोगिता के महत्त्व को रेखांकित किया है ,तब विरोध के स्वर कैसा ? यही बात को यहाँ समझने का प्रयास है | प्रस्तावित केंद्र के बारे में गृह मंत्री पी चिंदबरम ने भी काफी सफाई दी है ,लेकिन इसे विपक्ष के मुख्य मंत्रियों ने मानने से इंकार कर दिया है ,जिसमें पहले के केन्द्रीय सरकार की तरफ से उठाये गए कदम है ,जो संशय पैदा करते हैं | ऐसे में इस विषय पर सर्वानुमति हों कठिन है और विचार - विमर्श का यह दौर लंबा चलने की मांग भीं करता है ,वह इसलिए कि एन सी टी सी पर अबतक कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने अपने मुंह सी लिये हैं और इसकी वजह अम्मा सोनिया गाँधी के नाराजगी का डर समझा गया है ,ऐसे में गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने ही विस्तार से इसके खामियों और दुरूपयोग की ओर ध्यान खिंचा है ,जिसमे ओडिसा के नवीन पटनायक ,बंगाल के ममता बनर्जी ,बिहार के नीतीश कुमार ,गुजरात के नरेन्द्र मोदी ,तमिलनाडु के जयललिता ,झारखण्ड के अर्जुन मुंडा ,मतलब कि अबतक बारह राज्यों ने इसके इस्तेमाल पर शक जाहिर करते हुए ,इसमें राज्यों की सहभागिता को केंद्र के बराबर ही आतंकवाद को लेकर "कार्यबल"
 संचालित होने पर जोर दिया है ,ताकि केन्द्रीय सरकार इसके मनमाना इस्तेमाल राज्यों के विधि सम्मत अधिकारों को कुचल नहीं सके ,ऐसा इसलिए कि कानून -व्यवस्था के विषय संवैधानिक रूप से राज्यों के क्षेत्राधिकार में आते है ,जो यह एक मजबूत तर्क भी है , वैसे भी देखा गया है कि क्रिया -प्रतिक्रिया में भी केंद्र -राज्यों के कदम एक -दूसरे के विपरीत उठते रहे हैं ,जैसे -टाडा,फिर पोटा जैसे अधिनियम का इस्तेमाल प्रतिक्रियात्मक स्वरूप में अर्थात कांग्रेस और गैर कांग्रेस केन्द्रीय  सरकारों के काल में हुआ है ,ऐसे में गैर शासित कांग्रेस के मुख्य मंत्रियों का यह मानना कि इसके बहाने राज्यों के मामले में केंद्र की दखलंदाजी बढ़ाने की यह सुनियोजित चाल है ,काफी हद तक राजनीतिक तौर पर उचित ही मालूम पड़ती है |
        ऐसे में .जयराम सरीखे केन्द्रीय मंत्रियों के अनुभव का लाभ संघ सरकार को लेना चाहिए ,जिन्होंने बेबाक तरीके से स्वीकार किया कि उग्रवाद प्रभावित राज्यों में स्थानीय विकास में स्थानीय सरकार अर्थात उग्रवाद को तभी नेस्तनाबूद किया जा सकता है ,जब सामाजिक,शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर विकासगत योजनाओं का व्यापक तौर पर क्रियान्वयन होगा और इन्होने स्वय लातेहार में ४३१ करोड रूपये की आधारशिला रखी , भले ही इन्होने सुरक्षा के साये में ही अपनी कार्य योजना को मूर्त रूप देने की पहल की हो लेकिन खुद बाइक से चाल कर दुर्गम क्षेत्रों में जाकर निर्माणात्मक गत्रिविधियों को गति देना .कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता | जंगल की सरकार का अस्तित्व तभी तक है ,जब तक सरकार से निरीह ग्रामीण या लोग उपेक्षित हैं ,मगर जैसे ही केंद्र या राज्य की सरकार कल्याणकारी स्वरूपों में हाथ बढाती  है तब , इनमें स्वत: स्फूर्त "सिरचन" की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ,तब लोग ही जंगल सरकार के खिलाफत में उठ खड़े होने के लिये तैयार होंगे और फिर किसी एन सी टी सी की जरूरत नहीं रह जायगी |
       जयराम रमेश का यह कदम अपनी ही सरकार की सोच से एकदम उलट है , केवल विधि -व्यवस्था ही शांति स्थापित करने में पहल नहीं करती ,बल्कि विकासगत योजनाएं भी आतंकवाद को सिरे से नकार सकने की क्षमता रखती है | अभी के दलगत सरकारों के अस्तित्व में आसानी से कोई भी सार्थक पहल ,तब तक कामयाब नहीं हो सकती ,जबतक केंद्र  अपने आचरण से खुद को नेक आचरण और काम  करने वाले के तौर पर प्रदर्शित नहीं नहीं करती | फिलवक्त तो संदेह का ही डेरा राष्टीय राजनीती में है ,फिर इसके छाया से आसानी से निकलना तो थोडा मुश्किल है |
    आतंकवाद ,देश को अंदर से खोखला कर रहा है ,इससे इंकार नहीं किया जा सकता ,मगर जिस तरह कांग्रेस सरकार का राष्टीय राजनीती में व्यवहार रहा है ,वही इसके विरोध का मुख्य कारण है ,जो मनमोहन सिंह की सरकार समझ पाने में असमर्थ है | गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य  मंत्रियों के दिए गए विचार स्पष्ट सन्देश दे रहे हैं कि उनको एन सी टी सी से उतना विरोध नहीं है ,जितना इसके दुरूपयोग होने से संशकित है | आखिर आतनकवाद  इनको भी तो खतरा के तौर पर मौजूद है और यह  छिपा सन्देश पढ़ पाने में केंद्र सरकार  भी सक्षम नहीं है ,अन्यथा सहमति नहीं बनने की क्या वजह हो सकती है | केवल राजनीतिक तिकडम से तो सहमति बनती नहीं |


Friday, 4 May 2012

स्थायित्व की खोज में भाजपा की हार


               (एसके सहाय)
 झारखण्ड में राज्य सभा चुनाव के नतीजे विशेष कुतूहल पैदा नहीं करते ,जहाँ केवल "सत्ता" में बने रहने की कला को ही राजनीती का अंतिम ठौर मान लिया गया हो ,वहां तो सरकार के नेतृत्वकारी शक्ति को हारना ही पड़ता है और ऐसा ही खेल इस बार के चुनाव में दिखा है ,जहाँ भाजपानीत सरकार में शामिल मुख्य घटक ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं किये और किये भी तो केवल दिखावटी ही ,जिसमें सत्ता किसी दूसरे के हाथों में हस्तगत नहीं हो जाये ,इस डर से अपनी भद्द पिटवा लेने में ही भलाई समझी ताकि सत्ता की मलाई खाने में दिक्कत नहीं  हो सके काफी कुछ ऐसा ही नज़ारा इस चुनाव के दरम्यान परिलक्षित हुआ |
           वैसे , भाजपा की इस हार में इसके सरकार के स्थायित्व का संकट छिपा है ,जो अब शनै - शनै प्रकट होगा और मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा समझ रहे होंगे कि उन्होंने अपनी गद्दी बचा ली है तो यह उनका ख्याली पुलाव ही साबित होने जा रहा है | सरकार के स्थायित्व को लेकर भाजपा शुरू से ही संशकित है और इस वजह से ही राज्य में चहुंओर अराजकता का प्रभाव दिक्दर्शित  है बल्कि यूँ कहिये कि प्रशासनिक स्थिति लुंज -पुंज हालात में वैसी ही है ,जैसी मधु कोड़ा के राज में थे ,फिर इस वर्त्तमान सरकार के औचित्य का क्या अर्थ ,जो एक भी जन समस्या को हल ढूढने में कामयाब नहीं हो सके अर्थात अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी झारखण्ड मुलभुत संकट यथा बिजली ,पानी ,सड़क ,चिकित्सा ,शिक्षा के साथ ही कानून व व्यवस्था के लिये झूझ रहा हो , ऐसे में सरकार का नेतृत्व करके भी भाजपा को कोई खास फायदा होती प्रतीत नहीं होती ,बल्कि विपक्ष में ही अपनी सशक्त भूमिका को दमदार बनाते हुए सत्ता में बहुमत पाने के लिये संघर्ष करती तो वह ज्यादा बेहतर होता |
         बहरहाल , भाजपा के उम्मीदवार एस एस अहलुवालिया ,मात खा चुके है और कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू एवं झामुमो के संजीव कुमार राज्य सभा में पहुंच कर झारखण्ड के लिये कौन सा लाभकारी योजना केंद्र से यहाँ ला सकते हैं ,यह देखना बाकी है
 फिलवक्त के राजनीतिक माहौल में इस चुनाव में झाविमो ( प्रजातान्त्रिक) की घोषित नीति ने आस जगाई है ,जिसने शुरू से ही वोट नहीं करने का फैसला कर रखा था और यह पूरी तरह से कार्यान्वित भी हुआ मगर सौधान्तिक परिप्रेक्ष्य में यह कदम लोकतंत्र के विपरीत हो सकती है लेकिन ,जो हालात झारखण्ड में उत्पन्न है ,उसमे घोषित नीति पर अटल रहना आज के राजनीती वातावरण में अलग ही नीति धार  थोडा हटकर अन्यों की तुलना में दे जाता है ,जिसमे इसके प्रमुख बाबु लाल मरांडी अभी सफल हैं |चुनाव के  येन बेला पर ऐसा  कभी दिखा नहीं कि वह भाजपा की प्रतिक्रिया में आकार कांग्रेस को वोट करने के लिये तैयार है ,जैसा कि रद्द हुए गत चुनाव में भाजपा ने अंतिम समय में झामुमो के पक्ष में मतदान कर अपनी प्रतिक्रियात्मक वोट यह करके डाल दी थी .कि उसके विरोधी प्रत्याशी के जीत नहीं हो, इसके लिये मतदान किये गए |
             इस राज्य सभा के चुनाव में उम्मीदवारों के प्राप्त हुए वोट भी कई आशंकाओं को जन्म दिया है और यह आशंका इस बात के संकेत हैं कि आने वाला समय राजनीतिक झंझावतों को अपने में लिये हुए है ,जिसका एक सिरा कांग्रेस के हाथों में है ,तो दूसरा झामुमो के पास है |यह आशंका इस बात से उपजी है कि प्राप्त वोटों के विश्लेषण में बलमुचू को सर्वाधिक २५ मत मिले और संजीव को २३ तथा अहलुवालिया को २० अर्थात निर्दलीय के सभी सात वोट कांग्रेस को मिले ,जब कि विदेश सिंह और चमरा लिंडा जैसे विधायकों का समर्थन मौजूदा सरकार को प्राप्त रहा है ,यही नहीं ,इन दोनों विधायकों ने झामुमो के प्रत्याशी का भी प्रस्तावक बन कर सामने आये थे ,ऐसे में क्या  बात हो गई कि दोनों एक साथ प्रतिपक्ष  के लिये वोट कर दिए ,जब कि इन दोनों के गृह जिले में मनमाफिक अफसरों की पद स्थापना -तबादले -योजनागत विकास के मामले में खुली छूट अर्जुन मुंडा ने अपनी सरकार के स्थायित्व बरक़रार रखने के लिये दे दी थी |
         ताज्जुब इस बात का है कि जेलों में भ्रष्टाचार को लेकर कैद विधायक एनोस एक्का ,हरिनारायण और सांसद मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा ने भी कांग्रेस का साथ दिया ,जबकि इनको इस हाल में पहुँचाने में कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार का ही मुख्य हाथ है ,इनके मतदान की संकल्पना अब रहस्य का रूप ले चुकी है ,ऐसे में अर्जुन मुंडा की सरकार को हारने के बाद भी सकून नहीं मिलने वाला है और राज्य एक बार फिर निकट भविष्य में अस्थिरता के दौर में आने के लिये अपने को तैयार कर रहा |
         ऐसे में , राज्य के प्रमुख  राजनीतिक नेताओं के प्रवृति पर नज़र डालना जरूरी है ताकि भविष्य में होने वाले खेल को सहज ढंग से समझा जा सके | पहली बात कि अर्जुन मुंडा को पार्टी से ज्यादा खुद की चिंता इस रूप में जाहिर है कि सरकार रहे तो उसके मुखिया वह रहें और सरकार बचाने के लिये ही सारे उपक्रम अहलुवालिया को ठिकाने लगाने में किये अन्यथा वह चाहते तो भाजपा प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करवा देने में सक्षम थे ,इनके लिये निर्दलियों को अपनी तरफ मोडना खास बात नहीं था ,इनकी पृष्ठभूमि भी कोई खास नैतिकता से भरा रहा है ,वह इसलिए कि आज भी अपने हाथों के जरीये भद्दे मजाक का त्रिकोण बनाने और अंगूठा दिखाने जैसे प्रदर्शन करते रहे हैं ,जो इनकी मानसिकता को बयां करने के लिये काफी है | झामुमो की जीत में अपनी सरकार की सुरक्षा की तलाश में वह शुरू से थे ,जिसमे वह आजसू को मोहरा के रूप में इस्तेमाल अपने आलाकमान के सामने किया और आजसू नेता एवं उप मुख्य मंत्री सुदेश महतो ने अपनी गोल -मोल बातों से एक तरफ भाजपा तो दूसरी तरफ झामुमो को साध कर रणनीतिक तौर पर कांग्रेस को इशारा कर दिए कि उसे भाजपा से किसी तरह के मोह -माया नहीं है | इसी को ध्यान में रख कर कांग्रेस ने निर्दलीय विधायकों को सत्ता में आने के भरोसा दिलाकर इनकी वोट हासिल किये ,जिसमे राजद के पास कांग्रेस को छोड़ कर अन्य को वोट दने का विकल्प ही नहीं था ,तब कामयाबी मिलती कैसे नहीं |

       दरअसल ,भाजपा का संकट बढ़ गया है ,अपनी हार से वह खुद की नज़र में गिरा ही ,साथ में कोई साफ सन्देश भी लोगों को नहीं दे पाया कि वह क्या चाहती है ? पूर्व में अंशुमान मिश्र प्रकरण तजा था , आरके अग्रवाल जनित भ्रष्टाचार के मामले सामने आ  चुके थे ,ऐसे में सत्ता के साझेदार दलों के बीच मतैक्य नहीं हो पाना ही इसके लिये सिरदर्द साबित होंगे ,ऐसे आसार अब दिखने को है | झामुमो को केवल अपनी शर्तों पर सत्ता चाहिए और इसके लिये ,जो भी तैयार है ,वह मुंडा को किनारे लगाने में जरा भी देर नहीं करेगी | आखिर सर्वाधिक वोट जो कांग्रेस को मिले हैं |कठिनाई है तो झाविमो को लेकर ,जो कतई झामुमो के साथ सरकार बनाने की ओर उन्मुख नहीं  होगी | ऐसे में मौजूदा सरकार हिलते - डुलते ही रहेगी ,जो इसके स्थायित्व के लिये अभिशप्त जैसा ही है |

Monday, 23 April 2012

पैसे का खेल बना राज्य सभा चुनाव


                  (एसके सहाय)
          कांग्रेस के विधायक चंद्रशेखर दुबे ने यह खुलासा कर झारखण्ड की राजनीतिक हल्कों में विस्फोट कर दिया है कि पिछले राज्य सभा चुनाव (२०१०) में खुद उनकी ही पार्टी के प्रत्याशी धीरज प्रसाद साहू ने उनसे और अन्य कांग्रेस के विधायकों को २५ -२५ लाख रूपये दिए जाने की पहल की थी ,जिसमें उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया था | यह बात दुबे ने ऐसे समय की है ,जब अगले तीन मई  को उच्च सदन  के लिये मतदान होना है | साथ ही ,केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की एक विशेष दल इन दिनों राज्य सभा चुनाव में हुए भ्रष्टाचार  के बाबत दर्ज प्राथमिकी के तहत जाँच -पड़ताल में जुटी है और इस सिलसिले में तीन विधायकों के आवासों पर छापामारी करके सबूत इकठ्ठा करने के प्रयास में भिडी है | ये तीन विधायक तीन अलग - अलग पार्टियों के हैं ,जिनके नाम कृष्णानंद त्रिपाठी (कांग्रेस),बिष्णु भैया (झामुमो) और सुरेश पासवान (राजद) हैं |
         इन तीनों विधायकों के यहाँ सीबीआई का दबिश होने का मतलब काफी साफ है ,जहाँ धुंआ होगी ,वहीँ आग होगी ,वाली तर्क के अंतर्गत ही यह छपा है ,जिसमे तस्वीर स्पष्ट है कि राज्य सभा के चुनाव में बराबर पैसों का खेल झारखण्ड में होता रहा है और इस बार ऐसा होगा ,इसकी कोई गारंटी भी नहीं है | ऐसे में , दुबे के खुलासे के मद्देनज़र यह मानना सही होगा कि कार्यकर्त्ता ,विचारधारा और निष्ठां विहीन हो गई है ,चुनाव प्रणाली , जिसमे तिकडम और धन का ही महत्त्व है ,जो दलगत राजनीती के मूलाधार के विपरीत है |ऐसे में ,एक बार फिर अधिक खर्च करने वाले प्रत्याशी राज्य सभा में चुनकर चले जाएँ ,तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए |
        वैसे दुबे की बात के अपने अर्थ हैं ,जिसमे उनकी राजनीती का साया है ,जिसमे एक कोण विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह हैं ,जिनसे मजदुर राजनीती में इनके छतीस के आकडें हैं | साथ ही ,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू का राजेंद्र सिंह से गलबहियां करके अपने लिये वोटों का जुगाड करने के प्रयास को दुबे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? कभी .दुबे ने यह कहकर राज्य की राजनीती में बवाल खड़ा कर दिया था कि "आदिवासी" मुख्य मंत्री के स्थान पर गैर जन जातीय मुख्य मंत्री के होने से ही झारखण्ड का विकास होगा | फिलवक्त ,धीरज साहू ने यह कह कर अपना बचाव किया है कि "वह कैसे अपने पार्टी विधायकों को वोट के लिये पैसे का निमंत्रण दे सकते हैं ,क्योंकि उनके ही दल से तो वह उम्मीदवार थे |"
        इन आरोप और सफाई के बीच सच क्या है ,इसमें ज्यादा सिर खपाने की जरूरत नहीं है |यह बराबर से पैसे का खेल राज्य सभा के चुनाव में होता रहा है ,जिसमे पार्टियां "मालदार" को ही अपना उम्मीदवार  बनाती रही है और इनके लिये आसान रास्ते विधान सभा का वह चेहरा है ,जहां किसी दल के पास विगत बारह सालों में स्पष्ट बहुमत का अभाव रहा है |ऐसे में ,बाहरी चेहरे अपनी साम-दण्ड-भेद और अर्थ से हमेशा झारखण्ड में प्रभावी रहे हैं |हाल में .अंशुमान मिश्र के उम्मीदवारी को देखें ,जो भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी के आशिर्बाद से राज्य सभा के लिये नामाकन  कर दिए ,जिसमे पार्टी के ही विधायक उसके प्रस्तावक् बने लेकिन इनको लेकर  दल में जो . विवाद हुआ , उसके बाद वह नामाकन वापस लिये .लेकिन तबतक भाजपा की भद्द पीट चुकी थी ,बिना घोषित प्रत्याशी के मिश्र आखिर किसके बूते अपने को भाजपा प्रत्याशी कह रहे थे ?
       यह तो ,दो करोड १५ लाख रूपये के बरामद होना था कि चुनाव रद्द होने के पर्याप्त वजह बन गए और इसमें आरके अग्रवाल छना गए .नहीं तो दुबारा चुनाव होने की नौबत ही नहीं आती | अब जब सीबीआई चुनाव में भ्रष्टाचार के मामले की तहकीकात कर रही है ,तब कई खुलासे होना अभी बाकी है |
        अतएव , केवल तीन विधायक ही नहीं ,बल्कि दो दर्ज़न से अधिक विधायक सीबीआई के जद में आ चुके है और इसमें दलिये विधायकों के अतिरिक्त निर्दलीय विधायक भी शामिल है ,जिनपर जाँच का कड़ा जल्द गिरने वाला है ,इंतज़ार इस बात का है कि "साक्ष्य" की खोज में कई टीम जहाँ - तहां प्रत्यनशील है और इसमें काफी हद तक टुकड़े - टुकड़े में कामयाबी भी मिलती जा रही है ,देर केवल इनके बीच कड़ी जोड़ने में आ रही परेशानी का है ,जिसे वैज्ञानिक जाँच प्रविधि से क्रमबद्ध किया जा रहा है |
         अगले तीन मई को होने वाले चुनाव में सत्तापक्ष से दो उम्मीदवार और एक विपक्ष से है . इसमें एस एस अहलुवालिया (भाजपा), संजीव कुमार (झामुमो) और कांग्रेस से प्रदीप बलमुचू के भाग्य का फैसला होने वाला है |इस चुनाव में कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी झाविमो ने अपने को अलग रहने की घोषणा कर रखी है अर्थात इसके विधायक राज्य सभा के चुनाव में किसी के लिये मतदान नहीं करेंगे |ऐसे में यह चुनाव काफी दिलचस्प मोड पर आ गया प्रतीत है | राज्य सभा के रद्द हुए चुनाव में भी संजीव व बलमुचू प्रत्याशी थे ,इनमें अहलुवालिया भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर है ,जो पहले भी राज्य का प्रतिनिधित्व उच्च सदन में कर चुके है | यह किस हालात में पुन: चुनाव के लिये खड़े हुए ,इसकी एक अलग ही कहानी है |
           इन स्थितियों से प्रकट है कि झारखण्ड में बिना "धनबल" के चुनाव जितना कितना दुष्कर है ,जहाँ पार्टीगत उम्मीदवारी पर पैसे की चाहत हो ,निर्दलीय हैं तो भाग्य का छींका टुटा जैसे हालात हो , दलगत नेताओं -कार्यकर्त्ताओं का महत्त्व सिर्फ पैसे से नापी -खरीदी और आकलन की जाती हो , वैसे में ईमानदारी से चुनाव एक दुरूह सा होना स्वाभाविक है | आप मेरे पार्टी के हैं और उम्मीदवार भी है ,अच्छी बात है लेकिन जब जीत कर जायेंगे ,तब मेरे लिये क्या करेंगे ? ऐसी मनोभावना के बीच कार्यकर्त्ता बना राजनीतिज्ञ उम्मीदार से वोटों के बदले पैसे की मांग करता है ,तब पार्टी कहाँ ठहरती है ,जितने के बाद अक्सर विधायक -सांसद अपने कार्यकर्त्ता को भूल जाते हैं और यहीं से तात्कालिक लाभ की बातें शुरू होती है ,जो प्राय: हार पार्टी में रोग बन गया  है ,तो दलगत राजनीती का मरते जाना ही है अर्थात दल गिरोह में तब्दील हैं ,तब कैसे बिना पैसे के समाज सेवा करने के ठेकेदार आप  हो सकते हैं ?
        यह हालात केवल झारखण्ड भर की नहीं है ,राज्य सभा के सदस्यों के जीवनवृत को देखें ,इसमें कितने "जन्संघर्ष" से निकल कर पहुंचे हैं ? धीर -गंभीर सदन के रूप में चिन्हित यह राज्य सभा अब निकृष्ट तत्वों के जमावड़े के रूप में ही समझा जाता है |इनके अधिकांश सदस्यों को राष्टीय - अंतराष्टीय समझ का अभाव है .लोक चरित्र को भी आत्मसात करने में इनको दिक्कतें आती हैं , ऐसे ही परिस्थिति में अराजक तत्व देश के भाग्य विधाता बन जाते है ,तब जन -समस्या पर विचार और हल के तरीके कैसे  मूर्त रूप लेंगे ?  घूसखोरी में जो पकड़ा गए ,वह चोर और जो पकड़ में नहीं आया ,वह भ्रष्ट नहीं ,ऐसा मानना गलत होगा |
         इसलिए दुबे के बातों का एकतरफा अर्थ नहीं है ,वह स्वय भी एक संदेह से भरे जन प्रतिनिधि रहे हैं ,फिर भी जो खुलासे उन्होंने जाने या अनजाने में कर दिए हैं वह तो चिंता प्रकट करती है और इसे नज़रंदाज भी नहीं किया जा सकता | मबेलो ,नाथवानी ,केडी जैसे राज्य सभा के उम्मीदवार बन चुके और रह चुके सदस्य के बीच का राजनीतिक चरित्र का स्तर कैसा है ,यह सर्व विदित है और यह जानकर दलीय नेता -कार्यकर्त्ता कुंठा ग्रस्त होते दिखे तो यह लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगने का औचित्य एक बार फिर जन मानस को झकझोरे ,तब ताज्जुब नहीं !
  
        

विश्व राजनय में अग्नि बाण का प्रभाव


              (एसके सहाय)
        अग्नि -पांच के प्रक्षेपण से भारत की विश्व राजनीती में भूमिका को अब ज्यादा तरजीह दिए जाने की संभावना के मध्य यह स्पष्ट हो गया है कि "शत्रु देश" बातचीत के जरीये उलझे तार को सुलझाने की बात करने पर विवश हैं | मौजूदा अंतराष्टीय परिदृश्य में आर्थिक शक्ति और सामरिक ताकत ही वह सूत्र है ,जो किसी राशि -राज्य के संप्रभुता की गारंटी हो सकती है और यदि ऐसा नहीं है ,तब वह देश आर्थिक  गिरवी के भरोसे अपने किस्मत को चमकाने के झूठे भंवर में डोलते रहने को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानने की भूल कर जाता है |ऐसे ही दो पड़ोसियों के बीच ,भारत की विदेश राजनय के परीक्षण होने वाले हैं ,सो इस प्रेक्षपास्त्र प्रविधि का महत्व दक्षिण पूर्व एशिया के अलावे पूरे दुनिया के लिये है ,यह इसलिए कि अब संसार खुले तौर पर परमाण्विक शक्ति पर ज्यादा निर्भर होने की प्रक्रिया में है ,ऐसे में बदलते राजनय के बीच "हम" कहाँ हैं , की उपयोगिता का अर्थ यही अग्निवर्षा रेखांकित करेगी | ऐसा अबतक के प्रतिक्रिया से जाहिर हुआ है |
     इन परिप्रेक्ष्यों पर विचार करने के पहले सार - संक्षेप में यह जाने कि आजादी के बाद भारत असंलग्न अर्थात गुटनिरपेक्षता की नीति का अवलंबन किये रहा लेकिन १९५५ के बाद थोडा राष्ट हित के लिये सोवियत संघ से अधिक बंधा रहा ,जिसकी कई बार दूसरे देशों ने ,विशेष कर अमरीकी और पाश्चात्य देशों ने कटु आलोचना की | फिर भी अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर किसी खास देश या देश समूह के गुट को हावी नहीं देने के लिये भारतीय राजनय कटिबद्द रही | अब जब ,१९९१ में सोवियत संघ के टूट जाने और बिखर जाने के पश्चाताप यह वैश्विक राजनीती में एक ध्रुवीयता (संयुक्त राज्य अमेरिका )के युग से निकलने की ओर देशों में होड है ,वैसे समय में मिसाइल की यह चमक कैसे भारत को दुनिया में प्रतिष्ठित करेगा ,यह जानना ज्यादा समीचीन है | यह इसलिए भी कि जब पांच हज़ार किमी के लक्ष्य को यह भेदा ,तब पाकिस्तान चुप्पी साधे रहा लेकिन चीन की मीडिया में हलचल रही और वहां के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिउ वेमिन ने कहा कि " भारत और चीन सहयोगी हैं ,यधपि भरत के इस प्रक्षेपण से इस क्षेत्र में हथियारों की दौड़ का एक और नया दौर शुरू हो सकता है |चीन ने भारत के इस प्रक्षेपास्त्र के प्रक्षेपण को गंभीरता से लिया है |"
        इन दो देशों के इत्तर देशों में इसे लेकर सामान्य प्रतिक्रिया रही ,जिसमे नाटो ,अमरीका ,यूरोप के देश ,अरब देशों का कोई खास नागवार लगने वाली बातें सामने नहीं आई ,जो भी प्रकट हुआ ,उसमें  चीन और पाक का ही महत्त्व था ,जो फ़िलहाल गंभीर मीमांसा के लिये है | हाँ ,इसमें यह बात  एक चीनी वैज्ञानिक ने किया है ,जिसने कहा है कि भारत के छोड़े मिसाइल पांच नहीं बल्कि आठ हज़ार किमी के लक्ष्य भेदन का है ,जिसे भारत ने छुपा कर "नपी -तुली" शब्दों में घोषणा की है ,ताकि यह अपने मित्र देशों से नाराजगी मोल नहीं ले सके |
        वैसे , अग्नि पांच का अंतराष्टीय राजनय में अपना महत्त्व है, परिवर्तित विश्व में अब अमेरिका ,भारत मुखापेक्षी है , चीन ,उसके लिये बाज़ार हो सकता है लेकिन लोकतंत्र और विश्वास के लिये उसे भारत को साथ देने ही पड़ेंगे | राजनय के तथाकथित लोकतान्त्रिक स्वरूप काम हो जाने के बाद भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है | इस सन्दर्भ में हांस मर्गेन्थाऊ अपने लिखित पुस्तक "परमानेंट वैलू इन द ओल्ड डिप्लोमेसी के पृष्ठ संख्या १०- २० में कहते हैं -" यह युक्ति गलत है कि लोकतंत्र से शक्ति सुनिश्चित हो जाती है ओर पुरानी राजनय अनैतिक और अ -लोकतान्त्रिक है | यह रूख विदेश नीति का स्वतंत्र क्षेत्र होने के विचार का ही विरोधी है |" इसलिए साफ है कि - भारत के लिये अपने विदेश राजनय के रास्ते में लोकतंत्र , कुलीनतंत्र ,तानाशाही .एकाधिकारवाद या कोई भी वाद के स्वरूप में देश हो ,मामला केवल राष्ट हित  ही इनमे सबंध स्थापित कर सकने वाली प्रक्रिया हो सकती है ,इसलिए अमरीका अभी साथ है तो कल विरोधी भी हो सकता है |पूर्व के अनुभव सामने हैं |
           इस मिसाइल परीक्षण का महत्व अतीत कल से जुड़ा है ,जो अब भी प्रासंगिक है ,१९५५ से पहले के दस वर्षों में तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषताएं सामने आई थी - अंतराष्टीय राजनीती की द्विध्रुवीयता , इस द्विध्रुवीयता की एक -दो गुट निकाय में परिवर्तित की प्रवृति और परिरोधन की नीति | उस काल में अमरीका और सोवियत  संघ में ही विश्व की शक्ति निहित थी और ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन जैसी अन्य शक्तियों  को राजनीतिक ,सैनिक और आर्थिक मामलों में किसी एक प्रधान शक्ति का सहारा लेना पड़ता था और "आज" भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही है ,पाक, चीन, भारत ,जापान ,अफ़्रीकी देश या ने कोई भी ब्राजील सरीखें देश हो .अमरीका या अन्य इनसे कमत्तर देशो की शरण लेना ही है , इस परीक्षण के बाद भी यही हाल भारत के रहने वाले हैं | फिर सवाल है कि "अग्नि पांच के परीक्षण के लाभ क्या ?"
               इस समझने के लिये सोवियत संघ के विघटन का इतिहास से शुरू करें ,जो अरब जगत में लोकतंत्र के प्रति लालसा , अरसे से सत्ता पर काबिज शक्तियों के खात्मे का होना जैसी प्रक्रिया हाल में दृश्यमान  हैं |इसी तरह ,जर्मनी -जापान का महान शक्ति तो नहीं लेकिन महाशक्ति बन जाने और परमाणु शक्ति के बहुत सारे राष्टों में फ़ैल जाने से शक्ति उन्मुखीकरण के राजनय में तब्दिली लाने में मददगार हुई है |तब भारत को इस परीक्षण से खुद तय रास्ते में चलने में सहायता मिलेगी ही ,विश्व राजनय का इतिहास तो ऐसा ही कहता है |
            मौजूदा दुनिया में विदेश नीति और राजनय के बीच सामरिक ताकत का ही पराक्रम अंतराष्टीय राजनीती में चलता है |वजह यह कि सब देशों के परस्पर कुछ न कुछ रिश्ते होते हैं ,चाहे वह कितने दुरी पर हों ,प्रत्येक देश का व्यवहार किसी न किसी रूप में अन्य देश पर प्रभाव डालता ही है ,चाहे वो मित्र हो या शत्रु देश और इसी परिप्रेक्ष्य में प्रतिकूल प्रभाव को न्यूनतम करने और अनुकूल प्रभाव को अधिकतम करने का अवसर अग्नि पांच के परीक्षण ने भारत को दिए हैं ,जिसमे चिंता की लकीरें अबतक सिर्फ चीन में दिखी है और अन्य देशों में है भी तो वो खुलकर भारत के विपरीत जा सकने वाली प्रतिक्रिया को फिलवक्त दबाए हुए है | इसी बात को जार्ज मौदेलसकी ने "विदेश नीति का काम या प्रयोजन " कहा है | (देखें - ए थ्योरी ऑफ फारेन पोलिसी ,लन्दन ,१९६२ ,पृष्ठ - ३)
        सो .मिसाइल परीक्षण के बहाने अपने दोस्त -दुश्मन की खोज करना भी विदेश नीति का एक लक्ष्य रहा है ,जिसमे भारत अभी उहा - पोह की स्थिति में है .ऐसा इसलिए कि आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रविधि ने "राइ को भी पहाड  " बना देने की क्षमता प्रदान कर दी है , सो अभी इतराने की संभावना थोड़ी कम है |

Thursday, 19 April 2012

व्यवस्थागत खामियों के मध्य कानून व व्यवस्था के प्रश्न


                       (एसके सहाय)
आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर हाल में सपन्न मुख्य मंत्रियों के संग प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के व्यक्त विचारों ने गंभीर सवाल कड़े किये हैं और उन अप्रत्यक्ष प्रश्नों के उत्तर खोजा ही जाना चाहिए कि "भारत राज्यों का परिसंघ है या इससे इतर' , यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि प्रधान मंत्री ने रटे-रटाये शब्दावली में ही अपने प्रस्तावित नीतियों को रेखांकित किया है ,जो अक्सर बोल -चाल की भाषा में हर शासक वर्गों की नियति है ,उसे दोहराते रहने की ,क्योंकि इनके पास अपने कोई मौलिक विचार ,योजना होती नहीं ,सिर्फ यथा -स्थिति को बनाये रखने की चिंता ही इनके भीतर होती है ,सो मनमोहन सिंह ने कोई नई बात संघ की तरफ से नहीं की है ,यही सबसे गंभीर बात है |
              प्रधान मंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति वही बात कहे ,जो आम लोग अर्थात सामान्य सत्तासीन व्यक्ति बोले ,तो चिंता होनी स्वाभाविक है ,मसलन मनमोहन सिंह ने कहा कि "जातीय ,धार्मिक ,सामुदायिक - सांप्रदायिक ,आतंकी जैसी भीतरी संकट काबू में है लेकिन इसके समूल नष्ट करने के लिये अभी और ठोस कदम उठाये जाने हैं |" स्पष्ट है कि इन्होने कोई विशेष बात देश की अंदरूनी हालात पर नहीं की ,जिससे इस समस्या को पूरे राज्यों के मुख्य मंत्री एक तरीके से हाल के प्रति अपनी -अपनी दृष्टिकोण का इजहार करते ,लेकिन सम्मलेन में वैसा कुछ भी नहीं था ,गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी के विचार अलग थे ,तब तमिलनाडु के जयललिता के कुछ और पशिचमी बंगाल के मुख्य मंत्री ममता बनर्जी , ओडिसा के नवीन पटनायक  समेत हर मुख्य मंत्रियों के कानून व्यवस्था के प्रश्न पर शांति को लेकर भिन्न - भीं विचार थे ,ऐसे में मतभेद होना स्वाभाविक था और यह विवाद खुलकर सामने आया भी, इन्हीं परिप्रेक्ष्य में देखें तो अभी से ही आभास होता प्रतीत है कि अगले पांच मई को जब "राष्टीय आतंक रोधी केंद्र" अर्थात एन सी टी सी को लेकर एक बार फिर पखवारे बाद मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्रियों के बीच विचारों का विनिमय होगा ,तब इसमें विवाद होना अभी से ही तय है ,जिसकी पृष्भूमि इस आंतरिक विषय को लेकर हुए बैठक में बन गई है |ऐसे में केंद्र के साथ राज्यों का मतैक्य होना कठिन है और इसके लिये संविधान वर्णित स्थितियों का इसमें मुख्य करक की भूमिका है |
         प्राय: इस बात से सभी अवगत है कि "कानून व व्यवस्था" राज्यों के जिम्मे है और ऐसा राज्यों से निर्मित "भारत संघ" के सवैधानिक प्रावधानों में स्पष्ट रूप  से उल्लेखित है ,फिर इसमें आमूल चूल परिवर्तन किये बिना केंद्र सरकार कैसे सीधे हस्तक्षेप करने की योजना बना लेती है ,यह समझ से परे की बात अबतक है | संघ, राज्य और समवर्ती सूची के तौर पर स्पष्ट विभाजन रेखा ,इन के मध्य है ,केवल समवर्ती सूची ही ऐसी है ,जिसपर दोनों या एक अपने - अपने ढंग से अपने क्षेत्राधिकार के तहत कार्य कर सकते हैं | विवाद होने की हालात में परस्पर मिलकर या न्यायालय के निर्णयों के तहत कुछ हद तक ,अथवा कानूनों के आपसी टकराहट की स्थिति में संघ के नियम ही मान्य होंगे , ऐसा ही  व्यवस्था भारतीय संविधान में है ,फिर विरोध के स्वर उठने पर इसके समाधान की प्रक्रिया का अवलंबन होना चाहिए लेकिन यहाँ तो गैर कांग्रेसनीत राज्यों के मुख्य  मंत्रियों ने सीधे आक्षेप  कर दिया  है कि संघ की सरकार राज्यों के सरकार को स्थानीय निकाय समझ जैसी बातें कर रही है ,जो वाकई में गंभीर बात है |
         दरअसल ,यह विवाद देश के इतिहास से गुंथा है ,जिसके अवचेतन मन के "प्रभाव से प्रभावी" होने की ललक सत्ता वर्ग को बराबर बैचेन किये रहती है | संवैधानिक स्थिति में राज्यों के मिलन से संघ बना ,जिसे भारत संघ कहा गया ,यह स्थानीय संस्कृति ,भाषा ,अस्मिता के आधार पर गठित है ,जिसमें व्यापक स्वरूप में जनहित के दृष्टिकोण से संघ अर्थात केन्द्रसरकार को संचालित करने का दायित्व भर है ,मगर पिछली सदी के यों कहें कि इंदिरा गाँधी के अभ्युदय काल से ऐसी प्रवृति राष्टीय राजनीती में उत्पन्न है कि संघ सरकार पर किसी भी दल या दलीय समूह की सरकार हो ,वह अपने को ज्यादा सशक्त करने और दिखने में प्रत्यनशील रहती आई है ,ऐसे में राज्य - संघ के बीच तनाव -विवाद नहीं होंगे तो क्या होंगे ?
         यह सदैव याद रखी जानी चाहिए कि भारत कई राष्टियता वाले देश का संघ है ,केंद्र नहीं , यह संवैधानिक प्रावधानों में साफ तौर पर अंकित है या जानें कि "राज्यों के संघ" उदबोधन से ही संविधान की शुरूआत  होती है और इसे नजरदांज किये जाने की प्रवृति से खतरनाक परिणाम निकल सकते हैं | सोवियत संघ का बिखराव हमारे सामने है | यहाँ इसलिए इसे याद करने की जरूरत है कि इस देश में संविधान में ही उल्लेख था कि राज्य चाहें तो अलग हो सकते हैं पर यथार्थ में वैसा नहीं था ,सोवियत संघ की जकडबंदी से पूरा विश्व परिचित रहा है | इस तुलनात्मक विवरण का मकसद भारत को भी सतर्क रहने की ओर इशारा करना है | ऐसे में राज्य संघ के रिश्ते को समय रखने की आवश्यकता है |
            केन्द्रीय सत्ता को अत्यधिक मजबूत करने पर जोर की प्रवृति ने राज्यों को संशकित किया है और इसमें  यह मान लेने की प्रवृति है का योगदान है ,जिसमें भारत को एक राष्ट सरीखी जैसी समूह समझा जाय | यह तो उप राष्टियताओं के मिलन से उत्पन्न राज्य है ,जिसकी सीमा भुगौलिक रूप  से निश्चित होने के बाद भी कई टुकड़े  हुए ,जिनमे पाक ,बंगला देश  सुंदर उदाहरण है |
              ऐसे में केंद्र - राज्यों के बीच संवाद में प्रभुता स्थापित करने वाली प्रवृति से बचा जाना चाहिए ,सत्ता का संचालन सदा एक सा नहीं होता ,मुगलकालीन ओरंगजेब शासन  में सबसे ज्यादा केन्द्रीयकरण का परिणाम थ कि उस वक्त देश के  अधिक भूभाग एक सता के अधीन रहे ,फिर इस श्ससक के इंतकाल .कमजोर पड़ने से कैसे सत्ता भरभरा का ढह गई ,यह इतिहास के पन्नों में देखा जा सकता है |  लालडेंगा , तमिल, राजनीती के स्वरूप  कश्मीर ,भाषाई संकट ,जातीय अस्मिता से पैदा हुए कई आन्दोलानो का इन सन्दर्भों में अध्ययन किया जा सकता है .जो पूर्व में कैसी -कैसी क्रिया कर्म से यह प्रभावित रहा है |
           व्यवस्थागत कठिनाइयों के बीच केंद्र को अब ज्यादा संघ जैसी मानसिकता से परिचालित होने का समय है | संविधान भी संघ सोच को मान्यता देता है ,शक्ति के अतिशय प्रयोग से मौजूदा संप्रभुता पर चोट पहुँच सकती है | चिदम्बरम ,सिब्बल जैसे नेताओं को केवल क़ानूनी तकनीकी आधारों पर बोलने के आदत से बाज आने चाहिए और प्रधान मंत्री को भी थोडा इतिहास के लेखों पर ध्यान देने चाहिए .तभी कानून -व्यवस्था पर सार्थक पहल संयुक्त रूप से हो सकती है ,जिसमे राज्यों का योगदान "समुच्चय" के रूप में केन्द्र बनी संघ को मिलने  की उम्मीद हो सकती है ,इससे इत्तर नहीं |
        वैसे भी, देखा गया है कि देश में दलगत व्यवस्था ने राज्य -संघ के संबंधों को काफी प्रभावित किया है और हार-जीत को लेकर होने वाली और बननेवाली राजनीतिक रिश्ते ने देश को काफी नुक्सान पहुँचाया है | द्रमुक -अन्नाद्रुमुक को लेकर संघीय सरकार के दृष्टि चाहे संप्रग या राजग केन्द्रीय सरकार में किस रूप में रही है ,यह खुद प्रत्यक्षमान है , वैसे इस तरह के कई उदाहरण भारितीय इतिहास में पड़े हैं , यहाँ तो अंदरूनी व्यवस्था पर होने वाली विचार -विमर्श पर सोचने के अवसर है | इसलिए दुराग्रही प्रवृति से मुक्त होकर ही केंद्र -राज्य एक बेहतर स्थिति ला सकते है केवल राजनीतिक चश्मे से समाधान नहीं संभव है | .

Monday, 16 April 2012

समाज , कानून और निर्मल बाबा


                     (एसके सहाय)
             भारतीय समाज में इन दिनों ,खासकर, उत्तर भारत में नव चर्चित धर्म गुरू को लेकर जबरदस्त बहस का दौर है और इस लोक परिचर्चा में कई बातें ऐसी हुई हैं ,जिन पर विचार किया जाना लाजिमी है |सो , इस सतत सामाजिक प्रक्रिया को समझने के लिये सर्व प्रथम यह अनुभूत करने की जरूरत है कि देश का मन मिजाज की संस्कृति क्या रही है और जो इस समय निर्मला बाबा को लेकर बातें की जा रही है ,क्या उसमें तनिक भी व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में स्वीकारा जा सकता है |ऐसा इसलिए कि जो दिख रहा है ,उसकी जड़ें सामाजिक -सांस्कृतिक अवचेतना "मनों" में अति सूक्ष्म तरीके से स्थापित है ,फिर इस हाय -तौबा से क्या निष्कर्ष निकल सकते हैं ?
           इसी की खोज में यह कई बार सामने आया है कि भारत "धर्मभीरू" देश है, जहाँ नानाविध प्रक्रियाएं सामाजिक जीवन को प्रभावित करते रहे हैं और इसपर कभी व्यवस्था का रोक भी नहीं रहा और अब तो कदापि संभव नहीं ,क्योंकि संविधान प्रवृत जो अधिकार वैक्तिक स्वरूप में आम भारतीय को प्राप्त हैं ,उसमें आस्था ,विश्वास ,निष्ठां  और परस्पर सहयोग की प्रक्रिया पर बंदिशें नहीं है |ऐसे में ,निर्मल बाबा केवल एक प्रतिमान ही हो सकते हैं ,इन जैसे असंख्य बाबा इसी देश में हैं लेकिन उनपर नजर इसलिए नहीं जा पा रही कि उनके पहुँच अभी समाचार जगत से दूर हैं और यदि मौका मिले तो रोज -ब -रोज एक नई बाबाओं की नई कहानी सामने आ सकती है और पूरा मीडिया इसमें ही अपनी समाचार कथा के चटपटे सूत्र तलाश करने में अपने को धन्य मान सकती है और इसमें कोई हर्ज जैसी बात भी नहीं है |
         अतएव , निर्मल बाबा पर दोष देने से पहले खुद व्यक्ति को अपने को तौलने की जरूरत है | एक उदाहरण यहाँ पर है | देश के नागरिक सांसद -विधायकों या कहिये अन्य जन प्रतिनिधियों को अपने -अपने व्यक्तिगत "मत" देकर जन हितों के अनुरूप व्यवस्था को संचालित करने के लिये अधिकृत करता है लेकिन चुने जाने के बाद ,इनके नाज -नखरे आम हितों के विपरीत  प्रतीत होता है ,तब संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही मामले को निपटाए जाने की प्रक्रिया सन्मुख उपस्थित होती है ,जिसमें "खीझ" जैसी भावनाओं का तूफान भी दीखता है ,जिसका सुन्दर उदाहरण ,अन्ना हजारे के नेतृत्व में खड़ा "लोकपाल" जन आंदोलन है ,जिसे कुछ लोग बेकार मानते हैं तो कुछ लोग भ्रष्टाचार के लिये अपरिहार्य मानते हैं और यह  मुकाम तक तभी पहुंचेगी ,जब संसद इस लोकपाल पर अपनी मुहर लगायेगी |
        ठीक .इसी तरह का मामला निर्मल बाबा के साथ हैं |वह खुद तय शुल्क को ग्रहण करते हैं ,जोर -जबरदस्ती इसमें नहीं है और यह है भी ,तो उनके अपने परिनियम हैं |साथ ही ,अपने आय के ज्ञात स्रोत को छिपा नहीं रखा है |आयकर वाले ही सही -सही इस विषय पर प्रकाश डाल सकते हैं और इसमें अगर खामियां हैं तो बाबा इसके परिणाम भुगतेंगे ही ,यह तो नियम - परिनियम की प्रक्रिया है ,जिमें ज्यादा बुद्दि लगाने की आवश्यकता नहीं है |
        इसलिए , दोष देने की जहाँ तक बात है ,तब वह दोष सामाजिक प्रक्रिया के उन जड़ों की हैं ,जहाँ से अन्धविश्वास ,श्रधा जैसी प्रक्रिया उत्पन्न होती है |वैक्तिक स्तर पर किसी के प्रति निष्ठां पर क्या सवाल खडें हो सकते हैं |निर्मल बाबा तो एक नमूने भर है ,जो बलात किसी से रूपये तो नहीं झटके हैं ,जो कुछ भी है ,वह तो इनके ही नियोजित हैं या कहिये कथित भक्तों के हैं ,फिर इसमें कानून की खिल्ली उड़ाने जैसी बाते नहीं है |लोग खुद अपने मर्जी से जाते मुर्ख बनने ,तब कोई कैसे उसे रोक सकता है |अज्ञानता ,अशिक्षा के अभाव ने अभी भारतीयों को तर्कशील अर्थात वैज्ञानिक सोच से दूर कर रखा है तो इसके लिये व्यवस्था ही  न दोषी है ,इसमें निर्मल बाबा जैसे कई नये बाबाओं के उत्पन्न होने के सूत्र स्वाभाविक रूप से छिपे हैं .जिसपर कोई भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कानून प्रतिषेध नहीं कर सकते | इसके उपाय एक ही हो सकते हैं ,जागरूक व्यक्ति की अपनी मौलिक सोच या तर्कशीलता का प्रभाव ,समाज में है तो खुद -ब -खुद निर्मल बाबा समाज से कट जायेंगे ,तब इतनी आलोचनाओं - प्रतिआलोचनों  के लिये मीडिया या समाज के पास समय कहाँ होगा !
        थोडा इस पर भी विचार करें ,जो निर्मल बाबा और सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने अलग -अलग अंदाजों में एक दूसरे को साला - बहनोई के रूप में स्वीकार किया है ,सार्वजनिक बातों में ,जो एक रिश्ते की हकीकत भी है ,इसे इंकार नहीं किया जा सकता ,लेकिन जो बातें नामधारी ने की है ,क्या उसे मंजूर किया जा सकता है ? बात हो रही है ,उस जन प्रतिनिधि की ,जो २५ -३० सालों से एकाध अवसरों को छोड़कर बराबर विधायिकी में रहा है और अब निर्मल बाबा के सन्दर्भ में कहता है कि " वह हमारे निकटतम रिश्तेदार हैं ,उनपर मुझसे कुछ नहीं पूछिए अन्यथा संबंधों में दरार हो सकते हैं " यह उस शख्स के विचार हैं ,जिसे लोगों ने व्यवस्थापिका में शासन सूत्र को ठोस बनाये रखने की जिम्मेदारी कई अरसे से डालटनगंज और अब चतरा के लोगों ने दे रखी है और जब स्वयं की बरी आई ,तब अपना नजरिया अभिव्यक्त करने भाग गए | वह भी तब, जब कथित धर्म गुरू ने अपनी बातों को नामधारी के सन्दर्भ में "इनके बंद मुठ्ठी"  का इशारा किया ,जिससे मजबूर होकर इस मुकाम तक पहुँचने में अनपेक्षित कामयाबी मिली | समाचार चैनल "आजतक" को दिए साक्षात्कार में  निर्मल बाबा ने इसी तरह के संकेत दिये है , यह संकेत भी बाबा ने तब दिए जब नामधारी ने अपनी आदत के मुताबिक पिछले कई दिनों से साले होने की बात स्वीकार करते हुए अपने गोल - मोल  बातों से बताया कि "इनके "  कार्यों से उनके मतभेद हैं और कई बार ऐसा नहीं करने के सुझाव भी उन्होंने दिए हैं लेकिन निर्मलजीत सुनता है नहीं | इसकी प्रतिउत्तर में ही बाबा ने एक अनजाने से प्रश्न के जवाब में एक सामाजिक प्राणी ,जो राजनीतिज्ञ भी है, के नकाब उठाये दिए , जो भारतीय सामाजिक जीवन को समझने के एक सूत्र इन दिनों दे दिया है और इसे किस रूप में व्यवस्था के नेतृत्व कर्त्ता लेते हैं ,उसका भी परीक्षण के बाद निष्कर्ष आने वाला है |
         कुल मिलाकर देखें तो ,निर्मल बाबा प्रचलित सामाजिक विकृति की उपज हैं ,जिसमें नियम -परिनियम की भूमिका का कोई महत्त्व नहीं है और जो प्रश्न वैयक्तिक सोच से प्रभावित है अर्थात भावनाओं से परिचालित है ,उसे कैसे रोक पायेगें ? यह सवाल ही इस सन्दर्भ में मौजूं हैं |