Monday, 23 April 2012

पैसे का खेल बना राज्य सभा चुनाव


                  (एसके सहाय)
          कांग्रेस के विधायक चंद्रशेखर दुबे ने यह खुलासा कर झारखण्ड की राजनीतिक हल्कों में विस्फोट कर दिया है कि पिछले राज्य सभा चुनाव (२०१०) में खुद उनकी ही पार्टी के प्रत्याशी धीरज प्रसाद साहू ने उनसे और अन्य कांग्रेस के विधायकों को २५ -२५ लाख रूपये दिए जाने की पहल की थी ,जिसमें उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया था | यह बात दुबे ने ऐसे समय की है ,जब अगले तीन मई  को उच्च सदन  के लिये मतदान होना है | साथ ही ,केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की एक विशेष दल इन दिनों राज्य सभा चुनाव में हुए भ्रष्टाचार  के बाबत दर्ज प्राथमिकी के तहत जाँच -पड़ताल में जुटी है और इस सिलसिले में तीन विधायकों के आवासों पर छापामारी करके सबूत इकठ्ठा करने के प्रयास में भिडी है | ये तीन विधायक तीन अलग - अलग पार्टियों के हैं ,जिनके नाम कृष्णानंद त्रिपाठी (कांग्रेस),बिष्णु भैया (झामुमो) और सुरेश पासवान (राजद) हैं |
         इन तीनों विधायकों के यहाँ सीबीआई का दबिश होने का मतलब काफी साफ है ,जहाँ धुंआ होगी ,वहीँ आग होगी ,वाली तर्क के अंतर्गत ही यह छपा है ,जिसमे तस्वीर स्पष्ट है कि राज्य सभा के चुनाव में बराबर पैसों का खेल झारखण्ड में होता रहा है और इस बार ऐसा होगा ,इसकी कोई गारंटी भी नहीं है | ऐसे में , दुबे के खुलासे के मद्देनज़र यह मानना सही होगा कि कार्यकर्त्ता ,विचारधारा और निष्ठां विहीन हो गई है ,चुनाव प्रणाली , जिसमे तिकडम और धन का ही महत्त्व है ,जो दलगत राजनीती के मूलाधार के विपरीत है |ऐसे में ,एक बार फिर अधिक खर्च करने वाले प्रत्याशी राज्य सभा में चुनकर चले जाएँ ,तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए |
        वैसे दुबे की बात के अपने अर्थ हैं ,जिसमे उनकी राजनीती का साया है ,जिसमे एक कोण विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह हैं ,जिनसे मजदुर राजनीती में इनके छतीस के आकडें हैं | साथ ही ,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू का राजेंद्र सिंह से गलबहियां करके अपने लिये वोटों का जुगाड करने के प्रयास को दुबे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? कभी .दुबे ने यह कहकर राज्य की राजनीती में बवाल खड़ा कर दिया था कि "आदिवासी" मुख्य मंत्री के स्थान पर गैर जन जातीय मुख्य मंत्री के होने से ही झारखण्ड का विकास होगा | फिलवक्त ,धीरज साहू ने यह कह कर अपना बचाव किया है कि "वह कैसे अपने पार्टी विधायकों को वोट के लिये पैसे का निमंत्रण दे सकते हैं ,क्योंकि उनके ही दल से तो वह उम्मीदवार थे |"
        इन आरोप और सफाई के बीच सच क्या है ,इसमें ज्यादा सिर खपाने की जरूरत नहीं है |यह बराबर से पैसे का खेल राज्य सभा के चुनाव में होता रहा है ,जिसमे पार्टियां "मालदार" को ही अपना उम्मीदवार  बनाती रही है और इनके लिये आसान रास्ते विधान सभा का वह चेहरा है ,जहां किसी दल के पास विगत बारह सालों में स्पष्ट बहुमत का अभाव रहा है |ऐसे में ,बाहरी चेहरे अपनी साम-दण्ड-भेद और अर्थ से हमेशा झारखण्ड में प्रभावी रहे हैं |हाल में .अंशुमान मिश्र के उम्मीदवारी को देखें ,जो भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी के आशिर्बाद से राज्य सभा के लिये नामाकन  कर दिए ,जिसमे पार्टी के ही विधायक उसके प्रस्तावक् बने लेकिन इनको लेकर  दल में जो . विवाद हुआ , उसके बाद वह नामाकन वापस लिये .लेकिन तबतक भाजपा की भद्द पीट चुकी थी ,बिना घोषित प्रत्याशी के मिश्र आखिर किसके बूते अपने को भाजपा प्रत्याशी कह रहे थे ?
       यह तो ,दो करोड १५ लाख रूपये के बरामद होना था कि चुनाव रद्द होने के पर्याप्त वजह बन गए और इसमें आरके अग्रवाल छना गए .नहीं तो दुबारा चुनाव होने की नौबत ही नहीं आती | अब जब सीबीआई चुनाव में भ्रष्टाचार के मामले की तहकीकात कर रही है ,तब कई खुलासे होना अभी बाकी है |
        अतएव , केवल तीन विधायक ही नहीं ,बल्कि दो दर्ज़न से अधिक विधायक सीबीआई के जद में आ चुके है और इसमें दलिये विधायकों के अतिरिक्त निर्दलीय विधायक भी शामिल है ,जिनपर जाँच का कड़ा जल्द गिरने वाला है ,इंतज़ार इस बात का है कि "साक्ष्य" की खोज में कई टीम जहाँ - तहां प्रत्यनशील है और इसमें काफी हद तक टुकड़े - टुकड़े में कामयाबी भी मिलती जा रही है ,देर केवल इनके बीच कड़ी जोड़ने में आ रही परेशानी का है ,जिसे वैज्ञानिक जाँच प्रविधि से क्रमबद्ध किया जा रहा है |
         अगले तीन मई को होने वाले चुनाव में सत्तापक्ष से दो उम्मीदवार और एक विपक्ष से है . इसमें एस एस अहलुवालिया (भाजपा), संजीव कुमार (झामुमो) और कांग्रेस से प्रदीप बलमुचू के भाग्य का फैसला होने वाला है |इस चुनाव में कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी झाविमो ने अपने को अलग रहने की घोषणा कर रखी है अर्थात इसके विधायक राज्य सभा के चुनाव में किसी के लिये मतदान नहीं करेंगे |ऐसे में यह चुनाव काफी दिलचस्प मोड पर आ गया प्रतीत है | राज्य सभा के रद्द हुए चुनाव में भी संजीव व बलमुचू प्रत्याशी थे ,इनमें अहलुवालिया भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर है ,जो पहले भी राज्य का प्रतिनिधित्व उच्च सदन में कर चुके है | यह किस हालात में पुन: चुनाव के लिये खड़े हुए ,इसकी एक अलग ही कहानी है |
           इन स्थितियों से प्रकट है कि झारखण्ड में बिना "धनबल" के चुनाव जितना कितना दुष्कर है ,जहाँ पार्टीगत उम्मीदवारी पर पैसे की चाहत हो ,निर्दलीय हैं तो भाग्य का छींका टुटा जैसे हालात हो , दलगत नेताओं -कार्यकर्त्ताओं का महत्त्व सिर्फ पैसे से नापी -खरीदी और आकलन की जाती हो , वैसे में ईमानदारी से चुनाव एक दुरूह सा होना स्वाभाविक है | आप मेरे पार्टी के हैं और उम्मीदवार भी है ,अच्छी बात है लेकिन जब जीत कर जायेंगे ,तब मेरे लिये क्या करेंगे ? ऐसी मनोभावना के बीच कार्यकर्त्ता बना राजनीतिज्ञ उम्मीदार से वोटों के बदले पैसे की मांग करता है ,तब पार्टी कहाँ ठहरती है ,जितने के बाद अक्सर विधायक -सांसद अपने कार्यकर्त्ता को भूल जाते हैं और यहीं से तात्कालिक लाभ की बातें शुरू होती है ,जो प्राय: हार पार्टी में रोग बन गया  है ,तो दलगत राजनीती का मरते जाना ही है अर्थात दल गिरोह में तब्दील हैं ,तब कैसे बिना पैसे के समाज सेवा करने के ठेकेदार आप  हो सकते हैं ?
        यह हालात केवल झारखण्ड भर की नहीं है ,राज्य सभा के सदस्यों के जीवनवृत को देखें ,इसमें कितने "जन्संघर्ष" से निकल कर पहुंचे हैं ? धीर -गंभीर सदन के रूप में चिन्हित यह राज्य सभा अब निकृष्ट तत्वों के जमावड़े के रूप में ही समझा जाता है |इनके अधिकांश सदस्यों को राष्टीय - अंतराष्टीय समझ का अभाव है .लोक चरित्र को भी आत्मसात करने में इनको दिक्कतें आती हैं , ऐसे ही परिस्थिति में अराजक तत्व देश के भाग्य विधाता बन जाते है ,तब जन -समस्या पर विचार और हल के तरीके कैसे  मूर्त रूप लेंगे ?  घूसखोरी में जो पकड़ा गए ,वह चोर और जो पकड़ में नहीं आया ,वह भ्रष्ट नहीं ,ऐसा मानना गलत होगा |
         इसलिए दुबे के बातों का एकतरफा अर्थ नहीं है ,वह स्वय भी एक संदेह से भरे जन प्रतिनिधि रहे हैं ,फिर भी जो खुलासे उन्होंने जाने या अनजाने में कर दिए हैं वह तो चिंता प्रकट करती है और इसे नज़रंदाज भी नहीं किया जा सकता | मबेलो ,नाथवानी ,केडी जैसे राज्य सभा के उम्मीदवार बन चुके और रह चुके सदस्य के बीच का राजनीतिक चरित्र का स्तर कैसा है ,यह सर्व विदित है और यह जानकर दलीय नेता -कार्यकर्त्ता कुंठा ग्रस्त होते दिखे तो यह लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगने का औचित्य एक बार फिर जन मानस को झकझोरे ,तब ताज्जुब नहीं !
  
        

विश्व राजनय में अग्नि बाण का प्रभाव


              (एसके सहाय)
        अग्नि -पांच के प्रक्षेपण से भारत की विश्व राजनीती में भूमिका को अब ज्यादा तरजीह दिए जाने की संभावना के मध्य यह स्पष्ट हो गया है कि "शत्रु देश" बातचीत के जरीये उलझे तार को सुलझाने की बात करने पर विवश हैं | मौजूदा अंतराष्टीय परिदृश्य में आर्थिक शक्ति और सामरिक ताकत ही वह सूत्र है ,जो किसी राशि -राज्य के संप्रभुता की गारंटी हो सकती है और यदि ऐसा नहीं है ,तब वह देश आर्थिक  गिरवी के भरोसे अपने किस्मत को चमकाने के झूठे भंवर में डोलते रहने को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानने की भूल कर जाता है |ऐसे ही दो पड़ोसियों के बीच ,भारत की विदेश राजनय के परीक्षण होने वाले हैं ,सो इस प्रेक्षपास्त्र प्रविधि का महत्व दक्षिण पूर्व एशिया के अलावे पूरे दुनिया के लिये है ,यह इसलिए कि अब संसार खुले तौर पर परमाण्विक शक्ति पर ज्यादा निर्भर होने की प्रक्रिया में है ,ऐसे में बदलते राजनय के बीच "हम" कहाँ हैं , की उपयोगिता का अर्थ यही अग्निवर्षा रेखांकित करेगी | ऐसा अबतक के प्रतिक्रिया से जाहिर हुआ है |
     इन परिप्रेक्ष्यों पर विचार करने के पहले सार - संक्षेप में यह जाने कि आजादी के बाद भारत असंलग्न अर्थात गुटनिरपेक्षता की नीति का अवलंबन किये रहा लेकिन १९५५ के बाद थोडा राष्ट हित के लिये सोवियत संघ से अधिक बंधा रहा ,जिसकी कई बार दूसरे देशों ने ,विशेष कर अमरीकी और पाश्चात्य देशों ने कटु आलोचना की | फिर भी अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर किसी खास देश या देश समूह के गुट को हावी नहीं देने के लिये भारतीय राजनय कटिबद्द रही | अब जब ,१९९१ में सोवियत संघ के टूट जाने और बिखर जाने के पश्चाताप यह वैश्विक राजनीती में एक ध्रुवीयता (संयुक्त राज्य अमेरिका )के युग से निकलने की ओर देशों में होड है ,वैसे समय में मिसाइल की यह चमक कैसे भारत को दुनिया में प्रतिष्ठित करेगा ,यह जानना ज्यादा समीचीन है | यह इसलिए भी कि जब पांच हज़ार किमी के लक्ष्य को यह भेदा ,तब पाकिस्तान चुप्पी साधे रहा लेकिन चीन की मीडिया में हलचल रही और वहां के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिउ वेमिन ने कहा कि " भारत और चीन सहयोगी हैं ,यधपि भरत के इस प्रक्षेपण से इस क्षेत्र में हथियारों की दौड़ का एक और नया दौर शुरू हो सकता है |चीन ने भारत के इस प्रक्षेपास्त्र के प्रक्षेपण को गंभीरता से लिया है |"
        इन दो देशों के इत्तर देशों में इसे लेकर सामान्य प्रतिक्रिया रही ,जिसमे नाटो ,अमरीका ,यूरोप के देश ,अरब देशों का कोई खास नागवार लगने वाली बातें सामने नहीं आई ,जो भी प्रकट हुआ ,उसमें  चीन और पाक का ही महत्त्व था ,जो फ़िलहाल गंभीर मीमांसा के लिये है | हाँ ,इसमें यह बात  एक चीनी वैज्ञानिक ने किया है ,जिसने कहा है कि भारत के छोड़े मिसाइल पांच नहीं बल्कि आठ हज़ार किमी के लक्ष्य भेदन का है ,जिसे भारत ने छुपा कर "नपी -तुली" शब्दों में घोषणा की है ,ताकि यह अपने मित्र देशों से नाराजगी मोल नहीं ले सके |
        वैसे , अग्नि पांच का अंतराष्टीय राजनय में अपना महत्त्व है, परिवर्तित विश्व में अब अमेरिका ,भारत मुखापेक्षी है , चीन ,उसके लिये बाज़ार हो सकता है लेकिन लोकतंत्र और विश्वास के लिये उसे भारत को साथ देने ही पड़ेंगे | राजनय के तथाकथित लोकतान्त्रिक स्वरूप काम हो जाने के बाद भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है | इस सन्दर्भ में हांस मर्गेन्थाऊ अपने लिखित पुस्तक "परमानेंट वैलू इन द ओल्ड डिप्लोमेसी के पृष्ठ संख्या १०- २० में कहते हैं -" यह युक्ति गलत है कि लोकतंत्र से शक्ति सुनिश्चित हो जाती है ओर पुरानी राजनय अनैतिक और अ -लोकतान्त्रिक है | यह रूख विदेश नीति का स्वतंत्र क्षेत्र होने के विचार का ही विरोधी है |" इसलिए साफ है कि - भारत के लिये अपने विदेश राजनय के रास्ते में लोकतंत्र , कुलीनतंत्र ,तानाशाही .एकाधिकारवाद या कोई भी वाद के स्वरूप में देश हो ,मामला केवल राष्ट हित  ही इनमे सबंध स्थापित कर सकने वाली प्रक्रिया हो सकती है ,इसलिए अमरीका अभी साथ है तो कल विरोधी भी हो सकता है |पूर्व के अनुभव सामने हैं |
           इस मिसाइल परीक्षण का महत्व अतीत कल से जुड़ा है ,जो अब भी प्रासंगिक है ,१९५५ से पहले के दस वर्षों में तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषताएं सामने आई थी - अंतराष्टीय राजनीती की द्विध्रुवीयता , इस द्विध्रुवीयता की एक -दो गुट निकाय में परिवर्तित की प्रवृति और परिरोधन की नीति | उस काल में अमरीका और सोवियत  संघ में ही विश्व की शक्ति निहित थी और ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन जैसी अन्य शक्तियों  को राजनीतिक ,सैनिक और आर्थिक मामलों में किसी एक प्रधान शक्ति का सहारा लेना पड़ता था और "आज" भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही है ,पाक, चीन, भारत ,जापान ,अफ़्रीकी देश या ने कोई भी ब्राजील सरीखें देश हो .अमरीका या अन्य इनसे कमत्तर देशो की शरण लेना ही है , इस परीक्षण के बाद भी यही हाल भारत के रहने वाले हैं | फिर सवाल है कि "अग्नि पांच के परीक्षण के लाभ क्या ?"
               इस समझने के लिये सोवियत संघ के विघटन का इतिहास से शुरू करें ,जो अरब जगत में लोकतंत्र के प्रति लालसा , अरसे से सत्ता पर काबिज शक्तियों के खात्मे का होना जैसी प्रक्रिया हाल में दृश्यमान  हैं |इसी तरह ,जर्मनी -जापान का महान शक्ति तो नहीं लेकिन महाशक्ति बन जाने और परमाणु शक्ति के बहुत सारे राष्टों में फ़ैल जाने से शक्ति उन्मुखीकरण के राजनय में तब्दिली लाने में मददगार हुई है |तब भारत को इस परीक्षण से खुद तय रास्ते में चलने में सहायता मिलेगी ही ,विश्व राजनय का इतिहास तो ऐसा ही कहता है |
            मौजूदा दुनिया में विदेश नीति और राजनय के बीच सामरिक ताकत का ही पराक्रम अंतराष्टीय राजनीती में चलता है |वजह यह कि सब देशों के परस्पर कुछ न कुछ रिश्ते होते हैं ,चाहे वह कितने दुरी पर हों ,प्रत्येक देश का व्यवहार किसी न किसी रूप में अन्य देश पर प्रभाव डालता ही है ,चाहे वो मित्र हो या शत्रु देश और इसी परिप्रेक्ष्य में प्रतिकूल प्रभाव को न्यूनतम करने और अनुकूल प्रभाव को अधिकतम करने का अवसर अग्नि पांच के परीक्षण ने भारत को दिए हैं ,जिसमे चिंता की लकीरें अबतक सिर्फ चीन में दिखी है और अन्य देशों में है भी तो वो खुलकर भारत के विपरीत जा सकने वाली प्रतिक्रिया को फिलवक्त दबाए हुए है | इसी बात को जार्ज मौदेलसकी ने "विदेश नीति का काम या प्रयोजन " कहा है | (देखें - ए थ्योरी ऑफ फारेन पोलिसी ,लन्दन ,१९६२ ,पृष्ठ - ३)
        सो .मिसाइल परीक्षण के बहाने अपने दोस्त -दुश्मन की खोज करना भी विदेश नीति का एक लक्ष्य रहा है ,जिसमे भारत अभी उहा - पोह की स्थिति में है .ऐसा इसलिए कि आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रविधि ने "राइ को भी पहाड  " बना देने की क्षमता प्रदान कर दी है , सो अभी इतराने की संभावना थोड़ी कम है |

Thursday, 19 April 2012

व्यवस्थागत खामियों के मध्य कानून व व्यवस्था के प्रश्न


                       (एसके सहाय)
आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर हाल में सपन्न मुख्य मंत्रियों के संग प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के व्यक्त विचारों ने गंभीर सवाल कड़े किये हैं और उन अप्रत्यक्ष प्रश्नों के उत्तर खोजा ही जाना चाहिए कि "भारत राज्यों का परिसंघ है या इससे इतर' , यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि प्रधान मंत्री ने रटे-रटाये शब्दावली में ही अपने प्रस्तावित नीतियों को रेखांकित किया है ,जो अक्सर बोल -चाल की भाषा में हर शासक वर्गों की नियति है ,उसे दोहराते रहने की ,क्योंकि इनके पास अपने कोई मौलिक विचार ,योजना होती नहीं ,सिर्फ यथा -स्थिति को बनाये रखने की चिंता ही इनके भीतर होती है ,सो मनमोहन सिंह ने कोई नई बात संघ की तरफ से नहीं की है ,यही सबसे गंभीर बात है |
              प्रधान मंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति वही बात कहे ,जो आम लोग अर्थात सामान्य सत्तासीन व्यक्ति बोले ,तो चिंता होनी स्वाभाविक है ,मसलन मनमोहन सिंह ने कहा कि "जातीय ,धार्मिक ,सामुदायिक - सांप्रदायिक ,आतंकी जैसी भीतरी संकट काबू में है लेकिन इसके समूल नष्ट करने के लिये अभी और ठोस कदम उठाये जाने हैं |" स्पष्ट है कि इन्होने कोई विशेष बात देश की अंदरूनी हालात पर नहीं की ,जिससे इस समस्या को पूरे राज्यों के मुख्य मंत्री एक तरीके से हाल के प्रति अपनी -अपनी दृष्टिकोण का इजहार करते ,लेकिन सम्मलेन में वैसा कुछ भी नहीं था ,गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी के विचार अलग थे ,तब तमिलनाडु के जयललिता के कुछ और पशिचमी बंगाल के मुख्य मंत्री ममता बनर्जी , ओडिसा के नवीन पटनायक  समेत हर मुख्य मंत्रियों के कानून व्यवस्था के प्रश्न पर शांति को लेकर भिन्न - भीं विचार थे ,ऐसे में मतभेद होना स्वाभाविक था और यह विवाद खुलकर सामने आया भी, इन्हीं परिप्रेक्ष्य में देखें तो अभी से ही आभास होता प्रतीत है कि अगले पांच मई को जब "राष्टीय आतंक रोधी केंद्र" अर्थात एन सी टी सी को लेकर एक बार फिर पखवारे बाद मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्रियों के बीच विचारों का विनिमय होगा ,तब इसमें विवाद होना अभी से ही तय है ,जिसकी पृष्भूमि इस आंतरिक विषय को लेकर हुए बैठक में बन गई है |ऐसे में केंद्र के साथ राज्यों का मतैक्य होना कठिन है और इसके लिये संविधान वर्णित स्थितियों का इसमें मुख्य करक की भूमिका है |
         प्राय: इस बात से सभी अवगत है कि "कानून व व्यवस्था" राज्यों के जिम्मे है और ऐसा राज्यों से निर्मित "भारत संघ" के सवैधानिक प्रावधानों में स्पष्ट रूप  से उल्लेखित है ,फिर इसमें आमूल चूल परिवर्तन किये बिना केंद्र सरकार कैसे सीधे हस्तक्षेप करने की योजना बना लेती है ,यह समझ से परे की बात अबतक है | संघ, राज्य और समवर्ती सूची के तौर पर स्पष्ट विभाजन रेखा ,इन के मध्य है ,केवल समवर्ती सूची ही ऐसी है ,जिसपर दोनों या एक अपने - अपने ढंग से अपने क्षेत्राधिकार के तहत कार्य कर सकते हैं | विवाद होने की हालात में परस्पर मिलकर या न्यायालय के निर्णयों के तहत कुछ हद तक ,अथवा कानूनों के आपसी टकराहट की स्थिति में संघ के नियम ही मान्य होंगे , ऐसा ही  व्यवस्था भारतीय संविधान में है ,फिर विरोध के स्वर उठने पर इसके समाधान की प्रक्रिया का अवलंबन होना चाहिए लेकिन यहाँ तो गैर कांग्रेसनीत राज्यों के मुख्य  मंत्रियों ने सीधे आक्षेप  कर दिया  है कि संघ की सरकार राज्यों के सरकार को स्थानीय निकाय समझ जैसी बातें कर रही है ,जो वाकई में गंभीर बात है |
         दरअसल ,यह विवाद देश के इतिहास से गुंथा है ,जिसके अवचेतन मन के "प्रभाव से प्रभावी" होने की ललक सत्ता वर्ग को बराबर बैचेन किये रहती है | संवैधानिक स्थिति में राज्यों के मिलन से संघ बना ,जिसे भारत संघ कहा गया ,यह स्थानीय संस्कृति ,भाषा ,अस्मिता के आधार पर गठित है ,जिसमें व्यापक स्वरूप में जनहित के दृष्टिकोण से संघ अर्थात केन्द्रसरकार को संचालित करने का दायित्व भर है ,मगर पिछली सदी के यों कहें कि इंदिरा गाँधी के अभ्युदय काल से ऐसी प्रवृति राष्टीय राजनीती में उत्पन्न है कि संघ सरकार पर किसी भी दल या दलीय समूह की सरकार हो ,वह अपने को ज्यादा सशक्त करने और दिखने में प्रत्यनशील रहती आई है ,ऐसे में राज्य - संघ के बीच तनाव -विवाद नहीं होंगे तो क्या होंगे ?
         यह सदैव याद रखी जानी चाहिए कि भारत कई राष्टियता वाले देश का संघ है ,केंद्र नहीं , यह संवैधानिक प्रावधानों में साफ तौर पर अंकित है या जानें कि "राज्यों के संघ" उदबोधन से ही संविधान की शुरूआत  होती है और इसे नजरदांज किये जाने की प्रवृति से खतरनाक परिणाम निकल सकते हैं | सोवियत संघ का बिखराव हमारे सामने है | यहाँ इसलिए इसे याद करने की जरूरत है कि इस देश में संविधान में ही उल्लेख था कि राज्य चाहें तो अलग हो सकते हैं पर यथार्थ में वैसा नहीं था ,सोवियत संघ की जकडबंदी से पूरा विश्व परिचित रहा है | इस तुलनात्मक विवरण का मकसद भारत को भी सतर्क रहने की ओर इशारा करना है | ऐसे में राज्य संघ के रिश्ते को समय रखने की आवश्यकता है |
            केन्द्रीय सत्ता को अत्यधिक मजबूत करने पर जोर की प्रवृति ने राज्यों को संशकित किया है और इसमें  यह मान लेने की प्रवृति है का योगदान है ,जिसमें भारत को एक राष्ट सरीखी जैसी समूह समझा जाय | यह तो उप राष्टियताओं के मिलन से उत्पन्न राज्य है ,जिसकी सीमा भुगौलिक रूप  से निश्चित होने के बाद भी कई टुकड़े  हुए ,जिनमे पाक ,बंगला देश  सुंदर उदाहरण है |
              ऐसे में केंद्र - राज्यों के बीच संवाद में प्रभुता स्थापित करने वाली प्रवृति से बचा जाना चाहिए ,सत्ता का संचालन सदा एक सा नहीं होता ,मुगलकालीन ओरंगजेब शासन  में सबसे ज्यादा केन्द्रीयकरण का परिणाम थ कि उस वक्त देश के  अधिक भूभाग एक सता के अधीन रहे ,फिर इस श्ससक के इंतकाल .कमजोर पड़ने से कैसे सत्ता भरभरा का ढह गई ,यह इतिहास के पन्नों में देखा जा सकता है |  लालडेंगा , तमिल, राजनीती के स्वरूप  कश्मीर ,भाषाई संकट ,जातीय अस्मिता से पैदा हुए कई आन्दोलानो का इन सन्दर्भों में अध्ययन किया जा सकता है .जो पूर्व में कैसी -कैसी क्रिया कर्म से यह प्रभावित रहा है |
           व्यवस्थागत कठिनाइयों के बीच केंद्र को अब ज्यादा संघ जैसी मानसिकता से परिचालित होने का समय है | संविधान भी संघ सोच को मान्यता देता है ,शक्ति के अतिशय प्रयोग से मौजूदा संप्रभुता पर चोट पहुँच सकती है | चिदम्बरम ,सिब्बल जैसे नेताओं को केवल क़ानूनी तकनीकी आधारों पर बोलने के आदत से बाज आने चाहिए और प्रधान मंत्री को भी थोडा इतिहास के लेखों पर ध्यान देने चाहिए .तभी कानून -व्यवस्था पर सार्थक पहल संयुक्त रूप से हो सकती है ,जिसमे राज्यों का योगदान "समुच्चय" के रूप में केन्द्र बनी संघ को मिलने  की उम्मीद हो सकती है ,इससे इत्तर नहीं |
        वैसे भी, देखा गया है कि देश में दलगत व्यवस्था ने राज्य -संघ के संबंधों को काफी प्रभावित किया है और हार-जीत को लेकर होने वाली और बननेवाली राजनीतिक रिश्ते ने देश को काफी नुक्सान पहुँचाया है | द्रमुक -अन्नाद्रुमुक को लेकर संघीय सरकार के दृष्टि चाहे संप्रग या राजग केन्द्रीय सरकार में किस रूप में रही है ,यह खुद प्रत्यक्षमान है , वैसे इस तरह के कई उदाहरण भारितीय इतिहास में पड़े हैं , यहाँ तो अंदरूनी व्यवस्था पर होने वाली विचार -विमर्श पर सोचने के अवसर है | इसलिए दुराग्रही प्रवृति से मुक्त होकर ही केंद्र -राज्य एक बेहतर स्थिति ला सकते है केवल राजनीतिक चश्मे से समाधान नहीं संभव है | .

Monday, 16 April 2012

समाज , कानून और निर्मल बाबा


                     (एसके सहाय)
             भारतीय समाज में इन दिनों ,खासकर, उत्तर भारत में नव चर्चित धर्म गुरू को लेकर जबरदस्त बहस का दौर है और इस लोक परिचर्चा में कई बातें ऐसी हुई हैं ,जिन पर विचार किया जाना लाजिमी है |सो , इस सतत सामाजिक प्रक्रिया को समझने के लिये सर्व प्रथम यह अनुभूत करने की जरूरत है कि देश का मन मिजाज की संस्कृति क्या रही है और जो इस समय निर्मला बाबा को लेकर बातें की जा रही है ,क्या उसमें तनिक भी व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में स्वीकारा जा सकता है |ऐसा इसलिए कि जो दिख रहा है ,उसकी जड़ें सामाजिक -सांस्कृतिक अवचेतना "मनों" में अति सूक्ष्म तरीके से स्थापित है ,फिर इस हाय -तौबा से क्या निष्कर्ष निकल सकते हैं ?
           इसी की खोज में यह कई बार सामने आया है कि भारत "धर्मभीरू" देश है, जहाँ नानाविध प्रक्रियाएं सामाजिक जीवन को प्रभावित करते रहे हैं और इसपर कभी व्यवस्था का रोक भी नहीं रहा और अब तो कदापि संभव नहीं ,क्योंकि संविधान प्रवृत जो अधिकार वैक्तिक स्वरूप में आम भारतीय को प्राप्त हैं ,उसमें आस्था ,विश्वास ,निष्ठां  और परस्पर सहयोग की प्रक्रिया पर बंदिशें नहीं है |ऐसे में ,निर्मल बाबा केवल एक प्रतिमान ही हो सकते हैं ,इन जैसे असंख्य बाबा इसी देश में हैं लेकिन उनपर नजर इसलिए नहीं जा पा रही कि उनके पहुँच अभी समाचार जगत से दूर हैं और यदि मौका मिले तो रोज -ब -रोज एक नई बाबाओं की नई कहानी सामने आ सकती है और पूरा मीडिया इसमें ही अपनी समाचार कथा के चटपटे सूत्र तलाश करने में अपने को धन्य मान सकती है और इसमें कोई हर्ज जैसी बात भी नहीं है |
         अतएव , निर्मल बाबा पर दोष देने से पहले खुद व्यक्ति को अपने को तौलने की जरूरत है | एक उदाहरण यहाँ पर है | देश के नागरिक सांसद -विधायकों या कहिये अन्य जन प्रतिनिधियों को अपने -अपने व्यक्तिगत "मत" देकर जन हितों के अनुरूप व्यवस्था को संचालित करने के लिये अधिकृत करता है लेकिन चुने जाने के बाद ,इनके नाज -नखरे आम हितों के विपरीत  प्रतीत होता है ,तब संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही मामले को निपटाए जाने की प्रक्रिया सन्मुख उपस्थित होती है ,जिसमें "खीझ" जैसी भावनाओं का तूफान भी दीखता है ,जिसका सुन्दर उदाहरण ,अन्ना हजारे के नेतृत्व में खड़ा "लोकपाल" जन आंदोलन है ,जिसे कुछ लोग बेकार मानते हैं तो कुछ लोग भ्रष्टाचार के लिये अपरिहार्य मानते हैं और यह  मुकाम तक तभी पहुंचेगी ,जब संसद इस लोकपाल पर अपनी मुहर लगायेगी |
        ठीक .इसी तरह का मामला निर्मल बाबा के साथ हैं |वह खुद तय शुल्क को ग्रहण करते हैं ,जोर -जबरदस्ती इसमें नहीं है और यह है भी ,तो उनके अपने परिनियम हैं |साथ ही ,अपने आय के ज्ञात स्रोत को छिपा नहीं रखा है |आयकर वाले ही सही -सही इस विषय पर प्रकाश डाल सकते हैं और इसमें अगर खामियां हैं तो बाबा इसके परिणाम भुगतेंगे ही ,यह तो नियम - परिनियम की प्रक्रिया है ,जिमें ज्यादा बुद्दि लगाने की आवश्यकता नहीं है |
        इसलिए , दोष देने की जहाँ तक बात है ,तब वह दोष सामाजिक प्रक्रिया के उन जड़ों की हैं ,जहाँ से अन्धविश्वास ,श्रधा जैसी प्रक्रिया उत्पन्न होती है |वैक्तिक स्तर पर किसी के प्रति निष्ठां पर क्या सवाल खडें हो सकते हैं |निर्मल बाबा तो एक नमूने भर है ,जो बलात किसी से रूपये तो नहीं झटके हैं ,जो कुछ भी है ,वह तो इनके ही नियोजित हैं या कहिये कथित भक्तों के हैं ,फिर इसमें कानून की खिल्ली उड़ाने जैसी बाते नहीं है |लोग खुद अपने मर्जी से जाते मुर्ख बनने ,तब कोई कैसे उसे रोक सकता है |अज्ञानता ,अशिक्षा के अभाव ने अभी भारतीयों को तर्कशील अर्थात वैज्ञानिक सोच से दूर कर रखा है तो इसके लिये व्यवस्था ही  न दोषी है ,इसमें निर्मल बाबा जैसे कई नये बाबाओं के उत्पन्न होने के सूत्र स्वाभाविक रूप से छिपे हैं .जिसपर कोई भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कानून प्रतिषेध नहीं कर सकते | इसके उपाय एक ही हो सकते हैं ,जागरूक व्यक्ति की अपनी मौलिक सोच या तर्कशीलता का प्रभाव ,समाज में है तो खुद -ब -खुद निर्मल बाबा समाज से कट जायेंगे ,तब इतनी आलोचनाओं - प्रतिआलोचनों  के लिये मीडिया या समाज के पास समय कहाँ होगा !
        थोडा इस पर भी विचार करें ,जो निर्मल बाबा और सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने अलग -अलग अंदाजों में एक दूसरे को साला - बहनोई के रूप में स्वीकार किया है ,सार्वजनिक बातों में ,जो एक रिश्ते की हकीकत भी है ,इसे इंकार नहीं किया जा सकता ,लेकिन जो बातें नामधारी ने की है ,क्या उसे मंजूर किया जा सकता है ? बात हो रही है ,उस जन प्रतिनिधि की ,जो २५ -३० सालों से एकाध अवसरों को छोड़कर बराबर विधायिकी में रहा है और अब निर्मल बाबा के सन्दर्भ में कहता है कि " वह हमारे निकटतम रिश्तेदार हैं ,उनपर मुझसे कुछ नहीं पूछिए अन्यथा संबंधों में दरार हो सकते हैं " यह उस शख्स के विचार हैं ,जिसे लोगों ने व्यवस्थापिका में शासन सूत्र को ठोस बनाये रखने की जिम्मेदारी कई अरसे से डालटनगंज और अब चतरा के लोगों ने दे रखी है और जब स्वयं की बरी आई ,तब अपना नजरिया अभिव्यक्त करने भाग गए | वह भी तब, जब कथित धर्म गुरू ने अपनी बातों को नामधारी के सन्दर्भ में "इनके बंद मुठ्ठी"  का इशारा किया ,जिससे मजबूर होकर इस मुकाम तक पहुँचने में अनपेक्षित कामयाबी मिली | समाचार चैनल "आजतक" को दिए साक्षात्कार में  निर्मल बाबा ने इसी तरह के संकेत दिये है , यह संकेत भी बाबा ने तब दिए जब नामधारी ने अपनी आदत के मुताबिक पिछले कई दिनों से साले होने की बात स्वीकार करते हुए अपने गोल - मोल  बातों से बताया कि "इनके "  कार्यों से उनके मतभेद हैं और कई बार ऐसा नहीं करने के सुझाव भी उन्होंने दिए हैं लेकिन निर्मलजीत सुनता है नहीं | इसकी प्रतिउत्तर में ही बाबा ने एक अनजाने से प्रश्न के जवाब में एक सामाजिक प्राणी ,जो राजनीतिज्ञ भी है, के नकाब उठाये दिए , जो भारतीय सामाजिक जीवन को समझने के एक सूत्र इन दिनों दे दिया है और इसे किस रूप में व्यवस्था के नेतृत्व कर्त्ता लेते हैं ,उसका भी परीक्षण के बाद निष्कर्ष आने वाला है |
         कुल मिलाकर देखें तो ,निर्मल बाबा प्रचलित सामाजिक विकृति की उपज हैं ,जिसमें नियम -परिनियम की भूमिका का कोई महत्त्व नहीं है और जो प्रश्न वैयक्तिक सोच से प्रभावित है अर्थात भावनाओं से परिचालित है ,उसे कैसे रोक पायेगें ? यह सवाल ही इस सन्दर्भ में मौजूं हैं |
            

Friday, 13 April 2012

निर्मल बाबा के प्रारंभिक दास्तान


                 (एसके सहाय)
       निर्मलजीत से निर्मल बाबा बने नव चर्चित इस धर्म गुरू की कहानी किसी तिलिस्म से कम प्रतीत नहीं है ,जिसमें रहस्य के पुट है ,तो एक कर्मठ एवं गंभीर व्यक्ति के अदम्य साहस की गाथा भी है ,जो और धर्म गुरूओं से इनको अलग पहचान देती है | ऐसे में , इनके जीवन के शुरूआती गतिविधियों को जानना काफी दिलचस्प होगा , जिसमें एक कारोबारी वृत्त के सामान्य व्यक्ति का आर्विभाव ,कुछ ठहराव के बाद अचानक विशिष्ट स्वरूप में होती है ,फिर संदेहात्मक विवादों के घेरे में आकर बहस का केन्द्र बन जाती है और आजकल, इनके साथ यही देश व्यापी चर्चा का विषय लोगों के बीच बन गए हैं |सो ,इनके जीवन के शुरूआती सफर की ओर तांक-झांक करना स्वाभाविक है |
          निर्मल बाबा के जीवन की शुरूआती पल झारखण्ड के डाल्टनगंज में गुजरी है ओर इसके लिये निर्दलीय सांसद इन्दर सिंह नामधारी का सहारा इनके वैशाखी को डोर प्रदान करती है ,जो कि रिश्ते के धागों में साला -बहनोई के रूप में है ,लेकिन इन संबंधों का मूल्य अब वैसा नहीं रहा ,जैसा की शुरू में था ,जिसमें निर्मलजीत एक कर्मचारी के तौर पर ही अपने जीजा के व्यापारिक कामों में हाथ बंटाते थे ,जिसमें असंतुष्ट रहना ही इनकी नियति बन गई थी | इस कारोबारी जीवन में निर्मल को जब ठौर नहीं मिला ,तब वह अचानक अपना बोरिया बिस्तर बांध कर देहली के लिये कूच कर गए ,जहाँ  फिर अपने तरीके से जीवन यात्रा की शुरूआत की ओर इसमें संबल बना इनकी पत्नी सुषमा कौर की लगन एवं मेहनत, जिसमें वह घर खर्च के लिए खुद राष्टीय राजधानी में टुयुशन करके आजीविका अर्जित करने में इनको मदद करने में सहायक बनी |
   निर्मल बाबा जीवन के अमूल्य शुरूआती बसंत डालटनगंज में गुजारे और इन दो दशकों में किसी लफड़े में नहीं पड़ें ,जबकि इनके जीजा और खुद का कारोबारी धंधा ही जीवन का मूल आधार थे | यह बात गत सदी के अस्सी एवं नब्बे दशक की है ,जिसमें बालपन के वह साल भी समाहित है ,जब इनकी उम्र मात्र तेरह साल की थी और इनके पिता का देहांत हो चूका था लेकिन तबतक नामधारी के साले के रूप में रिश्तेदारी कायम हो चुकी थी . जो बाद के दिनों में इनके तजुर्बे निर्मल को आगे बढ़ने के लिये प्रेरित की | नामधारी के संग निर्मलजीत सिंह उनके तेल व्यवसाय के कामों में सहयोग देते थे और यहीं से कारोबार के गुर सीखकर बाद में अपना ठेकेदारी का काम अलग होकर करने लगे ,जिसमें बराबर इनको क्षति ही झेलने की स्थिति से गुजरते रहना पड़ा ,जो परवर्ती काल में इन्होने डाल्टनगंज से हमेशा के लिये विदा ले ली और अब जब "निर्मल बाबा" के रूप में अवतरित हैं ,तब इनके बालपन एवं युवापन के कई किस्से पलामू में चर्चा के विषय बन गए है | वह इसलिए कि डाल्टनगंज ,गढ़वा ,रांची और बहरागोड़ा में अपने को एक कारोबारी के तौर पर स्थापित करने के जीतोड परिश्रम इन्होने किया लेकिन कामयाबी नहीं मिली और जब सफलता मिली भी तो अब नव चर्चित धर्म गुरू के रूप में ,जो विवादों के बीच इनका देश के कानून से दो -चार होने के हालात है और यह स्थितियां भी इनके द्वारा स्व उत्पन्न है ,जिसकी अनुभूति शायद इनको खुद नहीं है |
           बहरहाल , निर्मल बाबा खुद पाकिस्तान से आये एक शरणार्थी रहे और जब इनकी बहन की शादी इन्दर सिंह नामधारी के साथ हुई तब वह अपने माँ के साथ पंजाब के पटियाला में थे ,बाद में नामधारी के  परामर्श के तहत डालटनगंज में व्यवसाय करने आ गए |यहाँ नामधारी के तेल व्यवसाय में इनकी भूमिका एक हिसाब -किताब रखने वाले मुंशी की थी |यहीं इनकी दिलीप सिंह बग्गा की बेटी सुषमा कौर से विवाह हुआ \इनके ससुर  की परिवहन व्यवसाय में काफी नाम थे ,जो कभी "बी  डी मोटर्स" के तौर पर पहचान रही |अभी एक वर्ष पहले ही इनके ससुर दिलीप बग्गा का जयपुर में इंतकाल हुआ है |
         निर्मल बाबा के ससुर  डालटनगंज से जयपुर अपने धंधे के लिये १९८९ में गए थे | इनके दो अन्य सालों  के नाम संतोष सिंह बग्गा और संतोष सिंह बग्गा है |इसमें संतोष बग्गा फ़िलहाल जीवित हैं |
         डालटनगंज में जब निर्मलजीत ने अपना स्वतंत्र व्यवसाय "मोटर्स पार्ट्स" की शुरू की थी ,यह कारोबार १९८४ तक यहाँ था लेकिन जब उस वर्ष सिख दंगे के चपेट में आने पर इनकी दुकान लुट ली गई और फिर इन्होने इस शहर को छोड़ दिया
इनके पडौसी विजयकांत शुक्ल बताते है " वह काफी धीर गंभीर प्रवृति के व्यक्ति थे " शुक्ल के बगल में ही डालटनगंज के रेडमा में आज के बाबा की दुकान थी | इसी तरह की बातें रांची एक्सप्रेस के वरिष्ष्ठ संवाददाता सुरेन्द्र सिंह रूबी कहते हैं "वह तो अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाला इंसान था ,काफी काम बोलना उसके आदत में शुमार थी " रूबी के बगल में ही निर्मलजीत १९७०-७५ के बीच रहा करते थे और ये दोनों ही पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थी परिवार थे ,स्वाभाविक है कि इनके भी परस्पर छनती हो |
        निर्मल बाबा की पत्नी सुषमा कौर के फुफेरे भाई मदन मोहन सिंह डालटनगंज में एक वरिष्ठ अधिवक्ता है | वह बताते हैं कि " सिख दंगे के बाद वह डालटनगंज से विदा हो चुके थे और देहली में रहकर जीविकोपार्जन की कोशिश में थे ,इस दौरान मेरी  ममेरी बहन सुषमा (बाबा की पत्नी ) से मिलने १९८६ में  वह देहली गए थे ,तब बहन अपने घर के आस -पास के बच्चों को पढाकर घर के खर्चे जुटाती थी और बहनोई साहब अपने ही कक्ष में अंतरध्यान लगाये रहते थे ,जिसमें सुषमा सहयोग करती थी |" वैसे, इनके ससुराल के लोग अच्छे -खासे ,स्थापित व्यवसायी रहे हैं ,परिवहन और खदान के कामों में इनकी अपनी साख रही है |
         ऐसे में, निर्मलजीत सिंह कब निर्मल बाबा हो गए ,यह डालटनगंज के लोगों ने तब ही जाना ,जब उनके किस्से  - कहानी मिडिया के माध्यम से चर्चित हुए | कहते है कि सिख दंगे ने इनको  मानसिक रूप से काफी विचलित किया और उसी आघात ने इनको धर्म गुरू के तौर पर स्थापित  किया ,जो इन दिनों चर्चा का विषय बन गया है,जिसमें कई तरह की बातें निकल कर सामने आ रही है ,जिसमें सर्वाधिक चर्चा के मुद्दे अकूत सम्पति अर्जित करना ,अध्यात्म के नाम पर व्यापारिक गतिविधियों को संचालित करना तथा भावनाओं के दोहन के मुद्दे ज्यादा प्रचारित -प्रसारित हैं  |
            इन सब चर्चित विषयों से अलग अबतक यह प्रकट नहीं है कि क्या निर्मल बाबा ने किसी को धोखा दिया , जोर जबरदस्ती से रूपये वसूले ,मतलब कि वस्तुगत प्रत्यक्षमान साक्ष्यों के अभाव में न्यायिक प्रक्रिया के क्या हस्र होते हैं ? फ़िलहाल, इसका इंतजार देश को है |



Wednesday, 11 April 2012

इन मुठभेड़ों में छिपी स्थितियां


                           (एसके सहाय)
        झारखण्ड के एक ही क्षेत्र में पांच दिनों के अंतराल में सशस्त्र माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुए मुठभेड़ों ने यह साफ कर दिया है कि भूमिगत संगठनों के प्रति सरकार और जिला एवं स्थानीय प्रशासन गंभीर नहीं है और यदि ऐसा नहीं है ,तब इतने कम अवधि में तुरत मुठभेड़ होना और केवल पुलिस को ही नुक्सान होने के क्या मत;लैब है ? पहले चार अप्रैल और अब नौ अप्रैल को पलामू परिक्षेत्र में ही मुठभेड़ इतने कम अंतराल पर होने से यह भावना ग्रामीण क्षेत्रों में घनीभूत होने को है कि जान - माल की सुरक्षा अब उग्रवादियों के ही हाथों में है ,इसलिए इनसे पंगा लेना गांव वालों  को मंहगा हो सकता है | वैसे ,पलामू प्रमंडल के तीनों जिलों में यथा -पलामू ,गढ़वा और लातेहार में माओवादियों के अतिरिक्त अन्य कई चरमपंथी संगठनों के हथियारबंद दस्ते सक्रीय हैं ,जिसमे आपसी एकता तो नहीं लेकिन सरकार को चुनौती देने में सभी तरह के उग्रवादी सक्रीय रहते दिखे है |
             यह दोनों मुठभेड़ इसलिए भी महत्वपूर्ण तौर पर रेखांकित है कि दोनों मुठभेड़ स्थलों के बीच की दुरी महज कुछेक किलोमीटर है ,जो कहने को दो अलग -अलग जिलों में पड़ता है लेकिन यह दोनों जिला पुलिस के लिये आपसी तालमेल को दर्शाने के लिये भी प्रयाप्त है ,फिर भी दोनों मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों के ही सतही हत् हुए ,यह कम चुन्ताजनक स्थिति नहीं कही जा सकती | सर्वप्रथम लातेहार जिले के बरवाडीह थानांर्गत कर्मडीह में माओवादियों ने केन्द्रीय सुरक्षा बल के एक जवान को मार डाला और एक, झारखण्ड आर्म्स पुलिस के जवान को गंभीर रूप से घायल कर दिया .फिर नौ अप्रैल को गढ़वा जिले के भंडरिया थाना क्षेत्र के चेमु स्नाय इलाके में मुठभेड़ करके अर्ध सैनिक बलों के छ जवानो को जख्मी कर दिए ,जो माओवादियों के बढते हौसले को प्रदर्शित कर रहे और सरकार की तरफ से कोई जवाबी कारवाई के संके तन नहीं मिल रहे है ,जो आमजान में भरोसे को तोड़ते प्रतीत है और यह कोई स्वस्थ लक्षण के तौर पर नहीं लिया जा रहा ,इससे निकट भविष्य में पुन: हमले होने की आशंका से इंकार नहींकिया जा सकता |
           सबसे ताजुब की बात है कि दोनों मुठभेडें दिन के उजाले में हुई और पुलिस -सुरक्षा बलो के पास इतने समय थे कि अगर वे चाहते तो इन अतिवामपंथियों को आराम में घेर कर अपनी कब्ज़ा में ले सकते थे लेकिन इन व्यूह रचनाओं को अमली जमा न पहनाकर पुलिस आत्म रक्षार्थ हो गई ,जिसे माओवादियों के हौसले में इजाफा हो गया और जब कर्मडीह मुठभेड़ के बाद दूसरे दिन "आक्टोपस" अभियान चरम पंथियों के विरूद्ध छेड़ा गया ,तब नौ अप्रैल को दिन के दस बजे छ जवान उग्रवादियों के चपेट में चेमु स्नाय के निकट  गंभीर रूप से घायल हो गए और एक बार फिर पुलिस मुहीम, आत्म रक्षार्थ मन: स्थिति में आ  गयी |
         इन हालातों में कैसे उग्रवादियों पर झारखण्ड में काबू पाया जा सकता है |यह प्रश्न एक बार फिर पुलिस महकमें में उठ गया है | राज्य पुलिस को मदद के लिये केन्द्रीय सुरक्षा बल कि कंपनियां प्राय: हर जिले में प्रतिनियुक्त है |खासकर , उग्रवाद प्रभावित जिलो में ,जिनकी संख्या अठारह हैं ,में लगातार अभियान चलाये जाने की बात सरकार और पुलिस महानिदेशक गौरीशंकर रथ करते रहे हैं ,फिर भी नतीजे कोई विशेष सामने नहीं आ पा रहे | आखिर क्यों ?
         दरअसल , भूमिगत संगठनों के उग्रवादियों  के प्रति सरकार की कोई स्पष्ट नीति अबतक सामने नहीं आ पाई है और न ही पुलिस को वो खुली छूट प्राप्त है ,जैसा कि पूर्वोत्तर  के राज्य पुलिसों को है ,सिर्फ  "हवाई फायर " ही इनकी घोषणा दिखी है ,जिसे जन विश्वास भी खत्म होता परिलक्षित है | गांव में यदि ग्रामीण उग्रवादियों के रहम - करम पर है ,तो इनके उनके साथ सुरक्षा की गारंटी भी है ,यही वजह है कि राज्य के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में अपराध की मात्रा घट गई है ,जिसके कारण यह रहा कि ,चोरी ,डकैती ,लुट ,छिनतई ,बलात्कार ,हत्या जैसी मामले उग्रवादियों के भय से नहीं हो पाते ,क्यों कि इनके बीच फरियाद होने या जानकारी मिलने पर तुरत अपनी कथित "जन अदालत" में फैसले  कर दिए जाने की  बात रहती है |और तो और शाम हुआ नहीं कि पुलिस या अन्य कोई भी सुरक्षा बल गांवों की मुंह नहीं करते तथा मुख्य सड़क से उतरने की तो सोचीय ही नहीं , यह हालात है झरखंड की ,जहाँ माओवादियों के अलावे अन्य कई दर्जन भर उग्रवादिक संगठन अपनी सरकार के सामानांतर प्रभाव स्थापित किये हुए हैं ऐसे में ,जब -तब कथित लेवी वसूलने की बात सामने आती है ,तब वह हकीकत है ,बिना इनके अनुमति के कोई भी निर्माणात्मक काम हो ही नहीं सकते और इसे देखना -जानना हो तो पुलिस मुख्यालय ,ख़ुफ़िया रिपोर्ट या जिला पुलिस के फाइलों को देखने ,जहाँ हजारों की संख्या में उग्रवाद के साथ अन्य गठजोड़ की बाते पढ़ने को मिल जायेगी |
               झारखण्ड में हकीकत तो यह है कि यदि ग्रामीण उग्रादियों को थोडा खाना खिला दें ,तब पुलिस उन्हें तंग करती है और अगर पुलिस कोई बात गांववाले सूचित करें ,तो माओवादी सहित अन्य उग्रवादी सताते हैं ,जिसके कारण पूरा ग्रामीण जन -जीवन तबाह है |ऐसे  में ,कोई कारगर नीति इन चरम पंथियों से लड़ने के लिये पिछले १२ सालों में नहीं बनी , जिसके वजह से आज आये दिन मुठभेड़ ,मौत ,घायल जैसी लोमहर्षक घटनाओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है | इस राज्य में ,पूर्व मंत्री ,सांसद ,विधायक ,भारतीय पुलिस सेवा ,राज्य पुलिस सेवा या अन्य अधिकारी ,- कर्मचारी समेत असंख्य लोगों की मौत उग्रवादियों के हाथों हो चुकी है ,इसके बावजूद सरकार ,सामाजिक जीवन ,आर्थिक -राजनीतिक समूह या कहे अन्य वर्गों में केवल "वैक्तिक " रूप से बैचेनी है ,कुछ कर गुजरने की भावना का सर्वथा अभाव है ,जो पुरे  झारखण्ड को लकवा ग्रस्त किये हुए है |यही इस राज्य की फ़िलहाल सबसे बड़ी त्रासदी है |
 
         

Monday, 9 April 2012

सरदा-जरदा मिलाप के कूटनीतिक अध्ययन


                        (एसके सहाय)
   पाकिस्तानी राष्टपति आसिफ अली जरदारी के निजी दौरे पर भारत आने और इस मौके पर भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से एकांत में पच्चास मिनट बातचीत करने को लेकर ,इधर देश -विदेश के कूटनीतिक क्षेत्रो में जबरदस्त मीमांसा किये जाने की होड है ,जिसमे भारत के राजनीतिक गलियारों में ,इन मुलाकातों के सन्दर्भ में तरह - तरह के अनुमानों का दौर है और इन अनिश्चित स्थितियों के बीच राष्ट हित का सवाल गौण होता प्रतीत है ,जो कि भारत के लिये अब भी आतंकवाद  को लेकर कोई ठोस  वायदे -आश्वासन पाक की ओर से  संकेतित नहीं है | यही इन भेंट -मुलाकातों का सार है ,जिसके कोई यथार्थ मायने नहीं है |
 फिर भी इन दो शाख्सियतों का मूल्याकन किया ही जाना चाहिए ,ताकि यह तो पता चाल सके कि इन दो गैर राजनीतिज्ञों के मान में क्या विचार अपने - अपने देश के प्रति है ? ऐसा इसलिए कि मनमोहन सिंह और आसिफ अली में ज्यादा का फर्क नहीं है ,दोनों की शक्तियां एक -दूसरे की तरह पराश्रित हाथों में है और काफी हद तक दोनों अपनी -अपनी जरूरतों के हिसाब से ही डगर भर सकने के हालात में है ,ऐसे में कोई यथार्थ परक रिश्ते की बात इन दोनों के बीच हुई होगी ,कोरी कल्पना होगी |
   अतएव , भारत -पाक के सबंध सीमित दायरे में ही फिलवक्त बने रहने की है ,जिसमे अमेरिका को दुश्मन नंबर एक मान लेने की प्रवृति इन दिनों पाक में जोर पकड़ रही है ,जो जरदारी ,गिलानी परवेज कयानी और पाक मुख्य न्यायधीश चौधरी के झूले में अटका है , जिसमे परस्पर अहम ही इनके बीच एक -दूसरे को शंकालु बाये हुए है |मतलब यह कि पाक में अभी स्थिरता के अभाव का दौर है और इस बचने की जो भी कोशिश वहां दिखती है , समष्टिगत न होकर व्यष्टिगत है ,ऐसे में जरदारी के सामूहिक या फिर व्यक्तिगत मुलाकतों का भारत के लियेकोई अर्थ नहीं है |
     इतना ही नहीं , जरदारी की मनोदशा व्यापारिक बुद्दि से प्रभावित है ,जो लाभ -हानि के नजरिये से खुद और अपने देश पाक को तौलने की प्रवृति से लाचार हैं ,तभी तो उनको पाक में  "मि टेन परसेंट " के संबोधनों से अक्सर बातचीत में लोग नवाजते हैं ,लेकिन भारत में सरदार जी के प्रति इस मामले में कोई आपति देश के लोगों में नहीं है ,आपति है तो सिर्फ यह कि राजनीतिक -कूटनीतिक निर्णयों में इनके असमंजस में रहना और दूसरों के मुखापेक्षी होना ही इनके अतिरिक्त दोष है ,जो किसी भी मुल्क के सेहत के लिये ठीक नहीं माना जाता | ईमानदारी में इनके स्तर के खोजने से भी जल्द व्यक्ति मिलने मुश्किल है , इन सब के बीच जो खामिया है ,वह इनके पेशेगत नजरिये  से जुड़ा है ,जिसमे अर्थकीय विशेषज्ञता ही हर राजनीतिक -कूटनीतिक मसलों पर इनसे झलकती है ,जिसमे सपाटपन ज्यादा है और तकनीकी बातें
कम होती है |
       इन सब अलग -अलग सोच वाले व्यक्तित्वों के बीच जब देश के परस्पर हित साधने के मसले पर विचारों का आदान -प्रदान होता है ,तब इनके बीच बातों की मौलिकता नहीं होती ,बल्कि दूसरे के सलाह पर ही इनके फैसले होते है .इसलिए एकांतवास की यह मुलाकात का कोई माने -मतलब नहीं दीखता | जरदारी और सरदारजी इतफाक से ही अपने -अपने पद पर हैं | मनमोहन  ईमानदार होने के साथ ,नौकरशाही संस्कृति के बीच से एक नेत्री के पसंद के बाद अपने मुकाम तक पहुंचे है,जिसमें सीधे निर्णय  लेने की क्षमता का सर्वथा अभाव अबतक के कार्यकाल में उनमें दिखा है और देश के बाहर भी यदि कुछेक मामलों में फैसले करने तक पहुंचे तो उसमें सोनिया गाँधी के साथ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के मन्त्र रहे है | ऐसा कई बार दिखा है और इसका सबसे सुन्दर उदाहरण मुंबई कांड के बात मुखर्जी के कूटनीतिक पूर्ण बयानों में साफ परिलक्षित हुआ और पाक शेष विश्व से अलग -थलग होने की स्थिति में आ पहुंचा है |
    इसलिए जरूरी है कि भारत -पाक के रिश्ते को समझने के पूर्व दोनों देशों के राष्ताध्यक्ष  और शासनाध्यक्ष के मनोवृतियों को समझा जाय | वैसे , जरदारी भी एक व्यवसायी ही हैं ,जो पूर्व  प्रधान मंत्री नवाज शरीफ के सोच वाले जैसे प्रतीत हैं ,इसका उदाहरण उनके कार्यकाल में व्यापार के तहत चीनी आपूर्ति का विषय काफी चर्चित था और अन्य क्षेत्रों में खुला बाज़ार की तरफ कदम दोनों देश द्वारा उठाये जाने वाले ही थे कि वहां सत्ता पलट हो गए और एक बार फिर दोनों देश जहाँ  से चले थे ,वही पहुँच गए |
  फिलवक्त ,भारत की सोच का दायरा एकमात्र आतंकवाद के इर्द -गिर्द घूम रहा है ,जिसकी कड़ी में मुंबई कांड और अपनी जमीं से पनाह देने वाली हरकतों का साया ,इनके बीच आगे बढ़ने से विचलित करती है और पाकिस्तान में कब ,कौन और कैसे संप्रभु के तौर पर अवतरित हो जाये ,यह थाह पाना भी मिश्किलों वाला है | इधर जब से अमेरिका ने पाक के कान ऐंठने शुरू किये है ,तब से पाक की बोलती में वह कड़क भारत के प्रति नहीं है ,जैसा कि पूर्ववर्ती  कालों में दिखती रही है |
        अभी के हालातों के मद्देनज़र पाक को ,भारत का सहारा चाहिए और यह सहारा ऐसा भी होना चाहिए कि वह लात भी मरे ,तब उसे बर्दाश्त करने में मददगार भारत को होनी चाहिए ,क्योंकि वहां के लोकतंत्र इन दिनों सेना के साये में गर्दिश  में है और यदि भारत दबाव बनाया ,तब एक बार फिर सैन्य शासन की ओर पाक लौट  जाएगा  ,जो भारत के लिये सिरदर्द ही होगा ,पहले की तरह ,यही इन मुलाकातों का लब्बों-लुआब है ,दोनों सरदा -जरदा के ,जिसमे देशीय चिंता कम वैयक्तिक चिंता के भाव ज्यादा झलकते हैं |