Wednesday, 8 January 2014

हेमंत : युवा मुख्य मंत्री और यह अवसान

                                           (एसके सहाय)
     झारखण्ड में झामुमोनीत सरकार का गठन हेमंत सोरेन के नेतृत्व में  हुआ , तब कल्पना थी कि युवा मन की हिलोंरे लेती तस्वीरों को  राज्य में उतरने के लिये माकूल मौका मिलेगी ,ऐसा सोचने के पर्याप्त वजहें भी थी ,लेकिन कुछेक माह गुजरने के बाद प्रतीत है कि निकट भविष्य में वैसा कुछ भी नहीं होने वाला है , जिससे लगे कि शिबू सोरेन का यह बेटा बदलाव करने की तमन्ना भी रखता है |बस ,जैसे -तैसे सत्ता को बचाए रखने में ही समय , श्रम और शक्ति जाया हो रही है , गोया उन्हें लगता है कि उनके अपने टोटके से ज्यादा दिनों तक सत्ता सुख मिल सकेगा |  
      यहाँ यह बात इसलिए प्रासंगिक है कि हेमंत ने कहा है कि 'विकास के लिये गठबंधन की जगह स्पष्ट जनादेश की जरूरत है , इस सरकार में वह विवश हैं ,इसमें समझौते की मज़बूरी है, अपेक्षाकृत कदम नहीं उठा सकते हैं |' यही नहीं वह कहते हैं कि अरविन्द केजरीवाल जैसे ही लालबत्ती एवं रोब -दाब का प्रदर्शन नहीं करेंगे , अच्छे कामों का "नक़ल" करने में कोई दिक्कत नहीं है |
           यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि जिस नेता को नक़ल और अनुसरण में फर्क पत्ता नहीं और जिसकी अपनी मौलिक सोच नहीं हो , उससे आम लोगों का क्या भला हो सकता है ? 'आप' के प्रभाव हेमंत पर दिखा तो है ,मगर यह वैसा ही है , जैसे  पानी का बुलबुला, यह इसलिए कि इनमे राजनीतिक जोखिम उठाने का मादा नहीं है और यह दृढ़ता होती , तब तीन माह में राज्य के भीतर दिख जाती , लेकिन ऐसा कुछ भी खास नहीं है ,जो हेमंत के व्यक्तित्व में चार चाँद राजनीतिक तौर पर  नजर आते | यह ताज उनकी लोलुपता का नतीजा है ,यही नहीं अपने पिता शिबू सोरेन की सोची -समझी योजना का फल है , बीमार शिबू को यह मालूम है कि उनके जीवित रहते पुत्र की ताजपोशी होने से पार्टी में अगले कतार में यह स्वत: रहेगा | इसीलिए अपने जीवित अवस्था में ही हेमंत को मुख्य मन्त्री बना देना इनकी शातिर दिमाग की उपज माना गया है |
     काफी हद तक यह सच भी है , शिबू सोरेन के गैर मौजूदगी में हेमंत आसानी से सत्ता की बागडोर नहीं संभाल पाते , दल में ही उनके कई कद्दावर नेता हैं ,जो जब -तब झामिमो के नेतृत्व को खरी -खोटी सुनाने में जरा भी देर नहीं करते रहे हैं और शिबू भी दबाव में आते रहे हैं |
      खैर , आज जिस स्वरूप में हेमंत सोरेन है , उसमे सत्ता में बने रहने और कांग्रेस -राजद के आगे नत -मस्तक रहना ही है | सत्ता इनके लिये इतनी प्यारी है कि केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार की योजना के तहत २०१४ में होने वाली लोक सभा में मात्र चार सीटों पर  झामुमो को  लड़ने के लिये कांग्रेस ने रजामंद कर लिया और झारखण्ड में इन्हें कमान सरकार सौंप दी ,ताकि केन्द्रीय सत्ता को अक्षुण्य बनाये रखने में मदद मिल सके |
                  यह बातें इसलिए रेखांकित है कि वक्त किसी का मोहताज नहीं होता , मौका मिला है ,तो अल्प अवधि में ही जन हितों की दिशा में सख्त एवं जोखिम उठाते हुए पहल करने की , यह अवसर हेमंत को मिला है ,मगर हिचक क्यों ? वह वैसे भी झामुमो के सबसे काबिल नेताओं में कभी शुमार नहीं रहे , पिता की तिकड़मी एवं तदर्थ राजनीति का फल है कि उन्हें मुख्य मंत्री के पद पर आसानी से ताजपोशी हो गई | झामुमो का अपना इतिहास उतना उजाला नहीं है कि इसके लार्टी लाइन को लोग सहज ढंग से मंजूर कर लेंगे | यह प्राय: सभी झारखण्ड वासी जानते हैं कि झामुमो जब दक्षिण बिहार अब झारखंड  में गठित हुई तो , उसके सिरमौर बिनोद बिहारी महतो और निर्मल महतो थे ,इसमें तीसरे पायदान में शिबू सोरेन थे | इस जानकारी के पीछे और जाएँ ,तब विदित होगा कि शिबू को इस लायक बनाने में धनबाद के कभी उपायुक्त रहे केबी सक्सेना और बिनोद बिहारी महतो का अहम योगदान रहा है | इतना ही नहीं , निर्मल महतो की हत्या (१९८५) के बाद ही धीरे -धीरे शिबू की खास पहचान झारखण्ड की राजनीति में  हुई |
       इतना ही नहीं , जब ३ सितम्बर १९९३  को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री एसवी पाटिल ने झारखण्ड निर्माण सबंधी बयान दिया ,तब मौजूदा मुख्य मंत्री के पिता शिबू कांग्रेस के साथ गलबहियां कर रहे थे , उम्मीद बनी कि जल्द ही राज्य का गठन हो जायेगा , गृह मंत्री के बयान में ऐसा ही संकेत था ,लेकिन बाद में सार्वजनिक हुआ कि पीवी नरसिंह राव के विश्वास मत के दौरान झामुमो रिश्वत कांड हुए थे | जाहिर है कि राजनीति को जैसे -तैसे मनमाफिक हांकने के यत्न ही पिछले दो दशक से इस पार्टी ने किया है और अब जब इनके आशाओं पर तुषारापात की झलक मंडराने लगी है ,तो झामुमो प्रमुख के इस लाडले ने साफ बहुमत के भाव का रोना रोया है |
        ध्यान रहे , गृह मंत्री ने पुणे में कही अपनी बात को दूसरे दिन गौहाटी में दुहरा दिया था , तब दक्षिण बिहार में आशा बांध गई थी शीघ्र ही अलग प्रान्त की विधिवत घोषणा हो जायेगी | मगर ,उस वक्त यह मृग मरीचिका ही साबित हुई |
       यह कई दफे प्रकट हो चूका है कि सत्ता के लिये झामुमो का कोई साफ -सुथरा नीति -सिन्धांत कभी नहीं रहा | यह राज्य बन रहा था , तब यह राजग के साथ थी , भाजपा ने शिबू को मुख्य मंत्री बनाना नहीं गंवारा ,तब यह कांग्रेस के खेमे में चली गई | यह सिलसिला इसके काफी लंबे हैं | ऐसे में हेमंत सोरेन की बात बेमानी परिलक्षित हो तो कोई आश्चर्य नहीं |
         झारखण्ड में हेमंत सोरेन को मुख्य मंत्री बनने का अवसर मिल गया ,मगर इनके मंत्रिमंडल में इनके मंत्रियों के बीच इतना अंतर्विरोध -तीखा मतभेद है कि इसके होने न होने का कोई मतलब ही नहीं है | नतीजतन ,राज्य राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता के दौर में है लेकिन इसके सुधरने के लिये हेमंत के पास फिलवक्त कोई सख्त योजना नहीं है |
       कम उम्र के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल भी हैं , इनकी भी सरकार कांग्रेस के रहमो -करम पर टिकी है , मगर इनको फिक्र नहीं है कि सरकार रहे यह जाये , इसके बावजूद जिस दृढ़ता से जनोपयोगी निर्णय दिल्ली की सरकार ने लिया है , वह सराहनीय एवं स्वागत योग्य है |  आखिर सरकार है किसके लिये ? "जनता" के लिये ही न , फिर जन कल्याण के मामलों में गुणा-भाग कैसा ? वह भी लोकतंत्र में नफे - नुक्सान को लेकर , कम से कम बुनियादी जरूरतों के मामले में लाभ -हानि को दरकिनार होनी ही चाहिए |

       लोक सभा चुनाव हेमंत सोरेन के लिये अहम है | इसमें राजनीति की चतुरंगी फांस को कैसे तोडा जाये , यह फिलवक्त मुख्य सवाल है |१०-४ के बीच सीटों के बंटवारे की बात ठीक उसी तरह सामने आई है ,जैसे भाजपा के संग में २८-२८ माहों के सरकार के कार्यकाल का कथित तय होना कहा जाता था , यह अविश्वसनीयता क्या एक बार फिर खंडित होगी ? 

Tuesday, 7 January 2014

मोदी बनाम राहुल बराबर केजरीवाल

                (एसके सहाय)
      २०१४ में होने वाले लोक सभा चुनाव के विधिवत घोषणा में अभी देर है, इसके बावजूद देश में अगले प्रधान मंत्री को लेकर बहस-मुबाहिसों का दौर तेज हो गया है , ऐसे में नवोदित दल  'आम आदमी पार्टी' के अचानक धीर -गंभीर तरीके से राष्टीय राजधानी दिल्ली में काबिज होने से नये समीकरण एवं धुर्वीकरण की संभावना उत्पन्न है , जिसे लेकर भाजपा में धीमी स्वर से ,तो कांग्रेस खुलेआम चिंता के स्वर दिखने लगे हैं और इस कड़ी में जब केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश अपनी पार्टी ,कांग्रेस को सचेत करते हुए कहते हैं कि ' कांग्रेस को अभी से अपने में परिवर्तन करना होगा ,अन्यथा ---तो गंभीर बात होगी , का खास मतलब है | यह इसलिए भी चिंतनीय है कि दिल्ली में "आप" के उदय पर राहुल गाँधी ने तूरत साफ तौर पर इसके क्रिया -कलापों को स्वीकार किया है और सीखने की बात कही है |
      ऐसे में अरविन्द केजरीवाल को अगले प्रधान मंत्री के तौर पर 'आप' के रणनीतिकार एवं विचारक योगेन्द्र यादव घोषित करते हैं , तब इसके मायने काफी गुढ़ होते हैं , जिसे मौजूदा राजनीति में प्रभावकारी कारक के तौर पर देखा जा रहा है |
     यों तो , भाजपा के घोषित प्रधान मंत्री के उमीदवार नरेन्द्र मोदी हैं और कांग्रेस के लिये नाम अबतक सामने नहीं आये हैं ,फिर भी परदे के पीछे की बातों पर भरोसा करें ,तो राहुल गाँधी ही इसके दावेदार होंगे | चर्चा भी इसी नाम की है |मनमोहन सिंह ने प्रेसवार्ता  करके स्पष्ट कर दिया है कि वह तीसरे पाली के लिये प्रधान मंत्री के पद पर विराजमान नहीं होगें , इनकी माने तो , राहुल ही पार्टी के 'आदर्श उम्मीदवार उक्त पद के लिये हैं |
   बहरहाल , अब जो नाम देश के फिजां में तैर रहा है ,उसमे राहुल ,मोदी और केजरीवाल का है | इनके नाम पर मुहर कैसे लगेगी ,यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही तय होगा | वैसे , नतीजे सामने आने पर १९९६ की तरह भी अचानक लाटरीनुमा नाम अचानक सामने आ सकते हैं , फिर भी इसकी संभावना कम ही है |
     तुलनात्मक दृष्टि से देखें , तो जाहिर होगा कि मोदी बनाम राहुल के मध्य ही मुख्य जोर होगा | इसमें भाजपा को लगातार प्रतिपक्ष में रहने का लाभ है ,तो कांग्रेस को सत्ता में रहते भ्रष्टाचार ,मंहगाई और अन्य समस्याओं को लेकर दरपेश होने की विवशता है | मुख्य मुकाबले में यही दो किनारों के बीच  "केन्द्रीय सत्ता " के लिये होड़ होगी |ऐसा राज प्रेक्षक मानते हैं | इसमें अरविन्द केजरीवाल की भुमिका को लेकर कतिपय राजनीतिक हल्कों में संदेह के बदल हैं , जिसमे मुख्य वजह सांगठनिक शक्ति का सीमित स्वरूप , चरित्रवान सामाजिक क्रियाविदों के चयन का झमेला , पैसे -सादगी के बीच आम लोगों के बीच पहुँच के अलावा अन्य कई ऐसे तथ्य हैं ,जिसका परीक्षण होना अभी बाकी है |
      यह इसलिए कि भारतीय समाज कई कोणों से विभाजित हैं , जिसमे जातीय ,धार्मिक क्षेत्रीय ,सामुदायिक समूहों के अपने -अपने आग्रह -विग्रह हैं , इस अवस्था में अभी सीधे कोई निष्कर्ष निकाल लेना जल्द बाजी होगी कि भारतीय मतदाता आजादी के बाद पूर्णत: परिपक्व हो गई है और अपना -बुरा -भला समझने में सक्षम है |यह इसलिए कि अबतक भावावेश में ही 'सत्ता' परिवर्तन देश में हुए हैं और जहाँ राजनीतिक चुनाव के प्रति उदवेग नहीं हैं , वहां खंडित 'जनादेश' ही सामने आये हैं ,यथा - १९९१ ,१९९६ ,२००४ और २००९ के नतीजे को विश्लेषित कर सकते हैं | हालाँकि सरकार गठित हुई लेकिन इसमें कई दल , दलीय समूह ऐसे से ,जो एक -दूसरे के विरूद्ध ख़म ठोक कर चुनाव मैदान में थे | इनमे साहचर्य तभी बना ,जब सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी मिली |१९७७ में तानाशाही बनाम लोकशाही ,१९८९ में बोफोर्स से उपजे भ्रष्टाचार की छाया तो १९९८-९९ में पस्त कांग्रेस एवं अन्य कथित तीसरे मोर्चे की स्थिति | इन चुनाव परिणामों को देखें ,तो साफ होगा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में अब स्पष्ट जनादेश निकट भविष्य में किसी पार्टी या पार्टी समूह को आसानी से मिल जायेगी ,यह मुमकिन प्रतीत नहीं होती |
       याद करें , परतंत्र भारत में अंग्रेजी हुकूमत में भी केन्द्रीय एसेम्बली के लिये चुनाव हुए थे , इसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग ही प्रभावी भूमिका में थे , जिसका असर इस रूप में प्रकट हुआ कि जिस समुदाय की जहाँ बहुमत था ,वहां उसी को मतदाताओं ने पसंद किया ,बंगाल इसका सुन्दर उदाहरण है | तब कांग्रेस को हिंदू पार्टी और लीग को मुस्लिम के प्रतिनिधित्व करने वाली समझा गया था | ऐसे में , यदि केजरीवाल के 'आप' को कितना जन समर्थन मिल पाता है , यह देखने लायक होगा , प्रधान मंत्री के ख्वाब देखें ,यह अच्छी बात है लेकिन यह सहज होगा , यह अभी काफी लंबा सफर की मांग करती है |
     'आप' का प्रादुर्भाव स्थानीय जन समस्या/संकट से उत्पन्न है |अलबत्ता , यह दीगर बात है कि लोकतंत्र के अनुरूप जन अधिकार की लड़ाई में इसके कर्ता-धर्ताओं की अहम योगदान है ,जैसे सूचनाधिकार और लोकपाल | मगर यह भी फिलवक्त काफी नहीं है | सिन्धान्तों का गढना , विचारधारा को अंगीकृत करना यों कहें कि एक जो राजनीतिक दल के लिये मौलिक स्वरूप होती है , उसे तैयार करना ,इसके लिये जरूरी है | नहीं तो विनोद कुमार बिन्नी के असंतोष , प्रशांत भूषण के अति बुधिवादी बातें और कुमार विश्वास के बडबोलापन के जरीये से सत्ता पर काबिज होना इसके बूते की बात नहीं |
     अतएव , मोदी संघर्ष की उपज हैं ,तो राहुल विरासत की देन है ,इसमें केजरीवाल मध्य वृति के परिचायक हैं | कांग्रेस और भाजपा को अपनी सांगठनिक शक्ति पर भरोसा है , तो 'आप' को अपने तेज वैक्तित्व एवं चरित्र पर अडिग रहने का जज्बा | मोदी को लेकर चुनाव परिणाम आने पर संशय -संदेह उक्त पद के लिये हो सकते है लेकिन राहुल को लेकर कांग्रेस में कोई चुनौती देने को तैयार नहीं | केजरीवाल केवल 'पूरक' की भूमिका में वर्तमान राजनति में हो सकते हैं ,मगर उक्त दोनों के साथ ऐसा संभव नहीं , जब भी भाजपा -कांग्रेस होंगे एक -दूसरे के खिलाफ ही होंगे ,बाकी इनके हाथों के  खिलौने होंगे |

       इन परिप्रेक्ष्य में प्रकट है कि आनेवाले चुनाव पूर्व की अपेक्षा ज्यादा दिलचस्प होंगे , जिसमे 'आप' का तड़क कितना कारगर होगा , वह देखने वाली चीज होगी |

Saturday, 4 January 2014

ऐसे हों यार तो कैसे हो बेड़ा पार

                        (एसके सहाय)
        इन दिनों अगले लोक सभा चुनाव को लेकर देश में बहस तेज है |क्या पक्ष और क्या विपक्ष सभी अपने -अपने हित -अनहित को लेकर चिंतित और व्यूह रचना में मशगुल हैं | खासकर ,केंद्र की सत्ता पार काबिज होने कि बेकरारी बढ़ गई है |इसमें राष्टीय एवं क्षेत्रीय दलों की  भूमिका अपने नफे -नुक्सान को लेकर आकलन में क्या होगी ? इसपर ज्यादा राज प्रेक्षक जोर दिए हैं और इसके केंद्र में भाजपानीत राष्टीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के अलावे तीसरे मोर्चा की चर्चा प्रबल है |इस संभावित मोर्चे पर बल इसलिए है कि 'कहीं बिल्ली के भाग्य का छींका फिर १९९६ की तरह टूटे और हलदन हल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा एवं इन्द्र कुमार गुजराल की तरह किस्मत चमक उठे' इस प्रत्याशा में वैसे खुलकर कोई नाम नहीं आया है ,लेकिन दबे जुबान राजनीतिक गलियारों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव वैसी लालसा पाल बैठे है , यह चर्चा भी बहुत है |
कहते हैं ,राजनीति संभावनाओं का खेल है , फिर मुलायम या अन्य क्यों नहीं अपने को 'प्रधान मंत्री' बनने के सपने पालें ?इनकी इस मनोभाव को वामपंथी दलों के नेताओं ने ताड़ लिया है और जब -तब अपने अंदाज़ में इनके ख्वाब को हवा तीसरे मोर्चा के लिये देते रहे हैं और मुलायम भी बार -बार तीसरे मोर्चे के रट लगाते दिखे हैं ,ताकि जीवन के अंतिम पहर में सत्ता के शिखर पद पर आरूढ़ हो सके | इसके लिये क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल बिठाना काफी मुश्किल एवं दुष्कर सा है |यथा -बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव , जद (यु) के शासन वाली बिहार के मुख्य मंत्री , बसपा प्रमुख मायावती , बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व मुख्य मंत्री ,उडीसा में बीजू जनता दल प्रमुख व मुख्य मंत्री नवीन पटनायक , तो आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम , जगन रेड्डी वाली कांग्रेस के अलावा तमिलनाडु में डीएमके -एडीएमके सरीखे पार्टियों के बीच सामंजस्य एवं समन्वय बिठाना किसी पहाड तोड़ने जैसा ही है | फिलवक्त मुलायम -मायावती एक मंच में एक -दूसरे को देखने को तैयार नहीं हैं और कांग्रेस दोनों को कैसे मौजूदा स्थिति में साध रही है , यह कलाबाजी सीखने को तैयार भी नहीं है , नीतीश -लालू एक -दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते |इससे इत्तर क्षेत्रो में भी कमोबेश यही हालात हैं |करूणानिधि ,जयललिता को पसंद नहीं , तो चंद्रबाबू नायडू -जगन रेड्डी की अपनी -अपनी सीमा है | इसके अतिरिक्त , महाराष्ट में नवनिर्माण राज ठाकरे , असम में अगप और हरियाणा में अलग -अलग परिस्थितियां हैं और इनके बीच समय स्थापित करना टेढ़ी खीर जैसी प्रक्रिया है |
         दरअसल , अपनी - अपनी महत्वकांक्षा को साकार करने में ठिगने से पार्टियों में स्पंदन को बढ़ावा इसलिए मिल पाई है कि देश में पहले भी तीसरे मोर्चे अर्थात राष्टीय मोर्चे अर्थात संयुक्त मोर्चा के नाम पर गठबंधन की सरकार केंद्र की सत्ता में आ चुकी है | १९८९ में जनता दल की अगुवाई में विश्वनाथ प्रधान मंत्री तीसरे मोर्चे की तरह प्रधान मंत्री हुए ,तो उस सरकार को बाहर से परस्पर धुर विरोधी भाजपा और वाम दल समर्थन दे रहे थे | परवर्ती काल में १९९६-९८ के मध्य देवगौड़ा और गुजराल सरकार  को कांग्रेस भाजपा के रास्ते रोकने या कहिये खेल बिगाड़ने के लिये इस मोर्चे को बाहर से अपना समर्थन देकर टिकाये रखने के काम किये और मतलब नहीं सधते देख दोनों से अपना हाथ एक -एक वर्ष के अंतराल में खींच लिया | इसके बावजूद भी उम्मीद के परवान चढ़ने की उम्मीद कथित तीसरे मोर्चे के कल्पनाशील नेताओं को इसमें अपना भविष्य दीखता हो ,तो कोई आश्चर्य नहीं |
           इन राजनीतक परिस्थितियों के मध्य भाजपा और कांग्रेस की पैतरेबाजी २०१४ के लोक सभा चुनाव में क्या रंग भरती है , वह भी कम दिलचस्प नहीं है | कांग्रेस ढलान पर है , इसे प्राय: सभी राजनीतिक पर्यवेक्षक किन्तु -परन्तु के साथ स्वीकार कर चुके हैं |अब कोई करिश्माई हरकत ही इसमें निस्तेज होती शक्ति में प्राण फूंक सकता है |फिलवक्त, १२८ वर्ष पुरानी  इस पार्टी का ही कुनबा अर्थात गठबंधन ,भाजपा से बड़ा है ,इसके बावजूद इसके कुनबा दरकने की ओर अग्रसर है | सो , संकट इस बात का है कि कांग्रेस अपना भविष्य जोड़े तो किस क्षेत्रीय दल से , जो डूबती नैया को बेड़ा पार कर सके |
          उत्तर प्रदेश में बसपा -सपा के बीच दांत कटी दुश्मनी है , अभी दोनों मज़बूरी में दांत पीसकर  कांग्रेस के केन्द्रीय पतवार को खेवने में सहायक हैं और दोनों के साथ कांग्रेस भी भ्रष्टाचार जनित घपले -घोटाले को लेकर तर -बतर हैं | यही हाल बिहार में हैं ,जहाँ सजा याफ्ता व्यक्ति लालू प्रसाद यादव (राजद) अपनी  रणनीति में कांग्रेस के साथ सकून अनुभूत करते हैं और सोनिया गाँधी भी दागदार लालू को मुलाकात का अवसर देकर आने वाले चुनौतियों से भिड़ने का मंसूबा बनाती है | झारखण्ड में देखें तो सत्ता में शामिल होकर भी राजद ,झामुमो और कांग्रेस के मध्य इतना अंतर्विरोध है कि मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के बखिया उखाड़ने में जरा भी संकोच नहीं करते ,जबकि १०-४ के बीच क्रमश: कांग्रेस -झामुमो के बीच लोक सभा के सीटों पर समझौता सरकार बनाने के पहले ही संयुक्त रूप से कर चुके हैं , जिसमे राजद के लिये कोई स्थान नहीं हैं | इसे लेकर विवाद भी इनके बीच शुरू हो चूका है |
       कांग्रेस के दो प्रयोग सत्ता में टिके रहने के लिये कितना खतरनाक स्थायित्व को लेकर हो सकता है ,शायद इसका अहसास इसके केन्द्रीय नेतृत्व को नहीं है | राजनीतिक समीक्षक देख रहे हैं कि कैसे मुलायम -मायावती को सीबीआई का भय दिखा कर और झारखण्ड में सरकार का लालच देकर झामुमो के मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन एवं इनके पिता व पार्टी प्रमुख शिबू सोरेन को मिलाये हुए है कि राज्य तुम्हारा और केंद्र हमारा | सीटों के बंटवारे की संख्या से जाहिर है | इतना ही नहीं , लालू प्रसाद यादव , उस हालात को कैसे भूल सकते हैं ,जब संप्रग के पहले कार्यकाल में उनकी महत्ता को कांग्रेस नेतृत्व स्वीकारती थी और उनके विचारों को महत्व देती थी , फिर बिहार से राजद के सांसद क्या कम हुए , समर्थन दिए जाने के बाद भी दूसरे कार्यकाल में 'मंत्री' तक नहीं बनाया गया राजद कोटे से , लालू के मन में यह कैसे कचोटता होगा , क्या इसकी समझ कांग्रेस को है ?
        वास्तव में ,यथार्थवादी राजनीति में आदर्शों का कोई मूल्य नहीं होता | कांग्रेस और भाजपा अपने -अपने तरीके से क्षेत्रीय क्षत्रपों को सहलाने एवं पुचकारने में जुटे हैं और कोई  अचरज नहीं कि  कल् के बिछड़े यार पुन: मलाई खाने को एक मंच पर अपनी -अपनी वजहों से आ जाएँ | नवीन पटनायक ,ममता बनर्जी , मायावती , प्रफुल कुमार महंत , फारूक अब्दुला , शिव सेना , ओम प्रकाश चौटाला , चंद्र बाबू नायडू , जयललिता ,नीतीश कुमार ,रामविलास पासवान सरीखे नेता और इनकी पार्टियां मौका मिलते ही भाजपा के साथ होने में जरा भी देर नहीं कर सकती | इन सबों ने कभी भाजपा के संग सत्ता की गलबहियां की है  ,इसलिए तोता रटंत की तरह बार -बार कांग्रेस का कथित धर्म निरपेक्षता के स्वर कुम्भ्लाते दिख सकते हैं |अब तो भाजपा से कभी नाता नहीं रखने वाले डीएमके के अध्यक्ष करूणानिधि ने खुले तौर पर नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री के लायक बताने में संकोच नहीं किया है और इसे देश के लिये बेहतर कहा है | साफ है कि " यारों के यारीपन " पर ही लोक सभा के चुनाव नतीजे निर्भर हैं , जिसमे कई उजले -काले चेहरों का नुमाइश दो माह बाद होने शुरू होंगे |
      कुल मिलाकर यह कि 'आम आदमी पार्टी ' ही एकमात्र राजनीतिक दल ऐसा होगा , जिसका परम्परागत दलों से कोई नाता -रिश्ता कम से कम चुनाव तक नहीं रहने के आसार प्रबल हैं 

Friday, 3 January 2014

नौकरशाह प्रधान मंत्री के राजनीतिक बातें

                      (एसके सहाय)
         एक नौकर वृति अर्थात चित्त वाले व्यक्ति से क्या अपेक्षा हो सकती है ? जैसा कि आसन्न लोक सभा चुनाव के पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत में अपने विचार व्यक्त किये हैं , जिसमे अर्थकीय पहलुओं पर कम और राजनीतिक सन्दर्भों में अधिक बातें की है | इसलिए यह जरूरी है कि इनके व्यक्त विचारों पर गंभीर परिचर्चा हो |
           खासकर , गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के परिप्रेक्ष्य में सिंह के दिए गए बयानों पर विचार मंथन प्रमुख है | यह सर्व विदित है कि मनमोहन सिंह की पृष्ठभूमि किसी भी कोण से सामाजिक -राजनीतिक नहीं रही है , यह इतफाक कहें या सिंह की किस्मत कि वह देश-विदेश में एक गंभीर अर्थशास्त्री के रूप में अपनी लगन से लब्ध प्रतिष्ठित होने में कामयाब है , जो इनके व्यक्तित्व का विशेष पहलू है | इस स्थिति में इनके भारत जैसे नानाविध संस्कृतियों वाले देश भारत के सत्ता शीर्ष पर काबिज होना अचरज जैसा है | यह कैसे प्रधान मंत्री के पद पर पहुंचे , इसे यहाँ बतलाना कोई जरूरी नहीं | कांग्रेस की दलगत संस्कृति में एक परिवार अर्थात नेहरू -गाँधी वंश का विशेष महत्व रहा है और इसके प्रति एकनिष्ठ भाव ही किसी कांग्रेसी नेता -कार्यकर्त्ता के आगे बढ़ने के एकमात्र रास्ते हैं , जिसे मनमोहन ने करीने से अनुगमन किया और शासन के शिखर पर विराजमान होने में सफल रहे |
        इन परिप्रेक्ष्यों में नरेन्द्र मोदी की तुलना सिंह से किया जाना लाजिमी है | स्वाभाविक इसलिए कि वह भाजपा के प्रधान मंत्री के घोषित उम्मीदवार हैं , सो इनपर शब्दों के हमले कांग्रेस नेता बन के सिंह करने के लिये मजबूर हैं , वैसे स्वभाव से मनमोहन एक शांत चित्त मनोवृति के शख्स हैं , मगर नेता के गुणों से कोसों दूर हैं और अपनी पार्टी निष्ठ "लाइन" पर बोलने के लिये भी आवश्यक है ,अन्यथा वह कभी -किसी पर कोई आक्षेपात्मक बातें करते नहीं दीखते ,इसलिए दल भेद में नजर आना इनके पद के स्थायित्व के लिये अपरिहार्य है |
           मनमोहन की तरह विषयगत क्षेत्रों के मेधा क्षमता से मोदी कोसों दूर हैं , इनकी जमा कुल पूंजी इनके अपनी संघर्ष गाथा से जुडी हैं , जो एक अदने से कार्यकर्त्ता के अपने बूते आगे बढ़ने की कहानी बताता हैं | भाजपा के साथ इनकी माता जन्य राष्टीय स्वयंसेवक संघ विचार धारा में अपनी राजनीतिक सोच की अलग छटा ने २०१४ में इनको महत्वपूर्ण बना दिया है , सो मनमोहन सिंह ने साफ लफ्जों में कहा कि 'अगर मोदी प्रधान मंत्री होते हैं ,तो देश बर्बाद हो जायेगा |' इस बात ने इंगित किया है कि कांग्रेस एक बार फिर कथित धर्म निरपेक्षता को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाकर मैदान में उतरने वाली है | गुजरात दंगे का डर अल्पसंख्यक समाज में उत्पन्न करना और भाजपा को अन्य दलों से दूर रखने के यत्न सिंह ने प्रेसवार्ता में की है |
             सिंह ने दूसरी महत्वपूर्ण रेखांकन राहुल गाँधी को लेकर की है ,जिसमे अगले चुनाव परिणाम के बाद खुद को 'प्रधान मंत्री' की दौड़ से अलग रखने और राहुल को ताजपोशी में सहयोग करने की बात है | यह विचार उनके अंतरमन मन की है या भविष्य के नतीजे को देखकर , यह तय कर पाना थोडा मुश्किल है ,मुश्किल इसलिए कि वह खुद अपनी मर्जी से कांग्रेस के निर्णयों को दिशा देने में असमर्थ हैं , जो खुद पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी के हुक्मों का गुलाम हो , वह कैसे ऐसी बातें कर सकता है ? यह आश्चर्य जनक है |
             दरअसल , मनमोहन सिंह कभी राजनीतिक जगत के प्राणी नहीं रहे | बैंकिग और अर्थ के क्षेत्रों में इनके अप्रतिम योगदान को कांग्रेस ने अपने तरीके से भुनाया | तब पिछली सदी का अंतिम दशक की शुरूआत हो रही थी और वह कांग्रेस में 'पद' की चाह में शामिल हो गये थे और संयोग से कांग्रेस पीवी नरसिंह राव के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री का दायित्व भी इस उम्मीद के साथ मिल गया कि पटरी से उतरी देश की अर्थ व्यवस्था को संभालने में मदद मिलेगी | यह जमाना , उदारवाद ,बाजारवाद , भूमंडलीकृत और खुलापन का था और पूरा विश्व, व्यापक 'गांव' में तब्दील होने के लिये जगह -जगह , अपने -अपने देश ,समाज ,राज्य में संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे |
          इन्हीं समय में सिंह को सोनिया गाँधी के साथ सटने अर्थात सामीप्य प्राप्त करने के लगातार अवसर मिले , जिसका पूरा सदुपयोग उन्होंने की | सोनिया से जब भी मिले एक स्वामी भक्त की तरह मिले और यही विश्वास सिंह को प्रधान मंत्री के पद पर आसीन् करवाने में सफल हो गया |बस , इतनी भर योग्यता ने पहली बार देश ने एक गैर राजनीतिज्ञ प्राणी को लोकतान्त्रिक सामाजिक -राजनीतिक सत्ता के शिखर पर पहुंचे देखा |प्रणव मुखर्जी ,एके अन्तोनी सरीखे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को नजर अंदाज करके एक नौकरी करने वाले मानसिकता लिये व्यक्ति को प्रधान मंत्री जैसे पद पर बिठ्लाना के क्या मायने थे ?
      जाहिर सी बात है कि इसमें एक परिवार की ''जी हजूरी'' के लाभ सिंह को मिले और यह सब कांग्रेस में खूब चलता है | देखें , जब महिला राष्टपति को लेकर वाम दलों ने कांग्रेस पर दबाव बनाया , तब सोनिया कैसे अपने पसंद एवं सेवाभावी प्रतिभा सिंह पाटिल को उस पद पर निर्वाचित करवाने में सफल हो गई थी , जबकि उस समय एक से बढ़ कर एक महिला शख्सियतें देश में सार्वजनिक जीवन में पाटिल से अधिक सक्रिय थी | यानि 'यसमैन' ही देश के लिये लोकतंत्र के नाम पर पसंद किया गया , जहाँ योग्यता एवं सामाजिक -राजनीतिक योगदान का कोई 'मूल्य' नहीं |

          अंत में एक बात और , मनमोहन सिंह एक अर्थवेत्ता के तौर पर दुनिया में प्रसिद्ध हैं , फिर भी मौजूदा मंहगाई , बेरोजगारी , मुद्रा स्फीति , विकास दर जैसे मामलों में फिस्सडी ही दिखे हैं | इनके ज्ञानार्जन का फायदा आखिर देश को क्यों नहीं मिल रहा ? भ्रष्टाचार की अनंत कहानी क्यों चौक -चौराहों पर तीखी बहस का विषय बनी है ? केवल व्यक्तिगत 'ईमानदारी' ही देश को गतिमान नहीं बनाती , इस समझ के अभाव ने इनके प्रधान मंत्रित्व काल को इतना दागदार बना दिया है कि इनको इतिहास के काल खण्डों में "अकर्मण्य प्रधान मंत्री" के रूप में ही दर्ज होना है |इससे इत्तर इनकी खास विशेषताओं का कोई मोल नहीं , जिसमे सामाजिकता -राजनितिकता का समावेश न हो |

Thursday, 2 January 2014

भारत ,अमरीका और शेष विश्व


                   ( एसके सहाय )
                  भारतीय राजनयिक देवयानी के मामले में अमरीका के प्रति इतनी तीव्रता एवं दृढ़ता से देश में प्रतिक्रिया होगी , यह कभी संयुक् राज्य अमेरिका ने कल्पना नहीं की होगी , लेकिन जो सामने है , उसे अब दुनिया के अपने को दरोगा समझने वाले अमरीका को एहसास हो गया होगा कि भारत वह नहीं है , जो वह समझता है बल्कि वह है , जो अब उसके सामने है | इसलिए , जरूरी है कि एक नजर उस स्थितियों पर नजर डाली जाये , जिसके जवाब में देश ने ऐसा सख्त कदम उठाने को विवश हुआ |
                   इसे जानने - समझने के पूर्व इन्द्र कुमार गुजराल के अल्प समय अर्थात एक वर्ष के प्रधान मंत्रित्व काल को झांकना होगा , तब कश्मीर के मुद्दे विश्व में गंभीर विषय के तौर पर चर्चित और सुलगे थे और इसी को लेकर पाश्चात्य देश ,भारत के विरूद्ध चेतावनी दे रहे थे , जिसमे आस्ट्रेलिया ने कूटनीतिक रिश्ते भी तोड़ कर अपने गुस्से का इजहार किया था ,इसके अलावा , ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रा ने कश्मीर को विश्व में  "सर्वाधिक जलते मुद्दे" की बात कर इसमें पाक -भारत के बीच चिंगारी भरने की कोशिश की थी |ऐसे में गुजराल ने जिस दृढ़ता से अपनी बात दुनिया के समक्ष रखी और उसका जो फल निकला , वाकई में देश को गौरवान्वित करने वाला है |
              इन भारत विरोधी विश्वव्यापी बयानों से गुजराल कभी विचलित नहीं हुए बल्कि इनके वह बात जिसमे कहा गया था कि " दो नम्बर के देश (ब्रिटेन) अपनी धौंस हमपर (भारत) दिखाते हैं ,उन्हें अपनी ताकत का पता नहीं है ,उनके गीदड भभकी से भारत डरने वाला नहीं है , जो चाहे वह कदम उठा लें, हम उनको जवाब देने को हरदम तैयार हैं" इस स्पष्ट चेतावनी का असर इतना जबरदस्त हुआ कि तत्कालीन ब्रिटेन के विदेश मंत्री को अपने पद से दो माह के भीतर इस्तीफा देने के लिये मजबूर होना पड़ा | साथ ही , जब आस्ट्रेलिया को अपनी कूटनीतिक चूक की अनुभूति हुई ,तब वह छ माह बाद फिर से "दौत्य" रिश्ते कायम करने के लिये अपने यहाँ से विशेष प्रतिनिधि मंडल दिल्ली भेजा , जिसे केंद्र सरकार ने कोई खास तव्वजो नहीं दी और वह महीने भर कभी राष्टपति , तो कभी प्रधान मंत्री , विदेश मंत्री और विदेश सचिव से मुलाकात करने के लिये 'गिडगिडाना' पड़ा था , तब जाकर उसे मामूली अतिरिक्त सचिव (विदेश मंत्रालय) से भेंट करने की अनुमति मिली थी और अपने उठाये क़दमों  के लिये माफ़ी मांगनी पड़ी थी |
                अतएव , इन परिप्रेक्ष्य में मौजूदा अमरीका -भारत के सबंधों को देखें , तो प्रतीत होगा कि अमरीका जैसे बलशाली राष्ट के प्रति अचानक कठोर कदम प्रतिक्रिया में उठाने की हिम्मत आखिर भारत को कैसे आई ? विश्व में जो शक्ति के केंद्र हैं , उसमे अमरीका अव्वल है , यों कहें कि उससे सीधे चुनौती देने की कुव्वत शेष विश्व को नहीं है , फिर भारत जैसे विकासशील देश उसकी  आँख में आँख डाल करके बात करे , यह उस जैसे 'विश्व दरोगा' को पसंद नहीं |
            इस गुढ़ अर्थ को समझने के लिये दो बातें महत्वपूर्ण हैं , पहली यह कि भारत ही नहीं बल्कि समूचे एशिया में 'नारी' को विशेष दर्ज़ा अपने -अपने संस्कृतियों के अनुरूप समाज में प्राप्त है , यह 'नंगापन' जाँच ने देवयानी के मामले ने भारतीय अंतरमन को झकझोर दिया , जो सहन से बाहर की बात थी | अमरीका में पहले भी भारतीय शाख्सियतों को जाँच के नाम पर बेइज्जत किया गया , मगर कभी प्रतिरोध कूटनीतिक तौर पर उग्रता से नहीं किये गए | दूसरा यह कि देश में आम चुनाव अर्थात लोक सभा के चुनाव सिर पर है ,ऐसे में केंद्र में सत्तासीन कोई भी सरकार देश की मर्यादा को नजर अंदाज करने की जुर्रत नहीं कर सकती थी |
                         वैसे , यह भी एक यथार्थ है कि भारत -अमरीका के सबंध मौजूदा स्थिति में ज्यादा दिन रहने वाले नहीं हैं | विश्व में जो एकतरफा धुर्वीकरण १९९१ में सोवियत संघ के विखंडन से हुआ है , वह विगत २३ सालों से अबतक बरकरार है , रुस , चीन या अन्य समूह  देश , जो अमरीका को सामरिक-आर्थिक चुनौती दे सकते थे , वे भी सीधे सामना करने से बचने में अपनी कूटनीतिक चतुराई का सहारा लेते आ रहे हैं | इन विश्व व्यापी हालातों में फ़िलहाल ,अमरीका ही एकमात्र महाशक्ति के तौर पर विराजमान हैं , जो अपनी शर्तों पर राजनयिक -कूटनीतिक आयामों को गढता चला आ रहा है | यह इतफाक ही था , देवयानी के मामले में वह फंस गया और भारत उसे उसके ही तरीके से ,लेकिन सभ्य स्वरूप में गरूर को चुनौती देने की हिमाकत कर डाली है और अब एक बार पुन: रिश्ते को पटरी पर लाने के प्रयास हो रहे हैं , यह कोशिश किस प्रकार है , यह अभी बयानबाजी के जरीये ही व्यक्त है | इससे इत्तर अन्य कदम भारत उठा भी नहीं सकता | दोनों को एक -दूसरे की जरूरत है , इसमें भारत को ज्यादा ,अमरीका को कम , कम इसलिए कि उसे किसी देश से सीधे सैन्य संघर्ष में उलझने स्थिति नहीं है ,जबकि भारत के साथ वैसा नहीं है |पाकिस्तान और चीन से बराबर आशंका उत्पन्न रहने के हालात है | इसमें अमरीका अपने शर्तों पर ही किसी राष्ट -देश के खिलाफ उलझता रहा है , चाहे इराक हो , अफगानिस्तान, लीबिया , मिस्र या कोई |
             स्थितियां को देखें - इराक में सद्दाम हुसैन का मामला हो या अफगानिस्तान में तालिबान का , दोनों में अमरीका और नाटो के सैनिक तभी हस्तक्षेप किये ,जब वह साम ,दण्ड ,भेद और अर्थ के माध्यम  से संयुक्त राष्ट संघ को अपने अनुकूल साधने में विवश किया |यह विश्व में पिछले दो दशकों से  चल रही उसकी अपनी दादागिरी  की ही परिस्थितियां हैं , जिनके विरूद्ध कूटनीतिक तौर पर कोई सामने नहीं आने को तैयार है |

        इतना ही नहीं , याद करें जब तालिबान के खिलाफ सैन्य कारवाई के लिये ' अड्डे ' की तलाश में वह मध्य पूर्व एवं दक्षिण में भरोसे के काबिल साथी देश में था , तब पाक -भारत के तत्कालीन सरकारों में इस बात की होड थी कि वह उनके देश से अपनी सैन्य कारवाइयों को अंजाम दे | साफ है कि ,भारत अमरीका के दबाव को अधिक दिनों तक झेलने की स्थिति में नहीं है , देर -सबेर यह पूर्ववत रिश्ते कायम होने ही हैं | ऐसा कूटनीतिक जगत में विश्वास है | यह हो सकता है कि इसके लिये दोनों देश परस्पर मेल से गोपनीय ढंग से नाटकीयता बरतते हुए शेष विश्व के समक्ष सबंध सुधार के लिये प्रकट हों |

Wednesday, 1 January 2014

परिवर्तित रंग में झारखण्ड


                    (एसके सहाय)
      अपने स्थापना काल से राजनीतिक स्थायित्व की तलाश में तेरह वर्ष गुजर जाने के बाद भी झारखण्ड में अस्थिरता का दौर ही बने रहने के आसार हैं | निकट भविष्य में इस राज्य को कोई ठोस ठौर मिलने की उम्मीद नहीं है , जैसा कि अब खुल्लम -खुल्ला "भ्रष्टाचार" के मुद्दे विधान सभा में 'नाम' सहित आने के बाद भी पक्ष -प्रतिपक्ष यह साफ तौर पर यह नहीं बता सका कि "बसंत सोरेन' कौन है ? जाहिर है कि जोड़ -तोड़ और गठबंधनों के जरीये सत्ता हासिल करने के विकल्प खुले रखने में ही प्राय: सभी दल विश्वास पाले हुए हैं , तब राजनीतिक अराजकता से छुटकारा मिले ,तो कैसे ? इस राज्य की मूल समस्या यही है |
                          यह चर्चा इसलिये अहम है कि "बालू घाटों" के ठेके पर दिए जाने के मसले ने सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में इतने तेजी से 'मथा' है कि सत्र के दौरान ही इसके नेपथ्य में हुई काली लेन-देन में उपजी भ्रष्टाचार पर हुई बहस में बसंत सोरेन का नाम अचानक उछल गया, इसके बावजूद विपक्ष के किसी विधायक ने उस नाम के शख्सियत को "शिनाख्त" नहीं की, जो इंगित करता है कि 'भविष्य' के गठजोड़ को ध्यान में रखकर किसी ने उस शख्स की पहचान अपने जुबान से नहीं की ,जबकि पूरा झारखण्ड उसे पहले से ही मुख्य मंत्री के भाई और झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र के रूप में जान चूका था |
        तात्पर्य यह कि 'कर प्रबंधन एवं ग्राम पंचायतों के विकास' के नाम पर तिजोरी भरने की यह नायाब तरीके भ्रष्ट सत्ता में ही दिकदर्शित है और इसमें पूरा राजनीतिक समाज गले में  आकंठ तक डूबा है , तो कैसे अराजक तस्वीर से झारखण्ड को मुक्ति मिलेगी ? यह यक्ष सवाल राज्य के लोग पूछ रहे हैं , मगर कोई संतोषप्रद जवाब देने को तैयार नहीं है ! जहाँ राजा भोज और गंगुआ तेली एक जैसे हो , तो उम्मीद बंधे तो कैसे ?
       वैसे ,गत २९ दिसंबर को भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने लोक सभा के अगले चुनाव के परिप्रेक्ष्य में एक ख्वाब दिखला गए हैं और सूबे की बदहाली ,गरीबी ,कुशासन जैसे हालात के लिये केंद्र और राज्य में बैठी सरकारों को जिम्मेदार बताया है लेकिन वह भूल गए कि खनिज - वन संपदा से परिपूर्ण इस प्रान्त की सत्ता में १३ सालों में तीन चौथाई काल भाजपानीत सरकार ही आरूढ़ रही है , जो अपनी तिकड़मों से इसे बदतर ही बनाने में योगदान दी है |
              इस सन्दर्भ में एक उदाहरण ही है ,इसे समझने के लिये पर्याप्त -- केंद्र सरकार ने स्कूली बच्चो को पोशाक निशुल्क उपलब्ध कराने के मद में ७३५ करोड रूपये झारखण्ड सरकार को २०१० में दी थी ,मगर दो साल बीत जाने के बाद भी छात्रों को पोशाक नहीं मिल सका | ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि अर्जुन मुंडा एवं इनके मानव संसाधन मंत्री बैधनाथ राम इसमें "कमीशन" की चाह पाल रखे  थे और इसके लिये अनावश्यक रूप से केंद्र को पत्र लिखकर अनुनय करते रहे कि एक जगह से ही पोशाक के कपडे ख़रीदे जाएँ , तब उसे स्कूलों को आपूर्ति किया जाये , जबकि केंद्र सरकार का सख्त निर्देश था कि विकेन्द्रीकृत तरीके से पोशाक की राशि स्कूलों को दी जाये ,जिसके लिये विद्यालय प्रबंध समिति ही क्रय के अधिकृत हों |मगर भाजपा की सरकार ने इसे लटकाए रखा | भला हो , राष्टपति शासन का , जिसने राज्य की कमान सभालते ही समुची राशि, विद्यार्थियों के अनुपात में विद्यालयों को भेज दिया और बच्चों को सहज तौर पर प्राप्त भी हो गए | क्या यह भ्रष्टाचार का चेहरा नहीं है ? इसी तरह के मामले पाठ्य पुस्तकों के खरीदगी और आपूर्ति के हैं ,मगर इसपर कोई ठोस एवं त्वरित कदम के अभाव ने साफ -साफ भ्रष्टाचार कई दफे दिखलाया है , फिर भी यह ख़ामोशी पक्ष -विपक्ष के मध्य है ,आखिर क्यों ?
        इन दो उदाहरणों से प्रकट है कि बदलते समय के साथ झारखण्ड में अब खुल्लेआम अवैध कमाई पर परस्पर विरोध नहीं है , विरोध केवल अपने -अपने हिस्सेदारी को लेकर है | बालू घाटों को लेकर सत्ता पक्ष के कांग्रेस -राजद ने हाय -तौबा मचाया ही , साथ में विपक्ष के भाजपा ,आजसू और झाविमो ने भी कम कोहराम नहीं किया , परिणाम वही ढँक के तीन पात की तरह है , जिसमे सभी नंगे हैं |
      १५ नवंबर २००० को झारखण्ड अस्तित्व में आया था , तब कुछेक लाज -शर्म की आबो -हवा राजनीतिक हल्कों में थी , मगर शनै:शनै: इसके रंग में बदलाव होते गए ,कभी भाजपा के लिये सहयोगी की भूमिका निभाहने वाले झामुमो राज्य गठन के साथ ही ,इससे बिदक कर कांग्रेस की झोली में बैठ गई और जब इसके सहारे सत्ता की मलाई खाने के मौके नहीं मिलने के संदेह उत्पन्न हुए ,तो भाजपा के संग हो लिये , उसपर तुर्रा यह कि विकास के नाम पर राज्यवासियों को बरगलाने की कोशिश !
         इस राज्य में राजनीति के सभी सिन्धांत और इससे निसृत विचारधारा की सीमाएं टूट गई , जब जिसे जो लाभकारी प्रतीत हुआ , उसके साथ हो लिये ,वाली राजनीति ही झारखण्ड में प्रभावी रही | गजब तो उस काल में हुआ , मधु कोड़ा के मुख्य मंत्रित्व काल में चंद्र प्रकाश चौधरी इसमें शामिल रहे , यह आजसू के विधायक थे और इस पार्टी ने कोड़ा के विरोध में अपने को घोषित कर रखा था मगर चौधरी के इस व्यवहार को , कभी इनको पार्टी स्तर से कोई राजनीतिक परेशानी नहीं होने दी , यह इसलिए संभव हो सका कि पार्टी प्रमुख सुदेश महतो के वह सगा मौसा थे अर्थात दल -बदल और अनुशासन सबंधी सभी नियम इनके लिये ताक पर थे | है न दिलचस्प नजारा !
        ऐसे में , झारखण्ड में वर्तमान राजनीति परिदृश्य परिवर्तित स्वरूप में दिखती हो तो ,अचरज नहीं | इसके रंग में मौका परस्ती अव्वल है | शब्दों की बाजीगरी के साथ बेशर्म कदम इसके हदों को तोड़ते नहीं ,बल्कि जोड़ते है , ऐसी मानसकिता के बीच इस राज्य में लोक सभा के चुनाव चालू साल में होने हैं ,जहाँ राष्टीय और क्षेत्रीय दलों के बीच की दूरियां सिमट गई प्रतीत है , फिर गठजोड़ हो तो,  न हो तो, क्या फर्क पड़ता है , जीत तो बेमानी ही है न आम लोग के लिये !
        भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम हुए मधु कोड़ा को अपने में समाहित करने में बेकरार कांग्रेस , तो नरेन्द्र मोदी के असरकारक होने के भान ने भाजपाइयों को इतना उत्प्रेरित कर रखा है कि मानो इनके हाथों में इनके होने से लड्डू मिल ही जायेगा | यह ख्याली पुलाव कैसे इनके अलावे झामुमो ,झाविमो और आजसू के हैं , यह उल्लेखित किया जाये तो पूरी राम कहानी  कभी नहीं पूरी हो पायेगी |

        सो , अब इस राज्य में चुनावी रंग में परिवर्तन के लक्षण दिखने लगे हैं और इसमें किसी को सराहने और दुराहने जैसी को नई बात नहीं है ,बल्कि यह समझा जाये कि राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं | मौजूदा ,जो सांसद हैं , वही थोड़ी -बहुत परिवर्तन के साथ लोक सभा में रंग भरेंगे ,ऐसा परिलक्षित है |

Tuesday, 24 December 2013

sksahayjharkhand: मौजूदा "सत्ता" के मूल

sksahayjharkhand: मौजूदा "सत्ता" के मूल:                     (एसके सहाय) नवोदित "आम आदमी पार्टी" के महज डेढ़ साल के जन संघर्ष में राष्टीय राजधानी "नई दिल्ली&quot...