Saturday, 4 January 2014

ऐसे हों यार तो कैसे हो बेड़ा पार

                        (एसके सहाय)
        इन दिनों अगले लोक सभा चुनाव को लेकर देश में बहस तेज है |क्या पक्ष और क्या विपक्ष सभी अपने -अपने हित -अनहित को लेकर चिंतित और व्यूह रचना में मशगुल हैं | खासकर ,केंद्र की सत्ता पार काबिज होने कि बेकरारी बढ़ गई है |इसमें राष्टीय एवं क्षेत्रीय दलों की  भूमिका अपने नफे -नुक्सान को लेकर आकलन में क्या होगी ? इसपर ज्यादा राज प्रेक्षक जोर दिए हैं और इसके केंद्र में भाजपानीत राष्टीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के अलावे तीसरे मोर्चा की चर्चा प्रबल है |इस संभावित मोर्चे पर बल इसलिए है कि 'कहीं बिल्ली के भाग्य का छींका फिर १९९६ की तरह टूटे और हलदन हल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा एवं इन्द्र कुमार गुजराल की तरह किस्मत चमक उठे' इस प्रत्याशा में वैसे खुलकर कोई नाम नहीं आया है ,लेकिन दबे जुबान राजनीतिक गलियारों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव वैसी लालसा पाल बैठे है , यह चर्चा भी बहुत है |
कहते हैं ,राजनीति संभावनाओं का खेल है , फिर मुलायम या अन्य क्यों नहीं अपने को 'प्रधान मंत्री' बनने के सपने पालें ?इनकी इस मनोभाव को वामपंथी दलों के नेताओं ने ताड़ लिया है और जब -तब अपने अंदाज़ में इनके ख्वाब को हवा तीसरे मोर्चा के लिये देते रहे हैं और मुलायम भी बार -बार तीसरे मोर्चे के रट लगाते दिखे हैं ,ताकि जीवन के अंतिम पहर में सत्ता के शिखर पद पर आरूढ़ हो सके | इसके लिये क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल बिठाना काफी मुश्किल एवं दुष्कर सा है |यथा -बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव , जद (यु) के शासन वाली बिहार के मुख्य मंत्री , बसपा प्रमुख मायावती , बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व मुख्य मंत्री ,उडीसा में बीजू जनता दल प्रमुख व मुख्य मंत्री नवीन पटनायक , तो आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम , जगन रेड्डी वाली कांग्रेस के अलावा तमिलनाडु में डीएमके -एडीएमके सरीखे पार्टियों के बीच सामंजस्य एवं समन्वय बिठाना किसी पहाड तोड़ने जैसा ही है | फिलवक्त मुलायम -मायावती एक मंच में एक -दूसरे को देखने को तैयार नहीं हैं और कांग्रेस दोनों को कैसे मौजूदा स्थिति में साध रही है , यह कलाबाजी सीखने को तैयार भी नहीं है , नीतीश -लालू एक -दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते |इससे इत्तर क्षेत्रो में भी कमोबेश यही हालात हैं |करूणानिधि ,जयललिता को पसंद नहीं , तो चंद्रबाबू नायडू -जगन रेड्डी की अपनी -अपनी सीमा है | इसके अतिरिक्त , महाराष्ट में नवनिर्माण राज ठाकरे , असम में अगप और हरियाणा में अलग -अलग परिस्थितियां हैं और इनके बीच समय स्थापित करना टेढ़ी खीर जैसी प्रक्रिया है |
         दरअसल , अपनी - अपनी महत्वकांक्षा को साकार करने में ठिगने से पार्टियों में स्पंदन को बढ़ावा इसलिए मिल पाई है कि देश में पहले भी तीसरे मोर्चे अर्थात राष्टीय मोर्चे अर्थात संयुक्त मोर्चा के नाम पर गठबंधन की सरकार केंद्र की सत्ता में आ चुकी है | १९८९ में जनता दल की अगुवाई में विश्वनाथ प्रधान मंत्री तीसरे मोर्चे की तरह प्रधान मंत्री हुए ,तो उस सरकार को बाहर से परस्पर धुर विरोधी भाजपा और वाम दल समर्थन दे रहे थे | परवर्ती काल में १९९६-९८ के मध्य देवगौड़ा और गुजराल सरकार  को कांग्रेस भाजपा के रास्ते रोकने या कहिये खेल बिगाड़ने के लिये इस मोर्चे को बाहर से अपना समर्थन देकर टिकाये रखने के काम किये और मतलब नहीं सधते देख दोनों से अपना हाथ एक -एक वर्ष के अंतराल में खींच लिया | इसके बावजूद भी उम्मीद के परवान चढ़ने की उम्मीद कथित तीसरे मोर्चे के कल्पनाशील नेताओं को इसमें अपना भविष्य दीखता हो ,तो कोई आश्चर्य नहीं |
           इन राजनीतक परिस्थितियों के मध्य भाजपा और कांग्रेस की पैतरेबाजी २०१४ के लोक सभा चुनाव में क्या रंग भरती है , वह भी कम दिलचस्प नहीं है | कांग्रेस ढलान पर है , इसे प्राय: सभी राजनीतिक पर्यवेक्षक किन्तु -परन्तु के साथ स्वीकार कर चुके हैं |अब कोई करिश्माई हरकत ही इसमें निस्तेज होती शक्ति में प्राण फूंक सकता है |फिलवक्त, १२८ वर्ष पुरानी  इस पार्टी का ही कुनबा अर्थात गठबंधन ,भाजपा से बड़ा है ,इसके बावजूद इसके कुनबा दरकने की ओर अग्रसर है | सो , संकट इस बात का है कि कांग्रेस अपना भविष्य जोड़े तो किस क्षेत्रीय दल से , जो डूबती नैया को बेड़ा पार कर सके |
          उत्तर प्रदेश में बसपा -सपा के बीच दांत कटी दुश्मनी है , अभी दोनों मज़बूरी में दांत पीसकर  कांग्रेस के केन्द्रीय पतवार को खेवने में सहायक हैं और दोनों के साथ कांग्रेस भी भ्रष्टाचार जनित घपले -घोटाले को लेकर तर -बतर हैं | यही हाल बिहार में हैं ,जहाँ सजा याफ्ता व्यक्ति लालू प्रसाद यादव (राजद) अपनी  रणनीति में कांग्रेस के साथ सकून अनुभूत करते हैं और सोनिया गाँधी भी दागदार लालू को मुलाकात का अवसर देकर आने वाले चुनौतियों से भिड़ने का मंसूबा बनाती है | झारखण्ड में देखें तो सत्ता में शामिल होकर भी राजद ,झामुमो और कांग्रेस के मध्य इतना अंतर्विरोध है कि मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के बखिया उखाड़ने में जरा भी संकोच नहीं करते ,जबकि १०-४ के बीच क्रमश: कांग्रेस -झामुमो के बीच लोक सभा के सीटों पर समझौता सरकार बनाने के पहले ही संयुक्त रूप से कर चुके हैं , जिसमे राजद के लिये कोई स्थान नहीं हैं | इसे लेकर विवाद भी इनके बीच शुरू हो चूका है |
       कांग्रेस के दो प्रयोग सत्ता में टिके रहने के लिये कितना खतरनाक स्थायित्व को लेकर हो सकता है ,शायद इसका अहसास इसके केन्द्रीय नेतृत्व को नहीं है | राजनीतिक समीक्षक देख रहे हैं कि कैसे मुलायम -मायावती को सीबीआई का भय दिखा कर और झारखण्ड में सरकार का लालच देकर झामुमो के मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन एवं इनके पिता व पार्टी प्रमुख शिबू सोरेन को मिलाये हुए है कि राज्य तुम्हारा और केंद्र हमारा | सीटों के बंटवारे की संख्या से जाहिर है | इतना ही नहीं , लालू प्रसाद यादव , उस हालात को कैसे भूल सकते हैं ,जब संप्रग के पहले कार्यकाल में उनकी महत्ता को कांग्रेस नेतृत्व स्वीकारती थी और उनके विचारों को महत्व देती थी , फिर बिहार से राजद के सांसद क्या कम हुए , समर्थन दिए जाने के बाद भी दूसरे कार्यकाल में 'मंत्री' तक नहीं बनाया गया राजद कोटे से , लालू के मन में यह कैसे कचोटता होगा , क्या इसकी समझ कांग्रेस को है ?
        वास्तव में ,यथार्थवादी राजनीति में आदर्शों का कोई मूल्य नहीं होता | कांग्रेस और भाजपा अपने -अपने तरीके से क्षेत्रीय क्षत्रपों को सहलाने एवं पुचकारने में जुटे हैं और कोई  अचरज नहीं कि  कल् के बिछड़े यार पुन: मलाई खाने को एक मंच पर अपनी -अपनी वजहों से आ जाएँ | नवीन पटनायक ,ममता बनर्जी , मायावती , प्रफुल कुमार महंत , फारूक अब्दुला , शिव सेना , ओम प्रकाश चौटाला , चंद्र बाबू नायडू , जयललिता ,नीतीश कुमार ,रामविलास पासवान सरीखे नेता और इनकी पार्टियां मौका मिलते ही भाजपा के साथ होने में जरा भी देर नहीं कर सकती | इन सबों ने कभी भाजपा के संग सत्ता की गलबहियां की है  ,इसलिए तोता रटंत की तरह बार -बार कांग्रेस का कथित धर्म निरपेक्षता के स्वर कुम्भ्लाते दिख सकते हैं |अब तो भाजपा से कभी नाता नहीं रखने वाले डीएमके के अध्यक्ष करूणानिधि ने खुले तौर पर नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री के लायक बताने में संकोच नहीं किया है और इसे देश के लिये बेहतर कहा है | साफ है कि " यारों के यारीपन " पर ही लोक सभा के चुनाव नतीजे निर्भर हैं , जिसमे कई उजले -काले चेहरों का नुमाइश दो माह बाद होने शुरू होंगे |
      कुल मिलाकर यह कि 'आम आदमी पार्टी ' ही एकमात्र राजनीतिक दल ऐसा होगा , जिसका परम्परागत दलों से कोई नाता -रिश्ता कम से कम चुनाव तक नहीं रहने के आसार प्रबल हैं 

Friday, 3 January 2014

नौकरशाह प्रधान मंत्री के राजनीतिक बातें

                      (एसके सहाय)
         एक नौकर वृति अर्थात चित्त वाले व्यक्ति से क्या अपेक्षा हो सकती है ? जैसा कि आसन्न लोक सभा चुनाव के पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत में अपने विचार व्यक्त किये हैं , जिसमे अर्थकीय पहलुओं पर कम और राजनीतिक सन्दर्भों में अधिक बातें की है | इसलिए यह जरूरी है कि इनके व्यक्त विचारों पर गंभीर परिचर्चा हो |
           खासकर , गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के परिप्रेक्ष्य में सिंह के दिए गए बयानों पर विचार मंथन प्रमुख है | यह सर्व विदित है कि मनमोहन सिंह की पृष्ठभूमि किसी भी कोण से सामाजिक -राजनीतिक नहीं रही है , यह इतफाक कहें या सिंह की किस्मत कि वह देश-विदेश में एक गंभीर अर्थशास्त्री के रूप में अपनी लगन से लब्ध प्रतिष्ठित होने में कामयाब है , जो इनके व्यक्तित्व का विशेष पहलू है | इस स्थिति में इनके भारत जैसे नानाविध संस्कृतियों वाले देश भारत के सत्ता शीर्ष पर काबिज होना अचरज जैसा है | यह कैसे प्रधान मंत्री के पद पर पहुंचे , इसे यहाँ बतलाना कोई जरूरी नहीं | कांग्रेस की दलगत संस्कृति में एक परिवार अर्थात नेहरू -गाँधी वंश का विशेष महत्व रहा है और इसके प्रति एकनिष्ठ भाव ही किसी कांग्रेसी नेता -कार्यकर्त्ता के आगे बढ़ने के एकमात्र रास्ते हैं , जिसे मनमोहन ने करीने से अनुगमन किया और शासन के शिखर पर विराजमान होने में सफल रहे |
        इन परिप्रेक्ष्यों में नरेन्द्र मोदी की तुलना सिंह से किया जाना लाजिमी है | स्वाभाविक इसलिए कि वह भाजपा के प्रधान मंत्री के घोषित उम्मीदवार हैं , सो इनपर शब्दों के हमले कांग्रेस नेता बन के सिंह करने के लिये मजबूर हैं , वैसे स्वभाव से मनमोहन एक शांत चित्त मनोवृति के शख्स हैं , मगर नेता के गुणों से कोसों दूर हैं और अपनी पार्टी निष्ठ "लाइन" पर बोलने के लिये भी आवश्यक है ,अन्यथा वह कभी -किसी पर कोई आक्षेपात्मक बातें करते नहीं दीखते ,इसलिए दल भेद में नजर आना इनके पद के स्थायित्व के लिये अपरिहार्य है |
           मनमोहन की तरह विषयगत क्षेत्रों के मेधा क्षमता से मोदी कोसों दूर हैं , इनकी जमा कुल पूंजी इनके अपनी संघर्ष गाथा से जुडी हैं , जो एक अदने से कार्यकर्त्ता के अपने बूते आगे बढ़ने की कहानी बताता हैं | भाजपा के साथ इनकी माता जन्य राष्टीय स्वयंसेवक संघ विचार धारा में अपनी राजनीतिक सोच की अलग छटा ने २०१४ में इनको महत्वपूर्ण बना दिया है , सो मनमोहन सिंह ने साफ लफ्जों में कहा कि 'अगर मोदी प्रधान मंत्री होते हैं ,तो देश बर्बाद हो जायेगा |' इस बात ने इंगित किया है कि कांग्रेस एक बार फिर कथित धर्म निरपेक्षता को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाकर मैदान में उतरने वाली है | गुजरात दंगे का डर अल्पसंख्यक समाज में उत्पन्न करना और भाजपा को अन्य दलों से दूर रखने के यत्न सिंह ने प्रेसवार्ता में की है |
             सिंह ने दूसरी महत्वपूर्ण रेखांकन राहुल गाँधी को लेकर की है ,जिसमे अगले चुनाव परिणाम के बाद खुद को 'प्रधान मंत्री' की दौड़ से अलग रखने और राहुल को ताजपोशी में सहयोग करने की बात है | यह विचार उनके अंतरमन मन की है या भविष्य के नतीजे को देखकर , यह तय कर पाना थोडा मुश्किल है ,मुश्किल इसलिए कि वह खुद अपनी मर्जी से कांग्रेस के निर्णयों को दिशा देने में असमर्थ हैं , जो खुद पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी के हुक्मों का गुलाम हो , वह कैसे ऐसी बातें कर सकता है ? यह आश्चर्य जनक है |
             दरअसल , मनमोहन सिंह कभी राजनीतिक जगत के प्राणी नहीं रहे | बैंकिग और अर्थ के क्षेत्रों में इनके अप्रतिम योगदान को कांग्रेस ने अपने तरीके से भुनाया | तब पिछली सदी का अंतिम दशक की शुरूआत हो रही थी और वह कांग्रेस में 'पद' की चाह में शामिल हो गये थे और संयोग से कांग्रेस पीवी नरसिंह राव के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री का दायित्व भी इस उम्मीद के साथ मिल गया कि पटरी से उतरी देश की अर्थ व्यवस्था को संभालने में मदद मिलेगी | यह जमाना , उदारवाद ,बाजारवाद , भूमंडलीकृत और खुलापन का था और पूरा विश्व, व्यापक 'गांव' में तब्दील होने के लिये जगह -जगह , अपने -अपने देश ,समाज ,राज्य में संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे |
          इन्हीं समय में सिंह को सोनिया गाँधी के साथ सटने अर्थात सामीप्य प्राप्त करने के लगातार अवसर मिले , जिसका पूरा सदुपयोग उन्होंने की | सोनिया से जब भी मिले एक स्वामी भक्त की तरह मिले और यही विश्वास सिंह को प्रधान मंत्री के पद पर आसीन् करवाने में सफल हो गया |बस , इतनी भर योग्यता ने पहली बार देश ने एक गैर राजनीतिज्ञ प्राणी को लोकतान्त्रिक सामाजिक -राजनीतिक सत्ता के शिखर पर पहुंचे देखा |प्रणव मुखर्जी ,एके अन्तोनी सरीखे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को नजर अंदाज करके एक नौकरी करने वाले मानसिकता लिये व्यक्ति को प्रधान मंत्री जैसे पद पर बिठ्लाना के क्या मायने थे ?
      जाहिर सी बात है कि इसमें एक परिवार की ''जी हजूरी'' के लाभ सिंह को मिले और यह सब कांग्रेस में खूब चलता है | देखें , जब महिला राष्टपति को लेकर वाम दलों ने कांग्रेस पर दबाव बनाया , तब सोनिया कैसे अपने पसंद एवं सेवाभावी प्रतिभा सिंह पाटिल को उस पद पर निर्वाचित करवाने में सफल हो गई थी , जबकि उस समय एक से बढ़ कर एक महिला शख्सियतें देश में सार्वजनिक जीवन में पाटिल से अधिक सक्रिय थी | यानि 'यसमैन' ही देश के लिये लोकतंत्र के नाम पर पसंद किया गया , जहाँ योग्यता एवं सामाजिक -राजनीतिक योगदान का कोई 'मूल्य' नहीं |

          अंत में एक बात और , मनमोहन सिंह एक अर्थवेत्ता के तौर पर दुनिया में प्रसिद्ध हैं , फिर भी मौजूदा मंहगाई , बेरोजगारी , मुद्रा स्फीति , विकास दर जैसे मामलों में फिस्सडी ही दिखे हैं | इनके ज्ञानार्जन का फायदा आखिर देश को क्यों नहीं मिल रहा ? भ्रष्टाचार की अनंत कहानी क्यों चौक -चौराहों पर तीखी बहस का विषय बनी है ? केवल व्यक्तिगत 'ईमानदारी' ही देश को गतिमान नहीं बनाती , इस समझ के अभाव ने इनके प्रधान मंत्रित्व काल को इतना दागदार बना दिया है कि इनको इतिहास के काल खण्डों में "अकर्मण्य प्रधान मंत्री" के रूप में ही दर्ज होना है |इससे इत्तर इनकी खास विशेषताओं का कोई मोल नहीं , जिसमे सामाजिकता -राजनितिकता का समावेश न हो |

Thursday, 2 January 2014

भारत ,अमरीका और शेष विश्व


                   ( एसके सहाय )
                  भारतीय राजनयिक देवयानी के मामले में अमरीका के प्रति इतनी तीव्रता एवं दृढ़ता से देश में प्रतिक्रिया होगी , यह कभी संयुक् राज्य अमेरिका ने कल्पना नहीं की होगी , लेकिन जो सामने है , उसे अब दुनिया के अपने को दरोगा समझने वाले अमरीका को एहसास हो गया होगा कि भारत वह नहीं है , जो वह समझता है बल्कि वह है , जो अब उसके सामने है | इसलिए , जरूरी है कि एक नजर उस स्थितियों पर नजर डाली जाये , जिसके जवाब में देश ने ऐसा सख्त कदम उठाने को विवश हुआ |
                   इसे जानने - समझने के पूर्व इन्द्र कुमार गुजराल के अल्प समय अर्थात एक वर्ष के प्रधान मंत्रित्व काल को झांकना होगा , तब कश्मीर के मुद्दे विश्व में गंभीर विषय के तौर पर चर्चित और सुलगे थे और इसी को लेकर पाश्चात्य देश ,भारत के विरूद्ध चेतावनी दे रहे थे , जिसमे आस्ट्रेलिया ने कूटनीतिक रिश्ते भी तोड़ कर अपने गुस्से का इजहार किया था ,इसके अलावा , ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रा ने कश्मीर को विश्व में  "सर्वाधिक जलते मुद्दे" की बात कर इसमें पाक -भारत के बीच चिंगारी भरने की कोशिश की थी |ऐसे में गुजराल ने जिस दृढ़ता से अपनी बात दुनिया के समक्ष रखी और उसका जो फल निकला , वाकई में देश को गौरवान्वित करने वाला है |
              इन भारत विरोधी विश्वव्यापी बयानों से गुजराल कभी विचलित नहीं हुए बल्कि इनके वह बात जिसमे कहा गया था कि " दो नम्बर के देश (ब्रिटेन) अपनी धौंस हमपर (भारत) दिखाते हैं ,उन्हें अपनी ताकत का पता नहीं है ,उनके गीदड भभकी से भारत डरने वाला नहीं है , जो चाहे वह कदम उठा लें, हम उनको जवाब देने को हरदम तैयार हैं" इस स्पष्ट चेतावनी का असर इतना जबरदस्त हुआ कि तत्कालीन ब्रिटेन के विदेश मंत्री को अपने पद से दो माह के भीतर इस्तीफा देने के लिये मजबूर होना पड़ा | साथ ही , जब आस्ट्रेलिया को अपनी कूटनीतिक चूक की अनुभूति हुई ,तब वह छ माह बाद फिर से "दौत्य" रिश्ते कायम करने के लिये अपने यहाँ से विशेष प्रतिनिधि मंडल दिल्ली भेजा , जिसे केंद्र सरकार ने कोई खास तव्वजो नहीं दी और वह महीने भर कभी राष्टपति , तो कभी प्रधान मंत्री , विदेश मंत्री और विदेश सचिव से मुलाकात करने के लिये 'गिडगिडाना' पड़ा था , तब जाकर उसे मामूली अतिरिक्त सचिव (विदेश मंत्रालय) से भेंट करने की अनुमति मिली थी और अपने उठाये क़दमों  के लिये माफ़ी मांगनी पड़ी थी |
                अतएव , इन परिप्रेक्ष्य में मौजूदा अमरीका -भारत के सबंधों को देखें , तो प्रतीत होगा कि अमरीका जैसे बलशाली राष्ट के प्रति अचानक कठोर कदम प्रतिक्रिया में उठाने की हिम्मत आखिर भारत को कैसे आई ? विश्व में जो शक्ति के केंद्र हैं , उसमे अमरीका अव्वल है , यों कहें कि उससे सीधे चुनौती देने की कुव्वत शेष विश्व को नहीं है , फिर भारत जैसे विकासशील देश उसकी  आँख में आँख डाल करके बात करे , यह उस जैसे 'विश्व दरोगा' को पसंद नहीं |
            इस गुढ़ अर्थ को समझने के लिये दो बातें महत्वपूर्ण हैं , पहली यह कि भारत ही नहीं बल्कि समूचे एशिया में 'नारी' को विशेष दर्ज़ा अपने -अपने संस्कृतियों के अनुरूप समाज में प्राप्त है , यह 'नंगापन' जाँच ने देवयानी के मामले ने भारतीय अंतरमन को झकझोर दिया , जो सहन से बाहर की बात थी | अमरीका में पहले भी भारतीय शाख्सियतों को जाँच के नाम पर बेइज्जत किया गया , मगर कभी प्रतिरोध कूटनीतिक तौर पर उग्रता से नहीं किये गए | दूसरा यह कि देश में आम चुनाव अर्थात लोक सभा के चुनाव सिर पर है ,ऐसे में केंद्र में सत्तासीन कोई भी सरकार देश की मर्यादा को नजर अंदाज करने की जुर्रत नहीं कर सकती थी |
                         वैसे , यह भी एक यथार्थ है कि भारत -अमरीका के सबंध मौजूदा स्थिति में ज्यादा दिन रहने वाले नहीं हैं | विश्व में जो एकतरफा धुर्वीकरण १९९१ में सोवियत संघ के विखंडन से हुआ है , वह विगत २३ सालों से अबतक बरकरार है , रुस , चीन या अन्य समूह  देश , जो अमरीका को सामरिक-आर्थिक चुनौती दे सकते थे , वे भी सीधे सामना करने से बचने में अपनी कूटनीतिक चतुराई का सहारा लेते आ रहे हैं | इन विश्व व्यापी हालातों में फ़िलहाल ,अमरीका ही एकमात्र महाशक्ति के तौर पर विराजमान हैं , जो अपनी शर्तों पर राजनयिक -कूटनीतिक आयामों को गढता चला आ रहा है | यह इतफाक ही था , देवयानी के मामले में वह फंस गया और भारत उसे उसके ही तरीके से ,लेकिन सभ्य स्वरूप में गरूर को चुनौती देने की हिमाकत कर डाली है और अब एक बार पुन: रिश्ते को पटरी पर लाने के प्रयास हो रहे हैं , यह कोशिश किस प्रकार है , यह अभी बयानबाजी के जरीये ही व्यक्त है | इससे इत्तर अन्य कदम भारत उठा भी नहीं सकता | दोनों को एक -दूसरे की जरूरत है , इसमें भारत को ज्यादा ,अमरीका को कम , कम इसलिए कि उसे किसी देश से सीधे सैन्य संघर्ष में उलझने स्थिति नहीं है ,जबकि भारत के साथ वैसा नहीं है |पाकिस्तान और चीन से बराबर आशंका उत्पन्न रहने के हालात है | इसमें अमरीका अपने शर्तों पर ही किसी राष्ट -देश के खिलाफ उलझता रहा है , चाहे इराक हो , अफगानिस्तान, लीबिया , मिस्र या कोई |
             स्थितियां को देखें - इराक में सद्दाम हुसैन का मामला हो या अफगानिस्तान में तालिबान का , दोनों में अमरीका और नाटो के सैनिक तभी हस्तक्षेप किये ,जब वह साम ,दण्ड ,भेद और अर्थ के माध्यम  से संयुक्त राष्ट संघ को अपने अनुकूल साधने में विवश किया |यह विश्व में पिछले दो दशकों से  चल रही उसकी अपनी दादागिरी  की ही परिस्थितियां हैं , जिनके विरूद्ध कूटनीतिक तौर पर कोई सामने नहीं आने को तैयार है |

        इतना ही नहीं , याद करें जब तालिबान के खिलाफ सैन्य कारवाई के लिये ' अड्डे ' की तलाश में वह मध्य पूर्व एवं दक्षिण में भरोसे के काबिल साथी देश में था , तब पाक -भारत के तत्कालीन सरकारों में इस बात की होड थी कि वह उनके देश से अपनी सैन्य कारवाइयों को अंजाम दे | साफ है कि ,भारत अमरीका के दबाव को अधिक दिनों तक झेलने की स्थिति में नहीं है , देर -सबेर यह पूर्ववत रिश्ते कायम होने ही हैं | ऐसा कूटनीतिक जगत में विश्वास है | यह हो सकता है कि इसके लिये दोनों देश परस्पर मेल से गोपनीय ढंग से नाटकीयता बरतते हुए शेष विश्व के समक्ष सबंध सुधार के लिये प्रकट हों |

Wednesday, 1 January 2014

परिवर्तित रंग में झारखण्ड


                    (एसके सहाय)
      अपने स्थापना काल से राजनीतिक स्थायित्व की तलाश में तेरह वर्ष गुजर जाने के बाद भी झारखण्ड में अस्थिरता का दौर ही बने रहने के आसार हैं | निकट भविष्य में इस राज्य को कोई ठोस ठौर मिलने की उम्मीद नहीं है , जैसा कि अब खुल्लम -खुल्ला "भ्रष्टाचार" के मुद्दे विधान सभा में 'नाम' सहित आने के बाद भी पक्ष -प्रतिपक्ष यह साफ तौर पर यह नहीं बता सका कि "बसंत सोरेन' कौन है ? जाहिर है कि जोड़ -तोड़ और गठबंधनों के जरीये सत्ता हासिल करने के विकल्प खुले रखने में ही प्राय: सभी दल विश्वास पाले हुए हैं , तब राजनीतिक अराजकता से छुटकारा मिले ,तो कैसे ? इस राज्य की मूल समस्या यही है |
                          यह चर्चा इसलिये अहम है कि "बालू घाटों" के ठेके पर दिए जाने के मसले ने सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में इतने तेजी से 'मथा' है कि सत्र के दौरान ही इसके नेपथ्य में हुई काली लेन-देन में उपजी भ्रष्टाचार पर हुई बहस में बसंत सोरेन का नाम अचानक उछल गया, इसके बावजूद विपक्ष के किसी विधायक ने उस नाम के शख्सियत को "शिनाख्त" नहीं की, जो इंगित करता है कि 'भविष्य' के गठजोड़ को ध्यान में रखकर किसी ने उस शख्स की पहचान अपने जुबान से नहीं की ,जबकि पूरा झारखण्ड उसे पहले से ही मुख्य मंत्री के भाई और झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र के रूप में जान चूका था |
        तात्पर्य यह कि 'कर प्रबंधन एवं ग्राम पंचायतों के विकास' के नाम पर तिजोरी भरने की यह नायाब तरीके भ्रष्ट सत्ता में ही दिकदर्शित है और इसमें पूरा राजनीतिक समाज गले में  आकंठ तक डूबा है , तो कैसे अराजक तस्वीर से झारखण्ड को मुक्ति मिलेगी ? यह यक्ष सवाल राज्य के लोग पूछ रहे हैं , मगर कोई संतोषप्रद जवाब देने को तैयार नहीं है ! जहाँ राजा भोज और गंगुआ तेली एक जैसे हो , तो उम्मीद बंधे तो कैसे ?
       वैसे ,गत २९ दिसंबर को भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने लोक सभा के अगले चुनाव के परिप्रेक्ष्य में एक ख्वाब दिखला गए हैं और सूबे की बदहाली ,गरीबी ,कुशासन जैसे हालात के लिये केंद्र और राज्य में बैठी सरकारों को जिम्मेदार बताया है लेकिन वह भूल गए कि खनिज - वन संपदा से परिपूर्ण इस प्रान्त की सत्ता में १३ सालों में तीन चौथाई काल भाजपानीत सरकार ही आरूढ़ रही है , जो अपनी तिकड़मों से इसे बदतर ही बनाने में योगदान दी है |
              इस सन्दर्भ में एक उदाहरण ही है ,इसे समझने के लिये पर्याप्त -- केंद्र सरकार ने स्कूली बच्चो को पोशाक निशुल्क उपलब्ध कराने के मद में ७३५ करोड रूपये झारखण्ड सरकार को २०१० में दी थी ,मगर दो साल बीत जाने के बाद भी छात्रों को पोशाक नहीं मिल सका | ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि अर्जुन मुंडा एवं इनके मानव संसाधन मंत्री बैधनाथ राम इसमें "कमीशन" की चाह पाल रखे  थे और इसके लिये अनावश्यक रूप से केंद्र को पत्र लिखकर अनुनय करते रहे कि एक जगह से ही पोशाक के कपडे ख़रीदे जाएँ , तब उसे स्कूलों को आपूर्ति किया जाये , जबकि केंद्र सरकार का सख्त निर्देश था कि विकेन्द्रीकृत तरीके से पोशाक की राशि स्कूलों को दी जाये ,जिसके लिये विद्यालय प्रबंध समिति ही क्रय के अधिकृत हों |मगर भाजपा की सरकार ने इसे लटकाए रखा | भला हो , राष्टपति शासन का , जिसने राज्य की कमान सभालते ही समुची राशि, विद्यार्थियों के अनुपात में विद्यालयों को भेज दिया और बच्चों को सहज तौर पर प्राप्त भी हो गए | क्या यह भ्रष्टाचार का चेहरा नहीं है ? इसी तरह के मामले पाठ्य पुस्तकों के खरीदगी और आपूर्ति के हैं ,मगर इसपर कोई ठोस एवं त्वरित कदम के अभाव ने साफ -साफ भ्रष्टाचार कई दफे दिखलाया है , फिर भी यह ख़ामोशी पक्ष -विपक्ष के मध्य है ,आखिर क्यों ?
        इन दो उदाहरणों से प्रकट है कि बदलते समय के साथ झारखण्ड में अब खुल्लेआम अवैध कमाई पर परस्पर विरोध नहीं है , विरोध केवल अपने -अपने हिस्सेदारी को लेकर है | बालू घाटों को लेकर सत्ता पक्ष के कांग्रेस -राजद ने हाय -तौबा मचाया ही , साथ में विपक्ष के भाजपा ,आजसू और झाविमो ने भी कम कोहराम नहीं किया , परिणाम वही ढँक के तीन पात की तरह है , जिसमे सभी नंगे हैं |
      १५ नवंबर २००० को झारखण्ड अस्तित्व में आया था , तब कुछेक लाज -शर्म की आबो -हवा राजनीतिक हल्कों में थी , मगर शनै:शनै: इसके रंग में बदलाव होते गए ,कभी भाजपा के लिये सहयोगी की भूमिका निभाहने वाले झामुमो राज्य गठन के साथ ही ,इससे बिदक कर कांग्रेस की झोली में बैठ गई और जब इसके सहारे सत्ता की मलाई खाने के मौके नहीं मिलने के संदेह उत्पन्न हुए ,तो भाजपा के संग हो लिये , उसपर तुर्रा यह कि विकास के नाम पर राज्यवासियों को बरगलाने की कोशिश !
         इस राज्य में राजनीति के सभी सिन्धांत और इससे निसृत विचारधारा की सीमाएं टूट गई , जब जिसे जो लाभकारी प्रतीत हुआ , उसके साथ हो लिये ,वाली राजनीति ही झारखण्ड में प्रभावी रही | गजब तो उस काल में हुआ , मधु कोड़ा के मुख्य मंत्रित्व काल में चंद्र प्रकाश चौधरी इसमें शामिल रहे , यह आजसू के विधायक थे और इस पार्टी ने कोड़ा के विरोध में अपने को घोषित कर रखा था मगर चौधरी के इस व्यवहार को , कभी इनको पार्टी स्तर से कोई राजनीतिक परेशानी नहीं होने दी , यह इसलिए संभव हो सका कि पार्टी प्रमुख सुदेश महतो के वह सगा मौसा थे अर्थात दल -बदल और अनुशासन सबंधी सभी नियम इनके लिये ताक पर थे | है न दिलचस्प नजारा !
        ऐसे में , झारखण्ड में वर्तमान राजनीति परिदृश्य परिवर्तित स्वरूप में दिखती हो तो ,अचरज नहीं | इसके रंग में मौका परस्ती अव्वल है | शब्दों की बाजीगरी के साथ बेशर्म कदम इसके हदों को तोड़ते नहीं ,बल्कि जोड़ते है , ऐसी मानसकिता के बीच इस राज्य में लोक सभा के चुनाव चालू साल में होने हैं ,जहाँ राष्टीय और क्षेत्रीय दलों के बीच की दूरियां सिमट गई प्रतीत है , फिर गठजोड़ हो तो,  न हो तो, क्या फर्क पड़ता है , जीत तो बेमानी ही है न आम लोग के लिये !
        भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम हुए मधु कोड़ा को अपने में समाहित करने में बेकरार कांग्रेस , तो नरेन्द्र मोदी के असरकारक होने के भान ने भाजपाइयों को इतना उत्प्रेरित कर रखा है कि मानो इनके हाथों में इनके होने से लड्डू मिल ही जायेगा | यह ख्याली पुलाव कैसे इनके अलावे झामुमो ,झाविमो और आजसू के हैं , यह उल्लेखित किया जाये तो पूरी राम कहानी  कभी नहीं पूरी हो पायेगी |

        सो , अब इस राज्य में चुनावी रंग में परिवर्तन के लक्षण दिखने लगे हैं और इसमें किसी को सराहने और दुराहने जैसी को नई बात नहीं है ,बल्कि यह समझा जाये कि राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं | मौजूदा ,जो सांसद हैं , वही थोड़ी -बहुत परिवर्तन के साथ लोक सभा में रंग भरेंगे ,ऐसा परिलक्षित है |

Tuesday, 24 December 2013

sksahayjharkhand: मौजूदा "सत्ता" के मूल

sksahayjharkhand: मौजूदा "सत्ता" के मूल:                     (एसके सहाय) नवोदित "आम आदमी पार्टी" के महज डेढ़ साल के जन संघर्ष में राष्टीय राजधानी "नई दिल्ली&quot...

मौजूदा "सत्ता" के मूल

                    (एसके सहाय)

नवोदित "आम आदमी पार्टी" के महज डेढ़ साल के जन संघर्ष में राष्टीय राजधानी "नई दिल्ली" की सत्ता में काबिज होने की परिघटना ने राज प्रेक्षकों को अचरज में डाला है , जो स्वाभाविक भी है , मगर अचरज जैसी कोई बात नहीं | आश्चर्य इस बात का है कि यह किसी ठोस सिन्धांत , विचारधारा , नीति की घोषणा किये केवल "कार्यक्रम" के बल पर इतना समर्थन प्राप्त किया है कि इसे कैसे संगठित राजनीतिक दल या समूह में निरुपित किया जाये , जो भविष्य में इस जैसे अन्य उदीयमान संघटन को राजनीतिक शक्ति के तौर पर प्रस्थापित किया जा सके |
ऐसे में एक शब्द इसके लिये उचित प्रतीत हो सकती है और वह :तदर्थवाद" से उपजी मानसिकता का परिचायक के रूप में जाना जा सकता है | इसमें वर्तमान सत्ता के कार्यशैली ,भ्रष्टाचार और लोक विरोधी क़दमों का समावेश मुख्य है |कार्यशैली से तात्पर्य पारदर्शिता का अभाव , भ्रष्टाचार से मतलब कई घपले -घोटाले का सामने आना और लोक विरोधी से अर्थ "लोकपाल" के पार्टी दुराभाव का मौजूदा केन्द्रीय सत्ता में होना से है |
इन तत्वों से दिल्ली के लोगों ने सीधा साक्षात्कार पिछले काफी अरसे से करते आ रहे थे और इसमें कोई सीधा अर्थात विकल्प ने देखकर सिरे से भाजपा एवं कांग्रेस को नकार दिया , जो अब एक बड़ी चुनौती के तौर पर इनके समक्ष खड़ी है |
अतएव , भविष्य की चुनावी राजनीति की तस्वीर कैसी होगी ? इस विषय पर बहुत तेज़ी से विचार -मंथन का दौर राजनीतिक -सामाजिक हल्कों में गतिमान है और उम्मीद किया जाना चाहिए कि जल्द ही पुरातन पंथी राजनीतिक टोटकों से अब देश की राजनीति से छुटकारा मिलने वाला है , इसकी शुरूआत "आप" प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के जज्बे से परिलक्षित है | इसमें कांग्रेस एक बार फिर चक्करघिन्नी की तरह जन वेग में हवा होने की रह पर है | झलक देखें . "आप" को बिना शर्त समर्थन दिए जाने की घोषणा दिल्ली कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष लवली ने चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद खुद की थी और अब जब "आप" ने सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ाने शुरू किया , तब कार्यवाहक मुख्य मंत्री शिला दीक्षित ने बिना शर्त समर्थन को ख़ारिज करते हुए बयान जारी किया है कि जन कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिये कांग्रेस का समर्थन है , इससे इत्तर नहीं | जाहिर है कि कांग्रेस की दोमुंही बातों से एक बार फिर "आप" को दिल्लीवासियों का विश्वास प्राप्त होगा | यह कोई कहने की बात नहीं कि जन मुद्दे क्या हैं ? इस बारीकी की समझ कांग्रेस के पंडितों को शायद नहीं है कि राष्टीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समझ देश के सुदूरवर्ती इलकों से ज्यादा होती है , इसमें किसी तरह के काइयांपन का प्रदर्शन किसी भी जमे -जमाये पार्टी की लुटिया डुबो सकती है |
बहरहाल , "आप" के सत्ताधारी वर्ग में सम्मिलित होने से प्रकट है कि चरित्र के साथ जन मुद्दों पर अगर संघर्ष करने की मादा हो , तब लोकतान्त्रिक राजनीति में बदलाव को कोई भी ताकत नहीं रोक सकता ,बशर्ते इसमें विश्वास को चुनौती नहीं मिल सके | भाजपा , कांग्रेस ,वामपंथी दल के साथ- साथ क्षेत्रीय दलों में मौजूदा परिवेश में "चरित्र" का संकट है, इसलिए इनको जाति, समुदाय , धर्म , क्षेत्र और अवसरवादी गठबंधन का सहारा लेने की मज़बूरी रहती है |ऐसे में नवोदित 'आप` ने दिखला दिया है कि वह कांग्रेस को पसंद नहीं करती , इसके बावजूद संसदीय राजनीति के तय मापदंडों के तहत सरकार बनाने में उसे गुरेज़ भी नहीं है |गुरेज इसलिए नहीं कि वह `सत्ता` की भूखी है , यह इसलिए कि मध्यावधि चुनाव का तोहमत उसके माथे पर नहीं लगे , इसलिए वह अपने तरीके से दिल्लीवासियों का मनटटोल कर सरकार बनाने को तैयार है , करना तो वही है , जो दिल्लीवासियों के प्राथमिक हित में है और जब सरकार जनापेक्षी और पूर्ववर्ती सरकार के घपलेबाजी उजागर करेगी और दंडात्मक कारवाई होंगे तो कांग्रेस तिलमिलाएगी, कालांतर में वह समर्थन वापसी के तौर पर सामने आएगी  , जो एक बार फिर `आप` को जन समर्थन देने पर गंभीरता से लोगों को उत्प्रेरित कर सकती  है |
पुनश्च , अब राज विश्लेषकों को `आप` के भविष्य को लेकर भ्रम का शिकार होना वाजिब प्रतीत है | यह भ्रम भी इसलिए कि यह उस तरीके से अस्तित्व में नहीं आई है , जैसे अन्य राजनीतिक दल आते हैं , अर्थात येन-केन-प्रकारेण सत्ता हस्तगत करना किसी भी दलगत राजनीति से उत्पन्न पार्टियों का मुख्य उद्देश्य इसके प्रथम रहे हैं | ऐसे में `आप` को समझने के लिये नए दृष्टिकोण की जरूरत है , जिसमे विचारधारात्मक विभेद की जगह "मौके पर उत्पन्न" जन समस्या -संकट ही इसके सिन्धांत ,विचार ,सूत्र ,नीति और कार्यक्रम गढते हैं और यह मौजूदा वक्त में किसी के आयामी शब्दावली का मोहताज भी नहीं है| इसका परिचय कई मरतबे केजरीवाल ने अपने खास लहजे में दे भी दिया है | मतलब यह कि जो मुलभूत आवश्यकता हैं , उसकी परिपूर्ति इसके मुख्य एजेंडे में स्वत: शामिल है , यथा बिजली-पानी के अलावे भ्रष्टचार में लिप्त प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के साथ ही इसमें दोषी पाए गए तत्वों को कठोरतम सजा मुकरर करना , ताकि समाज में राज्य अर्थात सरकार के होने का स्पष्ट सन्देश जाना निश्चित हो |
इतना ही नहीं ,`आप` को जो फिलवक्त कामयाबी दिल्ली में मिली है , इसका यह अर्थ नहीं कि इसकी सफलता के गाथे अन्य राज्यों में भी इसी तरह दुहराएँ जा सकने की संभावना बढ़ गई है | इसमें इतना जरूर तब्दिली आई है कि इस नवोदित पार्टी से जुड़ने की ललक आम लोगों में बढ़ गई है , जिसका उदाहरण है कि `आप` के केन्द्रीय नेताओं को मालूम भी नहीं है और कई राज्यों में इस नाम से पार्टी का गठन भी क्षेत्रीय -स्थानीय तौर पर हो चूका है और इससे संबद्धता के लिये आवेदन भेजे जाने लगे हैं | यह परम्परागत राजनीति जैसा ही है, जिसका अभी ठोस स्वरूप नहीं  |
खैर , `आप` के विस्तार का असली परीक्षा मेट्रो पोलिटन सिटी में होना है , यथा मुंबई ,चेन्नई , कोलकाता, अहमदाबाद , लखनऊ , पुणे , नागपुर , बैंगलोर, जयपुर जैसे  महानगरों में इसकी ताकत का परीक्षण होगा , जहाँ जात -पात से एक अलग दुनिया ही बस्ती है |बिहार , उत्तर प्रदेश ,झारखण्ड , छतीशगढ़ जैसे अन्य प्रान्तों में इसकी अभी सीमित सफलता की ही गुंजाइश है, जिसमे गांव -कस्बे वाली मानसिकता से लोग आजादी छियासठ साल के बाद भी उबर नहीं पाए हैं |

और अंत में एक बात -- देश में उपभोक्तावादी संस्कृति मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की देन है और यही मनोवृति ने दिल्ली में कांग्रेस की कब्र खोद दी , जिसमे मध्य वर्ग में शुमार होती जनसँख्या ने तात्कालिक आवश्यकता को ही पहली जरूरत समझा है , जिसमे "सपाट राजनीति" की अहम भूमिका अन्तर्निहित है , आखिर इस कपटी राजनीति के अगुवा भी तो सिंह ही थे ,जब वह नरसिह राव के प्रधान मंत्रित्व(१९९१-९६) में वित्त मंत्री थे |

Tuesday, 10 December 2013

भारतीय राजनीति के बदलते चेहरे

                                            ( एसके सहाय )
देश के पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का सबक यह है कि मौजदा राष्टीय एवं क्षेत्रीय दल अब अपने को परिवर्तित दौर में राजनीति के नये "टूल्स" से लैस करें , नहीं तो आने वाले कल् के राजनीतिक बियाबान में खो जाने के लिये तैयार रहें | ऐसा मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छतीशगढ़ , दिल्ली और
मिजोरम के संकेत हैं | यह चुनाव कल् के लोक सभा चुनाव का पूर्वाभ्यास था | स्थानीय मुद्दे के साथ राजनीतिक हल्कों में आर्थिक भ्रष्टाचार ने समूचे समाज को भीतर तक झकझोर दिया है और पारम्परिक पार्टियां इनपर अट्टहास करती दिखी है , जिसका परिणाम है कि "आप" सरीखी नवोदित पार्टी ने एक साथ भाजपा और कांग्रेस का मान -मर्दन कर दिया है और यह अब और उफान पर आने वाला है , जिसमे भाजपानीत राजग गठबंधन को मुश्किलों में डालने की कुव्वत है |
         भारतीय राजनीति में तेज़ी से नये नायकों का प्रवेश हुआ है , इसमें दो मत नहीं कि अरविद केजरीवाल महज डेढ़ साल के राजनीतिक जीवन में वह कर दिखलाया है , जिसकी कल्पना तक शीर्ष पार्टियों के नेता नहीं कर सके थे |इसमें राहुल गाँधी बौने नजर आये ,तो कोई आश्चर्य नहीं | संघर्ष क्या होती है और क्या कहलाती है , यदि राहुल को सीखना हो ,तो केजरीवाल से सीखें |वैसे ,राहुल ने अपनी इन चुनावी प्रतिक्रिया में "आप" के राजनीतिक ओजारों को परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है , तभी तो उनका कहना था कि दिल्ली के सन्देश को वह ग्रहण कर लिये हैं और कांग्रेस को उसी के तर्ज़ पर आने वाले चुनौतियों के लिये तैयार किया जायेगा |
इस प्रसंग में १९४७ के पूर्व स्वाधीनता संघर्ष को जानने की जरूरत है , मोहनदास करमचंद गाँधी के भारतीय भूमि में दक्षिण अफ्रीका से अवतरण के पहले देश में बाल, पाल और लाल अर्थात बाल गंगाधर तिलक , बिपिनचंद्र पाल और लाला लाजपत राय की तिकड़ी अंग्रेस सरकार से लोहा लेने की थी , इसमें उग्र तेवरों का जलवा भी काफी कुछ अहिंसक तरीके से मौजूदा हाल में "आप" जैसा ही था और तीनों उस काल में अपने -अपने क्षेत्रों में क्रमश: महाराष्ट , बंगाल और पंजाब में आजादी की अलख जगा रहे थे और इनके आन्दोलनों में जन भागीदारी भी कम नहीं थी | इनके ओजस्वी भाषणों में में वह जाज्वलयमान विचार थे , जो अब केजरीवाल में दिख रहे हैं | एक अर्थों में इसे इतिहास का दुहराना भी कह सकते हैं |यह स्थिति उन तीनों नेताओं के रहते देश में राजनीतिक आंदोलन तीखा काफी अरसे से  था |
ऐसे समय में जब गाँधी जी का स्वदेश में वापसी हुआ ,तो शनै ; शनि: आजादी की लड़ाई के तरीको अर्थात ओजारों अर्थात टूल्स में बदलाव आने लगा , ऐसा इसलिए कि एक ही तरह के रास्ते से स्वाधीनता की लड़ाई से लोगों में "अनमना " से हालात उत्पन्न हो गए थे और गाँधी अपने तरीके से सत्य एवं अहिंसा से उपजे सिन्धान्तों के बल पर सविनय ,अवज्ञा जैसी प्रक्रिया को राजनीति को नई धार प्रदान कर रहे थे और यह तब के भारतीयों के लिये एक प्रकार का अलग ही अनुभूति थी , जो बाद के दिनों में आजादी के मतवालों के बीच सिर चढ कर बोला और हम गुलामी के जंजीरों से मुक्त हुए |
फिर आजादी बाद की स्थिति दूसरी थी , जिसमे तपे -तपाये नेताओं का प्रभाव उनके खुद के चरित्रों से चलायमान थे | ऐसे में, पंडित जवाहरलाल नेहरू , लाल बहादुर शास्त्री तक राजनीतिक संघर्ष में कोई खास परिवर्तन नहीं था ,मगर इंदिरा गाँधी और इनके पुत्र संजय गाँधी के कार्यकाल में इन हथियारों में बदलाव हो चूका था और अधिनायकवादी प्रवृति भारतीय राजनीति को भीतर से लोकतान्त्रिक व्यवस्था को खोखला करने में आमादा थी , तब वैसे दौर में नेहरू युग के ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दृढ़ता से जन संघर्ष की अगुवाई की , नतीजा १९७७ में सामने था | इस तानाशाही बनाम लोकशाही लड़ाई में सात साले लगे थे और आज जब केजरीवाल ने महज डेढ़ वर्ष के संघर्ष में भाजपा के विजयी घोड़े को दिल्ली में रोक दिया , तब भी बुजुर्वा राजनीति के विश्लेषक इसे हल्के में लेते प्रतीत हैं | यह काफी कुछ वैसा ही है , जब मर्यादा पुरूषोतम राम के घोड़े को लव -कुश ने थामकर कुछ क्षण के लिये उनके समक्ष चुनौती दे डाली थी |यह हल्कापन भाजपा के लिये काफी गंभीर है और उसे संघ अर्थात केंद्र की सत्ता पर काबिज होना है , तो दृढ़ता के साथ राजनीति में ईमानदारी का परिचय उसे देना ही होगा, जिसमे चारित्रिक पुट की खास अहमियत होगी लेकिन उसमे तिकड़मी बुधिबाजी का स्थान नहीं होना होगा  |
यह वास्तव में , भ्रष्टाचार से निसृत शक्ति है , जिसकी आवाज को दिल्ली के लोगों ने करीने से पहचाना -जाना है | इसने अपने नई पहचान अन्ना हजारे के जरीये कायम की और नेक इरादों के साथ अपने मकसद में पिल पड़ गए , कामयाबी भी पहले चरण में इनकी कम नहीं है , इसीलिए तो आज युवाओं के प्रेरणा स्रोत के तौर पर राहुल के जगह पर अरविन्द केजरीवाल के नाम हैं |
बहरहाल , इन पांच प्रान्तों के इशारों को समझें ,तो विदित होगा कि आनेवाले लोक सभा के चुनाव में पशिचम ,मध्य और उत्तर का इलाका भाजपा के लिये विशेष होगा और कांग्रेस के लिये जीवन -मरण सा होगा | इसे ऐसे समझें , पश्चिम में राजस्थान , उत्तर में दिल्ली और मध्य में मध्य प्रदेश -छतीशगढ़ के विधान सभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता तो मिली लेकिन दिल्ली का महत्त्व इनमे अन्य से पृथक है , अलग इसलिए कि बहुमत के रास्ते इसी मार्ग से लोक सभा में अधिसंख्य जाते हैं , जिसमे उत्तर प्रदेश की उपयोगिता किसी भी राष्टीय दल के लिये  खास है | ऐसे में दिल्ली उत्तर भारत का आइना दिखती हो तो ताज्जुब नहीं | मिजोरम जैसे सूबों का इस्तेमाल चीथड़े बहुमत में पैबंद जैसा है , इसलिए इस प्रदेश को चुनावी परिदृश्य से अलग चश्मे में देखने -आंकने के प्रवृति समीक्षकों को है |
इन चुनावों का हकीकत तो यह है कि राजनीति के बाज़ार में पारम्परिक लटके -झटके -टोटके का जमाना लद चूका है | लोग अपेक्षा पाल रहे है कि कैसे भ्रष्टाचार से निजात मिले | यह देश -समाज को अन्दर से खाई जया रही है | जन लोकपाल एक वैसा टूल्स रहा , जिसमे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत चोरों को अर्थात भ्रष्टाचारियों को दंडित करने की पद्धति विकसित हो सकती थी , बावजूद विपक्ष में रहते भाजपा इसके महत्ता को भांप नहीं पाई और कांग्रेस को नंगा करने के चक्कर में यह खुद के लिये भी सवाल खड़ी कर गई , इसी का नतीजा है कि दिल्ली में इसके रथ बहुमत के नजदीक आते रुक गए और "आप" ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर डाली | अन्ना हजारे ,  राजनीति में सक्रिय नहीं नहीं थे और हैं भी नहीं , लेकिन इनकी मांग के साथ पूरा देश का "अवचेतन मन"  हमेशा रहा , क्योंकि यह ऐसी मांग थी , जिसे एक लोकतान्त्रिक समाज में बराबर आवश्यकता बनी रहती है |इस मुद्दे को केजरीवाल ने ठीक उसी तरह लपका यह कहिये कि आत्म -सात किया ,जैसे अमरीकी समाज विज्ञानी डेविड इस्टन ने कभी यह कहा था कि "जानने का क्या अर्थ है , इसका मतलब है कि उसे करने के लिये अपने को उसमें जोत देना और यह जोतना क्या है , तो इसका तात्पर्य यह कि समाज के हित में अपने को लगा देना , यह लगा देने का क्या मतलब , तो यह कि वैसा कर्तव्य जो समाज के लिये जरूरी है , तो कैसा कर्तव्य , जो सद हो और उसकी रचनात्मक उपयोगिता हो |"
ठीक, यही दिल्ली की राजनीति में "आप" ने किया है , जिसका प्रतिफल सामने हैं और यह डर अब सभी को खाए जया रहा है कि चरित्रगत विशेषताओं के बिना उनके राजनीतिक कांरवा कैसे आगे बढे ?संघर्ष के साथ राजनीतिक ईमानदारी अब भारतीय राजनीति के चेहरे बदलने के लिये आतुर हैं | इसमें , नौकरशाह , किसान , व्यवसायी , कर्मचारी , विद्यार्थी , सामाजिक कार्यकर्त्ता , मजदुर अर्थात हर वर्ग -समुदाय -क्षेत्र के उग्र विचारों का समावेश होगा और यह खास पहचान की मोहताज नहीं होगी , अदना सा दिखने वाला भी कल हमारा भाग्य -विधाता होगें , दिल्ली के "आप" के निर्वाचित विधायकों से ऐसा ही आभास है | यह नई चुनौती है , परम्परागत राजनीति को , जिसमे नई सोच के साथ बदलते समय में नई चेहरे राजनीति के मौजूदा स्वरूप को पलटते दिखे , तब अचरज कैसा ?

दिल्ली विधान सभा के चुनाव परिवर्तित समय में एक अलग तरह का "अभिनव प्रयोग" है , जिसमे विरोध करता स्वर , वर्तमान व्यवस्था को चुनौती देने में देश का ध्यान इसलिए बरबस खिचने में कामयाब है कि बिना विचारधारा ,सिन्धांत एवं  नीति के इसने सिर्फ "कार्यक्रमों" को ही अपने क्षेत्रीय घोषणा पत्रों में जगह दी , जिसमे लफ्फाजी नहीं ,केवल क्रियान्वयन ही इनके मुद्दे रहे |क्या इस मर्म को अरसे से राजनीतिक दल में सक्रिय नेता -कार्यकर्त्ता समझने के लिये तैयार हैं ?