Tuesday, 24 December 2013

मौजूदा "सत्ता" के मूल

                    (एसके सहाय)

नवोदित "आम आदमी पार्टी" के महज डेढ़ साल के जन संघर्ष में राष्टीय राजधानी "नई दिल्ली" की सत्ता में काबिज होने की परिघटना ने राज प्रेक्षकों को अचरज में डाला है , जो स्वाभाविक भी है , मगर अचरज जैसी कोई बात नहीं | आश्चर्य इस बात का है कि यह किसी ठोस सिन्धांत , विचारधारा , नीति की घोषणा किये केवल "कार्यक्रम" के बल पर इतना समर्थन प्राप्त किया है कि इसे कैसे संगठित राजनीतिक दल या समूह में निरुपित किया जाये , जो भविष्य में इस जैसे अन्य उदीयमान संघटन को राजनीतिक शक्ति के तौर पर प्रस्थापित किया जा सके |
ऐसे में एक शब्द इसके लिये उचित प्रतीत हो सकती है और वह :तदर्थवाद" से उपजी मानसिकता का परिचायक के रूप में जाना जा सकता है | इसमें वर्तमान सत्ता के कार्यशैली ,भ्रष्टाचार और लोक विरोधी क़दमों का समावेश मुख्य है |कार्यशैली से तात्पर्य पारदर्शिता का अभाव , भ्रष्टाचार से मतलब कई घपले -घोटाले का सामने आना और लोक विरोधी से अर्थ "लोकपाल" के पार्टी दुराभाव का मौजूदा केन्द्रीय सत्ता में होना से है |
इन तत्वों से दिल्ली के लोगों ने सीधा साक्षात्कार पिछले काफी अरसे से करते आ रहे थे और इसमें कोई सीधा अर्थात विकल्प ने देखकर सिरे से भाजपा एवं कांग्रेस को नकार दिया , जो अब एक बड़ी चुनौती के तौर पर इनके समक्ष खड़ी है |
अतएव , भविष्य की चुनावी राजनीति की तस्वीर कैसी होगी ? इस विषय पर बहुत तेज़ी से विचार -मंथन का दौर राजनीतिक -सामाजिक हल्कों में गतिमान है और उम्मीद किया जाना चाहिए कि जल्द ही पुरातन पंथी राजनीतिक टोटकों से अब देश की राजनीति से छुटकारा मिलने वाला है , इसकी शुरूआत "आप" प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के जज्बे से परिलक्षित है | इसमें कांग्रेस एक बार फिर चक्करघिन्नी की तरह जन वेग में हवा होने की रह पर है | झलक देखें . "आप" को बिना शर्त समर्थन दिए जाने की घोषणा दिल्ली कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष लवली ने चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद खुद की थी और अब जब "आप" ने सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ाने शुरू किया , तब कार्यवाहक मुख्य मंत्री शिला दीक्षित ने बिना शर्त समर्थन को ख़ारिज करते हुए बयान जारी किया है कि जन कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिये कांग्रेस का समर्थन है , इससे इत्तर नहीं | जाहिर है कि कांग्रेस की दोमुंही बातों से एक बार फिर "आप" को दिल्लीवासियों का विश्वास प्राप्त होगा | यह कोई कहने की बात नहीं कि जन मुद्दे क्या हैं ? इस बारीकी की समझ कांग्रेस के पंडितों को शायद नहीं है कि राष्टीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समझ देश के सुदूरवर्ती इलकों से ज्यादा होती है , इसमें किसी तरह के काइयांपन का प्रदर्शन किसी भी जमे -जमाये पार्टी की लुटिया डुबो सकती है |
बहरहाल , "आप" के सत्ताधारी वर्ग में सम्मिलित होने से प्रकट है कि चरित्र के साथ जन मुद्दों पर अगर संघर्ष करने की मादा हो , तब लोकतान्त्रिक राजनीति में बदलाव को कोई भी ताकत नहीं रोक सकता ,बशर्ते इसमें विश्वास को चुनौती नहीं मिल सके | भाजपा , कांग्रेस ,वामपंथी दल के साथ- साथ क्षेत्रीय दलों में मौजूदा परिवेश में "चरित्र" का संकट है, इसलिए इनको जाति, समुदाय , धर्म , क्षेत्र और अवसरवादी गठबंधन का सहारा लेने की मज़बूरी रहती है |ऐसे में नवोदित 'आप` ने दिखला दिया है कि वह कांग्रेस को पसंद नहीं करती , इसके बावजूद संसदीय राजनीति के तय मापदंडों के तहत सरकार बनाने में उसे गुरेज़ भी नहीं है |गुरेज इसलिए नहीं कि वह `सत्ता` की भूखी है , यह इसलिए कि मध्यावधि चुनाव का तोहमत उसके माथे पर नहीं लगे , इसलिए वह अपने तरीके से दिल्लीवासियों का मनटटोल कर सरकार बनाने को तैयार है , करना तो वही है , जो दिल्लीवासियों के प्राथमिक हित में है और जब सरकार जनापेक्षी और पूर्ववर्ती सरकार के घपलेबाजी उजागर करेगी और दंडात्मक कारवाई होंगे तो कांग्रेस तिलमिलाएगी, कालांतर में वह समर्थन वापसी के तौर पर सामने आएगी  , जो एक बार फिर `आप` को जन समर्थन देने पर गंभीरता से लोगों को उत्प्रेरित कर सकती  है |
पुनश्च , अब राज विश्लेषकों को `आप` के भविष्य को लेकर भ्रम का शिकार होना वाजिब प्रतीत है | यह भ्रम भी इसलिए कि यह उस तरीके से अस्तित्व में नहीं आई है , जैसे अन्य राजनीतिक दल आते हैं , अर्थात येन-केन-प्रकारेण सत्ता हस्तगत करना किसी भी दलगत राजनीति से उत्पन्न पार्टियों का मुख्य उद्देश्य इसके प्रथम रहे हैं | ऐसे में `आप` को समझने के लिये नए दृष्टिकोण की जरूरत है , जिसमे विचारधारात्मक विभेद की जगह "मौके पर उत्पन्न" जन समस्या -संकट ही इसके सिन्धांत ,विचार ,सूत्र ,नीति और कार्यक्रम गढते हैं और यह मौजूदा वक्त में किसी के आयामी शब्दावली का मोहताज भी नहीं है| इसका परिचय कई मरतबे केजरीवाल ने अपने खास लहजे में दे भी दिया है | मतलब यह कि जो मुलभूत आवश्यकता हैं , उसकी परिपूर्ति इसके मुख्य एजेंडे में स्वत: शामिल है , यथा बिजली-पानी के अलावे भ्रष्टचार में लिप्त प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के साथ ही इसमें दोषी पाए गए तत्वों को कठोरतम सजा मुकरर करना , ताकि समाज में राज्य अर्थात सरकार के होने का स्पष्ट सन्देश जाना निश्चित हो |
इतना ही नहीं ,`आप` को जो फिलवक्त कामयाबी दिल्ली में मिली है , इसका यह अर्थ नहीं कि इसकी सफलता के गाथे अन्य राज्यों में भी इसी तरह दुहराएँ जा सकने की संभावना बढ़ गई है | इसमें इतना जरूर तब्दिली आई है कि इस नवोदित पार्टी से जुड़ने की ललक आम लोगों में बढ़ गई है , जिसका उदाहरण है कि `आप` के केन्द्रीय नेताओं को मालूम भी नहीं है और कई राज्यों में इस नाम से पार्टी का गठन भी क्षेत्रीय -स्थानीय तौर पर हो चूका है और इससे संबद्धता के लिये आवेदन भेजे जाने लगे हैं | यह परम्परागत राजनीति जैसा ही है, जिसका अभी ठोस स्वरूप नहीं  |
खैर , `आप` के विस्तार का असली परीक्षा मेट्रो पोलिटन सिटी में होना है , यथा मुंबई ,चेन्नई , कोलकाता, अहमदाबाद , लखनऊ , पुणे , नागपुर , बैंगलोर, जयपुर जैसे  महानगरों में इसकी ताकत का परीक्षण होगा , जहाँ जात -पात से एक अलग दुनिया ही बस्ती है |बिहार , उत्तर प्रदेश ,झारखण्ड , छतीशगढ़ जैसे अन्य प्रान्तों में इसकी अभी सीमित सफलता की ही गुंजाइश है, जिसमे गांव -कस्बे वाली मानसिकता से लोग आजादी छियासठ साल के बाद भी उबर नहीं पाए हैं |

और अंत में एक बात -- देश में उपभोक्तावादी संस्कृति मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की देन है और यही मनोवृति ने दिल्ली में कांग्रेस की कब्र खोद दी , जिसमे मध्य वर्ग में शुमार होती जनसँख्या ने तात्कालिक आवश्यकता को ही पहली जरूरत समझा है , जिसमे "सपाट राजनीति" की अहम भूमिका अन्तर्निहित है , आखिर इस कपटी राजनीति के अगुवा भी तो सिंह ही थे ,जब वह नरसिह राव के प्रधान मंत्रित्व(१९९१-९६) में वित्त मंत्री थे |

Tuesday, 10 December 2013

भारतीय राजनीति के बदलते चेहरे

                                            ( एसके सहाय )
देश के पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का सबक यह है कि मौजदा राष्टीय एवं क्षेत्रीय दल अब अपने को परिवर्तित दौर में राजनीति के नये "टूल्स" से लैस करें , नहीं तो आने वाले कल् के राजनीतिक बियाबान में खो जाने के लिये तैयार रहें | ऐसा मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छतीशगढ़ , दिल्ली और
मिजोरम के संकेत हैं | यह चुनाव कल् के लोक सभा चुनाव का पूर्वाभ्यास था | स्थानीय मुद्दे के साथ राजनीतिक हल्कों में आर्थिक भ्रष्टाचार ने समूचे समाज को भीतर तक झकझोर दिया है और पारम्परिक पार्टियां इनपर अट्टहास करती दिखी है , जिसका परिणाम है कि "आप" सरीखी नवोदित पार्टी ने एक साथ भाजपा और कांग्रेस का मान -मर्दन कर दिया है और यह अब और उफान पर आने वाला है , जिसमे भाजपानीत राजग गठबंधन को मुश्किलों में डालने की कुव्वत है |
         भारतीय राजनीति में तेज़ी से नये नायकों का प्रवेश हुआ है , इसमें दो मत नहीं कि अरविद केजरीवाल महज डेढ़ साल के राजनीतिक जीवन में वह कर दिखलाया है , जिसकी कल्पना तक शीर्ष पार्टियों के नेता नहीं कर सके थे |इसमें राहुल गाँधी बौने नजर आये ,तो कोई आश्चर्य नहीं | संघर्ष क्या होती है और क्या कहलाती है , यदि राहुल को सीखना हो ,तो केजरीवाल से सीखें |वैसे ,राहुल ने अपनी इन चुनावी प्रतिक्रिया में "आप" के राजनीतिक ओजारों को परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है , तभी तो उनका कहना था कि दिल्ली के सन्देश को वह ग्रहण कर लिये हैं और कांग्रेस को उसी के तर्ज़ पर आने वाले चुनौतियों के लिये तैयार किया जायेगा |
इस प्रसंग में १९४७ के पूर्व स्वाधीनता संघर्ष को जानने की जरूरत है , मोहनदास करमचंद गाँधी के भारतीय भूमि में दक्षिण अफ्रीका से अवतरण के पहले देश में बाल, पाल और लाल अर्थात बाल गंगाधर तिलक , बिपिनचंद्र पाल और लाला लाजपत राय की तिकड़ी अंग्रेस सरकार से लोहा लेने की थी , इसमें उग्र तेवरों का जलवा भी काफी कुछ अहिंसक तरीके से मौजूदा हाल में "आप" जैसा ही था और तीनों उस काल में अपने -अपने क्षेत्रों में क्रमश: महाराष्ट , बंगाल और पंजाब में आजादी की अलख जगा रहे थे और इनके आन्दोलनों में जन भागीदारी भी कम नहीं थी | इनके ओजस्वी भाषणों में में वह जाज्वलयमान विचार थे , जो अब केजरीवाल में दिख रहे हैं | एक अर्थों में इसे इतिहास का दुहराना भी कह सकते हैं |यह स्थिति उन तीनों नेताओं के रहते देश में राजनीतिक आंदोलन तीखा काफी अरसे से  था |
ऐसे समय में जब गाँधी जी का स्वदेश में वापसी हुआ ,तो शनै ; शनि: आजादी की लड़ाई के तरीको अर्थात ओजारों अर्थात टूल्स में बदलाव आने लगा , ऐसा इसलिए कि एक ही तरह के रास्ते से स्वाधीनता की लड़ाई से लोगों में "अनमना " से हालात उत्पन्न हो गए थे और गाँधी अपने तरीके से सत्य एवं अहिंसा से उपजे सिन्धान्तों के बल पर सविनय ,अवज्ञा जैसी प्रक्रिया को राजनीति को नई धार प्रदान कर रहे थे और यह तब के भारतीयों के लिये एक प्रकार का अलग ही अनुभूति थी , जो बाद के दिनों में आजादी के मतवालों के बीच सिर चढ कर बोला और हम गुलामी के जंजीरों से मुक्त हुए |
फिर आजादी बाद की स्थिति दूसरी थी , जिसमे तपे -तपाये नेताओं का प्रभाव उनके खुद के चरित्रों से चलायमान थे | ऐसे में, पंडित जवाहरलाल नेहरू , लाल बहादुर शास्त्री तक राजनीतिक संघर्ष में कोई खास परिवर्तन नहीं था ,मगर इंदिरा गाँधी और इनके पुत्र संजय गाँधी के कार्यकाल में इन हथियारों में बदलाव हो चूका था और अधिनायकवादी प्रवृति भारतीय राजनीति को भीतर से लोकतान्त्रिक व्यवस्था को खोखला करने में आमादा थी , तब वैसे दौर में नेहरू युग के ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दृढ़ता से जन संघर्ष की अगुवाई की , नतीजा १९७७ में सामने था | इस तानाशाही बनाम लोकशाही लड़ाई में सात साले लगे थे और आज जब केजरीवाल ने महज डेढ़ वर्ष के संघर्ष में भाजपा के विजयी घोड़े को दिल्ली में रोक दिया , तब भी बुजुर्वा राजनीति के विश्लेषक इसे हल्के में लेते प्रतीत हैं | यह काफी कुछ वैसा ही है , जब मर्यादा पुरूषोतम राम के घोड़े को लव -कुश ने थामकर कुछ क्षण के लिये उनके समक्ष चुनौती दे डाली थी |यह हल्कापन भाजपा के लिये काफी गंभीर है और उसे संघ अर्थात केंद्र की सत्ता पर काबिज होना है , तो दृढ़ता के साथ राजनीति में ईमानदारी का परिचय उसे देना ही होगा, जिसमे चारित्रिक पुट की खास अहमियत होगी लेकिन उसमे तिकड़मी बुधिबाजी का स्थान नहीं होना होगा  |
यह वास्तव में , भ्रष्टाचार से निसृत शक्ति है , जिसकी आवाज को दिल्ली के लोगों ने करीने से पहचाना -जाना है | इसने अपने नई पहचान अन्ना हजारे के जरीये कायम की और नेक इरादों के साथ अपने मकसद में पिल पड़ गए , कामयाबी भी पहले चरण में इनकी कम नहीं है , इसीलिए तो आज युवाओं के प्रेरणा स्रोत के तौर पर राहुल के जगह पर अरविन्द केजरीवाल के नाम हैं |
बहरहाल , इन पांच प्रान्तों के इशारों को समझें ,तो विदित होगा कि आनेवाले लोक सभा के चुनाव में पशिचम ,मध्य और उत्तर का इलाका भाजपा के लिये विशेष होगा और कांग्रेस के लिये जीवन -मरण सा होगा | इसे ऐसे समझें , पश्चिम में राजस्थान , उत्तर में दिल्ली और मध्य में मध्य प्रदेश -छतीशगढ़ के विधान सभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता तो मिली लेकिन दिल्ली का महत्त्व इनमे अन्य से पृथक है , अलग इसलिए कि बहुमत के रास्ते इसी मार्ग से लोक सभा में अधिसंख्य जाते हैं , जिसमे उत्तर प्रदेश की उपयोगिता किसी भी राष्टीय दल के लिये  खास है | ऐसे में दिल्ली उत्तर भारत का आइना दिखती हो तो ताज्जुब नहीं | मिजोरम जैसे सूबों का इस्तेमाल चीथड़े बहुमत में पैबंद जैसा है , इसलिए इस प्रदेश को चुनावी परिदृश्य से अलग चश्मे में देखने -आंकने के प्रवृति समीक्षकों को है |
इन चुनावों का हकीकत तो यह है कि राजनीति के बाज़ार में पारम्परिक लटके -झटके -टोटके का जमाना लद चूका है | लोग अपेक्षा पाल रहे है कि कैसे भ्रष्टाचार से निजात मिले | यह देश -समाज को अन्दर से खाई जया रही है | जन लोकपाल एक वैसा टूल्स रहा , जिसमे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत चोरों को अर्थात भ्रष्टाचारियों को दंडित करने की पद्धति विकसित हो सकती थी , बावजूद विपक्ष में रहते भाजपा इसके महत्ता को भांप नहीं पाई और कांग्रेस को नंगा करने के चक्कर में यह खुद के लिये भी सवाल खड़ी कर गई , इसी का नतीजा है कि दिल्ली में इसके रथ बहुमत के नजदीक आते रुक गए और "आप" ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर डाली | अन्ना हजारे ,  राजनीति में सक्रिय नहीं नहीं थे और हैं भी नहीं , लेकिन इनकी मांग के साथ पूरा देश का "अवचेतन मन"  हमेशा रहा , क्योंकि यह ऐसी मांग थी , जिसे एक लोकतान्त्रिक समाज में बराबर आवश्यकता बनी रहती है |इस मुद्दे को केजरीवाल ने ठीक उसी तरह लपका यह कहिये कि आत्म -सात किया ,जैसे अमरीकी समाज विज्ञानी डेविड इस्टन ने कभी यह कहा था कि "जानने का क्या अर्थ है , इसका मतलब है कि उसे करने के लिये अपने को उसमें जोत देना और यह जोतना क्या है , तो इसका तात्पर्य यह कि समाज के हित में अपने को लगा देना , यह लगा देने का क्या मतलब , तो यह कि वैसा कर्तव्य जो समाज के लिये जरूरी है , तो कैसा कर्तव्य , जो सद हो और उसकी रचनात्मक उपयोगिता हो |"
ठीक, यही दिल्ली की राजनीति में "आप" ने किया है , जिसका प्रतिफल सामने हैं और यह डर अब सभी को खाए जया रहा है कि चरित्रगत विशेषताओं के बिना उनके राजनीतिक कांरवा कैसे आगे बढे ?संघर्ष के साथ राजनीतिक ईमानदारी अब भारतीय राजनीति के चेहरे बदलने के लिये आतुर हैं | इसमें , नौकरशाह , किसान , व्यवसायी , कर्मचारी , विद्यार्थी , सामाजिक कार्यकर्त्ता , मजदुर अर्थात हर वर्ग -समुदाय -क्षेत्र के उग्र विचारों का समावेश होगा और यह खास पहचान की मोहताज नहीं होगी , अदना सा दिखने वाला भी कल हमारा भाग्य -विधाता होगें , दिल्ली के "आप" के निर्वाचित विधायकों से ऐसा ही आभास है | यह नई चुनौती है , परम्परागत राजनीति को , जिसमे नई सोच के साथ बदलते समय में नई चेहरे राजनीति के मौजूदा स्वरूप को पलटते दिखे , तब अचरज कैसा ?

दिल्ली विधान सभा के चुनाव परिवर्तित समय में एक अलग तरह का "अभिनव प्रयोग" है , जिसमे विरोध करता स्वर , वर्तमान व्यवस्था को चुनौती देने में देश का ध्यान इसलिए बरबस खिचने में कामयाब है कि बिना विचारधारा ,सिन्धांत एवं  नीति के इसने सिर्फ "कार्यक्रमों" को ही अपने क्षेत्रीय घोषणा पत्रों में जगह दी , जिसमे लफ्फाजी नहीं ,केवल क्रियान्वयन ही इनके मुद्दे रहे |क्या इस मर्म को अरसे से राजनीतिक दल में सक्रिय नेता -कार्यकर्त्ता समझने के लिये तैयार हैं ?

Thursday, 9 August 2012

वन्य जीवन : पलामू की बाघिन को "यार" की तलाश


                      भ्रामक है बाघों की तस्वीर 
                         एसके सहाय
 खबर है कि झारखण्ड  का एकमात्र बाघ परियोजना " पलामू ब्याघ्र रिजर्व " में नर बाघों का अभाव  हो गया है,  जिससे इनकी संख्या में वृद्धि होने के आसार धूमिल होते देख कर वन विभाग ने बाहर से "नर" बाघ को लाए जाने के एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है |
रिजर्व सूत्रों के मुताबिक फ़िलहाल अभ्यारणय में पांच - छः ही बाघिन हैं ,जिनकी उम्र आठ - नौ वर्ष की है | गत साल ट्रेपिंग कैमरे में एक बघ की छवि अंकित हुई थी ,मगर इसके बाद अन्य बाघों की तस्वीर कैमरे में कैद नहीं हो सकी ,जिससे बाघों की निश्चित संख्या के बारे में जब - तब विवाद होता रहा है कि पलाऊ रिजर्व में बाघ हैं भी या नहीं ! इस विषय में विगत पांच साल से लगातार भ्रम बना हुआ है |
यह भ्रम इसलिए भी है कि काफी अरसे से बाघों के शावकों को रिजर्व में नहीं देखा गया है | इसके अतिरिक्त देहरादून स्थित " वन्य प्राणी संरक्षण प्राधिकार " द्वारा गणना के वैज्ञानिक प्रविधि से पाए गए साक्ष्यों के आधार पर ही इसके अस्तित्व को मान्यता दिए जाने के नियम बना लिए हैं, इससे पलामू ब्याघ्र रिजर्व में बाघ - बाघिन के दावे के साथ मौजूदगी की सूचना पहले से ही संदिग्ध है |
फिलवक्त ,रिजर्व के अधिकारियों को थोड़ी राहत है कि एक बाघ की तस्वीर पिछले ग्यारह नवम्बर को कैद हो चुकी है , लेकिन इसे अब भी प्रयाप्त आधार माने जाने की स्थिति नहीं है | इससे रिजर्व कर्मियों की चिंता बढ़ गई है | इस चिंता को दूर करने के लिये कान्हा - रणथंभोर ब्याघ्र रिजर्व से नर बाघ को आयात करने पर इन दिनों गहन विचार मंथन का दौर चल रहा है |
पलामू बाघ परियोजना से पलामू ब्याघ्र रिजर्व में तब्दील इस अभ्यारणय में कभी गत सदी के अस्सी के दशक में बासठ तक बाघों के विचरण करने की सार्वजनिक सूचना दी जाती रही है , तब गणना के तरीकों में बाघों के पद -चाप ,मल - मूत्र और शिकार के बाद मिले जानवरों के कंकाल इसके आधार होते थे, लेकिन अब इसमें परिवर्तन करके मल - मूत्र के डीएनए जाँच रिपोर्ट एवं छाया चित्र  ही बाघों की वास्तविक संख्या का आधार  तय है | इससे सही -सही आंकड़े को लेकर इस रिजर्व के बारे में संशय की स्थिति बनी हुई है |
यह रिजर्व १०२६ वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है ,जिसमे ४१५ वर्ग किमी का इलाका  कोर क्षेत्र के रूप में अधिसूचित है | वैसे , एक बाघ अपने क्षेत्र में २४ वर्ग किलीमीटर में विचरण करता है ,जहाँ कोई दूसरा बाघ आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता ,केवल " प्रजनन " को लेकर ही नर - मादा के बीच मिलन होता है ,फिर शावकों के जन्म लेने के बाद नर बाघ अलग हो जाते हैं , मगर शावक अपनी माँ (मादा) बाघ के साथ जवान होने तक साथ रहते हैं ,फिर इनके कुदरती तौर पर विलगाव होता है | बाघों की औसत आयु १२- १५ वर्ष की होती है | ऐसे में पलामू ब्याघ्र रिजर्व में इनकी मौजूदगी को लेकर " भ्रम" होना स्वाभाविक है |

Friday, 15 June 2012

हटिया के हाट में आजसू के बढे भाव


                 ( एसके सहाय )
   झारखण्ड में हटिया विधान सभा के आये उप चुनाव परिणाम से यह जाहिर हुआ है कि राज्य में अब राष्टीय पार्टियों से लोगों का मोह भंग होने की स्थिति है ,इतना ही नहीं बल्कि परंपरागत झामुमो की भी हालात पूर्ववत है ,भी या नहीं ,इस पर भी संशय है ,जिसकी वजह इसका नेतृत्व वर्ग है ,जिसमे शिबू सोरेन एवं इनके पुत्र के प्रभाव का परीक्षण निकट भविष्य में होना निश्चित है | ऐसी हालात में इस उप चुनाव के नतीजे का खास महत्त्व है ,जिसमे एक साथ राजनीतिक स्थिरता और अस्थिरता के फैसले होने हैं |
          राज्य में , फिलवक्त के राजनीतिक माहौल में आजसू के भाव बढ़ना स्वाभाविक है ,आखिरकार झारखण्ड की सरकार के नेतृत्व करने वाली पार्टी भाजपा को इसने अपने बूते मात जो दी है | यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भाजपा को एक भी उल्लेखनीय जीत अबतक नसीब नहीं है ,जिसमे विशेषकर राज्य सभा में इसके प्रत्याशी एस एस अहलुवालिया की हार और अब हटिया में अपने ही सरकार के साथी पार्टी आजसू के उम्मीदवार नवीन जायसवाल के हाथों मिली मात ने भाजपा को भविष्य के सकेंत दिए हैं ,इसमें यदि गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुए ,तो तय मानिये भाजपा की "गिजना" होना ही है और इसका श्रेय मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा को ही जाता है | ऐसे में एक साथ कई सवाल मौजूदा परिप्रेक्ष्य में उठना  लाजिमी है |
         वैसे में , हटिया विधान सभा के राजनीतीक संदर्भ का "प्रतिमान " का अध्ययन जरूरी है | वह इसलिए कि चुनाव का परिदृश्य नितांत अराजक थे ,एक ही समूह के दो प्रतिद्न्दी आमने -सामने थे ,जिसमे एक के साथ झामुमो का परोक्ष साथ था ,तो दूसरे को यह गुमान था कि यह सीट उसी का है ,क्योंकि पूर्व में इसी क्षेत्र में महेश शारदा तीन दफे चुनाव जीत चुके थे और पुन; किस्मत आजमा रहे थे |ऐसे में भाजपा गफलत में थी कि वह आसानी से विजयी हो जायेगी ,मगर हुआ ठीक इसके विपरीत ,यह तीसरे स्थान पर आ गई और कांग्रेस के सुनील सहाय को मत पूछिए ,यह जनाब चौथे पर रहकर भी जमानत बचाने से चूक गए | यह हाल है ,हटिया विधान सभा के हाट का , जहाँ एक साथ राष्टीय पार्टी के गौरव से अभिभुषित भाजपा -कांग्रेस एक साथ चारों खाने चित हैं |
       अब जरा , हटिया क्षेत्र के पृष्ठभूमि पर , जहाँ कभी आज के केन्द्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय का एकछत्र राज था ,जो खुद १९७७ से इस सीट पर १९८९ तक काबिज रहे थे ,जिनसे बाद में भाजपा के महेश शारदा ने इनके वैक्तिक असर को कट दिया और भगवा से पूरे सीट को रंग दिए ,तब राम लहर का प्रभाव का योगदान ज्यादा था लेकिन अब राजनीतिक फिजां में वैसी बात नहीं रही ,तभी तो बाद के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर अपना दबदबा बन ली ,जो अब आजसू के तौर पर नये समीकरण की ओर इशारा कर दिया है ,इसमें इसके उम्मीदवार का करिश्मा कम और आजसू प्रमुख सुदेश महतो का ज्यादा रहा है ,जिसके बदौलत इसे जीत नसीब हुई |
         सुदेश महतो .राज्य में उप मुख्य मंत्री है और अपनी मौन राजनीती का विस्तार लेने में हमेशा अव्वल रहे हैं ,संयोग से हटिया रांची जिले के तहत ही है और सुदेश भी इसी जिले के वासी है और इनके क्षेत्र में "कुर्मी " जनित जातिगत प्रभाव दृष्टिगत है ,इसमें शहरी इलाकों में मतदान का प्रतिशत कम होने का लाभ आजसू को अनायास मिल गया हो तो ताज्जुब नहीं | ऐसे में कांग्रेस - भाजपा को यह प्रतीत होना कि वह आसानी से इसे जीत लेंगे दिवा स्वपन ही था | ऐसा सोचने के इनके पास पर्याप्त तर्क भी थे लेकिन वे भूल गए कि सामाजिक प्रक्रियाओं में हमेशा तर्क काम नहीं करते | अबतक जनता पार्टी , जनता दल( सुबोधकांत सहाय ) भाजपा (महेश शारदा) और कांग्रेस ( शाहदेव ) के राजनीतिक क्रियाविधियों का क्षेत्र हटिया रहा था ,जिसमे आजसू सेंध मारने में कामयाब हो गई ,तो इसके युगान्तकारी असर होना सत्ता के खेमों में स्वाभाविक है |
        ऐसे में , हटिया उप चुनाव के नतीजे राज्य की राजनीती में क्या गुल खिलाते हैं ,इसका राजनीतिक प्रेक्षकों को इंतजार है | यह इंतजार इसलिए भी है कि नतीजे में जो पार्टी दूसरे स्थान पर है ,वह झाविमो है ,जिसके प्रमुख पूर्ववर्ती मुख्य मंत्री बाबु लाल मरांडी हैं ,जो कभी भाजपा के सिरमौर ,झारखण्ड में थे | स्पष्ट है कि अब राज्य की राजनीती का जोर क्षेत्रीय पार्टियों की ओर है ,आजसू के जीत ने यही राह दिखाई है ,जिससे इनके भाव बढ़ने की उम्मीद राजनीतिक गलियारों में है और यह शुरू भी हो चूका है | कभी ,कांग्रेस का झाविमो के संग गलबहियां थी ,जो अब कडुआहट में बदल चुकी है और इसके पीछे पिछला राज्य सभा चुनाव की पृष्ठभूमि है ,ऐसे में नये समीकरण के तहत अगले विधान सभा के चुनाव तक इन क्षेत्रीय पार्टियों के बीच ध्रुवीकरण होते दिखे जाने का ही नजारा है |
          अब जब , निकट भविष्य में राज्य में कोई प्रतीकात्मक चुनाव नहीं हैं , ऐसे में हटिया के बाजार में आजसू के बढे भाव का मोल ही राजनीती की धुरी है ,जिसमे ज्यादा भाजपा और कांग्रेस को ही माता -पच्ची करना है | एक खुद सत्ता का प्रतिनिधिक शक्ति होते हुए हारी है तो दूसरा केन्द्रीय शक्ति सुबोध के भाई सुनील  सहाय खेत में जुत गए लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई , तब इन स्थितियों में इन दोनों पार्टियों के बीच अलग - अलग रूपों में सिर फुटौवल होना  ही है ,आख़िरकार इनकी शक्तियों के तार खुद के उम्मीदारों के पास नहीं थे , ये दोनों सिर्फ मोहरे भर थे ,जो चुनावी खेत रहे |
       हटिया के जीत का जश्न आजसू किस रूप में मानती है ,यह अभी देखना है , अब इसकी विधायकों की सदस्य संख्या पांच से बढ़कर छ हो गई है ,सो सत्ता के मलाई खाने में इसके दबाव की ताकत का इस्तेमाल आजसू प्रमुख किस तरह करते हैं ,यह जानना ,समझना और बुझना जरूरी है | राजनीति के बदलते स्वरूप ने अब दलगत शक्ति को नये सिरे से परिभाषित करने शुरू कर दिए हैं ,जिसमें एक उदाहरण राष्टीय तौर पर यह है कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ,केन्द्रीय राजनीती में संप्रग के साथ है लेकिन सरकार में प्रत्यक्ष - परोक्ष भागीदारी इनकी नहीं है और यह भागीदारी इसलिए नहीं है कि इनके पास मंत्री बने रहने एवं दबाव डालने की वह शक्ति नहीं ,जो कभी इनके पास लोक सभा में रहा करती थी | काफी कुछ इसी तरह के हालात झारखण्ड में हैं ,जिसमे हटिया ने आजसू  को नई ऊर्जा दी है और यह शक्ति अगर अपने पर उतार जाये तो राजनीती के नई रास्ते खुल सकते हैं ,जिसमे बाबु लाल मरांडी के साथ का अपना गुणात्मक असर होगा | ऐसे में भाजपा - कांग्रेस हासिये पर जाती दिखे ,तो आश्चर्य नहीं करनी चाहिए | आने वाले समय में राष्टीय पार्टियों का "सिकुडन" होना है ,क्षेत्रीय दलों में झाविमो  -आजसू के उभार के लक्षण हैं , झामुमो अपनी मौजूदगी तो दर्शाएगी ही लेकिन इसमें वह धार नहीं रहेगी ,जैसा कि सत्ता के बाहर और भीतर रहते इसके दिखे हैं | ऐसे में ,स्थानीय -क्षत्रिय जन विश्वास ही किसी भी पति को वह धार -शक्ति देगी ,जिसके अपने व्यक्तिगत प्रभाव भी इलाकाई स्तर पर होंगे ,फ़िलहाल तो यही सबक हटिया के हाट में आजसू के बढे भाव के हैं |
   



Monday, 21 May 2012

वन्य जीव संरक्षण की यह पहल


                   (एसके सहाय)
हाल में "ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्रोग्राम" (जीटीएपी)के कार्यशाला में यह बात रेखांकित होने के खास मायने है ,जिसमे कहा गया है कि भारत में विगत चार के दौरान बत्तीस बाघों की मौतें हुई है ,विशेष इसलिए कि मई २०१२ तक इसमें १४ बाघों के शिकारियों  के हाथों मारे जाने की रिपोर्ट भी शामिल है ,जो वाकई गंभीर और चिंता के विषय है .यह ब्रह्माण्ड के चराचर जीवों के प्रति मनुष्य के क्रूरता को प्रदशित करता है ,जबकि अब यह निर्विवाद रूप से सच है कि "मनुष्य और जानवरों के संघर्ष में हमेशा वन्य जीवन को ही नुक्सान उठाना पड़ता है" इसके बावजूद धरती पर मौजूदा वन्य प्राणियों के प्रति क्रूरता का भाव अब तक बना रहना खास चिंतनीय विषय बने हुए हैं | यह कार्यशाला पिछले १६-१७ मई को नई दिली के विज्ञान भवन में आयोजित थी ,जिसमे पूरे विश्व भर के देशों के प्रतिनिधिक वन्य प्राणियों की सुरक्षा में जुटे विशेषज्ञ उपस्थित थे |
             वन्य प्राणियों के बारें में फ़िलहाल भारत को ही देखें ,इसमें बताया गया है कि ३२ बाघों में मात्र १८ की मौत स्वाभाविक है ,याने बाकी दुर्घटनावश ,जिसमे शिकार भी एक प्रक्रिया है ,के वजह से इस कम होती प्रजाति के लिये खतरे से कम नहीं सिद्द हो रहे | इस कार्यशाला में यह तथ्य भी रेखांकित हुए कि वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवर्धन में नेपाल और रूस के बेहतर रिकार्ड है ,इसमें भी नेपाल में विगत तीन सालों में एक भी बाघ के नहीं मारे जाने की बात सामने है .जो इसके वन और वन्य जीव सुरक्षा के मामले में प्रतिबद्दता  को दर्शाती है ,जो प्रशंसनीय है | 
            वैसे ,भारत में बाघों के संरक्षण की दिशा में १९७२ में ही कदम बढ़ा दिए गए थे लेकिन वैज्ञानिक प्रविधि के अनुसरण में कोताही बरते जाने से इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले ,फिर भी, जो कदम उठाये जा रहे हैं ,उसमे अब पूरी तरह सजगता बरते जाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है | शुरूआती दौर में केवल १३ बाघ परियोजनाए क्रियान्वित थी ,जो अब बढ़ कर ४१ हो गई हैं और यह १७ राज्यों तक विस्तृत है ,इसमें तमिलनाडु के सथ्य्मंगालम और अंदर प्रदेश के कवल वन्य प्राणी अभ्यारण्य हाल में शामिल किये गए हैं |
           २००६ की गणना में १७०६ बाघों के पाए जाने की बात थी ,जिसमें उतरोतर वृद्दि की बातें सामने आई  हैं,लेकिन  २००८ में यह संख्या १४०० होने की बात सामने थी ,और अब यह तायदाद १७१० तक बताई गई है  इसलिए इसे  इसे ज्यादा उल्लेखनीय  माने जाने की तवज्जो में दर्ज नहीं है .यह इसलिए कि अवैध शिकार और व्यापार की आशंकाओं को पूरी तरह निर्मूल अर्थात रोक पाने में अब भी बाघ रिजर्व तैयार नहीं हो सके है ,यही कारण है कि जब - तब बाघों के मारे जाने की खबर आती रहती है | देश में कुल क्षेत्रफल का एक फीसदी भाग ही बाघों के लिये सुरक्षित है ,जिमें विस्तार की योजनाओं पर सरकार विचार कर रही है ,जैसा कि जी टी ए पी के उदघाटन के अवसर पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने संकेत दिए हैं |
        बाघ के संरक्षण और संवर्धन के अभियान में तेरह देश पूरी तरह सम्मिलित हैं ,जहाँ विश्व बैंक इन देशों में इन वन्य जीवों के लिये अपनी तरफ से वित्तीय मदद प्रदान कर रही है ,ऐसे में इस जानवर को विलुप्त होने से बचाने के लिये हर संभव पहल किये जाने की दरकार मनुष्य को है |यह मदद बैंक की २००८ से ही है और इसी के सौजन्य से पहला ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्लान की बैठक १० नवंबर २०१० को सेंट पीटर्सबर्ग में हुई थी और यह दूसरा कार्यशाला नई दिल्ली में संपन्न हुई है |इस बैठक में बाघों के बचाव ,संरक्षण एवं सुरक्षा के प्रति समर्पण भाव से कदम उठाये जाने पर बल दिए गए |  यहाँ यह भी उजागर हुआ कि जो बाघ पालतू हैं ,उसके भी जीवित रखने और इसमें प्रजनन क्षमता को बरकार रखने में मनुष्य कारगर नहीं है ,ऐसे में प्रकृति प्रदत आबो -हवा को इसके लिये इर्द - गिर्द बनाये  रखने पर मुख्य जोर दिए गए |
           फिलवक्त , विश्व में ५००० हज़ार पालतू बाघों के होने की बात कार्यशाला में उजागर हुई है ,जिसमें भारत का प्रदर्शन इसके रख -रखाव के बारे में काफी दयनीय है जिसे निचले सूची में अंकित किया गया है तथा जंगलों में विचरण करने वाले इस वन्य जीवों  की संख्या ३५०० बताई गई है ,जिसे २०२२ तक दुगुने अर्थात ७००० तक किये जाने का संकल्प लिया गया है | वैसे ,भारत में बाघों के लिये ५०००० वर्ग किलोमीटर का ही क्षेत्र अभी सुरक्षित है |

Sunday, 6 May 2012

अहसास सत्ता की


                        (एसके सहाय)
 स्थानीय सत्ता का ,क्या महत्त्व होता है ,इसकी अनुभूति कुछेक दिन पूर्व झारखण्ड के दौरे पर आये केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को हुई ,तभी तो उनके मुंह से अनायास निकला कि "वह अबतक देश में दो सरकारों के अस्तित्व को ही जानते थे लेकिन नहीं अब तीन सरकारें देश में हैं एक संघ ,दूसरा राज्य ओर तीसरा जंगल की सरकार , जिनके बिना कोई भी योजना क्रियांवित होना मुश्किल है |" यह बात जयराम ने लातेहार में पिछले तीस अप्रैल को दौरे करने के बाद रांची में पत्रकारों के समक्ष कही | साफ है कि योजना ,जिस किसी भी सरकार की हो ,उसका उग्रवाद प्रभावित राज्य ,इलाके में तभी क्रियान्वयन संभव है ,जब भूमिगत संघटन इसके लिये मंजूरी देते हों और  यह मंजूरी उसी उग्रवादी संघटन को मिलती है ,जिसमे ठेकेदार कंपनियों के प्रबंधन माओवादी सहित अन्य क्षेत्रीय प्रतिबंधित एवं सक्रीय उग्रवादियों से निर्माण कार्य के लिये अनुमति अपने बूते हासिल किये हो | खुद ,रमेश ने माना है कि राज्य में नौ सडकों का निर्माण इसलिए नहीं शुरू हो सका है कि उग्रवादी इसे बनने नहीं देना चाहते और यह सभी मार्ग उग्रवाद ग्रस्त क्षेत्रों में ही बनना है ,फिर इसे आसानी से कैसे बनाया जा सकता है ,यह केंद्र और राज्य साकार के लिये भारी सिरदर्द है |
        अतएव , अब जब मुख्य मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह राष्टीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के मौजूदा स्वरूप से तारतम्य जोड़ने और तादात्म्य सबंध स्थापित करने की बात ,राज्यों की सरकार से कहते हैं ,तब विरोध कैसा ? यह इसलिए कि देश की अंदरूनी हालात में एक साथ बाहरी और भीतरी संकट व्याप्त है , जिसमे बढती हिंसा के खतरे कम होने के असर दीखते नहीं ,तब इसका सामना और खात्मा कैसे किया जाये ,यह यक्ष प्रश्न वर्त्तमान व्यवस्था के समक्ष गंभीर रूप में उपस्थित है ,जिससे इंकार नहीं किया जा सकता |
       वैसे , कल याने छ मई को नई दिल्ली में  एन सी टी सी पर ,जो कुछ भी विचार राज्यों के मुख्य मंत्रियों की ओर से प्रकट किये गए ,उसमे आतंकवाद की गंभीरता को तो प्राय: सभी ने स्वीकार किया है ,जो यथार्थ में इसकी उपयोगिता के महत्त्व को रेखांकित किया है ,तब विरोध के स्वर कैसा ? यही बात को यहाँ समझने का प्रयास है | प्रस्तावित केंद्र के बारे में गृह मंत्री पी चिंदबरम ने भी काफी सफाई दी है ,लेकिन इसे विपक्ष के मुख्य मंत्रियों ने मानने से इंकार कर दिया है ,जिसमें पहले के केन्द्रीय सरकार की तरफ से उठाये गए कदम है ,जो संशय पैदा करते हैं | ऐसे में इस विषय पर सर्वानुमति हों कठिन है और विचार - विमर्श का यह दौर लंबा चलने की मांग भीं करता है ,वह इसलिए कि एन सी टी सी पर अबतक कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने अपने मुंह सी लिये हैं और इसकी वजह अम्मा सोनिया गाँधी के नाराजगी का डर समझा गया है ,ऐसे में गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने ही विस्तार से इसके खामियों और दुरूपयोग की ओर ध्यान खिंचा है ,जिसमे ओडिसा के नवीन पटनायक ,बंगाल के ममता बनर्जी ,बिहार के नीतीश कुमार ,गुजरात के नरेन्द्र मोदी ,तमिलनाडु के जयललिता ,झारखण्ड के अर्जुन मुंडा ,मतलब कि अबतक बारह राज्यों ने इसके इस्तेमाल पर शक जाहिर करते हुए ,इसमें राज्यों की सहभागिता को केंद्र के बराबर ही आतंकवाद को लेकर "कार्यबल"
 संचालित होने पर जोर दिया है ,ताकि केन्द्रीय सरकार इसके मनमाना इस्तेमाल राज्यों के विधि सम्मत अधिकारों को कुचल नहीं सके ,ऐसा इसलिए कि कानून -व्यवस्था के विषय संवैधानिक रूप से राज्यों के क्षेत्राधिकार में आते है ,जो यह एक मजबूत तर्क भी है , वैसे भी देखा गया है कि क्रिया -प्रतिक्रिया में भी केंद्र -राज्यों के कदम एक -दूसरे के विपरीत उठते रहे हैं ,जैसे -टाडा,फिर पोटा जैसे अधिनियम का इस्तेमाल प्रतिक्रियात्मक स्वरूप में अर्थात कांग्रेस और गैर कांग्रेस केन्द्रीय  सरकारों के काल में हुआ है ,ऐसे में गैर शासित कांग्रेस के मुख्य मंत्रियों का यह मानना कि इसके बहाने राज्यों के मामले में केंद्र की दखलंदाजी बढ़ाने की यह सुनियोजित चाल है ,काफी हद तक राजनीतिक तौर पर उचित ही मालूम पड़ती है |
        ऐसे में .जयराम सरीखे केन्द्रीय मंत्रियों के अनुभव का लाभ संघ सरकार को लेना चाहिए ,जिन्होंने बेबाक तरीके से स्वीकार किया कि उग्रवाद प्रभावित राज्यों में स्थानीय विकास में स्थानीय सरकार अर्थात उग्रवाद को तभी नेस्तनाबूद किया जा सकता है ,जब सामाजिक,शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर विकासगत योजनाओं का व्यापक तौर पर क्रियान्वयन होगा और इन्होने स्वय लातेहार में ४३१ करोड रूपये की आधारशिला रखी , भले ही इन्होने सुरक्षा के साये में ही अपनी कार्य योजना को मूर्त रूप देने की पहल की हो लेकिन खुद बाइक से चाल कर दुर्गम क्षेत्रों में जाकर निर्माणात्मक गत्रिविधियों को गति देना .कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता | जंगल की सरकार का अस्तित्व तभी तक है ,जब तक सरकार से निरीह ग्रामीण या लोग उपेक्षित हैं ,मगर जैसे ही केंद्र या राज्य की सरकार कल्याणकारी स्वरूपों में हाथ बढाती  है तब , इनमें स्वत: स्फूर्त "सिरचन" की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ,तब लोग ही जंगल सरकार के खिलाफत में उठ खड़े होने के लिये तैयार होंगे और फिर किसी एन सी टी सी की जरूरत नहीं रह जायगी |
       जयराम रमेश का यह कदम अपनी ही सरकार की सोच से एकदम उलट है , केवल विधि -व्यवस्था ही शांति स्थापित करने में पहल नहीं करती ,बल्कि विकासगत योजनाएं भी आतंकवाद को सिरे से नकार सकने की क्षमता रखती है | अभी के दलगत सरकारों के अस्तित्व में आसानी से कोई भी सार्थक पहल ,तब तक कामयाब नहीं हो सकती ,जबतक केंद्र  अपने आचरण से खुद को नेक आचरण और काम  करने वाले के तौर पर प्रदर्शित नहीं नहीं करती | फिलवक्त तो संदेह का ही डेरा राष्टीय राजनीती में है ,फिर इसके छाया से आसानी से निकलना तो थोडा मुश्किल है |
    आतंकवाद ,देश को अंदर से खोखला कर रहा है ,इससे इंकार नहीं किया जा सकता ,मगर जिस तरह कांग्रेस सरकार का राष्टीय राजनीती में व्यवहार रहा है ,वही इसके विरोध का मुख्य कारण है ,जो मनमोहन सिंह की सरकार समझ पाने में असमर्थ है | गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य  मंत्रियों के दिए गए विचार स्पष्ट सन्देश दे रहे हैं कि उनको एन सी टी सी से उतना विरोध नहीं है ,जितना इसके दुरूपयोग होने से संशकित है | आखिर आतनकवाद  इनको भी तो खतरा के तौर पर मौजूद है और यह  छिपा सन्देश पढ़ पाने में केंद्र सरकार  भी सक्षम नहीं है ,अन्यथा सहमति नहीं बनने की क्या वजह हो सकती है | केवल राजनीतिक तिकडम से तो सहमति बनती नहीं |


Friday, 4 May 2012

स्थायित्व की खोज में भाजपा की हार


               (एसके सहाय)
 झारखण्ड में राज्य सभा चुनाव के नतीजे विशेष कुतूहल पैदा नहीं करते ,जहाँ केवल "सत्ता" में बने रहने की कला को ही राजनीती का अंतिम ठौर मान लिया गया हो ,वहां तो सरकार के नेतृत्वकारी शक्ति को हारना ही पड़ता है और ऐसा ही खेल इस बार के चुनाव में दिखा है ,जहाँ भाजपानीत सरकार में शामिल मुख्य घटक ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं किये और किये भी तो केवल दिखावटी ही ,जिसमें सत्ता किसी दूसरे के हाथों में हस्तगत नहीं हो जाये ,इस डर से अपनी भद्द पिटवा लेने में ही भलाई समझी ताकि सत्ता की मलाई खाने में दिक्कत नहीं  हो सके काफी कुछ ऐसा ही नज़ारा इस चुनाव के दरम्यान परिलक्षित हुआ |
           वैसे , भाजपा की इस हार में इसके सरकार के स्थायित्व का संकट छिपा है ,जो अब शनै - शनै प्रकट होगा और मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा समझ रहे होंगे कि उन्होंने अपनी गद्दी बचा ली है तो यह उनका ख्याली पुलाव ही साबित होने जा रहा है | सरकार के स्थायित्व को लेकर भाजपा शुरू से ही संशकित है और इस वजह से ही राज्य में चहुंओर अराजकता का प्रभाव दिक्दर्शित  है बल्कि यूँ कहिये कि प्रशासनिक स्थिति लुंज -पुंज हालात में वैसी ही है ,जैसी मधु कोड़ा के राज में थे ,फिर इस वर्त्तमान सरकार के औचित्य का क्या अर्थ ,जो एक भी जन समस्या को हल ढूढने में कामयाब नहीं हो सके अर्थात अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी झारखण्ड मुलभुत संकट यथा बिजली ,पानी ,सड़क ,चिकित्सा ,शिक्षा के साथ ही कानून व व्यवस्था के लिये झूझ रहा हो , ऐसे में सरकार का नेतृत्व करके भी भाजपा को कोई खास फायदा होती प्रतीत नहीं होती ,बल्कि विपक्ष में ही अपनी सशक्त भूमिका को दमदार बनाते हुए सत्ता में बहुमत पाने के लिये संघर्ष करती तो वह ज्यादा बेहतर होता |
         बहरहाल , भाजपा के उम्मीदवार एस एस अहलुवालिया ,मात खा चुके है और कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू एवं झामुमो के संजीव कुमार राज्य सभा में पहुंच कर झारखण्ड के लिये कौन सा लाभकारी योजना केंद्र से यहाँ ला सकते हैं ,यह देखना बाकी है
 फिलवक्त के राजनीतिक माहौल में इस चुनाव में झाविमो ( प्रजातान्त्रिक) की घोषित नीति ने आस जगाई है ,जिसने शुरू से ही वोट नहीं करने का फैसला कर रखा था और यह पूरी तरह से कार्यान्वित भी हुआ मगर सौधान्तिक परिप्रेक्ष्य में यह कदम लोकतंत्र के विपरीत हो सकती है लेकिन ,जो हालात झारखण्ड में उत्पन्न है ,उसमे घोषित नीति पर अटल रहना आज के राजनीती वातावरण में अलग ही नीति धार  थोडा हटकर अन्यों की तुलना में दे जाता है ,जिसमे इसके प्रमुख बाबु लाल मरांडी अभी सफल हैं |चुनाव के  येन बेला पर ऐसा  कभी दिखा नहीं कि वह भाजपा की प्रतिक्रिया में आकार कांग्रेस को वोट करने के लिये तैयार है ,जैसा कि रद्द हुए गत चुनाव में भाजपा ने अंतिम समय में झामुमो के पक्ष में मतदान कर अपनी प्रतिक्रियात्मक वोट यह करके डाल दी थी .कि उसके विरोधी प्रत्याशी के जीत नहीं हो, इसके लिये मतदान किये गए |
             इस राज्य सभा के चुनाव में उम्मीदवारों के प्राप्त हुए वोट भी कई आशंकाओं को जन्म दिया है और यह आशंका इस बात के संकेत हैं कि आने वाला समय राजनीतिक झंझावतों को अपने में लिये हुए है ,जिसका एक सिरा कांग्रेस के हाथों में है ,तो दूसरा झामुमो के पास है |यह आशंका इस बात से उपजी है कि प्राप्त वोटों के विश्लेषण में बलमुचू को सर्वाधिक २५ मत मिले और संजीव को २३ तथा अहलुवालिया को २० अर्थात निर्दलीय के सभी सात वोट कांग्रेस को मिले ,जब कि विदेश सिंह और चमरा लिंडा जैसे विधायकों का समर्थन मौजूदा सरकार को प्राप्त रहा है ,यही नहीं ,इन दोनों विधायकों ने झामुमो के प्रत्याशी का भी प्रस्तावक बन कर सामने आये थे ,ऐसे में क्या  बात हो गई कि दोनों एक साथ प्रतिपक्ष  के लिये वोट कर दिए ,जब कि इन दोनों के गृह जिले में मनमाफिक अफसरों की पद स्थापना -तबादले -योजनागत विकास के मामले में खुली छूट अर्जुन मुंडा ने अपनी सरकार के स्थायित्व बरक़रार रखने के लिये दे दी थी |
         ताज्जुब इस बात का है कि जेलों में भ्रष्टाचार को लेकर कैद विधायक एनोस एक्का ,हरिनारायण और सांसद मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा ने भी कांग्रेस का साथ दिया ,जबकि इनको इस हाल में पहुँचाने में कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार का ही मुख्य हाथ है ,इनके मतदान की संकल्पना अब रहस्य का रूप ले चुकी है ,ऐसे में अर्जुन मुंडा की सरकार को हारने के बाद भी सकून नहीं मिलने वाला है और राज्य एक बार फिर निकट भविष्य में अस्थिरता के दौर में आने के लिये अपने को तैयार कर रहा |
         ऐसे में , राज्य के प्रमुख  राजनीतिक नेताओं के प्रवृति पर नज़र डालना जरूरी है ताकि भविष्य में होने वाले खेल को सहज ढंग से समझा जा सके | पहली बात कि अर्जुन मुंडा को पार्टी से ज्यादा खुद की चिंता इस रूप में जाहिर है कि सरकार रहे तो उसके मुखिया वह रहें और सरकार बचाने के लिये ही सारे उपक्रम अहलुवालिया को ठिकाने लगाने में किये अन्यथा वह चाहते तो भाजपा प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करवा देने में सक्षम थे ,इनके लिये निर्दलियों को अपनी तरफ मोडना खास बात नहीं था ,इनकी पृष्ठभूमि भी कोई खास नैतिकता से भरा रहा है ,वह इसलिए कि आज भी अपने हाथों के जरीये भद्दे मजाक का त्रिकोण बनाने और अंगूठा दिखाने जैसे प्रदर्शन करते रहे हैं ,जो इनकी मानसिकता को बयां करने के लिये काफी है | झामुमो की जीत में अपनी सरकार की सुरक्षा की तलाश में वह शुरू से थे ,जिसमे वह आजसू को मोहरा के रूप में इस्तेमाल अपने आलाकमान के सामने किया और आजसू नेता एवं उप मुख्य मंत्री सुदेश महतो ने अपनी गोल -मोल बातों से एक तरफ भाजपा तो दूसरी तरफ झामुमो को साध कर रणनीतिक तौर पर कांग्रेस को इशारा कर दिए कि उसे भाजपा से किसी तरह के मोह -माया नहीं है | इसी को ध्यान में रख कर कांग्रेस ने निर्दलीय विधायकों को सत्ता में आने के भरोसा दिलाकर इनकी वोट हासिल किये ,जिसमे राजद के पास कांग्रेस को छोड़ कर अन्य को वोट दने का विकल्प ही नहीं था ,तब कामयाबी मिलती कैसे नहीं |

       दरअसल ,भाजपा का संकट बढ़ गया है ,अपनी हार से वह खुद की नज़र में गिरा ही ,साथ में कोई साफ सन्देश भी लोगों को नहीं दे पाया कि वह क्या चाहती है ? पूर्व में अंशुमान मिश्र प्रकरण तजा था , आरके अग्रवाल जनित भ्रष्टाचार के मामले सामने आ  चुके थे ,ऐसे में सत्ता के साझेदार दलों के बीच मतैक्य नहीं हो पाना ही इसके लिये सिरदर्द साबित होंगे ,ऐसे आसार अब दिखने को है | झामुमो को केवल अपनी शर्तों पर सत्ता चाहिए और इसके लिये ,जो भी तैयार है ,वह मुंडा को किनारे लगाने में जरा भी देर नहीं करेगी | आखिर सर्वाधिक वोट जो कांग्रेस को मिले हैं |कठिनाई है तो झाविमो को लेकर ,जो कतई झामुमो के साथ सरकार बनाने की ओर उन्मुख नहीं  होगी | ऐसे में मौजूदा सरकार हिलते - डुलते ही रहेगी ,जो इसके स्थायित्व के लिये अभिशप्त जैसा ही है |