Thursday, 9 August 2012

वन्य जीवन : पलामू की बाघिन को "यार" की तलाश


                      भ्रामक है बाघों की तस्वीर 
                         एसके सहाय
 खबर है कि झारखण्ड  का एकमात्र बाघ परियोजना " पलामू ब्याघ्र रिजर्व " में नर बाघों का अभाव  हो गया है,  जिससे इनकी संख्या में वृद्धि होने के आसार धूमिल होते देख कर वन विभाग ने बाहर से "नर" बाघ को लाए जाने के एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है |
रिजर्व सूत्रों के मुताबिक फ़िलहाल अभ्यारणय में पांच - छः ही बाघिन हैं ,जिनकी उम्र आठ - नौ वर्ष की है | गत साल ट्रेपिंग कैमरे में एक बघ की छवि अंकित हुई थी ,मगर इसके बाद अन्य बाघों की तस्वीर कैमरे में कैद नहीं हो सकी ,जिससे बाघों की निश्चित संख्या के बारे में जब - तब विवाद होता रहा है कि पलाऊ रिजर्व में बाघ हैं भी या नहीं ! इस विषय में विगत पांच साल से लगातार भ्रम बना हुआ है |
यह भ्रम इसलिए भी है कि काफी अरसे से बाघों के शावकों को रिजर्व में नहीं देखा गया है | इसके अतिरिक्त देहरादून स्थित " वन्य प्राणी संरक्षण प्राधिकार " द्वारा गणना के वैज्ञानिक प्रविधि से पाए गए साक्ष्यों के आधार पर ही इसके अस्तित्व को मान्यता दिए जाने के नियम बना लिए हैं, इससे पलामू ब्याघ्र रिजर्व में बाघ - बाघिन के दावे के साथ मौजूदगी की सूचना पहले से ही संदिग्ध है |
फिलवक्त ,रिजर्व के अधिकारियों को थोड़ी राहत है कि एक बाघ की तस्वीर पिछले ग्यारह नवम्बर को कैद हो चुकी है , लेकिन इसे अब भी प्रयाप्त आधार माने जाने की स्थिति नहीं है | इससे रिजर्व कर्मियों की चिंता बढ़ गई है | इस चिंता को दूर करने के लिये कान्हा - रणथंभोर ब्याघ्र रिजर्व से नर बाघ को आयात करने पर इन दिनों गहन विचार मंथन का दौर चल रहा है |
पलामू बाघ परियोजना से पलामू ब्याघ्र रिजर्व में तब्दील इस अभ्यारणय में कभी गत सदी के अस्सी के दशक में बासठ तक बाघों के विचरण करने की सार्वजनिक सूचना दी जाती रही है , तब गणना के तरीकों में बाघों के पद -चाप ,मल - मूत्र और शिकार के बाद मिले जानवरों के कंकाल इसके आधार होते थे, लेकिन अब इसमें परिवर्तन करके मल - मूत्र के डीएनए जाँच रिपोर्ट एवं छाया चित्र  ही बाघों की वास्तविक संख्या का आधार  तय है | इससे सही -सही आंकड़े को लेकर इस रिजर्व के बारे में संशय की स्थिति बनी हुई है |
यह रिजर्व १०२६ वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है ,जिसमे ४१५ वर्ग किमी का इलाका  कोर क्षेत्र के रूप में अधिसूचित है | वैसे , एक बाघ अपने क्षेत्र में २४ वर्ग किलीमीटर में विचरण करता है ,जहाँ कोई दूसरा बाघ आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता ,केवल " प्रजनन " को लेकर ही नर - मादा के बीच मिलन होता है ,फिर शावकों के जन्म लेने के बाद नर बाघ अलग हो जाते हैं , मगर शावक अपनी माँ (मादा) बाघ के साथ जवान होने तक साथ रहते हैं ,फिर इनके कुदरती तौर पर विलगाव होता है | बाघों की औसत आयु १२- १५ वर्ष की होती है | ऐसे में पलामू ब्याघ्र रिजर्व में इनकी मौजूदगी को लेकर " भ्रम" होना स्वाभाविक है |

Friday, 15 June 2012

हटिया के हाट में आजसू के बढे भाव


                 ( एसके सहाय )
   झारखण्ड में हटिया विधान सभा के आये उप चुनाव परिणाम से यह जाहिर हुआ है कि राज्य में अब राष्टीय पार्टियों से लोगों का मोह भंग होने की स्थिति है ,इतना ही नहीं बल्कि परंपरागत झामुमो की भी हालात पूर्ववत है ,भी या नहीं ,इस पर भी संशय है ,जिसकी वजह इसका नेतृत्व वर्ग है ,जिसमे शिबू सोरेन एवं इनके पुत्र के प्रभाव का परीक्षण निकट भविष्य में होना निश्चित है | ऐसी हालात में इस उप चुनाव के नतीजे का खास महत्त्व है ,जिसमे एक साथ राजनीतिक स्थिरता और अस्थिरता के फैसले होने हैं |
          राज्य में , फिलवक्त के राजनीतिक माहौल में आजसू के भाव बढ़ना स्वाभाविक है ,आखिरकार झारखण्ड की सरकार के नेतृत्व करने वाली पार्टी भाजपा को इसने अपने बूते मात जो दी है | यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भाजपा को एक भी उल्लेखनीय जीत अबतक नसीब नहीं है ,जिसमे विशेषकर राज्य सभा में इसके प्रत्याशी एस एस अहलुवालिया की हार और अब हटिया में अपने ही सरकार के साथी पार्टी आजसू के उम्मीदवार नवीन जायसवाल के हाथों मिली मात ने भाजपा को भविष्य के सकेंत दिए हैं ,इसमें यदि गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुए ,तो तय मानिये भाजपा की "गिजना" होना ही है और इसका श्रेय मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा को ही जाता है | ऐसे में एक साथ कई सवाल मौजूदा परिप्रेक्ष्य में उठना  लाजिमी है |
         वैसे में , हटिया विधान सभा के राजनीतीक संदर्भ का "प्रतिमान " का अध्ययन जरूरी है | वह इसलिए कि चुनाव का परिदृश्य नितांत अराजक थे ,एक ही समूह के दो प्रतिद्न्दी आमने -सामने थे ,जिसमे एक के साथ झामुमो का परोक्ष साथ था ,तो दूसरे को यह गुमान था कि यह सीट उसी का है ,क्योंकि पूर्व में इसी क्षेत्र में महेश शारदा तीन दफे चुनाव जीत चुके थे और पुन; किस्मत आजमा रहे थे |ऐसे में भाजपा गफलत में थी कि वह आसानी से विजयी हो जायेगी ,मगर हुआ ठीक इसके विपरीत ,यह तीसरे स्थान पर आ गई और कांग्रेस के सुनील सहाय को मत पूछिए ,यह जनाब चौथे पर रहकर भी जमानत बचाने से चूक गए | यह हाल है ,हटिया विधान सभा के हाट का , जहाँ एक साथ राष्टीय पार्टी के गौरव से अभिभुषित भाजपा -कांग्रेस एक साथ चारों खाने चित हैं |
       अब जरा , हटिया क्षेत्र के पृष्ठभूमि पर , जहाँ कभी आज के केन्द्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय का एकछत्र राज था ,जो खुद १९७७ से इस सीट पर १९८९ तक काबिज रहे थे ,जिनसे बाद में भाजपा के महेश शारदा ने इनके वैक्तिक असर को कट दिया और भगवा से पूरे सीट को रंग दिए ,तब राम लहर का प्रभाव का योगदान ज्यादा था लेकिन अब राजनीतिक फिजां में वैसी बात नहीं रही ,तभी तो बाद के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर अपना दबदबा बन ली ,जो अब आजसू के तौर पर नये समीकरण की ओर इशारा कर दिया है ,इसमें इसके उम्मीदवार का करिश्मा कम और आजसू प्रमुख सुदेश महतो का ज्यादा रहा है ,जिसके बदौलत इसे जीत नसीब हुई |
         सुदेश महतो .राज्य में उप मुख्य मंत्री है और अपनी मौन राजनीती का विस्तार लेने में हमेशा अव्वल रहे हैं ,संयोग से हटिया रांची जिले के तहत ही है और सुदेश भी इसी जिले के वासी है और इनके क्षेत्र में "कुर्मी " जनित जातिगत प्रभाव दृष्टिगत है ,इसमें शहरी इलाकों में मतदान का प्रतिशत कम होने का लाभ आजसू को अनायास मिल गया हो तो ताज्जुब नहीं | ऐसे में कांग्रेस - भाजपा को यह प्रतीत होना कि वह आसानी से इसे जीत लेंगे दिवा स्वपन ही था | ऐसा सोचने के इनके पास पर्याप्त तर्क भी थे लेकिन वे भूल गए कि सामाजिक प्रक्रियाओं में हमेशा तर्क काम नहीं करते | अबतक जनता पार्टी , जनता दल( सुबोधकांत सहाय ) भाजपा (महेश शारदा) और कांग्रेस ( शाहदेव ) के राजनीतिक क्रियाविधियों का क्षेत्र हटिया रहा था ,जिसमे आजसू सेंध मारने में कामयाब हो गई ,तो इसके युगान्तकारी असर होना सत्ता के खेमों में स्वाभाविक है |
        ऐसे में , हटिया उप चुनाव के नतीजे राज्य की राजनीती में क्या गुल खिलाते हैं ,इसका राजनीतिक प्रेक्षकों को इंतजार है | यह इंतजार इसलिए भी है कि नतीजे में जो पार्टी दूसरे स्थान पर है ,वह झाविमो है ,जिसके प्रमुख पूर्ववर्ती मुख्य मंत्री बाबु लाल मरांडी हैं ,जो कभी भाजपा के सिरमौर ,झारखण्ड में थे | स्पष्ट है कि अब राज्य की राजनीती का जोर क्षेत्रीय पार्टियों की ओर है ,आजसू के जीत ने यही राह दिखाई है ,जिससे इनके भाव बढ़ने की उम्मीद राजनीतिक गलियारों में है और यह शुरू भी हो चूका है | कभी ,कांग्रेस का झाविमो के संग गलबहियां थी ,जो अब कडुआहट में बदल चुकी है और इसके पीछे पिछला राज्य सभा चुनाव की पृष्ठभूमि है ,ऐसे में नये समीकरण के तहत अगले विधान सभा के चुनाव तक इन क्षेत्रीय पार्टियों के बीच ध्रुवीकरण होते दिखे जाने का ही नजारा है |
          अब जब , निकट भविष्य में राज्य में कोई प्रतीकात्मक चुनाव नहीं हैं , ऐसे में हटिया के बाजार में आजसू के बढे भाव का मोल ही राजनीती की धुरी है ,जिसमे ज्यादा भाजपा और कांग्रेस को ही माता -पच्ची करना है | एक खुद सत्ता का प्रतिनिधिक शक्ति होते हुए हारी है तो दूसरा केन्द्रीय शक्ति सुबोध के भाई सुनील  सहाय खेत में जुत गए लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई , तब इन स्थितियों में इन दोनों पार्टियों के बीच अलग - अलग रूपों में सिर फुटौवल होना  ही है ,आख़िरकार इनकी शक्तियों के तार खुद के उम्मीदारों के पास नहीं थे , ये दोनों सिर्फ मोहरे भर थे ,जो चुनावी खेत रहे |
       हटिया के जीत का जश्न आजसू किस रूप में मानती है ,यह अभी देखना है , अब इसकी विधायकों की सदस्य संख्या पांच से बढ़कर छ हो गई है ,सो सत्ता के मलाई खाने में इसके दबाव की ताकत का इस्तेमाल आजसू प्रमुख किस तरह करते हैं ,यह जानना ,समझना और बुझना जरूरी है | राजनीति के बदलते स्वरूप ने अब दलगत शक्ति को नये सिरे से परिभाषित करने शुरू कर दिए हैं ,जिसमें एक उदाहरण राष्टीय तौर पर यह है कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ,केन्द्रीय राजनीती में संप्रग के साथ है लेकिन सरकार में प्रत्यक्ष - परोक्ष भागीदारी इनकी नहीं है और यह भागीदारी इसलिए नहीं है कि इनके पास मंत्री बने रहने एवं दबाव डालने की वह शक्ति नहीं ,जो कभी इनके पास लोक सभा में रहा करती थी | काफी कुछ इसी तरह के हालात झारखण्ड में हैं ,जिसमे हटिया ने आजसू  को नई ऊर्जा दी है और यह शक्ति अगर अपने पर उतार जाये तो राजनीती के नई रास्ते खुल सकते हैं ,जिसमे बाबु लाल मरांडी के साथ का अपना गुणात्मक असर होगा | ऐसे में भाजपा - कांग्रेस हासिये पर जाती दिखे ,तो आश्चर्य नहीं करनी चाहिए | आने वाले समय में राष्टीय पार्टियों का "सिकुडन" होना है ,क्षेत्रीय दलों में झाविमो  -आजसू के उभार के लक्षण हैं , झामुमो अपनी मौजूदगी तो दर्शाएगी ही लेकिन इसमें वह धार नहीं रहेगी ,जैसा कि सत्ता के बाहर और भीतर रहते इसके दिखे हैं | ऐसे में ,स्थानीय -क्षत्रिय जन विश्वास ही किसी भी पति को वह धार -शक्ति देगी ,जिसके अपने व्यक्तिगत प्रभाव भी इलाकाई स्तर पर होंगे ,फ़िलहाल तो यही सबक हटिया के हाट में आजसू के बढे भाव के हैं |
   



Monday, 21 May 2012

वन्य जीव संरक्षण की यह पहल


                   (एसके सहाय)
हाल में "ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्रोग्राम" (जीटीएपी)के कार्यशाला में यह बात रेखांकित होने के खास मायने है ,जिसमे कहा गया है कि भारत में विगत चार के दौरान बत्तीस बाघों की मौतें हुई है ,विशेष इसलिए कि मई २०१२ तक इसमें १४ बाघों के शिकारियों  के हाथों मारे जाने की रिपोर्ट भी शामिल है ,जो वाकई गंभीर और चिंता के विषय है .यह ब्रह्माण्ड के चराचर जीवों के प्रति मनुष्य के क्रूरता को प्रदशित करता है ,जबकि अब यह निर्विवाद रूप से सच है कि "मनुष्य और जानवरों के संघर्ष में हमेशा वन्य जीवन को ही नुक्सान उठाना पड़ता है" इसके बावजूद धरती पर मौजूदा वन्य प्राणियों के प्रति क्रूरता का भाव अब तक बना रहना खास चिंतनीय विषय बने हुए हैं | यह कार्यशाला पिछले १६-१७ मई को नई दिली के विज्ञान भवन में आयोजित थी ,जिसमे पूरे विश्व भर के देशों के प्रतिनिधिक वन्य प्राणियों की सुरक्षा में जुटे विशेषज्ञ उपस्थित थे |
             वन्य प्राणियों के बारें में फ़िलहाल भारत को ही देखें ,इसमें बताया गया है कि ३२ बाघों में मात्र १८ की मौत स्वाभाविक है ,याने बाकी दुर्घटनावश ,जिसमे शिकार भी एक प्रक्रिया है ,के वजह से इस कम होती प्रजाति के लिये खतरे से कम नहीं सिद्द हो रहे | इस कार्यशाला में यह तथ्य भी रेखांकित हुए कि वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवर्धन में नेपाल और रूस के बेहतर रिकार्ड है ,इसमें भी नेपाल में विगत तीन सालों में एक भी बाघ के नहीं मारे जाने की बात सामने है .जो इसके वन और वन्य जीव सुरक्षा के मामले में प्रतिबद्दता  को दर्शाती है ,जो प्रशंसनीय है | 
            वैसे ,भारत में बाघों के संरक्षण की दिशा में १९७२ में ही कदम बढ़ा दिए गए थे लेकिन वैज्ञानिक प्रविधि के अनुसरण में कोताही बरते जाने से इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले ,फिर भी, जो कदम उठाये जा रहे हैं ,उसमे अब पूरी तरह सजगता बरते जाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है | शुरूआती दौर में केवल १३ बाघ परियोजनाए क्रियान्वित थी ,जो अब बढ़ कर ४१ हो गई हैं और यह १७ राज्यों तक विस्तृत है ,इसमें तमिलनाडु के सथ्य्मंगालम और अंदर प्रदेश के कवल वन्य प्राणी अभ्यारण्य हाल में शामिल किये गए हैं |
           २००६ की गणना में १७०६ बाघों के पाए जाने की बात थी ,जिसमें उतरोतर वृद्दि की बातें सामने आई  हैं,लेकिन  २००८ में यह संख्या १४०० होने की बात सामने थी ,और अब यह तायदाद १७१० तक बताई गई है  इसलिए इसे  इसे ज्यादा उल्लेखनीय  माने जाने की तवज्जो में दर्ज नहीं है .यह इसलिए कि अवैध शिकार और व्यापार की आशंकाओं को पूरी तरह निर्मूल अर्थात रोक पाने में अब भी बाघ रिजर्व तैयार नहीं हो सके है ,यही कारण है कि जब - तब बाघों के मारे जाने की खबर आती रहती है | देश में कुल क्षेत्रफल का एक फीसदी भाग ही बाघों के लिये सुरक्षित है ,जिमें विस्तार की योजनाओं पर सरकार विचार कर रही है ,जैसा कि जी टी ए पी के उदघाटन के अवसर पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने संकेत दिए हैं |
        बाघ के संरक्षण और संवर्धन के अभियान में तेरह देश पूरी तरह सम्मिलित हैं ,जहाँ विश्व बैंक इन देशों में इन वन्य जीवों के लिये अपनी तरफ से वित्तीय मदद प्रदान कर रही है ,ऐसे में इस जानवर को विलुप्त होने से बचाने के लिये हर संभव पहल किये जाने की दरकार मनुष्य को है |यह मदद बैंक की २००८ से ही है और इसी के सौजन्य से पहला ग्लौबल टाइगर रिकोवरी प्लान की बैठक १० नवंबर २०१० को सेंट पीटर्सबर्ग में हुई थी और यह दूसरा कार्यशाला नई दिल्ली में संपन्न हुई है |इस बैठक में बाघों के बचाव ,संरक्षण एवं सुरक्षा के प्रति समर्पण भाव से कदम उठाये जाने पर बल दिए गए |  यहाँ यह भी उजागर हुआ कि जो बाघ पालतू हैं ,उसके भी जीवित रखने और इसमें प्रजनन क्षमता को बरकार रखने में मनुष्य कारगर नहीं है ,ऐसे में प्रकृति प्रदत आबो -हवा को इसके लिये इर्द - गिर्द बनाये  रखने पर मुख्य जोर दिए गए |
           फिलवक्त , विश्व में ५००० हज़ार पालतू बाघों के होने की बात कार्यशाला में उजागर हुई है ,जिसमें भारत का प्रदर्शन इसके रख -रखाव के बारे में काफी दयनीय है जिसे निचले सूची में अंकित किया गया है तथा जंगलों में विचरण करने वाले इस वन्य जीवों  की संख्या ३५०० बताई गई है ,जिसे २०२२ तक दुगुने अर्थात ७००० तक किये जाने का संकल्प लिया गया है | वैसे ,भारत में बाघों के लिये ५०००० वर्ग किलोमीटर का ही क्षेत्र अभी सुरक्षित है |

Sunday, 6 May 2012

अहसास सत्ता की


                        (एसके सहाय)
 स्थानीय सत्ता का ,क्या महत्त्व होता है ,इसकी अनुभूति कुछेक दिन पूर्व झारखण्ड के दौरे पर आये केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को हुई ,तभी तो उनके मुंह से अनायास निकला कि "वह अबतक देश में दो सरकारों के अस्तित्व को ही जानते थे लेकिन नहीं अब तीन सरकारें देश में हैं एक संघ ,दूसरा राज्य ओर तीसरा जंगल की सरकार , जिनके बिना कोई भी योजना क्रियांवित होना मुश्किल है |" यह बात जयराम ने लातेहार में पिछले तीस अप्रैल को दौरे करने के बाद रांची में पत्रकारों के समक्ष कही | साफ है कि योजना ,जिस किसी भी सरकार की हो ,उसका उग्रवाद प्रभावित राज्य ,इलाके में तभी क्रियान्वयन संभव है ,जब भूमिगत संघटन इसके लिये मंजूरी देते हों और  यह मंजूरी उसी उग्रवादी संघटन को मिलती है ,जिसमे ठेकेदार कंपनियों के प्रबंधन माओवादी सहित अन्य क्षेत्रीय प्रतिबंधित एवं सक्रीय उग्रवादियों से निर्माण कार्य के लिये अनुमति अपने बूते हासिल किये हो | खुद ,रमेश ने माना है कि राज्य में नौ सडकों का निर्माण इसलिए नहीं शुरू हो सका है कि उग्रवादी इसे बनने नहीं देना चाहते और यह सभी मार्ग उग्रवाद ग्रस्त क्षेत्रों में ही बनना है ,फिर इसे आसानी से कैसे बनाया जा सकता है ,यह केंद्र और राज्य साकार के लिये भारी सिरदर्द है |
        अतएव , अब जब मुख्य मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह राष्टीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के मौजूदा स्वरूप से तारतम्य जोड़ने और तादात्म्य सबंध स्थापित करने की बात ,राज्यों की सरकार से कहते हैं ,तब विरोध कैसा ? यह इसलिए कि देश की अंदरूनी हालात में एक साथ बाहरी और भीतरी संकट व्याप्त है , जिसमे बढती हिंसा के खतरे कम होने के असर दीखते नहीं ,तब इसका सामना और खात्मा कैसे किया जाये ,यह यक्ष प्रश्न वर्त्तमान व्यवस्था के समक्ष गंभीर रूप में उपस्थित है ,जिससे इंकार नहीं किया जा सकता |
       वैसे , कल याने छ मई को नई दिल्ली में  एन सी टी सी पर ,जो कुछ भी विचार राज्यों के मुख्य मंत्रियों की ओर से प्रकट किये गए ,उसमे आतंकवाद की गंभीरता को तो प्राय: सभी ने स्वीकार किया है ,जो यथार्थ में इसकी उपयोगिता के महत्त्व को रेखांकित किया है ,तब विरोध के स्वर कैसा ? यही बात को यहाँ समझने का प्रयास है | प्रस्तावित केंद्र के बारे में गृह मंत्री पी चिंदबरम ने भी काफी सफाई दी है ,लेकिन इसे विपक्ष के मुख्य मंत्रियों ने मानने से इंकार कर दिया है ,जिसमें पहले के केन्द्रीय सरकार की तरफ से उठाये गए कदम है ,जो संशय पैदा करते हैं | ऐसे में इस विषय पर सर्वानुमति हों कठिन है और विचार - विमर्श का यह दौर लंबा चलने की मांग भीं करता है ,वह इसलिए कि एन सी टी सी पर अबतक कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने अपने मुंह सी लिये हैं और इसकी वजह अम्मा सोनिया गाँधी के नाराजगी का डर समझा गया है ,ऐसे में गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने ही विस्तार से इसके खामियों और दुरूपयोग की ओर ध्यान खिंचा है ,जिसमे ओडिसा के नवीन पटनायक ,बंगाल के ममता बनर्जी ,बिहार के नीतीश कुमार ,गुजरात के नरेन्द्र मोदी ,तमिलनाडु के जयललिता ,झारखण्ड के अर्जुन मुंडा ,मतलब कि अबतक बारह राज्यों ने इसके इस्तेमाल पर शक जाहिर करते हुए ,इसमें राज्यों की सहभागिता को केंद्र के बराबर ही आतंकवाद को लेकर "कार्यबल"
 संचालित होने पर जोर दिया है ,ताकि केन्द्रीय सरकार इसके मनमाना इस्तेमाल राज्यों के विधि सम्मत अधिकारों को कुचल नहीं सके ,ऐसा इसलिए कि कानून -व्यवस्था के विषय संवैधानिक रूप से राज्यों के क्षेत्राधिकार में आते है ,जो यह एक मजबूत तर्क भी है , वैसे भी देखा गया है कि क्रिया -प्रतिक्रिया में भी केंद्र -राज्यों के कदम एक -दूसरे के विपरीत उठते रहे हैं ,जैसे -टाडा,फिर पोटा जैसे अधिनियम का इस्तेमाल प्रतिक्रियात्मक स्वरूप में अर्थात कांग्रेस और गैर कांग्रेस केन्द्रीय  सरकारों के काल में हुआ है ,ऐसे में गैर शासित कांग्रेस के मुख्य मंत्रियों का यह मानना कि इसके बहाने राज्यों के मामले में केंद्र की दखलंदाजी बढ़ाने की यह सुनियोजित चाल है ,काफी हद तक राजनीतिक तौर पर उचित ही मालूम पड़ती है |
        ऐसे में .जयराम सरीखे केन्द्रीय मंत्रियों के अनुभव का लाभ संघ सरकार को लेना चाहिए ,जिन्होंने बेबाक तरीके से स्वीकार किया कि उग्रवाद प्रभावित राज्यों में स्थानीय विकास में स्थानीय सरकार अर्थात उग्रवाद को तभी नेस्तनाबूद किया जा सकता है ,जब सामाजिक,शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर विकासगत योजनाओं का व्यापक तौर पर क्रियान्वयन होगा और इन्होने स्वय लातेहार में ४३१ करोड रूपये की आधारशिला रखी , भले ही इन्होने सुरक्षा के साये में ही अपनी कार्य योजना को मूर्त रूप देने की पहल की हो लेकिन खुद बाइक से चाल कर दुर्गम क्षेत्रों में जाकर निर्माणात्मक गत्रिविधियों को गति देना .कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता | जंगल की सरकार का अस्तित्व तभी तक है ,जब तक सरकार से निरीह ग्रामीण या लोग उपेक्षित हैं ,मगर जैसे ही केंद्र या राज्य की सरकार कल्याणकारी स्वरूपों में हाथ बढाती  है तब , इनमें स्वत: स्फूर्त "सिरचन" की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ,तब लोग ही जंगल सरकार के खिलाफत में उठ खड़े होने के लिये तैयार होंगे और फिर किसी एन सी टी सी की जरूरत नहीं रह जायगी |
       जयराम रमेश का यह कदम अपनी ही सरकार की सोच से एकदम उलट है , केवल विधि -व्यवस्था ही शांति स्थापित करने में पहल नहीं करती ,बल्कि विकासगत योजनाएं भी आतंकवाद को सिरे से नकार सकने की क्षमता रखती है | अभी के दलगत सरकारों के अस्तित्व में आसानी से कोई भी सार्थक पहल ,तब तक कामयाब नहीं हो सकती ,जबतक केंद्र  अपने आचरण से खुद को नेक आचरण और काम  करने वाले के तौर पर प्रदर्शित नहीं नहीं करती | फिलवक्त तो संदेह का ही डेरा राष्टीय राजनीती में है ,फिर इसके छाया से आसानी से निकलना तो थोडा मुश्किल है |
    आतंकवाद ,देश को अंदर से खोखला कर रहा है ,इससे इंकार नहीं किया जा सकता ,मगर जिस तरह कांग्रेस सरकार का राष्टीय राजनीती में व्यवहार रहा है ,वही इसके विरोध का मुख्य कारण है ,जो मनमोहन सिंह की सरकार समझ पाने में असमर्थ है | गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य  मंत्रियों के दिए गए विचार स्पष्ट सन्देश दे रहे हैं कि उनको एन सी टी सी से उतना विरोध नहीं है ,जितना इसके दुरूपयोग होने से संशकित है | आखिर आतनकवाद  इनको भी तो खतरा के तौर पर मौजूद है और यह  छिपा सन्देश पढ़ पाने में केंद्र सरकार  भी सक्षम नहीं है ,अन्यथा सहमति नहीं बनने की क्या वजह हो सकती है | केवल राजनीतिक तिकडम से तो सहमति बनती नहीं |


Friday, 4 May 2012

स्थायित्व की खोज में भाजपा की हार


               (एसके सहाय)
 झारखण्ड में राज्य सभा चुनाव के नतीजे विशेष कुतूहल पैदा नहीं करते ,जहाँ केवल "सत्ता" में बने रहने की कला को ही राजनीती का अंतिम ठौर मान लिया गया हो ,वहां तो सरकार के नेतृत्वकारी शक्ति को हारना ही पड़ता है और ऐसा ही खेल इस बार के चुनाव में दिखा है ,जहाँ भाजपानीत सरकार में शामिल मुख्य घटक ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं किये और किये भी तो केवल दिखावटी ही ,जिसमें सत्ता किसी दूसरे के हाथों में हस्तगत नहीं हो जाये ,इस डर से अपनी भद्द पिटवा लेने में ही भलाई समझी ताकि सत्ता की मलाई खाने में दिक्कत नहीं  हो सके काफी कुछ ऐसा ही नज़ारा इस चुनाव के दरम्यान परिलक्षित हुआ |
           वैसे , भाजपा की इस हार में इसके सरकार के स्थायित्व का संकट छिपा है ,जो अब शनै - शनै प्रकट होगा और मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा समझ रहे होंगे कि उन्होंने अपनी गद्दी बचा ली है तो यह उनका ख्याली पुलाव ही साबित होने जा रहा है | सरकार के स्थायित्व को लेकर भाजपा शुरू से ही संशकित है और इस वजह से ही राज्य में चहुंओर अराजकता का प्रभाव दिक्दर्शित  है बल्कि यूँ कहिये कि प्रशासनिक स्थिति लुंज -पुंज हालात में वैसी ही है ,जैसी मधु कोड़ा के राज में थे ,फिर इस वर्त्तमान सरकार के औचित्य का क्या अर्थ ,जो एक भी जन समस्या को हल ढूढने में कामयाब नहीं हो सके अर्थात अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी झारखण्ड मुलभुत संकट यथा बिजली ,पानी ,सड़क ,चिकित्सा ,शिक्षा के साथ ही कानून व व्यवस्था के लिये झूझ रहा हो , ऐसे में सरकार का नेतृत्व करके भी भाजपा को कोई खास फायदा होती प्रतीत नहीं होती ,बल्कि विपक्ष में ही अपनी सशक्त भूमिका को दमदार बनाते हुए सत्ता में बहुमत पाने के लिये संघर्ष करती तो वह ज्यादा बेहतर होता |
         बहरहाल , भाजपा के उम्मीदवार एस एस अहलुवालिया ,मात खा चुके है और कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू एवं झामुमो के संजीव कुमार राज्य सभा में पहुंच कर झारखण्ड के लिये कौन सा लाभकारी योजना केंद्र से यहाँ ला सकते हैं ,यह देखना बाकी है
 फिलवक्त के राजनीतिक माहौल में इस चुनाव में झाविमो ( प्रजातान्त्रिक) की घोषित नीति ने आस जगाई है ,जिसने शुरू से ही वोट नहीं करने का फैसला कर रखा था और यह पूरी तरह से कार्यान्वित भी हुआ मगर सौधान्तिक परिप्रेक्ष्य में यह कदम लोकतंत्र के विपरीत हो सकती है लेकिन ,जो हालात झारखण्ड में उत्पन्न है ,उसमे घोषित नीति पर अटल रहना आज के राजनीती वातावरण में अलग ही नीति धार  थोडा हटकर अन्यों की तुलना में दे जाता है ,जिसमे इसके प्रमुख बाबु लाल मरांडी अभी सफल हैं |चुनाव के  येन बेला पर ऐसा  कभी दिखा नहीं कि वह भाजपा की प्रतिक्रिया में आकार कांग्रेस को वोट करने के लिये तैयार है ,जैसा कि रद्द हुए गत चुनाव में भाजपा ने अंतिम समय में झामुमो के पक्ष में मतदान कर अपनी प्रतिक्रियात्मक वोट यह करके डाल दी थी .कि उसके विरोधी प्रत्याशी के जीत नहीं हो, इसके लिये मतदान किये गए |
             इस राज्य सभा के चुनाव में उम्मीदवारों के प्राप्त हुए वोट भी कई आशंकाओं को जन्म दिया है और यह आशंका इस बात के संकेत हैं कि आने वाला समय राजनीतिक झंझावतों को अपने में लिये हुए है ,जिसका एक सिरा कांग्रेस के हाथों में है ,तो दूसरा झामुमो के पास है |यह आशंका इस बात से उपजी है कि प्राप्त वोटों के विश्लेषण में बलमुचू को सर्वाधिक २५ मत मिले और संजीव को २३ तथा अहलुवालिया को २० अर्थात निर्दलीय के सभी सात वोट कांग्रेस को मिले ,जब कि विदेश सिंह और चमरा लिंडा जैसे विधायकों का समर्थन मौजूदा सरकार को प्राप्त रहा है ,यही नहीं ,इन दोनों विधायकों ने झामुमो के प्रत्याशी का भी प्रस्तावक बन कर सामने आये थे ,ऐसे में क्या  बात हो गई कि दोनों एक साथ प्रतिपक्ष  के लिये वोट कर दिए ,जब कि इन दोनों के गृह जिले में मनमाफिक अफसरों की पद स्थापना -तबादले -योजनागत विकास के मामले में खुली छूट अर्जुन मुंडा ने अपनी सरकार के स्थायित्व बरक़रार रखने के लिये दे दी थी |
         ताज्जुब इस बात का है कि जेलों में भ्रष्टाचार को लेकर कैद विधायक एनोस एक्का ,हरिनारायण और सांसद मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा ने भी कांग्रेस का साथ दिया ,जबकि इनको इस हाल में पहुँचाने में कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार का ही मुख्य हाथ है ,इनके मतदान की संकल्पना अब रहस्य का रूप ले चुकी है ,ऐसे में अर्जुन मुंडा की सरकार को हारने के बाद भी सकून नहीं मिलने वाला है और राज्य एक बार फिर निकट भविष्य में अस्थिरता के दौर में आने के लिये अपने को तैयार कर रहा |
         ऐसे में , राज्य के प्रमुख  राजनीतिक नेताओं के प्रवृति पर नज़र डालना जरूरी है ताकि भविष्य में होने वाले खेल को सहज ढंग से समझा जा सके | पहली बात कि अर्जुन मुंडा को पार्टी से ज्यादा खुद की चिंता इस रूप में जाहिर है कि सरकार रहे तो उसके मुखिया वह रहें और सरकार बचाने के लिये ही सारे उपक्रम अहलुवालिया को ठिकाने लगाने में किये अन्यथा वह चाहते तो भाजपा प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करवा देने में सक्षम थे ,इनके लिये निर्दलियों को अपनी तरफ मोडना खास बात नहीं था ,इनकी पृष्ठभूमि भी कोई खास नैतिकता से भरा रहा है ,वह इसलिए कि आज भी अपने हाथों के जरीये भद्दे मजाक का त्रिकोण बनाने और अंगूठा दिखाने जैसे प्रदर्शन करते रहे हैं ,जो इनकी मानसिकता को बयां करने के लिये काफी है | झामुमो की जीत में अपनी सरकार की सुरक्षा की तलाश में वह शुरू से थे ,जिसमे वह आजसू को मोहरा के रूप में इस्तेमाल अपने आलाकमान के सामने किया और आजसू नेता एवं उप मुख्य मंत्री सुदेश महतो ने अपनी गोल -मोल बातों से एक तरफ भाजपा तो दूसरी तरफ झामुमो को साध कर रणनीतिक तौर पर कांग्रेस को इशारा कर दिए कि उसे भाजपा से किसी तरह के मोह -माया नहीं है | इसी को ध्यान में रख कर कांग्रेस ने निर्दलीय विधायकों को सत्ता में आने के भरोसा दिलाकर इनकी वोट हासिल किये ,जिसमे राजद के पास कांग्रेस को छोड़ कर अन्य को वोट दने का विकल्प ही नहीं था ,तब कामयाबी मिलती कैसे नहीं |

       दरअसल ,भाजपा का संकट बढ़ गया है ,अपनी हार से वह खुद की नज़र में गिरा ही ,साथ में कोई साफ सन्देश भी लोगों को नहीं दे पाया कि वह क्या चाहती है ? पूर्व में अंशुमान मिश्र प्रकरण तजा था , आरके अग्रवाल जनित भ्रष्टाचार के मामले सामने आ  चुके थे ,ऐसे में सत्ता के साझेदार दलों के बीच मतैक्य नहीं हो पाना ही इसके लिये सिरदर्द साबित होंगे ,ऐसे आसार अब दिखने को है | झामुमो को केवल अपनी शर्तों पर सत्ता चाहिए और इसके लिये ,जो भी तैयार है ,वह मुंडा को किनारे लगाने में जरा भी देर नहीं करेगी | आखिर सर्वाधिक वोट जो कांग्रेस को मिले हैं |कठिनाई है तो झाविमो को लेकर ,जो कतई झामुमो के साथ सरकार बनाने की ओर उन्मुख नहीं  होगी | ऐसे में मौजूदा सरकार हिलते - डुलते ही रहेगी ,जो इसके स्थायित्व के लिये अभिशप्त जैसा ही है |

Monday, 23 April 2012

पैसे का खेल बना राज्य सभा चुनाव


                  (एसके सहाय)
          कांग्रेस के विधायक चंद्रशेखर दुबे ने यह खुलासा कर झारखण्ड की राजनीतिक हल्कों में विस्फोट कर दिया है कि पिछले राज्य सभा चुनाव (२०१०) में खुद उनकी ही पार्टी के प्रत्याशी धीरज प्रसाद साहू ने उनसे और अन्य कांग्रेस के विधायकों को २५ -२५ लाख रूपये दिए जाने की पहल की थी ,जिसमें उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया था | यह बात दुबे ने ऐसे समय की है ,जब अगले तीन मई  को उच्च सदन  के लिये मतदान होना है | साथ ही ,केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की एक विशेष दल इन दिनों राज्य सभा चुनाव में हुए भ्रष्टाचार  के बाबत दर्ज प्राथमिकी के तहत जाँच -पड़ताल में जुटी है और इस सिलसिले में तीन विधायकों के आवासों पर छापामारी करके सबूत इकठ्ठा करने के प्रयास में भिडी है | ये तीन विधायक तीन अलग - अलग पार्टियों के हैं ,जिनके नाम कृष्णानंद त्रिपाठी (कांग्रेस),बिष्णु भैया (झामुमो) और सुरेश पासवान (राजद) हैं |
         इन तीनों विधायकों के यहाँ सीबीआई का दबिश होने का मतलब काफी साफ है ,जहाँ धुंआ होगी ,वहीँ आग होगी ,वाली तर्क के अंतर्गत ही यह छपा है ,जिसमे तस्वीर स्पष्ट है कि राज्य सभा के चुनाव में बराबर पैसों का खेल झारखण्ड में होता रहा है और इस बार ऐसा होगा ,इसकी कोई गारंटी भी नहीं है | ऐसे में , दुबे के खुलासे के मद्देनज़र यह मानना सही होगा कि कार्यकर्त्ता ,विचारधारा और निष्ठां विहीन हो गई है ,चुनाव प्रणाली , जिसमे तिकडम और धन का ही महत्त्व है ,जो दलगत राजनीती के मूलाधार के विपरीत है |ऐसे में ,एक बार फिर अधिक खर्च करने वाले प्रत्याशी राज्य सभा में चुनकर चले जाएँ ,तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए |
        वैसे दुबे की बात के अपने अर्थ हैं ,जिसमे उनकी राजनीती का साया है ,जिसमे एक कोण विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह हैं ,जिनसे मजदुर राजनीती में इनके छतीस के आकडें हैं | साथ ही ,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू का राजेंद्र सिंह से गलबहियां करके अपने लिये वोटों का जुगाड करने के प्रयास को दुबे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? कभी .दुबे ने यह कहकर राज्य की राजनीती में बवाल खड़ा कर दिया था कि "आदिवासी" मुख्य मंत्री के स्थान पर गैर जन जातीय मुख्य मंत्री के होने से ही झारखण्ड का विकास होगा | फिलवक्त ,धीरज साहू ने यह कह कर अपना बचाव किया है कि "वह कैसे अपने पार्टी विधायकों को वोट के लिये पैसे का निमंत्रण दे सकते हैं ,क्योंकि उनके ही दल से तो वह उम्मीदवार थे |"
        इन आरोप और सफाई के बीच सच क्या है ,इसमें ज्यादा सिर खपाने की जरूरत नहीं है |यह बराबर से पैसे का खेल राज्य सभा के चुनाव में होता रहा है ,जिसमे पार्टियां "मालदार" को ही अपना उम्मीदवार  बनाती रही है और इनके लिये आसान रास्ते विधान सभा का वह चेहरा है ,जहां किसी दल के पास विगत बारह सालों में स्पष्ट बहुमत का अभाव रहा है |ऐसे में ,बाहरी चेहरे अपनी साम-दण्ड-भेद और अर्थ से हमेशा झारखण्ड में प्रभावी रहे हैं |हाल में .अंशुमान मिश्र के उम्मीदवारी को देखें ,जो भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी के आशिर्बाद से राज्य सभा के लिये नामाकन  कर दिए ,जिसमे पार्टी के ही विधायक उसके प्रस्तावक् बने लेकिन इनको लेकर  दल में जो . विवाद हुआ , उसके बाद वह नामाकन वापस लिये .लेकिन तबतक भाजपा की भद्द पीट चुकी थी ,बिना घोषित प्रत्याशी के मिश्र आखिर किसके बूते अपने को भाजपा प्रत्याशी कह रहे थे ?
       यह तो ,दो करोड १५ लाख रूपये के बरामद होना था कि चुनाव रद्द होने के पर्याप्त वजह बन गए और इसमें आरके अग्रवाल छना गए .नहीं तो दुबारा चुनाव होने की नौबत ही नहीं आती | अब जब सीबीआई चुनाव में भ्रष्टाचार के मामले की तहकीकात कर रही है ,तब कई खुलासे होना अभी बाकी है |
        अतएव , केवल तीन विधायक ही नहीं ,बल्कि दो दर्ज़न से अधिक विधायक सीबीआई के जद में आ चुके है और इसमें दलिये विधायकों के अतिरिक्त निर्दलीय विधायक भी शामिल है ,जिनपर जाँच का कड़ा जल्द गिरने वाला है ,इंतज़ार इस बात का है कि "साक्ष्य" की खोज में कई टीम जहाँ - तहां प्रत्यनशील है और इसमें काफी हद तक टुकड़े - टुकड़े में कामयाबी भी मिलती जा रही है ,देर केवल इनके बीच कड़ी जोड़ने में आ रही परेशानी का है ,जिसे वैज्ञानिक जाँच प्रविधि से क्रमबद्ध किया जा रहा है |
         अगले तीन मई को होने वाले चुनाव में सत्तापक्ष से दो उम्मीदवार और एक विपक्ष से है . इसमें एस एस अहलुवालिया (भाजपा), संजीव कुमार (झामुमो) और कांग्रेस से प्रदीप बलमुचू के भाग्य का फैसला होने वाला है |इस चुनाव में कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी झाविमो ने अपने को अलग रहने की घोषणा कर रखी है अर्थात इसके विधायक राज्य सभा के चुनाव में किसी के लिये मतदान नहीं करेंगे |ऐसे में यह चुनाव काफी दिलचस्प मोड पर आ गया प्रतीत है | राज्य सभा के रद्द हुए चुनाव में भी संजीव व बलमुचू प्रत्याशी थे ,इनमें अहलुवालिया भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर है ,जो पहले भी राज्य का प्रतिनिधित्व उच्च सदन में कर चुके है | यह किस हालात में पुन: चुनाव के लिये खड़े हुए ,इसकी एक अलग ही कहानी है |
           इन स्थितियों से प्रकट है कि झारखण्ड में बिना "धनबल" के चुनाव जितना कितना दुष्कर है ,जहाँ पार्टीगत उम्मीदवारी पर पैसे की चाहत हो ,निर्दलीय हैं तो भाग्य का छींका टुटा जैसे हालात हो , दलगत नेताओं -कार्यकर्त्ताओं का महत्त्व सिर्फ पैसे से नापी -खरीदी और आकलन की जाती हो , वैसे में ईमानदारी से चुनाव एक दुरूह सा होना स्वाभाविक है | आप मेरे पार्टी के हैं और उम्मीदवार भी है ,अच्छी बात है लेकिन जब जीत कर जायेंगे ,तब मेरे लिये क्या करेंगे ? ऐसी मनोभावना के बीच कार्यकर्त्ता बना राजनीतिज्ञ उम्मीदार से वोटों के बदले पैसे की मांग करता है ,तब पार्टी कहाँ ठहरती है ,जितने के बाद अक्सर विधायक -सांसद अपने कार्यकर्त्ता को भूल जाते हैं और यहीं से तात्कालिक लाभ की बातें शुरू होती है ,जो प्राय: हार पार्टी में रोग बन गया  है ,तो दलगत राजनीती का मरते जाना ही है अर्थात दल गिरोह में तब्दील हैं ,तब कैसे बिना पैसे के समाज सेवा करने के ठेकेदार आप  हो सकते हैं ?
        यह हालात केवल झारखण्ड भर की नहीं है ,राज्य सभा के सदस्यों के जीवनवृत को देखें ,इसमें कितने "जन्संघर्ष" से निकल कर पहुंचे हैं ? धीर -गंभीर सदन के रूप में चिन्हित यह राज्य सभा अब निकृष्ट तत्वों के जमावड़े के रूप में ही समझा जाता है |इनके अधिकांश सदस्यों को राष्टीय - अंतराष्टीय समझ का अभाव है .लोक चरित्र को भी आत्मसात करने में इनको दिक्कतें आती हैं , ऐसे ही परिस्थिति में अराजक तत्व देश के भाग्य विधाता बन जाते है ,तब जन -समस्या पर विचार और हल के तरीके कैसे  मूर्त रूप लेंगे ?  घूसखोरी में जो पकड़ा गए ,वह चोर और जो पकड़ में नहीं आया ,वह भ्रष्ट नहीं ,ऐसा मानना गलत होगा |
         इसलिए दुबे के बातों का एकतरफा अर्थ नहीं है ,वह स्वय भी एक संदेह से भरे जन प्रतिनिधि रहे हैं ,फिर भी जो खुलासे उन्होंने जाने या अनजाने में कर दिए हैं वह तो चिंता प्रकट करती है और इसे नज़रंदाज भी नहीं किया जा सकता | मबेलो ,नाथवानी ,केडी जैसे राज्य सभा के उम्मीदवार बन चुके और रह चुके सदस्य के बीच का राजनीतिक चरित्र का स्तर कैसा है ,यह सर्व विदित है और यह जानकर दलीय नेता -कार्यकर्त्ता कुंठा ग्रस्त होते दिखे तो यह लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगने का औचित्य एक बार फिर जन मानस को झकझोरे ,तब ताज्जुब नहीं !
  
        

विश्व राजनय में अग्नि बाण का प्रभाव


              (एसके सहाय)
        अग्नि -पांच के प्रक्षेपण से भारत की विश्व राजनीती में भूमिका को अब ज्यादा तरजीह दिए जाने की संभावना के मध्य यह स्पष्ट हो गया है कि "शत्रु देश" बातचीत के जरीये उलझे तार को सुलझाने की बात करने पर विवश हैं | मौजूदा अंतराष्टीय परिदृश्य में आर्थिक शक्ति और सामरिक ताकत ही वह सूत्र है ,जो किसी राशि -राज्य के संप्रभुता की गारंटी हो सकती है और यदि ऐसा नहीं है ,तब वह देश आर्थिक  गिरवी के भरोसे अपने किस्मत को चमकाने के झूठे भंवर में डोलते रहने को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानने की भूल कर जाता है |ऐसे ही दो पड़ोसियों के बीच ,भारत की विदेश राजनय के परीक्षण होने वाले हैं ,सो इस प्रेक्षपास्त्र प्रविधि का महत्व दक्षिण पूर्व एशिया के अलावे पूरे दुनिया के लिये है ,यह इसलिए कि अब संसार खुले तौर पर परमाण्विक शक्ति पर ज्यादा निर्भर होने की प्रक्रिया में है ,ऐसे में बदलते राजनय के बीच "हम" कहाँ हैं , की उपयोगिता का अर्थ यही अग्निवर्षा रेखांकित करेगी | ऐसा अबतक के प्रतिक्रिया से जाहिर हुआ है |
     इन परिप्रेक्ष्यों पर विचार करने के पहले सार - संक्षेप में यह जाने कि आजादी के बाद भारत असंलग्न अर्थात गुटनिरपेक्षता की नीति का अवलंबन किये रहा लेकिन १९५५ के बाद थोडा राष्ट हित के लिये सोवियत संघ से अधिक बंधा रहा ,जिसकी कई बार दूसरे देशों ने ,विशेष कर अमरीकी और पाश्चात्य देशों ने कटु आलोचना की | फिर भी अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर किसी खास देश या देश समूह के गुट को हावी नहीं देने के लिये भारतीय राजनय कटिबद्द रही | अब जब ,१९९१ में सोवियत संघ के टूट जाने और बिखर जाने के पश्चाताप यह वैश्विक राजनीती में एक ध्रुवीयता (संयुक्त राज्य अमेरिका )के युग से निकलने की ओर देशों में होड है ,वैसे समय में मिसाइल की यह चमक कैसे भारत को दुनिया में प्रतिष्ठित करेगा ,यह जानना ज्यादा समीचीन है | यह इसलिए भी कि जब पांच हज़ार किमी के लक्ष्य को यह भेदा ,तब पाकिस्तान चुप्पी साधे रहा लेकिन चीन की मीडिया में हलचल रही और वहां के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिउ वेमिन ने कहा कि " भारत और चीन सहयोगी हैं ,यधपि भरत के इस प्रक्षेपण से इस क्षेत्र में हथियारों की दौड़ का एक और नया दौर शुरू हो सकता है |चीन ने भारत के इस प्रक्षेपास्त्र के प्रक्षेपण को गंभीरता से लिया है |"
        इन दो देशों के इत्तर देशों में इसे लेकर सामान्य प्रतिक्रिया रही ,जिसमे नाटो ,अमरीका ,यूरोप के देश ,अरब देशों का कोई खास नागवार लगने वाली बातें सामने नहीं आई ,जो भी प्रकट हुआ ,उसमें  चीन और पाक का ही महत्त्व था ,जो फ़िलहाल गंभीर मीमांसा के लिये है | हाँ ,इसमें यह बात  एक चीनी वैज्ञानिक ने किया है ,जिसने कहा है कि भारत के छोड़े मिसाइल पांच नहीं बल्कि आठ हज़ार किमी के लक्ष्य भेदन का है ,जिसे भारत ने छुपा कर "नपी -तुली" शब्दों में घोषणा की है ,ताकि यह अपने मित्र देशों से नाराजगी मोल नहीं ले सके |
        वैसे , अग्नि पांच का अंतराष्टीय राजनय में अपना महत्त्व है, परिवर्तित विश्व में अब अमेरिका ,भारत मुखापेक्षी है , चीन ,उसके लिये बाज़ार हो सकता है लेकिन लोकतंत्र और विश्वास के लिये उसे भारत को साथ देने ही पड़ेंगे | राजनय के तथाकथित लोकतान्त्रिक स्वरूप काम हो जाने के बाद भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है | इस सन्दर्भ में हांस मर्गेन्थाऊ अपने लिखित पुस्तक "परमानेंट वैलू इन द ओल्ड डिप्लोमेसी के पृष्ठ संख्या १०- २० में कहते हैं -" यह युक्ति गलत है कि लोकतंत्र से शक्ति सुनिश्चित हो जाती है ओर पुरानी राजनय अनैतिक और अ -लोकतान्त्रिक है | यह रूख विदेश नीति का स्वतंत्र क्षेत्र होने के विचार का ही विरोधी है |" इसलिए साफ है कि - भारत के लिये अपने विदेश राजनय के रास्ते में लोकतंत्र , कुलीनतंत्र ,तानाशाही .एकाधिकारवाद या कोई भी वाद के स्वरूप में देश हो ,मामला केवल राष्ट हित  ही इनमे सबंध स्थापित कर सकने वाली प्रक्रिया हो सकती है ,इसलिए अमरीका अभी साथ है तो कल विरोधी भी हो सकता है |पूर्व के अनुभव सामने हैं |
           इस मिसाइल परीक्षण का महत्व अतीत कल से जुड़ा है ,जो अब भी प्रासंगिक है ,१९५५ से पहले के दस वर्षों में तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषताएं सामने आई थी - अंतराष्टीय राजनीती की द्विध्रुवीयता , इस द्विध्रुवीयता की एक -दो गुट निकाय में परिवर्तित की प्रवृति और परिरोधन की नीति | उस काल में अमरीका और सोवियत  संघ में ही विश्व की शक्ति निहित थी और ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन जैसी अन्य शक्तियों  को राजनीतिक ,सैनिक और आर्थिक मामलों में किसी एक प्रधान शक्ति का सहारा लेना पड़ता था और "आज" भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही है ,पाक, चीन, भारत ,जापान ,अफ़्रीकी देश या ने कोई भी ब्राजील सरीखें देश हो .अमरीका या अन्य इनसे कमत्तर देशो की शरण लेना ही है , इस परीक्षण के बाद भी यही हाल भारत के रहने वाले हैं | फिर सवाल है कि "अग्नि पांच के परीक्षण के लाभ क्या ?"
               इस समझने के लिये सोवियत संघ के विघटन का इतिहास से शुरू करें ,जो अरब जगत में लोकतंत्र के प्रति लालसा , अरसे से सत्ता पर काबिज शक्तियों के खात्मे का होना जैसी प्रक्रिया हाल में दृश्यमान  हैं |इसी तरह ,जर्मनी -जापान का महान शक्ति तो नहीं लेकिन महाशक्ति बन जाने और परमाणु शक्ति के बहुत सारे राष्टों में फ़ैल जाने से शक्ति उन्मुखीकरण के राजनय में तब्दिली लाने में मददगार हुई है |तब भारत को इस परीक्षण से खुद तय रास्ते में चलने में सहायता मिलेगी ही ,विश्व राजनय का इतिहास तो ऐसा ही कहता है |
            मौजूदा दुनिया में विदेश नीति और राजनय के बीच सामरिक ताकत का ही पराक्रम अंतराष्टीय राजनीती में चलता है |वजह यह कि सब देशों के परस्पर कुछ न कुछ रिश्ते होते हैं ,चाहे वह कितने दुरी पर हों ,प्रत्येक देश का व्यवहार किसी न किसी रूप में अन्य देश पर प्रभाव डालता ही है ,चाहे वो मित्र हो या शत्रु देश और इसी परिप्रेक्ष्य में प्रतिकूल प्रभाव को न्यूनतम करने और अनुकूल प्रभाव को अधिकतम करने का अवसर अग्नि पांच के परीक्षण ने भारत को दिए हैं ,जिसमे चिंता की लकीरें अबतक सिर्फ चीन में दिखी है और अन्य देशों में है भी तो वो खुलकर भारत के विपरीत जा सकने वाली प्रतिक्रिया को फिलवक्त दबाए हुए है | इसी बात को जार्ज मौदेलसकी ने "विदेश नीति का काम या प्रयोजन " कहा है | (देखें - ए थ्योरी ऑफ फारेन पोलिसी ,लन्दन ,१९६२ ,पृष्ठ - ३)
        सो .मिसाइल परीक्षण के बहाने अपने दोस्त -दुश्मन की खोज करना भी विदेश नीति का एक लक्ष्य रहा है ,जिसमे भारत अभी उहा - पोह की स्थिति में है .ऐसा इसलिए कि आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रविधि ने "राइ को भी पहाड  " बना देने की क्षमता प्रदान कर दी है , सो अभी इतराने की संभावना थोड़ी कम है |