Saturday, 7 April 2012
भारत-चीन: विवादों में बीच के रास्ते
(एसके सहाय)
बात १९९८ की है ,तब मई के माह
में भारत, परमाणु विस्फोट कर चूका था और इसकी अनुगूँज पूरे दुनिया में हुई थी
,जिसमे पश्चिमी देश के साथ -साथ संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा एवं आस्ट्रेलिया
प्रतिबंधों के बाबत देश को धमकी दर धमकी दिए जा रहे थे ,इधर देश में भी इस विस्फोट
के बाद लाभ -हानि पर बहस तेज थी |ऐसे में रोज ब रोज केंद्र सरकार को किसी न किसी
रूप में इन विस्फोटों को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करने की मशक्कत से जूझना पर रहा था
,तब अचानक तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज ने संसार को यह बताकर स्तंभित कर
दिया था कि " भारत का असली दुश्मन पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है |" यह
कहने भर की देर थी ,इसे लेकर भारी नाराजगी तब चीन ने प्रकट किया था ,जिसे भाजपानीत
राजग सरकार ने पूरी ताकत व क्षमता के प्रतिकार करने में सफल हो गई |बाद के दिनों
में क्या हुआ ,इसे सभी जानते हैं |खुद अमेरिका की पहल पर अंतराष्टीय परमाणु क्लब
की सदस्यता भारत ने ग्रहण की ,प्रतिबन्ध हटे या ढीले हुए ,इसकी गाथा से प्राय: अब
सब परिचित हैं |
इस पृष्भूमि के आईने में देखें तब चीन की
इन धमकियों का अर्थ समझने में सहायक हो सकती है ,जिसमें चीन सरकार के राष्टीय
इंस्टीट्युट आफ साऊथ चाइना के अध्यक्ष वू सिचुन ने दक्षिण चीन सागर को लेकर सख्त
चेतावनी वाले लहजे में कहा है कि " विवादित क्षेत्र से भारत ने तेल निकाला
,तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी |" साफ है कि चीन अपनी कूटनीतिक चालों में
पूर्व की तरह अंतराष्टीय राजनय के क्षेत्र में कर रहा है ,जिससे भारत को भयभीत
होने की जरूरत नहीं है और इसकी प्रतिक्रिया में विदेश मंत्री एस एम् कृष्णा ने
स्पष्ट लफ्जों में कहा कि "दक्षिण चीन सागर किसी की जागीर नहीं है बल्कि यह
पूरे संसार की है " और इस जवाबी हमले
में कूटनीति के वे तार जुड़े हैं ,जिसकी प्रतीक्षा में अमेरिका समेत अन्य कई राष्ट
इस इंतजार में हैं कि वे भी दक्षिण चीन सागर में आर्थिक दोहन अर्थात सामुद्रिक
खनिजों के लाभ उठाने के मौके मिले | यह इसलिए भी यूरोप -अमेरिका ,जापान जैसे देशों
के मुफीद है कि चीन का अपने सभी पडौसियों से "सीमा विवाद " शुरू से चला
आ रहा है | यह उस तरह के विवाद नहीं है ,जैसा कि भारत के साथ पाकिस्तान को छोड़कर
अन्य से है |ऐसे में ,चीन को शेष दुनिया से अलग - थलग करने में फिलवक्त सारी बातें
मौजूद है ,इसके बावजूद ,भूमंडलीकरण ,बाजारवाद और उदारवाद जैसी संकल्पनाओ के
व्यावहारिक स्वरूपों में यह संभव नहीं है |इसलिए अभी तो यही देखना
है कि चीन अपनी
धमकियों के बाबत कौन सा कदम उठता है ?
यह जग जाहिर है कि भारत, वियतनाम के
सहमति और रजामंदी से दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज में जुटा है और इन परियोजनो
से दिपक्षीय संबंधों के आधारों को बल मिलने की नई उम्मीद है और इन आशाओं के मध्य
यह भी एक तथ्य है कि वियतनाम के साथ चीन के रिश्ते शुरू से बिगड़े हुए है |इसकी झलक
पिछली सदी के सत्तर के दशक में देखि जा सकती है | घटना १९७९ की है ,भारत -चीन अपने
रिश्ते को पटरी पर लाने की अंतराष्टीय कूटनीतिक प्रक्रियाओ को आजमा रहे थे,आजमा
इसलिए रहे थे कि १९६२ में हुए युद्द के बाद पहली बार जनता पार्टी की केन्द्रीय
सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपयी चीन दौरे पर थे और इनके बीजिंग में रहते
चीन ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया था ,जिसके विरोध में बाजपेयी ने अपनी यात्रा को
बीच में ही अधूरी छोड़कर वापस लौट गए और चीन की इस हरकत को नापसंद करने की
प्रतिक्रिया व्यक्त की |
प्रकट है कि चीन की नीति ,कूटनीति और
कदम पहले से ही काफी सुविचारित एवं सुनियोजित रहते है ,जिसे लेकर भारत को अत्यंत
ही सतर्क रहने के लिये आगाह रहना है | इसलिए जब वह चेतावनी दे रहा है ,तब उसके
जेहन में आने वाली प्रतिक्रिया को लेकर पहले से रणनीति बन चुकी होगी |ऐसे में
अमेरिका का दक्षिण चीन सागर को लेकर दिलचस्पी होना चीन को भी सावधानी बरतने के
संकेत दे दिए है ,वह इसलिए कि यह इलाका प्रशांत महासागर से जुड़ा है ,जो अमेरिका
एवं इससे प्रभावित देशो के लिये महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र ३५ लाख वर्ग
किलोमीटर में विस्तृत है ,जो चीनी सीमा से काफी दूर है लेकिन अब जब सामुद्रिक
सम्पतियों की दोहन को लेकर मामले काफी आगे बढ़ चले हैं तब ऐसे में चीन नौनसा द्दीप में
तेल ,गैस एवं अन्य खनिजों की तलाश शुरू कर सकता है और भारत को दिए चेतावनी के पीछे
उसकी यही मकसद होने की संभावना हो सकती है |
वैसे ,दक्षिण चीन सागर का विषय हाल
में तब ही चर्चा में आया ,जब वियतनाम ने भारत को तेल परियोजनाओं के लिये आमंत्रित
किया |इस आमंत्रण के साथ चीन के चौधराहट से बौखलाये देश यथा - फिलीपिंस, ब्रुनेई
और ताइवान जैसे राष्ट खुलकर चीन के विरूद्ध सामने आ गए है | इअके अतिरिक्त अन्य
पडौसियों में भी चीन की दादागिरी को लेकर चिंताएं बराबर रही है ,जिसका लाभ भारत
उठा सकता है और फिलवक्त की स्थितियों में जब अमेरिका भी स्पष्ट कर चूका है कि वह
मानता है कि दक्षिण चीन सागर अंतराष्टीय आवागमन के सार्वभौम रास्ते हैं ,तब चीन भी
सतर्क हो चूका है ,ऐसे में शक्ति का इस्तेमाल करने की जुर्रत वह आसानी से नहीं कर
सकता |अभी के विश्व राजनय के हालात तो ऐसे ही हैं |
वास्तव में, चीन को अब एहसास है कि भारत
वह नहीं है ,जो कभी १९६२ में था | उसे यह
भी पत्ता है कि १९८२ और १९९२ में जब भारत परमाणु विस्फोट करने की ओर अग्रसर था ,तब
अमेरिका की चेतावनी से वह अपने बढे कदम पीछे हटा लिये थे और यह तब की बातें है ,जब
क्रमश: अमेरिका में रोनाल्ड रीगन जैसे सख्त एवं अनुदार राष्टपति थे और इंदिरा
गाँधी के प्रधान मंत्रित्व में यहाँ सरकार थी ,तब पी वी नरसिंह राव जैसे कमजोर
शासनाध्यक्ष की क्या बिसात, जो उसके हुक्म को बे उदूली करे |
लेकिन नहीं , समय ने करवट ली ,बाजपेयी
की सत्ता भारत में स्थापित हुई और अपने कलम से जिस संचिका पर सरकार ने सबसे पहले
जो निर्णय लिया वह परमाणु विस्फोट का ही था और इसमें ठीक -ठीक अंदाज में चीन को
कूटनीतिक तरीके से संकेत दिए गए कि भारत वो नहीं है ,जो अबतक जाना जाता रहा ,बल्कि
वो है ,जो हम चाहते है अर्थात विस्फोट के दिन बुद्द जयंती थी और तारीख थी ११ मई ,
यह इसलिए भी महत्पूर्ण रूप से रेखांकित है कि २४ साल पूर्व १९७४ में उसी माह में
भारत ने पहला परमाणु परिक्षण किये थे और जब बाजपेयी काल में पुन: विस्फोट हुए ,तब
दुनिया यह देख रही थी कि "बुद्द" मुस्करा रहे है |मतलब यह कि अहिंसक
नीति को भारत त्याग रहा था और अपनी ताकत को विश्व मंच पर तौलने के लिये खड़ा हो रहा
था ,जो चीन को विशेष तौर पर लक्षित किये गए थे और इसकी आवाज बने थे जार्ज फर्नाडीज
जिन्होंने बेबाक तरीके से दुनिया को बताया कि उनके देश का प्रथम शत्रु पाकिस्तान
नहीं बल्कि चीन है और इसी में कूटनीति के व्यापक सूत्र छिपे है ,जिसे अभी सहेजा जाना
बाकी है ,जिसका थोडा दिग्दर्शन एस एम् कृष्णा के बयानों में है |
और अंत में यह कि दक्षिण चीन सागर को
लेकर जिस तरह चीन ने अपनी संप्रभु होने का दावा
किया है ,ठीक उसी अंदाज में पाक अधिकृत कश्मीर के वे भाग ,जो कराकोरम
कहलाता है और इसे पाक सरकार ने अपनी दोस्ती को चीन के साथ प्रगाढ़ करने के निमित
चीन को दे दिया है ,उसे लेकर भारत को चाहिए कि चीन को बातचीत के जरीये संपूर्ण तौर
पर हल करे ,क्यों कि चीन ने भी अपनी उपस्थिति कराकोरम में भारतीय नाराजगी व्यक्त
करने के बावजूद बनाये हुए है ,जिस पर भारत शुरू
से अपना हक जतलाते आ रहा है | राजनय के सिद्दांतो में कूट चालों में एक सौदेबाजी भी तत्व हैं ,जिसे
याद रखा जाना चाहिए और फिलवक्त चीन के पास पाकिस्तान -उत्तर कोरिया सरीखे एक -दो
देश ही है .जो मित्र के
तौर पर अंतराष्टीय
मंचों पर उसके साथ खड़े हो सकते है और इसकी काट के लिये अमेरिका ही काफी है ,जो इन
दिनों दिन प्रति दिन भारत से सटने के करीब है, तब करारा झटका देने में हर्ज नहीं
होनी चाहिए |मौके की उत्पन्न स्थितियां तो ऐसी ही हैं |
Thursday, 5 April 2012
परराष्ट नीति में राष्टीय चिंता के मायने
( एसके सहाय )
जो देश अपनी "राष्टीय
चिंताओं" की परवाह नहीं करता ,उसकी दुनिया भी परवाह नहीं करती |अंतराष्टीय
राजनय के इस अटल सत्य को समझने के लिये कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है ,बल्कि
भारत ,पाकिस्तान ,अमेरिका और विश्व के अन्य देशों -क्षेत्रों के परिप्रेक्ष्य में
आज चहुंओर अपनी - अपनी "राष्टीय
चिंता" के रूप में विधमान है ,सिर्फ उसे अनुभूत करने और प्रदर्शित कूटनीतिक
व्यवहार को जानने की आवश्यकता है | अतएव, हाल में जब अमरीकी अंडर सेक्रेट्री आफ
स्टेट वेन्डी शरमन ने नई दिल्ली में यह जानकारी दी कि उसके देश ने पाकिस्तान के
मोहम्मद हाफिज सईद जैसे दुर्दांत आतंकवादी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिये एक
करोड डालर याने कारी पच्चास करोड रूपये के इनाम घोषित किया है ,तब भारतीय राजनय
एवं कूटनीतिक क्षेत्र में इसे स्वागत करते हुए हर्ष व्यक्त किया गया ,जिसको विदेश
मंत्री एस एम् कृष्णा ने रेखांकित भी किया |मतलब यह कि जो काम भारत को पहले ही
मुंबई कांड के बाद तुरत कर देना चाहिए था ,वह अमरीका कर रहा है और हम तालियाँ बजा
रहे हैं |है न सोचने वाली बात कि आखिर हमारी विदेह नीति का ध्येय क्या है ,यह भी
आज के केंद्र सरकार को मालूम नहीं है ,ऐसे में रह -रह करके बाहरी चुनौती मिलने की
आशंका बनी रहती है तो क्या ताज्जुब ?
इस घोषणा के क्या निहितार्थ हैं ,इसे भी
मौजूदा केंद्र समझने में चूक रही है और अपनी राष्टीय राज्य की चिंता को भूलने की दिशा में अग्रसर है
| वह इसलिए कि पाक राष्टपति आसिफ अली जरदारी के अजमेर शरीफ दौरे के लिये सरकार पलक
- पांवड़े बिछाए इसके इंतजार में है ,ताकि रिश्ते को नई दिशा अपनी राष्टीय हितों के
अनुरूप दिया जा सके ,जो अभी के पाक में व्याप्त स्थिति असंभव तो नहीं लेकिन बेहद
मुश्किल सा है क्योंकि वहां के हालात में खुद जरदारी का महत्त्व इनदिनों जबरदस्त
संदेह के घेरे में है ,फिर सेना -कट्टरपंथियों के बीच इनकी क्या हैसियत है ,यह विश्व
बिरादरी को अच्छी तरह मालूम है |
ऐसे में ,अमरीका ने सीधे विदेशी
आतंवादियों के विरूद्ध में अपनी परराष्ट नीतियों को विस्तार देने के कोशिश की है ,तो इसके मूल में उसके अपनी
राष्टीय चिंता है ,न कि दुनिया के हितों
को सुरक्षित करने की पहल ,जैसा कि अमूमन अपनी हर बात - कारवाई के लिये वह लोकतंत्र
,मानवता ,सभ्य समाज वगैरह की करता रहता है | इससे भारतीय कूटनीति को सिखने की
जरूरत है | मसलन , जब संयुक्त राज्य अमेरिका दूसरे देश के आंतकवादी को अपना शत्रु
घोषित करता है ,तो वह अपनी राष्टीय चिंता को प्रकट करता है अर्थात ९/११ हमले के
पश्चात वह अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए हुए है और इसके
आधार पर हर उस दुश्मन को खत्म करने के प्रयास में है ,जो उसकी अस्मिता को चुनौती
देते हों | यही वजह है कि एक तरफ पाकिस्तान को आर्थिक मदद की दुहाई देता है ,तो दूसरी तरफ उसके घर में ओसामा बिन
लादेन को मार डालता है और इसके लिये अंतराष्टीय मानक "संप्रभुता" को
तोड़ने में तनिक भी हिचकिचाहट उसे नहीं होती लेकिन एक भारत है ,जो प्रतीक्षा करने
में ही अपने को कूटनीतिक विजय और राष्टीय हित को सुरक्षित मान लेने के भ्रम में है
| ऐसे में चिंता होना लाजिमी है |
दरअसल , बदलते विश्व परिदृश्य में
दुनिया अब सिमट गई है और इसे तेजी से शोधपरक जीवन शैली के देश उसके अनुरूप अपने को
ढाल रहे है और इसमें यूरोप - अमेरिका सबसे आगे है ,जिसमे भारत के रणनीतिक तौर
-तरीके बाबा आदम के ज़माने से चले आ रहे हैं ,जिसमें अब वह कोई सार्थक लाभ या हित
परिलक्षित -दृष्टिगत नहीं है ,जो कभी हुआ करते थे |अब परराष्ट के नियम ,खुल्लमखुला
राष्ट हित से जुड़ा है ,जिसमे "नैतिकता" नाम की कोई बात नहीं होती और इस
सन्दर्भ में हाल के श्रीलंका के लिये मानवाधिकार पर हुए संयुक्त राष्ट संघ के
मतदान में भारत के हितों को नज़रंदाज करने वाला और श्रीलंका को चिढाने वाला रहा है
,फिर इस पडौसी से दुरी बनती दिखे तो इसके लिये कौन जिम्मेदार होगा ? आखिर क्या देश
की विदेश नीति ,अमरीका के नज़रिए से संचालित होगी ? इन दिनों तो ऐसा ही दिख रहा है
| यही नहीं ,अमरीका साफ कर चूका है कि ईरान के रिश्ते उसके साथ नहीं तो और किसी के
साथ नहीं मंजूर किये जा सकते और इसके लिये बहाना लिया है - परमाणु उर्जा के विकास
की , जिस ओर यह कदम बढ़ाया है ,उसे प्रतिबंधित करने की कोशिश में वह है |
इस मुद्दे अर्थात ईरान को लेकर ब्रिक्स
देशों की रणनीति को विफल करने और इसके तहत पाक को आतंकवादी पनाहगाह के तौर पर
चिन्हित करके अमेरिका ,भारत को अपने पक्ष में करने की कूटनीतिक प्रक्रिया को तेज
किया है और इसी परिप्रेक्ष्य में उसके कदम बढे है ,इसे समझने की जरूरत ,देश के
विदेश मामलों के संचालकों को होनी चाहिए | यह सदैव याद रखा जाना चाहिए कि लादेन या
इससे मिलीजुली धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने में अमेरिका खुद संलिप्त रहा है और
सोवियत संघ के अफगानिस्तान में घुसने की आड़ में कैसी- कैसी काली कारवाई इसने की है
,यह अब तक अंतराष्टीय राजनय के जानकारों के जेहन से उतरा नहीं है |
इसलिए भारत के हित में दोस्त -दुश्मन
की पहचान अवश्य होनी चाहिये | पाक का निर्माण का आधार धार्मिक कट्टरता है ,वह जबतक
खुद के मौजूदा हालात में है ,तबतक यह प्रतिद्न्दी के स्थान पर प्रतिद्वेषी ही बना
रहेगा ,यह इसके मुख्य लक्षण है ,जो आसानी से इसके राजनय के ओजारों से हटने वाला
नहीं है और इसकी झलक कई बार भारत को पुष्ट साक्ष्य के तौर पर मिला भी है लेकिन आक्रामक
विदेश नीति के अनुसरण के आभाव में वह बार -बार "राज्य" नीति के रूप में
अंजाम दे रहा है और हम सिर्फ चिल्ला-चिल्ला कर थक गए लेकिन दुनिया के अन्य देश
सुनने को तैयार नहीं हैं | ख़ुफ़िया तंत्र को सीधे भारत विरोधी गतिविधियों में
इस्तेमाल किया जाना और भारतीय मुद्रा के जाली नोट को बढ़ावा देने जैसे कार्य पाक कर
रहा है ,जो अंतराष्टीय नीतियों के खिलाफ है ,इसके बावजूद इस मामले में जैसे -तैसे
नीतियों का ही प्रतिफल है कि वह अपनी अवैध राजनय और कूटनीतिक गतिविधियों को रोकने
से बाज नहीं आ रहा |स्पष्ट है कि वह शक्ति की भाषा का इंतजार कर रहा है और हम हैं
कि अपने राष्टीय हितों को उपेक्षा -दर- उपेक्षा किये जा रहे है ,जिससे उसके मनोबल
बढते गए है |आखिर यह सिलसिला कबतक चलेगा ?
इधर ,अमेरिका अपने "मुनरो
सिद्दांत" का विस्तार किये जा रहा है और विना किसी के इजाजत के सीधे अपने
शत्रुओं पर वार पर वार किये जा रहा है और भारत केवल तालियाँ बजने के काम में ही
अपनी सफलता मान ले रहा है ,जो साफ जाहिर कर रहा कि हम अपनी राष्टीय चिंताओं को दूर
करने की दिशा में प्रयत्नशील नहीं है और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी सिद्द हो रही
है | यहाँ पर चीन ,जापान जैसे बड़े समृद्द और वियतनाम ,ईरान जैसे छोटे देश उदाहरण
हैं जो किसी भी कीमत पर अपनी राष्टीय अस्मिता को लेकर ढिलाई देने को तैयार नहीं है
,जबकि इनके बीच नस्लीय -जातीय तत्वों के पुट भी आपस में मिलते है |
Tuesday, 3 April 2012
बजट की सियासत में चालबाजियां
( एसके सहाय )
बोल - चाल की भाषा में आपने सुना
होगा कि, देखो वह "हदरल" जैसा खा रहा है ,मानों उसे पुन: भोजन नसीब होगा
या नहीं, वह एक ही बार में सब आहार जल्दी -जल्दी खाकर तृप्त होने की चेष्टा कर रहा
है | काफी कुछ ऐसा ही ,झारखण्ड में वार्षिक बजट को लेकर राज्य सरकार बर्ताव वह
करती रही है और इसका दोषारोपण केन्द्र सरकार पर इस रूप में लगाती है ,जैसे उसके
अपेक्षा के अनुरूप विकास मद में राशि नहीं दिए जाने से प्रान्त अबतक समृद्दि से
कोसों दूर है ,गोया इसके लिये हम जिम्मेदार नहीं बल्कि केंद्र की कांग्रेसनीत
संप्रग सरकार है ,जो केन्द्रीय राशि देने
में पक्षपात करती है, लेकिन सच तो यह है कि राजग शासन कल में भी यही हालात इस
राज्य के थे ,तब आरोप - प्रत्यारोप के आयाम नहीं थे ,क्योंकि दोनों एक ही प्रवृति
की सरकार थी ,इसलिए यह विषय कभी अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्रित्व काल में
संघर्ष का मुद्दा नहीं बना ,मगर अभी ऐसी बात नहीं है ,इसलिए एकबार फिर से समाप्त
हुए वित्तीय वर्ष (२०११- १२) के लेखकीय बजट को जानना समीचीन होगा ,ताकि यह स्पष्ट
हो सके कि विकासगत मामलों में कौन उत्तरदायी और किस रूप में हैं |
वैसे ,झारखण्ड में एक बार फिर
योजनागत -विकासगत राशि करोड़ों में पिछले वित्तीय वर्ष (२०११ -१२) में तय समय में
खर्च कर पाने में सरकार सफल नहीं हो पाई |यह पहली दफा नहीं है कि ऐसी स्थिति उत्पन
हुई हो , बल्कि राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से ही हर साल निर्माणात्मक
-संरचनात्मक कार्यों में प्राप्त रूपये को अबतक किसी भी मुख्य मंत्री के कार्यकाल में समय के साथ
पूर्ण या कहें कि खर्च नहीं कर पाने का रिकार्ड भी इस राज्य का है |ऐसे में यदि
संघ सरकार चालू वित्तीय वर्ष में योजना मद की राशि में कटौती कर दे ,तब कोई नैतिक
हक झारखंड का नहीं है कि उसे लेकर राजनीतिक वितंडा खड़ा करे ,लेकिन भाजपानीत मुख्य
मंत्री अर्जुन मुंडा की सरकार क्या सहन करेगी या राजनीतिक लोभ के संवरण करने से
बाज आएगी ? पूर्व का इतिहास देखें तो ऐसा नहीं लगता बल्कि जोर -शोर से कांग्रेसनीत
संप्रग सरकार को विकास के मार्ग का रोड़ा घोषित करेगी और लोगों को भरमाने के लिये
झूठ का सहारा लेगी |अबतक का ऐसा ही नज़ारा रहा है |इसमें आम लोगों को बेवकूफ बनाने
और अपनी सत्ता बचाए रखने की रणनीति काम करती है ,जो क्षुद्र मानसिकता वाले प्राय:
हर राजनीतिज्ञ करते है और इसी श्रेणी के मुंडा है ,जो खुद और भाजपा के बीच समन्वय
स्थापित करने की आड़ में राजभोग में तल्लीन है और इनके साथ झामुमो और आजसू सरीखी
बौनी पार्टियां साथ देने को तैयार ही है |
इस पूरी धोखाधड़ी और राजनीती को समझने
के लिये चालू वित्तीय वर्ष (२०१२- १३ )के लिये पारित विनियोग विधेयक को देखें
,जिसमे साल भर के बजट के लिये ३७,११३.८० करोड रूपये स्वीकृत किये गए हैं और इनमें
योजना मद के लिये १८,७०९.६७ करोड तथा गैर योजना कार्यों के लिये १८,४०४.१३ करोड
रूपये खर्च किये जाने की बात सरकार ने की है ,लेकिन सवाल है कि क्या वास्तव में
वर्तमान सरकार की क्षमता है ,जो इतनी बड़ी राशि निशिचत समय पर खर्च कर सकती है ! यह
इसलिए संदेह पैदा किया है कि विगत १२ सालों का अनुभव यही बताता है कि बाबु लाल
मरांडी ,शिबू सोरेन ,मधु कोड़ा और अर्जुन मुंडा के मुख्य मंत्रित्व में कभी ऐसा
आभास नहीं हुआ कि "सरकार गंभीरता एवं चुश्ती" के साथ योजनाओं को धरातल
पर उतारने के लिये कृत संकल्प है |
इस तथ्य की पुष्टि समाप्त हुए
वित्तीय वर्ष के आंकड़े खुद करते हैं और शक भी उत्पन्न करते है कि मात्र एक माह में
तीन चौथाई राशि बजट के कैसे खर्च कर दिए गए ? वह इसलिए कि २०११-१२ में फ़रवरी कुल
बजट का ६५०१.५७ करोड रूपये ही खर्च होने की आधिकारिक घोषणा थी ,फिर अचानक समाप्त
हुए साल में ३६०० करोड रूपये खर्च कर दिए जाने की बात सरकार ने कर डाली आखिर यह
कमाल कैसे हुआ ? यह इसलिए भी सोचनीय वाली बात है कि केन्द्र सरकार बराबर यह तोहमत
झारखण्ड पर लगाती रहती है कि वह दिए गए
राशि का समय में उपयोग नहीं करती और अधिक राशि मांगने के फोबिया से यह ग्रस्त रहती
है |ऐसे सवाल उठाना वाजिब ही कहा जा सकता है मगर इसका भी जवाब राज्य सरकार ने
तैयार कर रखा है और कहा भी है कि केन्द्रीय आवंटन हाल में जैसे ही मिला ,उसे तुरत
खर्च कर दिए गए इसलिए कि योजना पूरी कर ली गई थी !
इसमें क्या सच है और क्या झूठ ,इसका
दस्तावेजी सबूत ही साक्ष्य हो सकते है . जिसका कौन पहले खुलासा करता है ,इसका
इंतजार है | ऐसा इसलिए कि दोनों ही सरकार अपने -अपने तरीके से एक दूसरे को इल्जाम
में घेरते रहने के प्रयत्न में हमेशा रही है .क्योंकि दोनों ही इस वक्त एक -दूसरे
के विपरीत राजनीतिक समूह के प्रतिनिधित्व कर रहे हैं |
बहरहाल ,झारखण्ड का गत साल का वार्षिक बजट १५३२२.७५ करोड का
था |बाद में ,खर्च नहीं कर पाने की आशंका के बीच राज्य सरकार ने केन्द्रीय मदद को
देकते हुए इसके आकार में कमी की और फिर १२२३२.६५ रूपये के वार्षिक बजट बनाये
,जिसमें प्राप्त आवंटन १०४०२.८५ करोड रूपये घोषित हुए ,जिसमें बताया गया कि इसमें
अबतक अर्थात बीती ३१ मार्च तक १०१००.२२ करोड रूपये खर्च कर दिए गए हैं |
अतएव , इस सन्दर्भ में मुख्य मंत्री
अर्जुन मुंडा की तरफ से क्या करवाई होती है ,इसे देखा जाना बाकी है ,वह इसलिए कि
मुंडा ने बराबर अधिकारियों को चेतावनी दी है कि यदि समय पर याने चालू वित्तीय वर्ष
में योजना मद की राशि खर्च नहीं की गई ,तब सरकार सबंधित अधिकारीयों के विरूद्ध
दंडात्मक कदम उठायेगी लेकिन अब कहा जा रहा है कि समीक्षा में दोषी पाए जाने पर
विभागों के सचिवों के खिलाफ नकारात्मक चारित्रिक टिप्पणियाँ लिखी जायेगी | साफ है
कि स्वयं अकर्मण्य सरकार कैसे सख्त कारवाई कर सकती है ? जबकि वह खुद विकास पर कम
और राजनीतिक चालबाजियों पर ज्यादा ध्यान देने में मशगुल है ,जिससे कि सरकार के
स्थायित्व का खतरा टालता रहे ,यही आज झारखण्ड का मूल संकट है ,जिसमें हर पक्ष किसी
न किसी रूप में प्रत्यक्षमान है |
जाहिर है कि विगत वित्तीय वर्ष में कुल
बजट के ८२.९७ फीसदी खर्च किये जाने की बात सामने आई है ,जिसमें १२,२३२.६५ करोड में
से १०,१००.२२ करोड खर्च किये जाने का दावा है और इसमें फ़िलहाल पांच विभागों के
खर्च राशि में ३८ से ६२ प्रतिशत राशि खर्च नहीं होने के संकेत है | मसलन ,सूचना
प्राविधिक क्षेत्र में ३७, समाज कल्याण में ५९.५७, उर्जा में ६२.३२ ,भवन निर्माण
में ६५.१० ,स्वास्थ्य में ६६.१३ और विज्ञान प्रौधोगिकी के लिये ४६८.९१ प्रतिशत
राशि ,इनके लिये निर्धारित बजट में से खर्च हुई है ,जबकि अभी सड़क, पेयजल , बिजली ,
ग्रामीण विकास , कृषि ,सिंचाई कल्याण जैसे निर्माणात्मक ,संरचनात्मक एवं विकासगत
महकमों-क्षेत्रों -विषयों के समीक्षा किया जाना शेष है |
Saturday, 31 March 2012
झारखण्ड : राज्य सभा चुनाव रद्द की नैतिकता !
( एसके सहाय )
जैसी कि आशंका थी ,वही हुआ ,राज्य
सभा के लिये होने वाले मतदान में भ्रष्टाचार के तौर पर दो करोड पन्द्रह लाख रूपये
पकड़ में आना और फिर कल ही देर रात चुनाव आयोग द्वारा चुनावी प्रक्रिया को रद्द
किये जाने से यह साफ हो गया कि झारखण्ड में बिना दौलत के कोई सामाजिक क्रियाविद
उच्च सदन का सदस्य नहीं हो सकता | ऐसे में यक्ष प्रश्न है कि आखिर धनबल से कैसे
निपटा जाये और स्वस्थ मानसिकता ,चरित्र के बूते सामाजिक - राजनीतिक -आर्थिक एवं
सांस्कृतिक क्षेत्रों में योग दे रहे नागरिक किस राष्ट -राज्य को अपनी निस्वार्थ
सेवा देस सकें ?
दरअसल , जब से झारखण्ड अस्तित्व में
आया ,तब से राज्य सभा के लिये होड लग गई ,जहाँ विगत १२ सालों से बराबर कोई न कोई
पूंजी का धनिक व्यक्ति अचानक आ धमक गया और अपनी चकाचौंध से विधायकों को प्रभावित
करने में सफल होता रहा ,जिसका यह परिणाम
निकला कि सरे देश में यह सन्देश विस्तृत हो गए कि झारखण्ड से राज्य सभा में घुसना
है तो " पैसे लगाओ " और पहुँच जाओ उच्च सदन में , फिर अपनी ओछी कामनाओं
को पूरी करो < इसमें को हर्ज नहीं है | दिक्कत इसलिए नही कि पिछला इतिहास इसी
तरह का रहा है | नाथवानी ,केडी ,मबेलो ,अहवालिया जैसों का इतिहास ऐसा ही रहा है
,जिनका इस राज्य से कोई सीधा रिश्ता कभी नहीं रहा लेकिन अपनी ऊँची पहुँच और पैसे
के बल पर राज्य सभा में निर्विध्न पहुँच गए |ऐसे में नवधनाढय लेकिन राजनीतिक सोच
के कथित नेता एक बार फिर वैसी ही रणनीतिक व्यूह रचनाओ के जरीये अपने लक्ष्य को
साधने में भिड़ें हो तो कैसा आश्चर्य ?
अब जरा ,उस दृश्य को देखें ,जिसमें आर के
अग्रवाल के नाम पर रूपये आयकर वालों ने कल रांची में पकड़ा और फिर इसके साथ , जो
पर्चा मिला ,उसमें जिन विधायकों के नाम लिखे थे ,उनमें कई राष्टीय मान्यता प्राप्त
पार्टियों के विधायकों के नाम उल्लेखित है अर्थात संदश यह कि वे पैसे पर अपने ही
पार्टी के विपरीत वोट करने के लिये कमर कास लिये थे ,जिनके चेहरे अब उजागर है |
इतना ही नहीं ,अग्रवाल ने अपने को भाजपा के करीब दर्शाने के लिये ,जो विज्ञापन कल
ही याने मतदान के ही दिन एक राष्टीय दैनिक पत्र को दिया ,उसमें अटल बिहारी बाजपेयी
और लालकृष्ण अडवानी के साथ ही कई संघ से जुड़ें नेताओं के तस्वीर थे ,जो बता रहा था
कि उसे भाजपा का आशिर्बाद प्राप्त है |
इसी तरह ,कई ऐसी बातें हैं ,जिसे वर्णन नहीं किया जा सकता .अन्यथा एक मोटी पोथी तैयार हो सकती है | वैसे३ .झारखण्ड में इस तरह की राजनीती के शुरूआत भाजपा और कांग्रेस ने की ,और इसकी प्रेरणा प्रधान मंत्री से मिली ,जो १९१९ में असम से जीतकर राज्य सभा में पहुंचे थे और इसे लेकर न्यायिक लड़ाइयां भी तब हुई थी ,जिसे बाद में चुनाव आयोग , केंद्र सरकार और उच्चतम नयायालय के बीच इसे साध्य कर इस मुद्दे को खत्म किये गए ,तब से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि कोई भी नागरिक कहीं से भी कहीं के लिये राज्य सभा की दावेदारी कर सकता है अर्थात राज्यवासी होने का मूल विषय गौण कर दिए . फलत: अब झारखण्ड जैसे राज्य इसके बेहतर प्रयोगशाला के रूप में सामने हैं ,जहाँ सार्वजनिक नैतिकता नाम की कोई बात या प्रक्रिया नहीं ,सीधे "दौलत " ही यहाँ किसी के सम्मान का अधिकारिणी है |
इसी तरह ,कई ऐसी बातें हैं ,जिसे वर्णन नहीं किया जा सकता .अन्यथा एक मोटी पोथी तैयार हो सकती है | वैसे३ .झारखण्ड में इस तरह की राजनीती के शुरूआत भाजपा और कांग्रेस ने की ,और इसकी प्रेरणा प्रधान मंत्री से मिली ,जो १९१९ में असम से जीतकर राज्य सभा में पहुंचे थे और इसे लेकर न्यायिक लड़ाइयां भी तब हुई थी ,जिसे बाद में चुनाव आयोग , केंद्र सरकार और उच्चतम नयायालय के बीच इसे साध्य कर इस मुद्दे को खत्म किये गए ,तब से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि कोई भी नागरिक कहीं से भी कहीं के लिये राज्य सभा की दावेदारी कर सकता है अर्थात राज्यवासी होने का मूल विषय गौण कर दिए . फलत: अब झारखण्ड जैसे राज्य इसके बेहतर प्रयोगशाला के रूप में सामने हैं ,जहाँ सार्वजनिक नैतिकता नाम की कोई बात या प्रक्रिया नहीं ,सीधे "दौलत " ही यहाँ किसी के सम्मान का अधिकारिणी है |
झारखण्ड में कांग्रेस -झाविमो के बीच विधान सभा
में चिनावी तालमेल रहा और इसी के आधार पर इनके बीच आपसी सदभावना के तहत रणनीतिक
कदम होने चाहिए थे लेकिन इन दोनों के बीच केवल जरूरत के रिश्ते थे और परस्पर लेन
-देन की कोई ऐसी बात हुई नहीं और आपस में ही खीचतान करते रहे | यही हाल , झामुमो
और भाजपा के लिये रहा ,जो स्वार्थवश एक दूसरे को साथ देने में हैं मौका मिलते ही
इनमें छतीश का आंकड़ा होने में देर नहीं लगेगी | नजारा देखें - भाजपाध्यक्ष नितिन
गडकरी ने अपने मर्जी से झारखण्ड में अंशुमान मिश्र को पार्टी का प्रत्याशी बनाया
,फिर इसकी उम्मीदवारी को वजन देखने के लिये कुछ दिन इंतजार किये मगर जब इस उम्मीदवारी
का विरोध हुआ ,तब इसे पल्ला झाड लिये और अपने को पाक-साफ दिखने को लेकर
"वोटिंग प्रक्रिया " से अपने दल को अलग रखने की बात कही और जब झामुमो ने
अपने पसंदीदा उम्मीदवार संजीव कुमार के लिये दबाव बनाया ,तो कल अचानक यह कहते हुए
मतदान में कूद पड़ी कि " वोट नहीं देने से उसके प्रतिदंदी उम्मीदवार अर्थात
कांग्रेस के प्रदीप कुमार बलमुचू के जीत हो जायेगी ,इसलिए विधायकों को मतदान करने
के निर्देश दिए गए | हैं न कमाल की बातें ,
सत्ता के बीच अपनी भद पीट गई साख को बचाए रखने के कवायद में भाजपा की यह
"गत्त" हुई .इसके बावजूद इनमें अबतक ग्लानी के भाव पैदा नहीं हुए तो
भविष्य कैसा होगा ,यह इनके लिये सोचनीय वाली बात है |
अब ,जब राज्य सभा के चुनाव रद्द हैं .तब यह
जरूरी है कि यह सोचा जाना चाहिए कि आखिर
कैसे भला होगा झारखण्ड का ,जहाँ तात्कालिक लाभ के लिये विधायक खुलेआम बिकते हों और
"दलगत अनुशासन " का भय नहीं हो ,साथ में "लज्जा" भी शर्मिंदा
हो जाये और इसके चपेट में एक -दो नहीं बल्कि पूरी पार्टियां ही शामिल हो ,तब इस
संसदीय व्यवस्था के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को बदलने की दिशा में चिंतन क्यों नहीं
हो "
( एसके सहाय )
जैसी कि आशंका थी ,वही हुआ ,राज्य
सभा के लिये होने वाले मतदान में भ्रष्टाचार के तौर पर दो करोड पन्द्रह लाख रूपये
पकड़ में आना और फिर कल ही देर रात चुनाव आयोग द्वारा चुनावी प्रक्रिया को रद्द
किये जाने से यह साफ हो गया कि झारखण्ड में बिना दौलत के कोई सामाजिक क्रियाविद
उच्च सदन का सदस्य नहीं हो सकता | ऐसे में यक्ष प्रश्न है कि आखिर धनबल से कैसे
निपटा जाये और स्वस्थ मानसिकता ,चरित्र के बूते सामाजिक - राजनीतिक -आर्थिक एवं
सांस्कृतिक क्षेत्रों में योग दे रहे नागरिक किस राष्ट -राज्य को अपनी निस्वार्थ
सेवा देस सकें ?
दरअसल , जब से झारखण्ड अस्तित्व में
आया ,तब से राज्य सभा के लिये होड लग गई ,जहाँ विगत १२ सालों से बराबर कोई न कोई
पूंजी का धनिक व्यक्ति अचानक आ धमक गया और अपनी चकाचौंध से विधायकों को प्रभावित
करने में सफल होता रहा ,जिसका यह परिणाम
निकला कि सरे देश में यह सन्देश विस्तृत हो गए कि झारखण्ड से राज्य सभा में घुसना
है तो " पैसे लगाओ " और पहुँच जाओ उच्च सदन में , फिर अपनी ओछी कामनाओं
को पूरी करो < इसमें को हर्ज नहीं है | दिक्कत इसलिए नही कि पिछला इतिहास इसी
तरह का रहा है | नाथवानी ,केडी ,मबेलो ,अहवालिया जैसों का इतिहास ऐसा ही रहा है
,जिनका इस राज्य से कोई सीधा रिश्ता कभी नहीं रहा लेकिन अपनी ऊँची पहुँच और पैसे
के बल पर राज्य सभा में निर्विध्न पहुँच गए |ऐसे में नवधनाढय लेकिन राजनीतिक सोच
के कथित नेता एक बार फिर वैसी ही रणनीतिक व्यूह रचनाओ के जरीये अपने लक्ष्य को
साधने में भिड़ें हो तो कैसा आश्चर्य ?
अब जरा ,उस दृश्य को देखें ,जिसमें आर के
अग्रवाल के नाम पर रूपये आयकर वालों ने कल रांची में पकड़ा और फिर इसके साथ , जो
पर्चा मिला ,उसमें जिन विधायकों के नाम लिखे थे ,उनमें कई राष्टीय मान्यता प्राप्त
पार्टियों के विधायकों के नाम उल्लेखित है अर्थात संदश यह कि वे पैसे पर अपने ही
पार्टी के विपरीत वोट करने के लिये कमर कास लिये थे ,जिनके चेहरे अब उजागर है |
इतना ही नहीं ,अग्रवाल ने अपने को भाजपा के करीब दर्शाने के लिये ,जो विज्ञापन कल
ही याने मतदान के ही दिन एक राष्टीय दैनिक पत्र को दिया ,उसमें अटल बिहारी बाजपेयी
और लालकृष्ण अडवानी के साथ ही कई संघ से जुड़ें नेताओं के तस्वीर थे ,जो बता रहा था
कि उसे भाजपा का आशिर्बाद प्राप्त है |
इसी तरह ,कई ऐसी बातें हैं ,जिसे वर्णन नहीं किया जा सकता .अन्यथा एक मोटी पोथी तैयार हो सकती है | वैसे३ .झारखण्ड में इस तरह की राजनीती के शुरूआत भाजपा और कांग्रेस ने की ,और इसकी प्रेरणा प्रधान मंत्री से मिली ,जो १९१९ में असम से जीतकर राज्य सभा में पहुंचे थे और इसे लेकर न्यायिक लड़ाइयां भी तब हुई थी ,जिसे बाद में चुनाव आयोग , केंद्र सरकार और उच्चतम नयायालय के बीच इसे साध्य कर इस मुद्दे को खत्म किये गए ,तब से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि कोई भी नागरिक कहीं से भी कहीं के लिये राज्य सभा की दावेदारी कर सकता है अर्थात राज्यवासी होने का मूल विषय गौण कर दिए . फलत: अब झारखण्ड जैसे राज्य इसके बेहतर प्रयोगशाला के रूप में सामने हैं ,जहाँ सार्वजनिक नैतिकता नाम की कोई बात या प्रक्रिया नहीं ,सीधे "दौलत " ही यहाँ किसी के सम्मान का अधिकारिणी है |
इसी तरह ,कई ऐसी बातें हैं ,जिसे वर्णन नहीं किया जा सकता .अन्यथा एक मोटी पोथी तैयार हो सकती है | वैसे३ .झारखण्ड में इस तरह की राजनीती के शुरूआत भाजपा और कांग्रेस ने की ,और इसकी प्रेरणा प्रधान मंत्री से मिली ,जो १९१९ में असम से जीतकर राज्य सभा में पहुंचे थे और इसे लेकर न्यायिक लड़ाइयां भी तब हुई थी ,जिसे बाद में चुनाव आयोग , केंद्र सरकार और उच्चतम नयायालय के बीच इसे साध्य कर इस मुद्दे को खत्म किये गए ,तब से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि कोई भी नागरिक कहीं से भी कहीं के लिये राज्य सभा की दावेदारी कर सकता है अर्थात राज्यवासी होने का मूल विषय गौण कर दिए . फलत: अब झारखण्ड जैसे राज्य इसके बेहतर प्रयोगशाला के रूप में सामने हैं ,जहाँ सार्वजनिक नैतिकता नाम की कोई बात या प्रक्रिया नहीं ,सीधे "दौलत " ही यहाँ किसी के सम्मान का अधिकारिणी है |
झारखण्ड में कांग्रेस -झाविमो के बीच विधान सभा
में चिनावी तालमेल रहा और इसी के आधार पर इनके बीच आपसी सदभावना के तहत रणनीतिक
कदम होने चाहिए थे लेकिन इन दोनों के बीच केवल जरूरत के रिश्ते थे और परस्पर लेन
-देन की कोई ऐसी बात हुई नहीं और आपस में ही खीचतान करते रहे | यही हाल , झामुमो
और भाजपा के लिये रहा ,जो स्वार्थवश एक दूसरे को साथ देने में हैं मौका मिलते ही
इनमें छतीश का आंकड़ा होने में देर नहीं लगेगी | नजारा देखें - भाजपाध्यक्ष नितिन
गडकरी ने अपने मर्जी से झारखण्ड में अंशुमान मिश्र को पार्टी का प्रत्याशी बनाया
,फिर इसकी उम्मीदवारी को वजन देखने के लिये कुछ दिन इंतजार किये मगर जब इस उम्मीदवारी
का विरोध हुआ ,तब इसे पल्ला झाड लिये और अपने को पाक-साफ दिखने को लेकर
"वोटिंग प्रक्रिया " से अपने दल को अलग रखने की बात कही और जब झामुमो ने
अपने पसंदीदा उम्मीदवार संजीव कुमार के लिये दबाव बनाया ,तो कल अचानक यह कहते हुए
मतदान में कूद पड़ी कि " वोट नहीं देने से उसके प्रतिदंदी उम्मीदवार अर्थात
कांग्रेस के प्रदीप कुमार बलमुचू के जीत हो जायेगी ,इसलिए विधायकों को मतदान करने
के निर्देश दिए गए | हैं न कमाल की बातें ,
सत्ता के बीच अपनी भद पीट गई साख को बचाए रखने के कवायद में भाजपा की यह
"गत्त" हुई .इसके बावजूद इनमें अबतक ग्लानी के भाव पैदा नहीं हुए तो
भविष्य कैसा होगा ,यह इनके लिये सोचनीय वाली बात है |
अब ,जब राज्य सभा के चुनाव रद्द हैं .तब यह
जरूरी है कि यह सोचा जाना चाहिए कि आखिर
कैसे भला होगा झारखण्ड का ,जहाँ तात्कालिक लाभ के लिये विधायक खुलेआम बिकते हों और
"दलगत अनुशासन " का भय नहीं हो ,साथ में "लज्जा" भी शर्मिंदा
हो जाये और इसके चपेट में एक -दो नहीं बल्कि पूरी पार्टियां ही शामिल हो ,तब इस
संसदीय व्यवस्था के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को बदलने की दिशा में चिंतन क्यों नहीं
हो "
Thursday, 29 March 2012
दिलचस्प वाक्याँ मगर सोचनीय
एसके सहाय
झारखण्ड की प्रांतीय राजधानी रांची में गत दिन एक मजेदार घटना हुई लेकिन यह गंभीर किस्म का प्रकरण है ,जिसमें व्यक्त डायलाग किसी फ़िल्मी अंदाज से कम नहीं अहसास करते |सो , इसपर विचार किया ही जाना चाहिए कि "अधिकार बड़ा है या फिर कर्तव्य " इस मामले में दोनों बिंदु समाहित हैं ,जिसमें अखडपन् है तो विशिष्ट होने का दंभ भी दृष्टिगत है |
घटना बिरसा चौक की है ,जहाँ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में भाग लिये जत्था धरना पर बैठा था और इसमें शांति भंग न हो ,इसके लिये स्थानीय प्रशासन ने एक पुलिस बल की प्रतिनियुक्ति की थी ,तभी अचानक दो विधायक धरना स्थल पर आ धमके और उनसे मिलने की जुर्रत करने लगे ,जिसे मौके पर पुलिसकर्मियों ने रोक दिया ,जिससे वहां पर थोड़े समय के लिये नोंक -झोंक की स्थिति उत्पन्न हो गई और इसी क्रम में दरोगा ने अपने चिर -परिचित शैली में बोला कि- "क्या आपके माथे पर विधायक होने का तमगा लगा है" |
इस फ़िल्मी अंदाज में कही गई बात से निराश होकर दोनों विधायक वापस विधान सभा लौट गए ,जहाँ सत्र के दौरान आपबीती सुनाई ,जिसपर बवाल मच गए और सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष मिलकर घटना पर तीखी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त किये और एक स्वर से दोषी पुलिसकर्मियों नके विरूद्ध करवाई करने की मांग करने लगे , नतीजत: दरोगा रामकृष्ण महतो और जमादार लुईस मिंज को तत्काल मुअतल कर दिए जाने की घोषणा की गई |
वैसे ,पुलिस प्रताडना के शिकार हुए भाजपा विधायक उमाशंकर अकेला और राजद के विधायक जनार्दन पासवान ने यह भी बताया कि दोनों ने अपना परिचय पत्र दिखला कर पुलिस से धरना पर बैठे आंदोलनकारियों से भेंट करने की अनुनय की मगर उनकी एक भी नहीं सुनी गई | अपने को पिटे जाने तक की बात विधायकों ने सदन में रखी | प्रकट है कि पक्ष -विपक्ष दोनों के विधायक पुलिस अपमान के शिकार हुए और इनके खीझ में उन दो पुलिसकर्मियों को निलंबन होना पड़ा ,जिनको कानून -व्यवस्था बनाये रखने कि जिम्मेदारी दी गई थी |
इस घटना क्रम को ध्यान से देखें तो, जाहिर होगा कि इस प्रकरण में दोनों ने गैर जिम्मेवारी का परिचय दिया है | अव्वल तो दोनों विधायकों को धरना स्थल पर जाना नहीं चाहिए , विशेष कर यह जानते हुए कि वहां पर पुलिसकर्मी प्रतिनियुक्त हैं ,जो इनके आंदोलन को नियंत्रित करने के लिये तैनात है और यदि मिलने जाना ही था ,तब पुलिस बल के उच्चाधिकारियों से अनुमति लेकर जाना चाहिए था .ऐसा इसलिए कि वहां पर पुलिस बल अपने कर्तव्य के पालन में दृढ थी ,यह उस हालात में और गंभीर था कि निकट ही विधान सभा के सत्र चल रहे थे , और यह सब विधायकों को इसलिए भी ध्यान रखना चाहिए था कि वह खुद कानून -व्यवस्था बनाये रखने के लिये नियमों -परिनियमों का इजाद किये है ,जिसका पालन पुलिस धरना स्थल पर कर रही थी ,ऐसे में यदि पुलिस के नुमाइंदे ने उनके साथ जो बर्ताव किये वह ज्यादा गंभीर नहीं कहे जा सकते लेकिन यह तो लोग जान ही गए कि विधायक खुद नियमों की परवाह नहीं करते ,तब साधारण लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है !
दूसरी तरफ , पुलिस ने यह जानते हुए कि दोनों विधायक हैं ,इनके साथ गंभीरता से पेश होने चाहिए थे और जब स्थितियां अनुकूल है ,तब मिलने -मिलाने में कोई विशेष हर्ज भी नहीं था | ऐसे में कौन कसूरवार है और कौन बे कसूरवार यह तय कर पाना मुश्किल सा है |फ़िलहाल तो दोनों पुलिसकर्मी निलंबित है |
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