Friday, 22 April 2011

गुटखा : सरकार डाल -डाल तो कारोबारी पात - पात

                                                    एसके  सहाय 
                              आपने  यह  कहावत  सुनी  होगी - तू  डाल  -डाल  तो  मै  पात  -पात  ,ठीक  इसी  तर्ज़ पर  इन  दिनों  गुटखा  के  कारोबार  में  दिख  रहा  है . यह  सभी  जानते  है  की  सर्वोच्च  न्यायालय  ने  पर्यावरण   को  देख  कर  पान  -मसाले  के  तौर  पर  बेचे  जाने  वाली  गुटखे  के  पैकेजिंग   में  प्लास्टिक   का  उपयोग  करने  पर  रोक  लगा  दी  है  और  इसके  लिए  सरकार  को  निर्देशित  कर  रखा  है   . न्यायालय  के  आदेश  के  तहत  सरकार  ने  भी  बाकायदा  इसके  लिए  अधिसूचना  जारी  भी  किए  और  स्वच्छ  प्रयावरण  के  हित  में  प्रतिबंधित  कर  रखा  है  ,इसके  बावजूद  इस   धंधे  से  जुड़े  व्यवसायी  कैसे  सरकार  ,प्रशासन  और   न्यायालय  को  धोखा  दे  रहे हैं    ,यह  किसी   से       छिपा     नहीं   है
गुटका  वैसे  भी  स्वास्थ्य  के  लिए  नुकसान  देह  हैं  ,चिकित्सा  विज्ञानं   भी  इसे मानती   है  ,साथ  में  इसके  पैकेजिंग  में  प्रयुक्त  किए  जाने  वाले  प्लास्टिक  भी  प्रयावरण  को  क्षति  पहुँचाने  में  योगदान   देते  है  ,इसे  भी  लोग  और  पूरी  दुनिया  मानती -जानती  है  ,फिर  भी  इस  बारे   में  लोक  चेतना  गंभीर  नहीं   है  ,जिसके   वजह   से  सरकार  और  न्यायालय  को  धता   बताते    हुए   इसके  कारोबार  में  पिल   पड़े   कारोबारी  अपने   धंधे  को  बद स्तूर   जारी  रखे हैं   ,जो   इनकी   हिम्मत   को  इस  रूप   में  प्रदर्शित   की  है  ,जैसे  इनको   कानून का भय नहीं हो अर्थात कानून इनके लिए खिलौना जैसे हैं |  .
अब    जरा   गुटखे  की  तस्वीर   को  देखें  , इसे  निरीक्षण   करें   तो  पाएंगे   कि   इसके  पैकेजिंग  के  उपरी   कवर   पर  कागज   के  लबादा   ओढ़ाये   हुए   है और    अन्दर   प्लास्टिक   का  पैकेजिंग  ठीक  उसी   तरह   का  है  ,जिस   तरह   प्रतिबंधित  किए  जाने  के  पूर्व   यह  था |    .
मतलब कि     " आँखों में     धुल  झोकने   के   लिए  धंधे बाजों   ने  गुटखे  की  उपरी   आवरण   को  कागज   से  ढँक  दिया  लेकिन   इसमें   नमी   पैदा   नहीं   हो   जाय  ,इसके  लिए  प्लास्टिक  के  बनाये   को   रखा , ताकि इसकी  मियाद  पहले  कि  तरह  बनी  रहे  ." फ़िलहाल  जो  गुटके  बिक  रहे  है  ,वह  केवल  दिखावे  भर  के  लिए   कागज  के  कवर  से  ढंके  हुए  हैं   ,अन्दर  तो  प्लास्टिक  ही  है   ,फिर  इसके  प्रतिबंधित  करने  के  क्या  मतलब  रह  गए  हैं  ?
भारत  में  कानून  की  आड़  में  लोगों  को  मुर्ख  बनाने   का  धंधा  काफी  पुराना  है  ,कभी  इसके  जद   में  सरकार  आती  है  ,तो  कभी   आम  लोग  आते  है  और  इस  वक्त  कारोबारी  हैं  ,जिन्होंने  बिना  डर  के  बेहिचक  गुटखे  की  बिक्री  कर  रहे  हैं . इस  कारोबार  में  सरकारी  कर्मचारी  -अधिकारी  को  हाथ  हो  तो  आश्चर्य  नहीं  करना    चाहिए  .आखिर  उपरी  आमदनी  का  जो  मामला  है  , समाज  के  प्रगतिशील  और  रचनात्मक  कामो  के  "दंभ " भरने  वाले    गैर  सरकारी  संगठन  भी  इस  दिशा  में  खामोश  हैं  ,जबकि  एक  स्वैच्छिक  संस्था  की  पहल  पर  ही  यह  मामला  जनहित  याचिका  के  तौर  पर  उच्चतम  न्यायालय  के  सामने  आया  था  ,जिसे  जरूरी  समझ  न्यायालय  ने  इसे  रोकने  की  निर्देश  सरकार  को  दिए  थे , जिसका  काट  इस  रूप  में  सामने  कारोबारी  करेंगे  ,इसकी  कल्पना  नहीं  थी  .तभी  तो  कहा  गया  है  कि तू  डाल  डाल  तो  हम  पात - पात
प्रश्न  है - जीवन की तुलना में पैसे का क्या महत्व  जिसमे सिर्फ रोजगार   .के तर्क हों ?

Sunday, 17 April 2011

prime minister manmohan the importance of voting

        मनमोहन  और मताधिकार के मतलब
                                                               एसके सहाय
              देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने असम विधान सभा के चुनाव में अपना "मत " का इस्तेमाल नहीं करके यह साफ जतला दिया है कि वह "राजनीतिक प्राणी" नहीं हैं '
अतएव,यह निष्कर्ष निकालना कि आम जीवन को कोई विशेष उम्मीद इनसे नहीं है ,गलत नहीं होगा ,काफी हद तक सच के निकट है |
किसी भी देश का शासक उस राष्ट के मुख्य प्रेरणादायक शक्ति होता है ,इसके कार्य व्यवहार को लोग आत्म -साथ करते हैं और उसके अनुकूल आचरण करने के   कोशिश की  जाती है लेकिन आजादी के करोब ६० साल बाद यह स्थिति आएगी कि देश के शिखर पर बैठा राजनीतिक अपने वोट इसलिए नहीं देगा की उसे इन सब में कोइ रूचि नहीं है ,तब बात काफी गंभीर है |ऐसे में विचारणीय प्रश्न है कि "आखिर हमारा भविष्य क्या है " क्या यह मान लिया जाय  कि देश की बागडोर नादान किस्म के लोगों के हाथो में आ गया है| 
  भारत अब भी तीसरे श्रेणी के देशों में शुमार है ,विकसित  देश   होने की कगार पर हम है ,लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की देश पूरी तौर पर " लोकतान्त्रिक  ताकतों     

  के हवाले है ,इसलिए यदि प्रधान मंत्री वोट नहीं करता तो इसके कोई खास नकारात्मक परिणाम नहीं होगें .        
 लोकतंत्र में मतदान एक ऐसे प्रक्रिया है ,जिसका परिपालन प्राय: हर देश के नागरिक करते है ,खासकर जहाँ "लोकतान्त्रिक व्यवस्था  " जड़ें जमा चुकी हैं ,वहां सत्तर से अस्सी फीसदी तक मत्ताधिकार  का उपयोग होता है, लेकिन भारत जैसे देश में तो इसके लिए नागरिको के बीच खास जागरूकता अभियान हर बार चलाया  जाता है ,ताकि लोग अपने प्रतिनिधि को मन मुताबिक चुन लें |  यूरोप  और अमरीका के साथ कुछेक अन्य देश भी है ,जहाँ मतदाता को वोट देने के लिए इसलिए  सरकार या अन्य लोकतान्त्रिक शक्तियां प्रेरित नहीं करती कि   "उसे लोकतंत्र को मजबूत करना है |" मगर भारत में प्रत्याशियों को तो वोट चाहिए ही ,साथ में मत्ताधिकार के लाभ भी बताये जाते है ,ताकि तानाशाही प्रवृति से देश को बचाया जा सके |
 वैसे सभी जानते हैं कि मनमोहन सिंह एक अर्थ शास्त्री हैं ,जिन्होंने जीवन यापन के लिए नौकरी करना ही अपना और अपने परिवार के हित में उचित समझा ,सो बैंकों कि सेवा करते और अपने ईमानदारी की बदौलत  रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के गवर्नर एवं विश्व बैंक की सेवा में रहते  इतना "नाम" हुआ  कि लगने  लगा , अब देश  की अर्थ व्यवस्था को मजबूती मिलेगी ,क्यों क्योकि  इसकी बागडोर एक प्रख्यात अर्थ विज्ञानी के हाथों में है लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है .६० प्रतिशत  की आबादी इनके ही वित्त मंत्री और प्रधान मंर्त्री रहते कैसी अवस्था में यह छुपा नहीं है ,पूंजी का प्रवाह खास "धन्ना   -सेठों "  की ओर है ,इससे आज पुरे देश में रंज की स्थिति है
इससे क्षुब्ध होकर भूमिगत संगठनो की बाढ़  आई हुई है .केन्द्रीय बलों का बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर और जम्मू -कश्मीर में प्रतिनियुक्त तो है ही ,साथ ही बिहार ,झारखण्ड,   छतीशगढ ,ओड़िसा आन्ध्र प्रदेश ,महाराष्ट .मध्य प्रदेश और वब उत्तर प्रदेश के कुछ भागों  में उग्रवादियों से मोर्चा संभालें हुए है ,जो किसी भी सूरत में मौजूदा लोकतंत्र को मानने को तैयार नहीं है |ऐसे में प्रधान मंत्री द्वारा मत्ताधिकार का प्रयोग नहीं होने से यदि यह प्रचारित हो जाय कि "असम की हिंसक हालातों के मद्देनजर ही वह वोट देने नहीं गए ,तब इसका क्या अर्थ होगा ,क्या मनमोहन जानते हैं ?
       देश में अब भी "मतदान " को एक पवित्र लोकतान्त्रिक प्रक्रिया माना -समझा जाता है और इससे इत्तर जन प्रतिनिधि नजर  चुराते    दिखे , तब जाहिर   है  कि  उनकी कोई अभिरुचि  देश के प्रति  नहीं है ,काफी कुछ ऐसा ही मनमोहन   सिंह के व्यव्हार  में झलका   है , ऐसे में आम नागरिक भी मतदान से यह कहते हुए इंकार कर दे कि उसे भी फुर्सत नहीं है चुनाव में ,क्योकि "सभी दल और उम्मीद्वार एक जैसे है" ,तब क्या होगा ?वैसे भी कई बार सामने आ चुका है कि लोक सभा और  विधान सभा के अलावा स्थानीय चुनाव में नागरिक समूहों ने कई बार मतदान से हिस्सा नहीं लिया अर्थात बहिष्कार कर दिया ,जो जनतंत्र के लिए गंभीर बात है ,इस संदर्भ में यदि आम व्यक्ति और मनमोहन सिंह को एक ही "सोच "वाला निरुपित किया जाय  तो ताज्जुब नहीं करनी चाहिए |
                          असम से मनमोहन सिंह दो दशक से लगातार राज्य सभा में पहुंचे है ,इनका दिश्पुर में एक मतदाता के रूप में नाम दर्ज है ,इसी बिना पर इनके पहली दफा निर्वाचन होने पर विवाद हुआ था जो इनके असम वासी होने को लेकर था| यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय मेंसलता था ,विवाद इस बात प़र  थी कि "संबंधित राज्य के वासी को ही उच्च   सदन (राज्य सभा )में सदस्यता के पात्रता निर्धारित थे ,जिसमे वह अनफिट पाए गए थे |बाद में संवैधानिक संसोधन के जरिये इसका स्वरूप में बदलाव संसद ने अपने हितो के अनुकूल किया ,तब जाकर इनकी सदस्यता बच पाई थी| इसे लोग अभी तक भूलें नहीं हैं | तब सरकार कि काफी छिछलेदारी हुई थी |
              मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री का पद एक तोहफे में मिला ,जिसमें इनकी स्वामी भक्ति का विशेष गुण था |इनकी शक्ति का पत्ता उस वक्त ही चल गया था ,जब यह तय नहीं था कि प्रधान मंत्री कौन  होगा लेकिन वित्त  मंत्री मनमोहन ही होगें  यह सारा देश  जानता को पहले से मलिम था, बात १९९१ की है . साफ है कि कांग्रेसी राजनीति में एक परिवार कि छत्र छाया में ही  कोई मनमोहन जैसे शख्स तरक्की कर सकते हैं ,जिनका  खुद का कोई  नहीं हो  |
                  सार्वजनिक जीवन के मामले में प्रधान मंत्री की सोच का पता मतदान से चला ही है ,साथ ही भविष्य में अन्य कई राजनितिक /राजनितिक समूह भी मतदान के प्रति उदासीन हो सकते है ,जिसके आसार बढ़ गए है ,जम्मू -कश्मीर में कभी कम मतदान को लेकर अक्सर बात होती रहती है |इस परिप्रेक्ष्य  में मनमोहन के मतदान नहीं करने को देखें तो काफी खतरें आने वाले  दिनों  में हो सकते है .ऐसे में आम बुद्धिजीवियों  की चुप्पी इसमें ठीक नहीं है | ऐसा इसलिए की मतदान के दिन मनमोहन काफी अस्वस्थ थे ,या देश में स्थिति गंभीर थी, महत्वपूर्ण कामो को निपटाया  जाना जरूरी था|
                      जीवन  के अंतिम क्षण में जब आम व्यक्ति आराम चाहता है ,तन मनमोहन सिंह को राजनितीक शिखर के पद की प्राप्ति होती है,जिसके लायक वह कभी नहीं रहे ,| किसी भी राजनितीक सवालों को हल्कें में लेने की प्रवृति का नतीजा है कि  देश आज बाहरी और अंदरूनी हालातों से जूझने की कवायद में भिड़ा है | यह हालात जन्म कैसे हुई ,यह जानना हो तो मंमिहन सिंह के कार्य-  कारण को जानिए ,काफी दिलचस्प जानकारियां मिलेगी | अब तक के ज्ञात इतिहास में यही जाना जाता है कि  लोकतंत्र के लिए होने वाले मतदान में जन  नायकों की भूमिका सर्वोपरि है ,वे मतदान करके यह प्रदर्शित करते हैं कि "सभी नागरिक अपने विचारों के अनुरूप के दल और प्रत्याशियों को चुने .ताकि अपने विकास के  मार्ग तय कर सके,"|
               
            

Monday, 11 April 2011

inferior character IPS officer in jharkhand

पतित  आइपीएस  के  फिर  से  सेवा   में  आने  के  आसार  
एसके  सहाय  
रांची   : झारखण्ड  में  भारतीय  पुलिस  सेवा  के  एक  पतित  पुलिस  अधिकारी  के  पुन  सेवा  में  लौट  आने  की  आशंका  है    .यह  स्थिति  राज्य  सरकार  के  अस्थिरता  का  परिणाम  है  कि  पीएस  नटराजन  नाम  का  अधिकारी   न्याय  के  उचित  प्रकिया    का  अवलंबन  करके  सरकार  को  मजबूर  करने  कि  कोशिश  किया  है  कि  उसे  वह  फिर  से  नौकरी  में  नियमित  तौर  पर  बहल  करे , अन्यथा  न्यायालय  कि   तौहीन  को  झेलने  के  लिए  तैयार  रहे .इससे  इन  दिनों  राजनितिक  क्षेत्रों   के  अलावा  प्रशासनिक  ,सामाजिक  हल्कों  सहित  हर  वर्ग  में  सरकार  कि  हालात  काफी  कमजोर  दिखी   है  ,जो  इसके  सेहत  के  लिए  ठीक  नहीं  है .
                            यहाँ  पर  जिस  पुलिस  अधिकारी  की    चर्चा  की  जा  रही  है , वह  पुलिस  महा  निरीक्षक  (आईजी )स्तर  का  है  ,जो  २००५  से  निलबिंत   है  और  जमानत  पर  करा  से  निकलने  पर  कानून  ki  तकनीकी  सीढियों  का  सहारा  लेकर  सरकार  को  विवश  करने  की  मुद्रा  में  ला  दिया  है  .अतएव   इस  पूरे  प्रकरण  को  जानने  के  लिए  २००५  की    उस  घटना  को  याद  कर्म  होगा  " जिसमे  नटराजन  एक  आदिवासी  युवती  के  साथ  अय्यासी   करते  पूरे  देश  में  देखे  गए  थे  . यह  तस्वीर  एक  निजी  टीवी  चैनल  के  द्वारा  प्रसारित  हुआ  था  ,जिसके  बाद  सरकार  ने  इस  अधिकरी   को  मुअतल  करके  अपने  कर्तव्य  की  इतिश्री  समझ  कर  इसे  पांच  सालों  तक  लगातार  अनदेखा  करती  रही  .
                 अब  ,जब  झारखण्ड   उच्च  न्यायालय  ने  सरकार  की  उस  याचिका   को  ख़ारिज  कर  दिया  है  ,जिसमे  इस  पुलिस  अधिकरी  को  निलंबन  में   रखने  के   मांग  की   गई  थी  ,तब  सरकार  को  लोक -लाज  की  याद  सताने  लगी  है  ,ऐसे  में   राज्य  की  सामाजिक  ताना -बाना  में  भरोसा   कैसे  हो  ,इसके  संकट   पैदा  हो  गए  हैं  .इसलिए  यदी    पीएस  नटराजन  जैसे  चरित्रहीन  अधिकारी  फिर  से  कुर्सी  पर  बैठ  जाएँ  ,तब  इंसाफ  का  क्या  होगा   ,इस  बारे  में  सहज  hi  सवाल  खड़े  हो  जाएँ  ,तो  आश्चर्य  नहीं   .
                 यहाँ  पर  महज  नटराजन  का  सवाल  नहीं  है , यह  चिंता  लोक  व्यवस्था  से  जुडी  है  ,जिसमे  "संवैधानिक  तौर  पर  यह  साफ  रेखांकित  है  की  "राज  कर्मचारी  अपने  पद  पर  तभी  तक  रह  सकता  है   ,जब   तक  वह  सदाचारी  है   " .लेकिन  इस  मामले  में  तो  पूरी  बात  ही  उलटी  दिख  रही  है  ,जिससे  अंदेशा  है  कि  क़ानूनी -दांव  पेंच  से   नटराजन  को  मत  देना  उतना  आसान  नहीं  है  जितना  अमूमन  समझ  लिया  गया  है  ,ऐसे  में  सरकार   हर  जाय  और  एक  कदाचारी  को  पुन :  नौकरी  पर  बुलाने  के  लिए  बाध्य  होना  पड़े  ,तब  कैसा  शासन  -प्रशासन  का  रूप  दिखेगा  ,इसकी  सहज  कल्पना  की  जा  सकती  है  .
         इस  पूरे  प्रकरण  को  समझने  के  लिए  थोड़ा  नटराजन  के  ही   बोटों  पर  विश्वास  करें ,-जिसमें  उन्होंने  कहा  था   -सुषमा  के  साथ  जो  कुछ  भी  हुआ  .उसमे  उसकी  रजा  मंदी  थी    अर्थात  परस्पर  सहमती  thi  ,इसके  लिए  उनको  दोषी  नहीं  ठहराया  जा  सकता  .
                      जाहिर  है    कि  वे  सदाचार  के   मतलब  से  अपने  को   अलग  रख  कर  सोचते  है   ,ताकि " सेवा"  का  लाभ   मिलता  रहे  ,ऐसे  में  अदी  हर  कोई  कर्मचारी  व्यक्तिगत  बात  करके  किसी   अश्लील  हरकत  को  सहज  बताने  लगे  तब  क्या  होगा  , तब  तो  हर  वक्त  अनाचार -कदाचार  कि  स्थिति  होगी   ,ऐसे " सभ्य    समाज " की  कल्पना  ही  मुश्किल  होगी   जैसी  कि  संवैधानिक  तौर  पर  सभी  नागरिकों  को  बताया  जाता  रहा  है .
              आइपीएस  नटराजन  का   मामला  सरकार  के  अनदेखी  का  है   ,यह  उस  काल  का  है    ,जब  राज्य  में  स्थायित्व  को  लेकर  राजनितिक  दलों  के  भीतर  जोड़ -तोड़  की  राजनीति  चरम  पर  थी  ,ऐसे  में  खानापूर्ति  के  लिए  आनन्  -फानन  में  इस  अधिकारी  को  निलंबित  किया  गया  और  "इस  तथ्य  को  भुला  दिया  गया  ki  निलंबन  के  बाद  की   प्रक्रिया   बर्खास्तगी   की  होती  है  |" लेकिन  यहाँ  पर  उदासीनता  ka  ऐसा  ज्वर  चढ़ा  की  सरकार  और  प्रशासक  भूल  ही   गए  की  उनके  यहाँ  एक  अय्यास  अधिकारी  भी  है  जिसे  दंडित   किया  जाना  लोक  हित  में  इसलिए  जरूरी  है  कि  लोगों  का  विश्वास  सरकार  और  प्रशासन  पर  बनी  रहे  . कानून   -व्यवस्था  को  हानि   नहीं  पहुंचे  .
                 दरअसल ,  इस  मामले  में   नटराजन   का  कोई   दोष  नहीं  है  कि   व्यवस्था  कैसी  है  ,तभी   तो  अराजक  सी  स्थिति  में  उस  पुलिस  अधिकारी  ने  कानूनों  का    पूरा  इस्तेमाल  अपने  हित  के  लिए  किया  और  यह  अहसास  करा  दिया  कि  यदि  तिकड़म  और  नियम -परिनियम  कि  थोड़ी  भी  जानकारी  हो  तो  किसी  भी  सरकार  को  अपने  अनुकूल  कारवाई  करने  के  लिए  बाध्य  किया  जा  सकता  है ,   इस  मामले  में  काफी  कुछ  ऐसा  ही   है  , नटराजन   निलबिंत  हुए  ,जेल  गए  ,फिर  जमानत  में  बाहर  आये   ,इसके  बाद  केन्द्रीय  प्रशासनिक  न्यायाधिकरण  (कैट )  में  दरखाव्स्त  किए  कि  उनके  साथ  अन्याय  किया  जा  रहा     है  ,सो  कैट  ने  इनके  पक्ष  में  फैसला  दे  दिया  ,यहाँ  पर  सरकार  इसलिए  मात  खा  गई  कि  वह  अपनी  बातों  को  ठीक  से  रख  नहीं  सकी  . ढीले -ढले  तरीके  से  किसी  मामले  को  अंजाम  तक  पहुचाने  की  प्रवृति   ने   राज्य  को  काफी  नुकसान  पहुँचाया  है  ,जिसका  इसमें  एक   झलक  है  .
   कैट  के  आदेश  के  तहत   नौकरी  पर  रखे  जाने  की  बात  पर  सरकार  ने  झारखण्ड  उच्च  न्यायालय  से  इसमें  रोक  लगाने   की  गुहार  की  ,तब   यहाँ  पर  भी   सरकार  को  मात  खानी  पड़ी  .ऐसे  में  आसार  इसी  के  है   कि  पतित  समझे  जाने  वाले  नटराजन  एक  बार  फिर  पुलिस  की  लाठियां  भांजते  नज़र  आवें .
           इस  घटना  से  जाहिर  है  की  कानून  --संविधान  का  कोई  मतलब  नहीं  है   . व्यावहारिक  स्तर  पर  तो  यही  फिलवक्त  दिखा  है  ,वैसे  राज्य  सरकार  अब  उच्चतम  न्यायालय  में  एक  बार  फिर  इस  मामले  में  जाने  को  सोच  rahi  hai . लेकिन  प्रश्न  है  कि    जब  खुद  को  अपने  शक्तियों  के  बारे  में  पता  नहीं  हो  ,तब  कैसे  ऐसे  मामले  को  संभाल  सकते  है   ,झारखण्ड  का  यही   मूल  संकट  है  

 

Monday, 28 March 2011

public problem

                                       एलपीजी संकट और बाजपेयी युग
                                               एसके सहाय

मेदिनीनगर :स्थानीय स्तर पर एलपीजी की समस्या पूरे देश में है लेकिन बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा की यह कैसे संकट  के रूप में उत्पन्न हुआ, सो इसे जानने लिए आपको  प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल को जानना होगा ,तब यह पता चल सकेगा कि कैसे इसकी आपूर्ति में संकट पैदा होने की शिकायत बराबर  मिलती रहती है . 
                          एलपीजी के बारे में सबसे ज्यादा शिकायत यह है कि स्थानीय स्तर पर गैस आपूर्ति के लिए वितरक के पास सूचना दर्ज कराने के बाद भी यह तय अवधि में सिलिंडर  की आपूर्ति नहीं  करती है ,इससे क्षोभ होना स्वाभाविक है , आखिर तय समय में आपको रिफिल  क्यों नहीं पहुँचाया गया  ,इस पर कभी आम आदमी सोचता नहीं , सिर्फ अपने फायदे को ध्यान में रख कर ही काम करने की प्रवृति से संकट और अधिक गहरा जाने की स्थिति उत्पन्न होती है ,जो समाज में आलस्य पैदा  करने में सहायक  होती है .
                              यहाँ पर किसी सरकार के पक्ष -विपक्ष में विचार करना या अच्छा -बुरा बताना मकसद नहीं है ,केवल यह याद दिलाने की कोशिश है कि " कैसे  नीतियों के परिवर्तन से पूरा समाज प्रभावित होता है ,इसकी जानकारी सत्ता  में बैठे लोगों को नहीं होती, " जैसा कि बाजपेयी सरकार में हुआ .घरेलु गैस आसानी से मिले ,इसकी  परिकल्पना खुद बाजपेयी जी  ने की थी और यह भी सच्चाई है कि   राष्टीय जन्त्तान्त्रिक गठबंधन की सरकार केंद्र में रही ,तबतक एलपीजी के लिए विशेष चिंता के विषय उपभोक्ताओं के लिए नहीं बने थे ,  इसमें एक प्रमुख वजह यह थी कि सरकार ने "नीति "ही इसप्रकार तय  कर दिए कि "जो भी नागरिक ,जहाँ भी रहे ,वे पूरे भारत में कहीं से भी एलपीजी के लिए आवेदन कर उसे प्राप्त कर सकतेहैं ,केवल भारतीय पहचान होने की पुष्टि होना जरूरी घोषित  किया गया "   
                      इस नीति से सभी केलिए गैस मिलना सुलभ हो गया ,स्थानीयता का बंधन नहीं रहने से इसका लाभ समान रूप से सभो को मिला ,लेकिन परवर्ती काल में यही अब समस्या पैदा कर दी है ,जो आये दिन एलपीजी के लिए शोर सुनने को मिलता रहता है ,यहाँ यह भी ध्यान देने लायक तथ्य है कि बाजपेयी की सरकार जब तक  थी  सिलेंडर के आपूर्ति में कोई भी शिकायत नहीं थी ,इस बात को आज भी लोग बड़े जोर देकर तस्दीक करते  है लेकिन अब इसकी आपूर्ति में अनियमितता की शिकायत लगभग हर शहरों -कस्बों से मिल रही है .
                                  देखा जाय तो , मालूम होगा कि      "स्थानीयता के बंधन के नहीं रहने से एक बितरक के पास अचानक कनेक्शन के लिए आवेदनों की  बाढ़  आ गई ,जो उसके क्षमता के अनुकूल नहीं थे , ऐसे में किसी को कनेक्शन के लिए मना करना भी क़ानूनी तौर पर जुर्म होता ,ऐसे में सभी को समान रूप से कनेक्शन के लिए मंजूरी दी गई इससे घरेलु आपूर्ति में बाधा होना सवाभाविक था .
                          इस संदर्भ में एक बात और ध्यान देने की है, वह यह कि " बाजपेयी सरकार के  पहले   वितरकों के लिए आपूर्ति क्षेत्र का निर्धारण किया जाता था , जिसके बाहर गैस आपूर्ति की मंजूरी नहीं दी जाती थी ,इससे आपूर्ति में अनावश्यक दबाव वितरक पर नहीं होता  था "     अर्थात नगरपालिका ,पंचायत ,प्रखंड जिले वगैरह को क्षेत्राधिकार घोषित करके वितरक को लाइसेंस दिए जाते थे ,जिससे भी आपूर्ति सहज होने में मदद मिलती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है ,जिस के कारण    बराबर एलपीजी के लिए आन्दोलन होते रहन की खबरें मिलती रहती है .
                            इन बातों को समझने के लिए उदाहरण के तौर पर  डालटनगंज (मेदिनीनगर ) के एक वितरक की हालत को जानिए , १९९८ के पहले इसके पास गैस के मात्र ६ हज़ार उपभोक्ता थे ,इसे सिलेंडर की आपूर्ति केवल नगरपालिका क्षेत्र में करने के लिए ही आदेश था ,इसके बाहर के नागरिकों को  कनेक्शन देने की क़ानूनी मनाही थी ,इसतरह के क्षेत्राधिकार  देश में वितरकों के निश्चित थे,इससे समयबद्ध तरीके से  रिफिल उपभोक्ताओ को होता था ,लेकिन जब बाजपेयी ने गैस कनेक्शन लेने की प्रक्रिया आसान बन दिए तब   उस वितरक के पास डेढ़ सालों में २२ हज़ार उपभोक्ता पंजीकृत हो गए और इसके आपूर्ति करने के क्षमता पर यह बोझ बन गया   और आज   हालत यह है कि  इस बितरक के पास से माह मेंकेवल करीब ७००० -८०००   उपभोक्ताओं को ही सिलिंडर का लाभ मिल पता है ,
        मजे की बात है कि    इस वितरक के पास ५०० से १०० किलोमीटर पर रहने वालों का भी कनेक्शन है यह स्थिति सिर्फ इसकी नहीं है ,यह सारे देश के गैस वितरकों की है जहाँ से कनेक्शन  बेहिसाब जारी हुए है,इसी से आपूर्ति प्रभावित है तो ताज्जुब नहीं .
                               मतलब यह कि नीतियों के परिवर्तन से लाभ हैं ,तो हानि भी है ,इन दोनों में कौन सी नीति ज्यादा कारगर है  यह खुद सरकार  को ही मालूम  नहीं है           
           







Saturday, 26 March 2011

mane-matlab


                    बेबसी में मनमोहन की बातें
                                                एसके सहाय
                               प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का पिछले दिनों संसद और इसके बाहर लगातार भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में यह कहना कि "उनको पत्ता नहीं है, सरकार को स्थायित्व  की मज़बूरी  में  ए राजा जैसे  को मंत्री मंडल में बनाये रखना पड़ा"  काफी हद तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को बेपर्द करने के लिए एक मजबूत आधार विपक्ष को अनायास दे दिया है.साथ ही रूपये के लेनदेन को  अपनी जानकारी में नहीं होने की बात करके यह स्पष्ट कर दिए कि मामला बहुत ही गंभीर है, अतएव आने वाले दिन केन्द्रीय सत्ता के लिए काफी चुनौती वाल होगा, ऐसा प्रतीत  है.
                                       इन निहितार्थों को समझने के पूर्व मनमोहन सिंह के राजनीतिक जीवन और इसके पूर्व के जिन्दगी को जानना जरूरी है, ताकि यह बात देशवाशियों को मालूम पड़े कि इस प्रधान मंत्री से विशेष की उम्मीद बांधे रखना बेकार की बातें हैं .ऐसा इसलिए कि यह  इनके सार्वजनिक जीवन कि शुरूआत १९९१ में केन्द्रीय वित्त मंत्री के रूप में हुआ , इसमें यह लोगों को मालूम नहीं था कि प्रधान मंत्री कौन होगा , लेकिन यह सभी पहले से जानते थे कि "प्रधानमंत्री कोई भी होगा,  मगर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ही होगे." ऐसा कयास और विश्वास क्यों देश को था ,यह बताने की जरूरत नहीं है ,सोवियत संघ का पतन ,भूमंडलीकरण , उदारवाद और बाजार को एक साथ मिला कर देखे , जिसमें मनमोहन को विश्व बैंक में कार्यकाल के तरीके को जाने,  तब यह बताने कि आवश्यकता नहीं है कि इनके पीछे कि पृष्ठभूमि  क्या रही है .
                                इतना ही नहीं ,मनमोहन को जानने का एक उदहारण काफी है ,वह यह कि अपनी सरक्षण कर्त्ता सोनिया गाँधी के चापलूसी में या कहिये कि उनकी कृपा बनी रहे इसके लिए अपने से कई गुणे छोटे शख्स के लिए कैसे साष्टांग दंडवत करते है ,उसका मिसाल इंडियन एक्सप्रेस कि वह तस्वीर है " जिसमें इनको प्रियंका गाँधी के बेटे को दोनों हाथ  जोड़े प्रणाम की मुद्रा में दीखते है " यह घटना करीब दस साल पहले की है , जो बयां करती है "चारण प्रवृति " से  यह बाहर नहीं हैं .
                                             दरअसल मनमोहन सिंह सारी जिन्दगी नौकरी करते  रहे है ,सेवा निवृति के बाद का जीवन कांग्रेस से सीधे जुड़ा, इसमें इनको अहसास हुआ कि नेहरू -गाँधी परिवार का वंदना  करके सत्ता से अपने को जोड़ा रखा जा सकता है और इसी को उन्होंने अपना मूल सीढ़ी बनाया , जिसका नतीजा है कि वह आज देश के कल्याण के नाम पर ' भ्रष्टाचारियों के हाथों की कठपुतली बन कर रह  गए हैं" 
                                मनमोहन सिंह वास्तव में निहायत शरीफ लेकिन अराजनीतिक प्राणी है ,तभी तो बार -बार यह कहना कि "उन्होंने अपनी तरफ से कोई लाभ नहीं लिया है ,जो कुछ भी हुआ वह राजनीतिक जरूरतों कि पूर्ति के लिए हुआ " इस बात में दम है और प्राय लोग विश्वास भी करते है लेकिन जिस तरह से "सत्ता" में बने रहने के लिए अपनी बैटन को सामने रख रहें हैं ,वह साफ परिलक्षित करता है किसी के इशारों में ही उन्होंने अपने विचार रखे है और जाँच हेतु कदम बढ़ाये हैं ,वह शख्स कौन है ,यह सभी जानते है मगर राजनीतिक क्षमता के अभाव में प्रतिपक्ष वह जन आन्दोलन खड़ी करने  में लाचार हैं ,ऐसा इसलिए कि खुद राष्टीय जनतांत्रिक गठबन्धन का चेहरा पाक साफ नहीं है ,यहाँ भी कई दागदार चेहरे हैं "जो सिर्फ राजनीती के लिए राजनीती  करने में विश्वास करते है ,जैसा कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने खुद के व्यावहार से परिचय दिया है , जो राजनीती का केवल एक भाग है अर्थात "किसी तरह सत्ता में बने रहो "  यही राजनीती का अर्थ है .
                                    बहरहाल , आज जो भी कुछ देश में हो रहा है ,उसके पीछे मनमोहन सिंह का विशेष योगदान नहीं है ,बल्कि इनके आधार को समझने के लिए आपको थोड़ी मगजमारी करनी होगो और यदि वह भी आप नहीं कर सकते तो हम आपको खुद बता देते हैंकि सिंह प्रधान मंत्री के पद पर तब तक बने रहेगें ,जबतक सोनिया जी की इच्छा होगी ,इस परिप्रेक्ष्य में थोडा पीछे  जाएँ तब मालूम होगा कि "सत्ता" पर अपनी पकड मजबूत रखने के लिए कैसे  -कैसे कदम बढ़ाये गए .
                                   यहाँ दो दृष्टान्त का उल्लेख करना जरूरी है ,पहले यह कि जब महिला राष्टपति  को लेकर पक्ष -विपक्ष में जवाब सवाल  के बीच वामपंथियों  ने जोर दिया कि महिला वर्ग से ही उक्त पद पर कांग्रेस अपना उम्मीदवार दे ,तब कांग्रेस ने या कहिये  सोनिया जी के संकेत पर प्रतिभा पाटिल का नाम सामने आया , जब यह नाम पहली बार देश के लोगों को सुनने को मिला , तब काफी ताज्जुब और आश्चर्य कि स्थिति सार्वजनिक क्षेत्रों में थी ,क्यों कि इनसे कई गुणे स्थापित और चर्चित  महिला नेत्री  कांग्रेस के पास थी मगर इनके नाम की जगह पर अनजाने से नाम पर सहमती बनी . दूसरा यह कि प्रधान मंत्री के लिए नामों पर कांग्रेस बिचार कर रही थी तब मौजूदा प्रधान मंत्री से ज्यादा काबिल और सजग राजनीतिक पार्टी में मौजूद थे लेकिन इनकों नजरदांज करके मनमोहन सिंह को ही  चुनने का मतलब आज की पैदा हुई हालातों से खुद को बचाने का उपक्रम करना भर है ,ऐसा इसलिए कि कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति ,जो थोडा भी सार्वजनिक जीवन में सक्रीय रह कर उक्त पद हासिल करेगा वह कम से कम बचकानी बयान तो नहीं ही देगा ,जैसा कि मनमोहन सिंह ने खुद कहा कि "मुझे तो कुछ भी पत्ता नहीं "
                      प्रधान मंत्री के खुद की बात ने करीने से साफ कर दिया है कि संप्रग की वर्तमान सरकार सिर्फ सत्ता के लिए है ,जिसका केवल एक मात्र लक्ष्य  अपने आका के राजनीतिक हितों का प्रबंधन करना है .
             मन