Tuesday, 20 March 2012
Monday, 19 March 2012
त्रिवेदी के इस्तीफे के मध्य रेलवे बजट के खास पहलू
(एसके सहाय)
रेल मंत्री के पद से दिनेश त्रिवेदी के त्याग पत्र दिए जाने के बाद,ऐसा नहीं है कि रेलवे के हालात में कोई गुणात्मक परिवर्तन के आसार दीखते हों |ऐसा संभव है कि कुछेक बिंदुओं पर सस्ती और सतही घोषणा हो जाय, परन्तु मूल समस्या जो इसके हैं ,वो जस -के -तस ही रहने वाले हैं |इसमें बदलाव तभी हो सकते हैं ,जब स्थायित्व सरकार के स्थायी रेलमंत्री हों ,तदर्थ मंत्रियों के रहते आमूल चूल परिवर्तन और राष्ट हितकारी के सपने देखना मन को भुलावे में रखने के बराबर है |इसलिए एक नजर इसके चाल -ढाल पर दौडाना लाजिमी है |इसी को ध्यान में रख कर कहना है |
वैसे , यह परिघटना १०७० के दशक की शुरूआत की है | उस दौर में रेल मंत्रालय ने प्रांतीय राजधानियों को द्रुतगामी रेल सेवा से राष्टीय राजधानी नई देहली को जोड़ने के लिए "राजधानी एक्सप्रेस " नाम से यात्री ट्रेन के परिचालन प्रारंभ किया ,जिसके ठहराव केवल राजधानी में ही नियत किये गए लेकिन इसमें अफवाद स्वरूप एक ठहराव "रायबरेली " को भी दिया गया और यह ठहराव राजनीतिक सोच के तहत दिए गए ,क्योंकि उस क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी कर रही थी |
इसी तरह, दूसरे मामले का रिश्ता आजादी पूर्व का है ,जिसमे रेलवे की एक महत्त्वपूर्ण योजना गुलाम भारत में ही करीब अस्सी फीसदी पूरी कर ली गई थी मगर स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही इसके निर्माण पर अनिश्चित काल के लिए ग्रहण लग गया और यह निर्माणाधीन योजना क्यों स्थगित किया गया ,उसका कोई साफ -साफ जवाब आजतक किसी भी केंद्र सरकार ने नहीं दिया ,इसके बावजूद कई योजना रेलवे अपने हाथों में लेता रहा लेकिन पहले की अपूर्ण योजना को पुरे किये जाने के प्रति कभी भी खास दिलचस्पी नहीं ली |नतीजतन ,धरना ,प्रदर्शन ,घेराव जैसे आंदोलन होते रहे और रेल मंत्रालय इसे नजरंदाज करती रही |यह हाल दिखा है रेल मंत्रालय का ,जिसमे दूरगामी सोच की अवधारणा का कुछेक समय के बाद विलोप हो गया और तदर्थ आधार पर परियोजना बनने लगे |
इन दो परिदृश्यों से प्रकट है कि रेल शुरू से ही राजनीतिक शक्तियों का खिलौना बना रहा |ऐसे में दिनेश त्रिवेदी काफी अरसे बाद थोड़ी ईमानदारी का इजहार देश के वर्तमान जरूरत के हिसाब से किया तो मानो पहाड टूट गए और लगे हाथ अपनी ही पार्टी के प्रमुख ममता बनर्जी की आलोचना के शिकार होने लगे और यह कबतक रेल मंत्री के पद पर बने रहेगें ,यह संशय का प्रश्न बन गया है |तात्पर्य यह नहीं कि त्रिवेदी ने सबसे बेहतर रेल बजट को जनोन्मुखी स्वरूप में प्रस्तुत किया है | कहने का मतलब यह कि पूर्व के मंत्रियों कि तुलना में इनका पेश किया गया बजट अन्यों से ठीक है |ऐसा योजनाओं एवं आर्थिक जरूरतों के दृष्टि से परिलक्षित है ,इसलिए इस रेल बजट को २०१२-१३ के लिए परिवर्तनकारी समझा जाय तो गलत नहीं होगा |
अतएव , रेल मंत्री के रूप में त्रिवेदी ने समग्रता में रेल बजट को प्रस्तुत करने को कोशिश की है ,जिसमे यात्री किराये में वृद्धि को अधिसंख्य नागरिकों ने गंभीरता से नहीं लिया है और कोई लिया है तो वह इनकी पटी प्रमुख ममता बनर्जी ने ही ,जिनकी तुनक मिजाजी से अब बंगाल ही नहीं बल्कि पुरे देश के लोग आजिज आने लगे हैं ,जिसका भान खुद ममता को फ़िलहाल नहीं है लेकिन यह कटु सत्य है ,जो ठोस तौर पर व्यावहारिक होने के इंतजार में है |
बहरहाल , इस रेल बजट को खास राजनीतिक चाहत का नतीजा नहीं कहा जा सकता ,वह इसलिए भी कि इसमें वो रेखांकित नहीं है ,जो कभी ममता ,लालू , नीतीश और राम विलास के कार्यकाल में परिलक्षित होता था ,जहाँ खुल कर बजट में अपने राज्यों के लिए विशेष जगह होती थी ,इसलिए इसे अलग ही कहा जा सकता है ,जो दिनेश त्रिवेदी को अन्य रेल मंत्रियों से अलग और राष्टवादी सोच के राजनीतिज्ञ की श्रेणी में शुमार कर दिया है ,जो इसकी खास बात उल्लेखनीय है |इस आधार पर पेश बजट की आलोचना कतई संभव नहीं | वैसे ,आलोचना के लिए आलोचना हो तो बात अलग है |
इसलिए रेलवे को यदि व्यवस्थित रूप देना है ,तब इसके लिए सुविचारित नीति ,जो लोकतान्त्रिक अवधारणा के तहत लोक कल्याणकारी भाव से व्यावसायिक स्वरूप देना होगा ,जैसा कि इस बजट में दीखता है | त्रिवेदी ने कोशिश की है और इस कोशिश को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है क्योंकि पक्षपात पूर्ण रूख से क्षेत्रीय असंतोष स्वाभाविक तौर पर विस्तृत स्थान घेरती है ,जो एक देश -राज्य के लिए नुकसानदेह ही होगा ,इसे भलीभांति समझने कि आवश्यकता है | इंदिरा गाँधी ने अपने चुनाव क्षेत्र के लोगोएँ को राजधानी एक्सप्रेस का तोहफा देकर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने में पहल की और बदकिस्मत से तत्कालीन रेल मंत्री ने इसे नजरंदाज भी कर दिए ,जिसका परिणाम है कि अब हर कोई रेल को लेकर राजनीती करने को आतुर है और आर्थिक योजना के स्थान पर राजनीतिक रणनीति काम करने की प्रवृति पिछले दो दशक से परवान पर है ,जो क्षोभ पैदा करने में मददगार सिद्ध हो रही है ,जो देश के सेहत के लिए उचित नहीं है बल्कि इसके जगह पर सैधांतिक आधार को महत्त्व दिया जाना चाहिए ताकि आपसी लगाव की दुरी में खटास नहीं हो | राजधानी एक्सप्रेस की शुरूआत हुई थी .तब इसके लिए खास अवधारणा तैयार किया गया था ,जिसमे आर्थिक मजबूती के साथ -साथ राजनीतिक जुडाव भी इसके मुख्य तत्व थे लेकिन अब हाल यह है कि ट्रेन कहलाती है एक्सप्रेस और इसके चाल और ठहराव से खीझ पैदा होती है | ऐसा इसलिए कि राजनीतिक चाहत ने छोटे -छोटे स्टेशनों को रूकावट के तौर पर इसकी चाल -लक्षण को खस्ताहाल बना देने में अहम योगदान दिया है ,जहाँ आर्थिक लाभ के बड़े स्रोत के दर्शन भी रेलवे को नहीं होते जो इसकी मूल शक्ति है |
दरअसल , व्यवस्था के लोकतान्त्रिक स्वरूप में ही "लोकप्रियता " ऐसी प्रक्रिया है ,जिसके लोभ संवरण करने में कई अच्छे नेताओं को बेनकाब कर दिया है और इसका दिग्दर्शन रेल महकमे में ज्यादा है ,तभी तो इसके लेने को लेकर गठबंधन सरकार के दौर में काफी जोड़- तोड़ होती है ,जैसा कि पूर्ववर्ती कई मंत्रियों के काल में हुआ है | अपने क्षेत्र में रेलवे का विकास हो ,इसे कौन इंकार कर सकता है ,लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यावसायिक सिंद्धात के फैसले को दरकिनार कर दिया जाय ,जैसा कि विगत दो दशकों से होता आ रहा है
रेलवे को नई परियोजना में हाथ डालने के पूर्व एक बार पहले से निर्माणाधीन योजनाओं को देखना चाहिए कि ,उसकी क्या हाल है ? समय से यह कार्य कर रही है या नहीं ,या धन की कोई कमी तो नही है , अन्य योजना हाथ में लेने से कहीं इसके निर्माण में खर्च हो रही राशि का टोटा तो नहीं हो जायेगा | ऐसा ही ,नज़ारा उस वक्त था ,देश आजाद हो गया था बरवाडीह -चिरमिरी रेल खंड के लिए स्टेशन, पुल -पुलिया ,कर्मचारियों के क्वार्टर ,बंगले , रेल पटरी वगैरह के काफी हद तक काम पुरे कर लिए गए थे ,जिसके अवशेष आज भी देखें जा सकते हैं ,जहाँ अब झाड -फूंक के रूप में बड़े -बड़े दरख्त के विहंगम दृश्य विधमान हैं | यह नजारा ,झारखण्ड के पलामू -गढ़वा जिले और इससे सटे छतीशगढ के अंबिकापुर ,रामानुजगंज ,जसपुर तथा अन्य इलाके है जहाँ भी रेलवे के खंडहर दीखते हैं |
साफ है कि रेलवे के संचालन में आर्थिक जरूरतों को नजरंदाज करने और राजनीतिक स्थितियों के अनुरूप दिशा तय करना ही इसके दुर्दशा के लिए जिम्मेदार तत्व है पुराणी योजन पूरब हुई नहीं और लगे हाथ नई योजना को क्रियान्वित करने कि ललक ने आज रेलवे को इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है कि इसे सुधरने के लिए कड़े निर्णय लेने होंगे ,तभी इसकी हालत में सुधर हो सकेगी |त्रिवेदी के पेश बजट में ज्यादा ललो-चपो नहीं था ,इस लिए इसकी आलोचना सिर्फ विपक्ष की अपनी उपस्थिति जतलाने भर थी ,ऐसे में त्रिवेदी को खास मुश्किलों का सामना दूसरे से नहीं बल्कि अपनों से ही थे ,जिसका नतीजा इस्तीफे में देखने को मिला है ,जिसमे तृणमूल प्रमुख एवं पशिचमी बंगाल के मुख्य मंत्री ममत बनर्जी को फ़िलहाल खलनायक बना दिया है ,जिसके लिए दिनेश जिम्मेवार कतई नहीं है |यह राजनीतिक खेलों का ही नतीजा है कि बजट पेश किया कोई और पारित होने में अहम भूमिका कोई अन्य निभाता है |रेलवे को नई परियोजना में हाथ डालने के पूर्व एक बार पहले से निर्माणाधीन योजनाओं को देखना चाहिए कि ,उसकी क्या हाल है ? समय से यह कार्य कर रही है या नहीं ,या धन की कोई कमी तो नही है , अन्य योजना हाथ में लेने से कहीं इसके निर्माण में खर्च हो रही राशि का टोटा तो नहीं हो जायेगा | ऐसा ही ,नज़ारा उस वक्त था ,देश आजाद हो गया था बरवाडीह -चिरमिरी रेल खंड के लिए स्टेशन, पुल -पुलिया ,कर्मचारियों के क्वार्टर ,बंगले , रेल पटरी वगैरह के काफी हद तक काम पुरे कर लिए गए थे ,जिसके अवशेष आज भी देखें जा सकते हैं ,जहाँ अब झाड -फूंक के रूप में बड़े -बड़े दरख्त के विहंगम दृश्य विधमान हैं | यह नजारा ,झारखण्ड के पलामू -गढ़वा जिले और इससे सटे छतीशगढ के अंबिकापुर ,रामानुजगंज ,जसपुर तथा अन्य इलाके है जहाँ भी रेलवे के खंडहर दीखते हैं |
Saturday, 10 March 2012
युवा नेतृत्व के भरोसे पर
युवा नेतृत्व के भरोसे पर
(एसके सहाय )
अब ,जब उत्तर प्रदेश में युवा नेतृत्व के हाथों में सत्ता की बागडोर कुछेक दिन में होगी ,तब यह विचारणीय प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि किस परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के नाम पर एक बार जुआ खेलने का निर्णय लेने को मजबूर हुई ,जुआ इसलिए कि खुद अखिलेश और मुलायम सिंह यादव के निकट के साथी इस नेतृत्व के फैसले से अनमने से थे और इसका दिक्दर्शन आजम खान के रूख से परिलक्षित हुआ भी ,इसके बावजूद ,इस युवा नेतृत्व के मुख्य मंत्री बने का मार्ग साफ हुआ | अतएव ,एक बार फिर नए सिरे से अनुभव शून्य नेतृत्व का साबका ठीक उस प्रकार देश के सबसे बड़े सूबे में दिखने को मिलेगा ,जैसा कि राजीव गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के वक्त था |
फ़िलहाल , अखिलेश, मुख्य मंत्री के पद संभालेंगे और मुलायम छाया की तरह उनके मार्गदर्शन करेंगे | भारतीय राजनीति का यह चेहरा अगले छ माह तक काफी दिलचस्प होगा | रोचक इसलिए कि इतिहास को देखें ,तब आय काफी कुछ -कुछ राजीव गाँधी के सिंहासनारूढ़ की तरह है ,वह ऐसा इसलिए कि ,जब राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बने थे , तब कांग्रेस के अगले वर्ष शताब्दी वर्ष था और इसके उपलक्ष्य में 1985 में पार्टी के आयिजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि " देश के विकास मद की 100 फीसदी राशि र्मे से मात्र पांच प्रतिशत ही निर्धनों याने आम देश वाशियों के पल्ले पड़ती है ,बाक़ी बिचौलिये रास्ते में ही खा जाते हैं और इस स्थिति को बदलना उनकी सरकार का प्रथम कर्तव्य है " परवर्ती काल में क्या हुआ और क्या हस्र कांग्रेस की सरकार को प्रचंड बहुमत रहते झेलना पड़ा ,इसे बताने की जरूरत यहाँ नहीं है |
बहरहाल , अखिलेश ,राजीव के बनिस्पत ज्यादा खुशहाल हैं ,वह इसलिए कि इनके प[इत मुलायम अभी जीवित हैं और सक्रिय राजनीति में पूरे -दम -ख़म के साथ मौजूद भी है ,जो राजनीति के उचित -अनुचित परिणामों के प्रति आगाह करते रहेंगे लेकिन क्या इतने से भर से अखिलेश का काम चल जायेगा ? कदापि नहीं | फिर तो हल क्या है ? हल है .लेकिन उसके लिए "दृढ इच्छा " की जरूरत है और यह फौलादी इरादा वैसे अखिलेश में चुनावी दौरे और भाषणों के दौरान दिखा भी है .जिसे मूर्त रूप होते देखना भी प्रान्त के लोग चाहते भी है |
उत्तर प्रदेश के लिए ,वर्तमान समय में "कानून एवं व्यवस्था " ही मुख्य समस्या है ,जिसे सत्ता से ख़ारिज किए गए मायावती ने हार के बाद बहुत ही स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है कि " बसपा के कार्यकर्त्ताओं को निराश होने की जरूरत नहीं है ,सपा के राज -काज में कानून -व्यवस्था के हालात बिगड़ेगी ,2007 की तरह ही स्थितियां , राज्य में गुंडागर्दी का नजारा होगा ,जिससे लोगों का मोह भंग होना निश्चित है " इस नपे -तुले बयान के बाद ही तुरत जीत के बाद पहले संवाददाता सम्मलेन में अखिलेश ने भी अपनी और सपा के सर्वोच्च प्राथमिकता कानून -व्यवस्था को ही बनाये रखने की बात की है ,इससे उम्मीद है कि बसपा और सपा याने दोनों को यह पत्ता है कि यदि राज्य में शांति बनी रहती है ,तभी उनका टिकाऊपन होगा ,सो इसके खतरे से पक्ष -विपक्ष वाकिफ हैं | इस मुदे कि गंभीरता का अहसास अखिलेश को है ,तभी तो विधायक दल एक नेता चुने के बाद अपनी पहली बोल में ही "कानून -व्यवस्था को पुन: रेखांकित किए |इसलिए ,अभी तो भरोसा ही किए जाने के क्षण हैं |
इन परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट होगा कि देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीति पर इन दिनों राजनीतिक समीक्षकों का ध्यान स्वाभाविक तौर पर है और अगले कदम का इंतजार है कि अखिलेश की रहनुमाई में कैसे कार्यक्रम का प्रदर्शन यहाँ होता है ? यह इसलिए भी भारतीय राजनीति में वंशवाद अब प्रयोग की उतनी महत्पूर्ण विधा नहीं रही ,जैसा कि नेहरू -गाँधी के ज़माने में हुआ करती थी और अब लोकप्रियता है तो योग्यता भी है ,जिसका निर्धारण मतदाता ही अपने मनोयोग से कर रही है और यदि ऐसा नहीं होता तब , राहुल गाँधी को यूपी के लोग नहीं ठुकराते बल्कि अच्छी -खासी वोट देकर कम से कम विपक्ष में बैठने लायक बहुमत तो देते ही .लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि सिर छुपाने के लिए भी जगह नहीं दी ,जिसका मतलब बहुत ही साफ है और यह कि केवल हवाबाजी के बातों से काम नहीं चलने वाला ,वरन कथनी -करनी में साम्य का भी दिक्दर्शन होना चाहिए ,जैसा कि अखिलेश ने डी पी यादव ,अमर सिंह और अपने चाचाओं के प्रति किया है और यही पूंजी भरोसे का अभी अखिलेश के पास है ,जिसका अभाव अन्य युवा नेतृत्व को हैं |
वैसे में अखिलेश की बातों में अभी भरोसा किया ही जाना चाहिए ,ताकि इनके प्रवृतियों का परीक्षण हो सके |किसी भी राज्य का पहला दायित्व कानून -व्यवस्था को बनाये रखने का है फिर विकास की गति को धैर्यपूर्ण तरीके से अमली जामा पहनने से है ,जिसका बैचेनी से उत्तर प्रदेश को इंतजार है | इसके लिए अखिलेश के पास समय भी काफी है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह दूसरों के मीन-मेख निकलने में अपना वक्त जाया करें ,वक्त किसी का इंतजार नहीं करता बल्कि लोग समय की प्रतीक्षा करते है ताकि अपनी सोची योजना को मूर्त स्वरूप दिया जा सके .ठीक उसी प्रकार जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने पांच साल का इंतजार किए और इन वर्षों में समूचे सूबे में मायावती के खिलाफ अलख जगाते रहने में अपने को कभी अकेला नहीं माने और अब यही तेवर -धैर्य अखिलेश में देखना बाक़ी है |
और एक सलाह अखिलेश को ,वह यह कि आपराधिक तत्वों से दोस्ती मत करो और न ही प्रोत्साहन दो ,केवल जन कल्याण के मद्देनजर समग्रता में निर्णय लो ,फिर सिर्फ पानी -बिजली और सडक के विकास को फिलवक्त प्राथमिकता दो .देखो भविष्य के रास्ते और सुखद एवं आश्चर्यित होंगे | फ़िलहाल इतना ही --
Thursday, 8 March 2012
झारखण्ड की राह पर उत्तराखंड
उत्तराखंड भी अब झारखण्ड की राह पर है | खबर है कि कांग्रेस भी अब राज्य में सरकार बनाने के लिए कमर कस चुकी है |ऐसे में सरकार के स्थायित्व का संकट बराबर रहेगा ,जो इस खुबसूरत वादियों वाले प्रान्त को बर्बाद कर देगी |जोड़ -तोड़ और धूर्त चालें अब इसके मुख्य अस्त्र होगें ,जिसमे आम लोग पीसने के लिए अभिशप्त होगें |यही संसदीय प्रणाली के लोकतंत्र का विद्रूप चेहरा है ,जो कई प्रदेशों में भी दिखता रहा है |इसके बावजूद भी कोई धीर -गंभीर शक्ति जनहितों के अनुरूप सार्वजनिक क्षेत्र में राजनीति को एक ठोस दिशा देने के लिए आगे बढ़ने से कतराती है और यह स्थिति व्यवस्था से ही चिढ लोगों को पैदा करने में योगदान दे रही है ,जो किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए भविष्य में नुकसान दायक हो सता है |
आकंड़े और वह भी प्रतिनिध्यात्मक संख्या संसदीय व्यवस्था में समूचे जन विश्वास को अपने में नहीं समेटती ,बल्कि टुकड़े -टुकड़े में स्थानीय "मनो इच्छा "को अभिव्यक्त करती है ,इसे समझने की जरूरत है |इसे ही समझ कर और अनुभूत करके कांग्रेस के ही एक दिबगंत नेता बसंत साठे ने इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्रित्व काल में और खुद मंत्री रहते अध्यक्षात्मक प्रणाली की सरकार अर्थात व्यवस्था की जोरदार वकालत की थी लेकिन 1982 में उठाई गई बात अब भी देश के लिए प्रासंगिक है और बहस की मांग करते है ,जिस पर वाकई में गौर करने की आवश्यकता है | यह विषय जब साठे ने आम लोगों के बीच विचार करने के लिए रखा ,तब इसे हल्के से लिए गए और तत्कालीन सता और प्रतिपक्ष मतलब सभी पक्षों ने इसे अपने -अपने तरीके से शंकालू होकर अपनी बातें ,दबी जबान से की थी ,इसलिए यह बहस आगे नहीं बढ़ सकी |खुद इंदिरा गाँधी ने ही इसे उस वक्त ध्यान नहीं दी थी ,अन्यथा परवर्ती दिनों में कुछेक परिवर्तन देखने को मिल सकता था |
खैर, अब .जब उतराखण्ड में कांग्रेस और भाजपा की संख्या एक -दो से पीछे है और राज्य में संघ सरकार द्वारा पदस्थापित कांग्रेस चरित्र के राज्यपाल मार्गरेट अल्वा मौजूद है ,तब एक बार फिर देश को सरकार बनाने के लिए हो रहे नौटंकी देखने का मौका मिल सकती है और इन दलों से अलग जीत कर आए दलों में भी टूट -फुट और बागीपन के तेवर दिखेंगे ,जिसमें पद और मुद्रा ही सत्ता की चाभी इनके बीच स्थायित्व का मानक बनेगा ,इससे इतर कुछ भी नहीं और यदि कोई चतुर नेता खासकर भाजपा और कांग्रेस से गोल - गोल बातें करते हैं तो उसका कोई मतलब यथार्थ राजनीति से नहीं होता ,सिर्फ "सत्ता " ही इनके येन -केन -प्रकारेण लक्ष्य होते हैं .जहाँ सैधान्तिक , आदर्श और चरित्र के लिए कोई जगह नहीं होती |ऐसे में अब देखने लायक यह होगा कि राज्यपाल किसे सरकार बनाने के लिए सर्व प्रथम बुलावा देती है ,वैसे दावे तो दोनों कर ही चुके हैं |
उत्तराखंड और झारखण्ड समेत छतीशगढ प्रदेश का गठन एक साथ थोड़े -थोड़े अन्तराल के बाद 2000 में हुआ |इतफाक से झारखण्ड को छोड़कर इन दोनों राज्यों में स्थायित्व का संकट प्राय: नहीं रहा लेकिन इस बार उतराखंड फंस गया है .इसे अब झारखण्ड की तरह ही अराजक स्थिति से गुजरने के लिए तैयारी कर लेनी होगी ,इसमें कोई संशय नहीं | जो विधायक ,विशेष कर निर्दल सरकार बनाने में अपना समर्थन देगा ,वह इसकी पूरी कीमत वसूलेगा |यह आज की राजनीति का दस्तूर बन गया है और ऐसा नहीं हुआ ,तब समझे कि खंडूरी जैसे नेता अब भी राज्य में मौजूद हैं ,भले ही मुख्य मंत्री खंडूरी खुद चुनाव हर गए हो लेकिन इनकी ईमानदारी का कोई जोड़ नहीं | ऐसे नेता हारते भी है ,तो अपनी व्यापक सोच को लेकर जिसमे क्षेत्रीयता,जातीयता और सांप्रदायिकता के लिए कोई जगह नहीं होती .यदि ऐसा होता तो वह चुनाव नहीं हारते ,जैसे कि आप जानते है -सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सरीखे नेता अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर विकास के प्रति समग्र सोच रखते ही नहीं ,केवल अपने ही चुनाव हल्कों में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं ताकि चुनावी युद्ध में उनको कोई परेशानी भविष्य में नहीं हो सके |इसका नतीजा क्या हो सकता है ,खंडूरी सामने हैं ,अगर यह भी अपने चुनावी इलाकों को ध्यान में रखकर राजनीति की भौतिकवादी प्रवृतियों के अनुकूल सरकार का नेतृत्व करते तो हर का यह सामना इनको नहीं करना पड़ता |
बहरहाल ,उत्तराखंड के जनादेश का संकेत काफी साफ है और काफी हद तक निरपेक्ष है ,वह यह कि सरकार में सभी की भागीदारी हो ,ताकि स्थायित्व के संकट से यह राज्य बचा रहे | यदि ऐसा संभव नहीं है ,तो राष्टपति शासन ही इसकी नियति है ,ऐसा इसलिए भी बेहतर होगा कि बहुमत पर आधारित सरकार का स्वरूप ढीला -ढाला होगा ,और बात -बात पर "सनक " पूर्ण राजनीति का शिकार होने के लिए यह विवश होगा ,जैसा कि झारखण्ड में प्राय; रोज दिखता है | राष्पति शासन इसलिए कि कम से कम एक व्यक्ति याने राज्यपाल के हुक्म की तामिला होगी .जिससे प्रशासनिक अराकता से प्रान्त बच जायेगा | हाँ ,इसके लिए लोगों को खासकर., राजनीतिक प्राणियों को सब्र करना होगा ,अगर लोक कल्याण की भावना में विश्वास करते हों तब , वह भी इसलिए कि परोक्ष रूप से केंद्र की सरकार ,जो संयोग से कांग्रेस नेतृत्व वाली है |
लेकिन प्रश्न है कि क्या भाजपा -कांग्रेस ऐसा होने देगी खासकर , केंद्र में बैठी संप्रग सरकार के स्वभाव में जनतांत्रिक मूल्यों और जनहितों के स्थायी समझ को ठोस रूप देने की मादा है |कांग्रेस सरकार का सीधे सँचालन करती हो या अप्रत्यक्ष तौर से केंद्र के सहारे ,कलेजे पर सांप भाजपा के ही लोटेंगे न ,फिर जनहित -लोकहित कहाँ है ? यही बात कांग्रेस के साथ भी लागू है ,जो केंद्र में होने के लाभ राज्यपाल के जरीये लेने से नहीं हिचकेगी |ऐसे में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का यह विद्रूप चेहरा देश को हमेशा चिढाता रहेगा और हम बराबर "अट्ठाहस " करते रहेंगे |
Tuesday, 6 March 2012
इन चुनाव परिणामों का क्या
एसके सहाय
देश में संपन्न पांच राज्यों के विधान सभाओं के चुनाव परिणामों में मणिपुर के नतीजे चौकाते नहीं , बल्कि इसके लिए पूर्व से ही राजनीति समीक्षक उस तरह के प्रतिफल के लिए तैयार थे ,लेकिन अन्य चार राज्यों में आए परिणामों को लेकर अब ज्यादा माथा -पच्ची रजनीतिक -सामाजिक हल्कों में होने को बताब है |ऐसा इसलिए कि 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है और इसमें कांग्रेस के साथ कथित इनके युवराज राहुल गाँधी के किस्मत का फैसला होने वाला है और यह निर्णय ठीक उसी तरह के होने हैं ,जैसे इनके पिटा राजीव गाँधी के हुए थे ,यह इसलिए कि राजीव भी बिना अनुभव के सीधे प्रधान मंत्री बन गए थे और अब काफी कुछ इसी तरह कि स्थिति राहुल की है ,जो बिना राज -काज के अनिभव लिए उस पद पर निगाहें गडा दी है ,ऐसे में गंभीर मंथन का दौर इन दिनों रजनीतिक गलियारों में हैं ,इसलिए स्वाभाविक है कि अब वक्त आ गया है कि देश के नेतृत्व को लेकर दो -चार हो लिया जाय |
पहली बात यह कि मणिपुर देश नहीं है और इसपर ज्यादा भरोसा करके कांग्रेस भविष्य की राजनीति को धार नहीं दे सकती |अतएव , उत्तर प्रदेश ,पंजाब और उत्तराखंड के ही परिणामो को लेकर भविष्य के कयास किए जाये तो ज्यादा बेहतर होगा | खासकर , यूपी में राहुल के कड़ी परिश्रम का कोई साफ परिणाम नहीं हैं ,सो आने वाले कल की तस्वीर कांग्रेस के लिए ज्यादा दुःख पहुँचाने वाली प्रतीत है | ऐसा क्यों हुआ ? शायद वह इस विचार पर ज्यादा सोचने वाले भी नहीं हैं ,ऐसा इनकी सोच की दिशा को देख कर परिलक्षित है |वजह साफ है ,इन चुनाव परिणामों के पहले के इतिहास को देखें ,विशेष कर 2009 के लोक सभा चुनाव और 2010 विधान सभाओं के वक्त के राहुल को याद करें ,तब काफी कुछ इनके मन -मिजाज का हाल आप बेहतर तरीके से जान सकते हैं |
बिहार और झारखण्ड में जब उन लोक सभा -विधान सभा के चुनाव की घोषणा हो रही थी ,तब राहुल ने पूरे जोर -शोर से कांग्रेस जनों और आम जनों के मध्य यह गर्जन किए कि दागी , दो बार हार चुके राजनितिक तथा किसी भाई -भतीजे या पुत्रों को कांग्रेस का टिकट नहीं मिलेगा ,इतना ही नहीं साफ -सुथरी ,ईमानदार छवि के साथ युवा तबकों को टिकट दिए जाने के पैमाने तय कर दिए जाने की बात कही थी लेकिन जब चुनाव लड़ने के मौके आए ,तब अपनी कही गई और घोषित नीतियों के विपरीत बिहार और झारखण्ड में कांग्रेस के टिकट दिए गए ,जहाँ कांग्रेस का क्या हाल हुआ .यह अब स्पष्ट रूप में रेखांकित है | राहुल की यह मकारी पूर्ण बातों को यूपी के लोग भूले नहीं थे ,सो नतीजा सामने है |
राहुल को थोड़ी भी सामाजिक .राजनितिक और भौगोलिक समझ होती तो तो यह अहसास होता कि झारखण्ड -बिहार की सीमा और सामाजिक सरोकार उत्तर प्रदश से बंधे हैं ,जहाँ कही गई झूठ जल्द पकड़ में आ जाएगी मगर अपने गलैमर के प्रभाव से कांग्रेस की नैया हांकने की कोशिश क्या हो सकती है ,इसका ख्याल उन्हें नहीं था ,अन्यथा ऐसा हस्र नहीं होता ,जैसा की अभी हुआ है |
दूसरी यह कि .कांग्रेस को तीन मोर्चे पर लड़ाई लड़नी थी लेकिन इसके लिए उसके पास अपने शत्रु पार्टियों के काट के लिए कोई शस्त्र नहीं थे | समाजवादी पार्टी ,बहुजन पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पास स्थानीय स्तर पर भी कद्दावर नेता थे ,जो कांग्रेस से कहीं पर भी उनसे बीस पड़ने कि काबिलियत से लैस थे लेकिन इनके पास वैसा कुछ भी नहीं था ,जैसा की अन्यों नके पास था |ऐसे में कांग्रेस को हारना ही किस्मत में बदा था .इससे इतर कुछ भी नहीं |
वैसे भी ,व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से देखें तो स्पष्ट प्रतीत है कि कांग्रेस के पास खोने और पाने के लिए कुछ भी नहीं था | सोनिया गाँधी कभी जन मुद्दों पर आम लोगों के बीच नहीं आइ केवल बयानबाजी ही इनके अस्त्र रहे लेकिन मुलायम सिंह यादव का लंबा इतिहास संघर्ष का रहा है और लीक से हटकर बेबाकी से राजनितिक पूर्ण चतुराई से अपनी बात कह देने में माहिर रहे हैं | याद करें .वह बयान जब अयोध्या मुद्दे पर इलाहबाद उच्च न्यायालय के फैसले आए थे ,तब इस निर्णय को सपा खेमे को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों से सराहनीय फैसले की बात कहीं जा रही थी और मुलायम कुछेक दिन के लिए छुपी साध लिए थे .फिर मौका मिलते ही इन्होने जो कुछ भी कहा ,वह भाजपा ,कांग्रेस और बसपा के लिए अनमने सा था | इनका साफ तौर पर नपा -तुला विचार था कि "उक्त फैसले से देश का एक खास समुदाय ठगा सा महसूस कर रहा है "
बस, इस प्रतिक्रिया को सामने आने भर की देर थी ,समूचे देश में इसे लेकर सपा और मुलायम को क्या -क्या आलोचनाओं के तीर से भेद दिया गया लेकिन वह स्थिर बने रहे .इतना ही नहीं अमर सिंह जैसे राजदार ने उकसाने वाली बात कई बार कही लेकिन उसका कोई प्रत्युत्तर नहीं दिए और अपने तरीके से पूरे राज्य में राजनितिक दौरे में भिड़े रहे |ऐसे में चुनाव का लाभ इन्हें नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा ? अल्पसंख्यक समुदाय जो कल तक मायावती - बसपा के साथ थी अब सप -मुलायम के साथ दम साधे खड़े हो चुकी थी | इतना ही नहीं , इनके बेटे अखिलेश यादव ने जिस बेबाक तरीके से युवा साथियों के साथ संपर्क साधा ,वह बेमिसाल रहा ,इसमें किन्तु -परन्तू का कोई सवाल बीच में नहीं थे |
इसी तरह काफी कुछ उत्तराखंड और पंजाब की रही | अल्पसंख्यक वाली बातें यूपी में कांग्रेस ने की लेकिन उसके असर में पंजाब आ गया ,जहाँ अल्पसंख्यक मतदाताओं का अर्थ ही नहीं था और आजादी पूर्व के इतिहास को भाजपा -अकाली दल ने इस तरीके लोगों के बीच विस्तृत किए कि कांग्रेस जीत कर भी हार गई |कांग्रेस यह भूल गई कि तुस्टीकरण और लोक लुभावने बातों का प्रभाव भारत जैसे देश में बदलाव और स्थिरता के ठोस रह नहीं हो सकते |यह थोड़े समय के लिए फायदेमंद हो सकती है ,हमेशा के लिए नहीं | राहुल -सोनिया -प्रियंका के भरोसे कांग्रेस में इनसे कई उम्दें राजनितिक प्राणी हैं ,फिर राहुल के रहते कैसे कोई युवा अपनी महत्वकांक्षा को गर्त्त में मिलते देख सकता है ,वह भी तब ,जब वह राजनितिक को जीवन दर्शन के लिए चुना हो |
गोवा और उत्तराखंड के परिणाम शुरू से से जुदा थे .जितना सच मणिपुर के लिए चुनाव पुर अपरिनाम कि उम्मीद थी .ठीक उसी तरह गोवा के लिए भी आशा राजनीति प्रेक्षकों की थी ,फर्क सिर्फ मात्रा का अर्थात संख्या बल का था ,जो करीब -करीब सामाजिक विज्ञानं के अनुरूप ही रहे | थोड़ा अचरज ,उत्तराखंड के लिए ही है ,जहाँ बहुमत के फासले में कांग्रेस -भाजपा पिछड़ गए लेकिन सत्ता विरोधी रूझान के बावजूद भाजपा को इतना शक्ति लोगों ने दे दी कि वह -जोड़ -तोड़ कर पुन: सरकार बना सकती है |यह अलग प्रश्न है कि इस राज्य का हस्र भविष्य में झारखण्ड जैसे दिखे ,जहाँ अराजक सी स्थिति ही इसके अस्तित्व में आने बाद से बनी है और यही बात कांग्रेस पर भी लागू है ,जो अगर सरकार बना भी लेती है तो स्थायित्व का संकट उसे लगातार झेलने के लिए अभिशप्त रहना होया |
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Tuesday, 7 February 2012
पाक: नई सोच के कूटनीतिक आयाम
पाक: नई सोच के कूटनीतिक आयाम 
( एसके सहाय )
पाकिस्तान के प्रधान मंत्री युसूफ गिलानी ने कहा है कि " 21 सदी में पाकिस्तान एक और युद्ध का बोझ भारत के साथ झेलने में असमर्थ है |" यह बयान दक्षिण एशिया के लिए स्वागत योग्य तो है लेकिन इसके यथार्थ में देखें तब , यह अंदरूनी स्थितियों से उत्पन्न परिस्थितियों का समावेश भी इसमें है ,जो पाकिस्तान को एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है ,सो इसका समर्थन किया ही जाना चाहिए | ऐसा इसलिए भी आवश्यक है कि अंतराष्टीय सबंधों में भू: राजनीति की अपनी उपयोगिता है ,जिसे भारत कभी उपेक्षा नहीं कर सकता ,क्योकि देश की प्रतिनिध्यात्मक जनतांत्रिक पद्धति में स्वतंत्रता हासिल करने के बाद ही "अल्पसंख्यक " राजनीति के महत्त्व को एकाध राजीनीति पार्टियों को छोड़ कर सबों ने पाक के प्रति एक खास नजरिये का इजहार किया है ,जिसका सुन्दर उदाहरण पांच राज्यों के मौजूदा विधान सभा चुनाव है | ऐसे में गिलानी का कश्मीर दिवस के मौके पर दिए विचार को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए |
वैसे , पाक प्रधान मंत्री का व्यक्त विचार किस मकसद से स्पष्ट रूप से सामने आया है , इस बारे में थोड़ा संशय है ,संशय भी इसलिए कि पूर्व का इतिहास भारत को फूंक -फूंक कर कदम उठाने के लिए मजबूर करता है ,फिर भी जिस हालातों में गिलानी के व्यक्त भावना पूरी दुनिया के समक्ष आई है ,उसे सकारात्मक पहल के तौर पर लिया जाने की जरूरत दोनों देशों के हित में है | हित भी इसलिए कि भारत लोकतान्त्रिक प्रणाली वाली व्यवस्था के रूप में स्थापित है और पाकिस्तान इस प्रक्रिया के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है ,जिसे भारत के साथ की आवश्यकता ज्यादा है |
भारतीय हितों के परिप्रेक्ष्य में गिलानी की बातों को फिलवक्त मनमोहन सिंह किस रूप में ग्रहण करते हैं ,इसे सामने आने में देर हो सकती है लेकिन इतना सच है कि गिलानी के बयान में "कातरता " की झलक है ,और यही कातरता भारत हित में है |यह स्थिति कुछ -कुछ नवाज शरीफ के प्रधान मंत्रित्व में भी झलका था ,जिसे परवान चढाने अटल बिहारी वाजपेयी कोशिश कर ही रहे थे कि परवेज मुशर्रफ़ ने उसमे पलीता लगा दिया ,जिससे कश्मीर के मुद्दे को भी ले -दे के ख़त्म करने की पहल थी | यह पहल साकार क्यों नहीं ले सकी ? इस पर चिंतन करें ,तब साफ परिलक्षित होगा कि उस काल में अमरीका का भरपूर समर्थन पाक सेना को परोक्ष तौर पर हासिल था ,जिसके बूते जनरल मुशरर्फ ने शरीफ के तख्ता पलट करने की हिमाकत की | तब अमरीका के रिश्ते इस कदर बिगड़े नहीं थे .जैसा फिलवक्त पाक के साथ हैं और नवाज़ का भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते को खास प्राथमिकता दिया जाना था ,और यह अमरीका को पसंद नहीं थे ,जिसमे शह पाकर सेना ने पाक में सत्ता हस्तगत करने में कामयाब हो गई थी |
अब ,तब की स्थिति से गुणात्मक अंतर है ,जिसमे अमरीका पाक से खफा है ,अपने विश्व बिरादरी से आर्थिक मदद की किल्लत है ,ले -देकर चीन ही वह देश है ,जो कुछ सहायता दे सकता है ,मगर यह मदद उतना देने में भी सक्षम नहीं है ,जितना अमरीका उसे दे सकने में आगे रहा है | इस बात को गिलानी की सरकार भली भांति समझती है ,तभी वह खास अवसर पर एक कटु सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं की है ,जिसका भरपूर लाभ उठाये जाने की ओर भारत को पहल करना ही होगा और इसके लिए खटाई में पड़ी "मित्रता की संधि " की तरफ कदम बढ़ाने की कूटनीतिक पहल होनी चाहिए ,तभी राष्टीय हितों को साधने में मदद मिल सकती है |
दरअसल , पाककिस्तान की जो मौजूदा हालात हैं ,उसमे गिलानी के व्यक्त विचार किसी क्रांतिकारी से कम प्रतीत नहीं हैं | पाक में लियाकत अली खान के बाद जुल्फिकार भुट्टो ,बेनजीर भुट्टो ,नवाज शरीफ और युसूफ गिलानी ही वैसे प्रधान मंत्री हैं ,जिनको सेना के साये में ही काम करने की विवशता रही है |विशेष कर , उस हालात में ,जब एक तरफ सेना ,दूसरी तरफ कट्टरपंथी ,तीसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय और चौथी तरफ विश्व की निगाहें पाकिस्तान पर टेढ़ी हो ,तब अचानक भारत के संदर्भ में व्यक्त विचार का विशेष मतलब होना है | गिलानी के बयान जोखिम भरें है ,इसमें दो राय नहीं कि वह एक बार फिर सेना और कट्टरपंथियों के नज़र में चढ़ गयें हों | लेकिन हकीकत को खुलेआम स्वीकार कर पाक प्रधान मंत्री ने साफ कर दिया है कि वह अपने देश में "लोकतान्त्रिक मूल्यों के अस्तित्व के प्रति प्रतिबद्ध " है |
बहरहाल , पाक की अर्थ व्यवस्था काफी दयनीय है ,आतंकवाद ,रोजमर्रे की बात है ,बाहरी मदद के रास्ते सिकुड़ गए हैं | देश की व्यवस्था में परस्पर अविश्वास का माहौल है ,जैसे -तैसे अपनी अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के नाम पर विश्व बिरादरी से मदद की आकांक्षा उसे जिन्दा किए हुए है और इसकी पूर्ति का रास्ता भारत से ही गुजरता है ,जिसमे हिंसा के लिए कोई स्थान हैं ,तब गिलानी ने भारत को खुश करने के लिए अनजाने में ही एक तथ्यपरक बात सार्वजनिक तौर पर रख दी है .जो उनके लिए तो जोखिम भरा है ही ,साथ में इसके लपेटें में भारत को भी ले लिया है .जिसे आसानी से नज़रंदाज नहीं किया जा सकता है |
गिलानी अपने विचारों से साफ कर दिए हैं कि भारत के प्रति उनके विचार दुराग्रही नहीं है ,इसलिए पाकिस्तानी अवाम को अब यह निर्णय लेना है कि उसे कश्मीर चाहिए या इससे अधिक की ओर सोचने वाली लोकतान्त्रिक एवं सुदृढ़ अर्थ व्यवस्था वाली देश पसंद है .इन्हीं दो बिन्दुओं पर गिलानी के अस्तित्व टिके है ,यदि इसमें वह सफल हो गए तो इतिहास पुरूष कहलायेंगे और आधी शताब्दी से अधिक चले आ रहे दो देशों के झगडे को मिटा कर नए सिरे से कूटनीति के इबारत लिख डालेंगे ,जिसकी उम्मीद अमन -चैन पसंद दोनों देशों के लोग अरसे से कर रहे है |
भारत -पाक के संदर्भ में एक बात तो साफ हो गई है ,वह यह कि जिस हिम्मत के साथ गिलानी ने अपनी बात रखी है ,वह तारीफे काबिल है .इसके पहले किसी प्रधान मंत्री या राष्टपति ने अपनी देश की कमजोरी का बखान खुलें आम नहीं किया ,बल्कि यह भी साफ कर दिया कि कश्मीर समस्या का हल केवल बातचीत से ही संभव है ,हथियारों के बल पर कदापि नहीं | इसके लिए बिना शर्त वार्ता किए जाने से ही इस समस्या का हल हो पायेगा और पाक, ऐसा ही कदम उठाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है |
संभव है ,पाक प्रधान मंत्री के बयान के बाद गिलानी के विरूद्ध राष्टीय -अंतर्राष्टीय षड्यंत्र हों ,इसमें सिर्फ खतरें ही खतरे हैं ,यह खतरा गिलानी को ज्यादा है ,भारत को कम | गिलानी को दुश्मन देश बरगला सकते है और अपनी धन -दौलत से चका चौंध भी कर सकते है ,जिसका फ़िलहाल उसे जरूरत भी है |कश्मीर ही वह केंद्र है जिसके सहारे अबतक पाक इस्लामी जगत से आर्थिक ताकत पाता था और अमरीका समेत पशिचमी राष्ट उसे भारत के खिलाफ हर वक्त उकसाये रखने में जोर लगाये रहते थे ,जिसमे डालर की माया काफी रहा करती थी | फिर भी जब ,गिलानी ने सामरिक तौर पर यह मान ही लिया कि ,पाक हिंदुस्तान से कभी भी पार नहीं पा सकता था ,तब एक बार फिर भारतीय कूटनीति को तेज धार देने में क्या हर्ज़ हो सकती है ?

Thursday, 19 January 2012
सेनाध्यक्ष सिंह का न्यायालय में जाना अनुशासनहीनता का परिचायक है
भारतीय थल सेनाध्यक्ष वीके सिंह का अपनी उम्र को लेकर लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत न्यायिक पद्धति के समक्ष गुहार लगाने से एक बात स्पष्ट है कि "अब राष्ट -राज्य की अवधारणा विशिष्ट जनों के मध्य कमजोर पड़ गई है ,यदि ऐसा नहीं होता तो एक व्यवस्था के लिए गए निर्णय के विरूद्ध वह अपनी आयू को लेकर अभियाचना कदापि नहीं करते |"
अर्थात सिंह का उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खट खटाना किसी भी राज्य -देश की व्यवस्था को चुनौती देने जैसा कदम है और यह "अनुशासनहीनता " है ,ऐसे में इनको तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना ही उचित है | ऐसा इसलिए कि हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था के नागरिक तो है लेकिन उसके पहले एक देश के व्यवस्थित एवं सभ्य नागरिक भी है ,जो भौगोलिक सीमाओं से बंधा हुआ ,राष्ट -राज्य के रूप में मौजूद है |
सेनाध्यक्ष का कदम लोकतान्त्रिक समाज के समष्टि में उचित और वैध हो सकता है ,परन्तू जहाँ व्यवस्था के नेतृत्व के निर्णय को चुनौती देने जैसे प्रश्न है ,वह कदापि राष्ट--राज्य की संकल्पना के विपरीत है ,जिसे वर्तमान सरकार ( व्यवस्था )के लिए असहनीय है |
यहाँ पूर्व में रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिज के हाथों बर्खास्त नौ सेनाध्यक्ष विष्णु भागवत का दृष्टान्त सामने है |
तात्पर्य यह कि जनतांत्रिक व्यवस्था में ही कुछेक विषय ऐसे होते हैं ,जिसे देशकाल के दृष्टिकोण से कभी चुनौती दिए जाने की प्रक्रिया को ,कोई भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर सकती ,जैसा कि संघ सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपनी बात रखने की पहल की है |
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