Wednesday, 14 September 2011

अमर के पैरवीकार जेठमलानी

                                              एसके सहाय
राम जेठमलानी ,अब अमर सिंह को नोट के वोट मामले में पैरवी करेंगे ,यह  वह शख्स है जो भाजपा का सांसद है और अपने व्यावसायिक वसूलों केलिए किसी विचार धारा और सिन्धांत को मानता नहीं , ऐसे में इसकी निष्ठा दलगत और देश हित से परे है ,सिर्फ इस दलील पर कि  "वकालत उसका पेशा है " इसलिए वह इससे समझौता नहीं कर सकता ,तब प्रश्न है कि फिर राजनीति के नियमीकरण में इनकी क्या उपयोगिता है ,यह सवाल भाजपा के नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए ,यह इसलिए जरूरी है कि दलगत लोकतंत्र में सिन्धांत और विचार धारा ही किसी रजनीतिक दल के मुख्य शक्ति होते हैं और उसके एक जिम्मेदार सदस्य जेठमलानी है |
                                   बेशक कोई भी अधिवक्ता व्यावसायिक कार्यों में किसी दखलंदाजी को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं , लेकिन यदि वह किसी खास विचार धारा के वाहक भी  बनने  का ढोंग करे  और ठीक उसके आदर्शों के विपरीत आचरण करे ,तब इसकी गंभीरता बढ़ जाती है ,ऐसे में जेठमलानी का निर्णय एक बार फिर अवसरवादी राजनीति का परिचय दिया है ,यदि यह निर्दलीय होते ,तब बात कुछ और होती मगर भाजपा के संग होकर ठीक इसके वसूलों के विपरीत काम करने से जाहिर है कि ,इस शख्स के लिए राजनीति का कोई मतलब नहीं है सिर्फ नाम-- पैसा ही महत्वपूर्ण है ,जिसका परिचय इन्होने अमर सिंह के मामले में दिया है |
                                                 वैसे ,जेठमलानी के लिए यह पहला मौका नहीं है ,जो व्यवस्थागत खामियों से जुड़े मामलों में  अपने मुव्वकिल के लिए अदालत में खड़े हुए हों ,,इसके पूर्व भी कई ऐसे मामले हैं ,जिनकी पैरवी इन्होने किया है और क़ानूनी नुक्ताचीनी के बीच कामयाबी भी हासिल की है ,चाहे इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी से जुड़े मुकदमे हों या फिर वैसे विषय ,जिसमे राज्य की शक्ति को नीचा दिखाने का अवसर मिल सकने की गुंजाईश हो  ,प्राय: चर्चित मामलों में एक वकील के रूप में यह हमेशा मौजूद रहे है , २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में करूणानिधि की सांसद बेटी कनिमोझी के भी यही पैरवीकार हैं |
                                                 नाम ,दाम और यश के चक्कर  में जेठमलानी ने अपनी एक अलग ही छवि बनाई है ,जिसका कोई जवाब नहीं , राजनीति में भी अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शख्स के विरूद्ध  चुनाव लड़ने से परहेज नहीं ,जब मन में आया भाजप में घुस गए और जब दिल भर गया ,इससे अलग हो गए ,यह इनकी फितरत में है ,फिर भाजपा क्या सोच कर राजनीतिक तौर पर विचारहीन जेठमलानी को आत्मसात करती रही है ,,यह आम लोगों के लिए समझ से परे है |
                                             यहाँ  सिर्फ इतना ही कहना है कि दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में  राजनीति का सामान्यीकरण ,दल के  आदर्श होते हैं ,जिससे सिन्धांत ,विचार धारा ,कार्यक्रम ,नीति का उदभव स्वभाविक तौर  पर ,निसृत होती है ,ऐसे में अगर भाजपा को शर्मिन्दिगी झेलनी पड़े तो कोई अचरज नहीं , ,आखिर उसने ही जेठमलानी जैसे अराजक वकील को अपने यहाँ पनाह दे रखी है ,जिसका अपना कोई वसूल सामुदायिक हितों के परिप्रेक्ष्य  में नहीं है ,फिर भी वह व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप को स्वीकारता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं है ,यही आज देश के समक्ष रोना है ,जिस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं !
 
 
                      

Wednesday, 31 August 2011

इन्दर सिंह नामधारी के चेहरे को देखिये

                                                                         एसके सहाय                                                                                                                                            सांसद इन्दर सिंह नामधारी को ओमपुरी - किरण बेदी के कहे शब्द काफी बुरे लगे हैं इसलिए इनके खिलाफ विशेषाधिकार का नोटिस दिए जाने को उचित मानते हुए कहते हैं कि सांसदों कि सरेआम तौहीन करना संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में  उनके मर्यादा के विरूद्ध है इनको दंडित किया ही जाना चाहिए |वह रे नामधारी ,लगता है मर्यादा ,नैतिकता ,सत्य निष्ठां ,सचरित्र्ता के तीर उनके ही तरकश में है और किसी के पास यह नहीं है | अब यहाँ इनकी ब्लेकमेलिंग और कायरपन का झलक दिखा दिया जाय तो कैसा रहेगा ? खैर  छोडिये इन सब बातों को ----,   
 फिर भी दो कारनामे यहाँ इनके देना मौजूं है - पहला यह कि झारखण्ड में विधान सभा के अध्यक्ष रहते अपनी ही सरकार के विरूद्ध इन्होने साजिश की,यह उस वक्त की बात है ,जब बाबूलाल मरांडी मुख्य मंत्री थे ,यह षड्यंत्र जब उजागर हुआ ,तब छ: माह के लिए अपने मुंह सिल लिए थे ,इनके कारनामों की तब इनके ही तत्कालीन अध्यक्ष शरद यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता रवि राय ने इनके क़दमों की तीखी आलोचना की थी याने चारों तरफ से थू -थू इनकी हुई थी ,इस फजीहत के बाद काफी दिनों तक इनके मुंह पर ताले लटके रहे और जाकब मुंह खोला तो बड़ी मासूमियत से कहा " आखिर में भी तो राजनितिक प्राणी हूँ ,सो मुख्य मंत्री की लालसा किसे नहीं होती "
                                          यह है नामधारी का दिलचस्प बातें और कारनामें | अब इनकी डरपोकपन को देखिये -यह वाक्यां मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा के विरूद्ध लाये जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव से है ,तब विपक्ष ने पहली बार एकजुट होकर तत्कालीन मंत्रिमंडल में शामिल कथित निर्दलीय मंत्रियों    के सहयोग    से मुंडा को पदच्युत  करने  की रणनीति  बनाई  थे और नामधारी सरकार को लगातार  विश्वास  दिलाते  रहे कि उनिकी  सरकार को कोई  खतरा  नहीं  है ,वह इनके बागी  मंत्रियों  को डाल  -बदल  अधिनियम  के तहत  अयोग्य  करार  देंगे  |इसके  लिए नामधारी ने लगातार सिंह गर्जना करते हुए  तारीख  डर  तारीख  सुनवाई  के  तहत  अदालत  लगाते  रहे लेकिन  जब फैसले  देने  की  घडी  आई  तो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए | इन्होने बारह  घंटे  पूर्व  अपना  इस्तीफा  विधान  सभाध्यक्ष  के पद  से देकर  मुंडा को बता  दिया कि "निर्णय  देने  के जोखिम   वह नहीं उठा  सकते  "  ये वही मंत्री हैं ,जो अब मधु कोड़ा के साथ जेल में चक्की पीस रहे है |
                              यही है नामधारी  का असली चेहरा ,जो बातें तो बड़ी गोल-गोल करते  है और अपनी पर जब बन आये , तब एहसास होता है की दर्द कैसा होता है | ठीक यही बयान किया है ,इन्होने एक टीवी चैनल को दिए बयान में ,जिसमे इनको "विशेषाधिकार ही लोकतंत्र में सुरक्षा  कवच नज़र आता है ,यह दिखता ही नहीं कि -- भारत के संविधान के प्रस्तावना में ही पहली पक्तिं कि शुरूआत -" हम भारत के लोग" से होती है ,जिसकी झलक अभी -अभी देशवासियों ने देखा है और अगर इनके नज़र टेढ़ी हो गई ,तब क्या होगा ,कह पाना मुश्किल होगा | यह तो गनीमत समझिये कि अन्ना हजारे का भूख हड़ताल लंबा नहीं खीचा और इतफाक से यह लंबा होता ,तब  भीड़ की क्या मानसिकता होती है ,यह तो देहली देखता और पूरी दुनिया इसकी गवाह होती | आखिर पक्ष -विपक्ष ने इसे "भीड़ " ही घोषित करके वाजिब लोकतान्त्रिक मांग को बारह दिन तक टालते रहे थे | फ़िलहाल  इतना ही ------
 
     

Saturday, 27 August 2011

संसद को अपनी शक्ति का भान नहीं

                                                                                         एसके सहाय                                                                                                                              वाह  रे भारतीय संसद , प्रक्रिया, संविधान और इसकी सर्वोच्चता के बीच प्रक्रियागत प्रविधियों के सहारे लोकपाल के मुड़े को फ़िलहाल टालने में कामयाब हो ही गई | माननीय सांसदों को इसका भी भान नहीं रहा कि वे राइ को पहाड़ और पहाड़ को राइ बनाने की सामर्थ्य रखते हैं जैसा कि 1973 में दिए एक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने दिया था | इसमें साफ निर्णय थे कि संसद सविधान सहित अन्य मामले में प्रयाप्त बहुमत के बूते कोई भी निर्णय  ले सकती है सिर्फ संविधान के मूल भावना को बदल नहीं सकती | यह मूल भावना क्या है ?इसकी व्याख्या उस संविधान पीठ में शामिल न्यायधीशों ने अलग -अलग किए थे लेकिन इनके फैसले का मूल तत्व था - लोकतान्त्रिक व्यवस्था में परिवर्तन संसद हरगिज नहीं कर सकती |
                                               इस अपनी ताकत को पहचानते हुए भी संसद ने जाहिर कर दिया है कि उसे अपने हितों से ज्यादा प्यारा कुछ भी नहीं है | यदि ऐसा नहीं होता , तब सभी नियमों -परिनियमों को धत्ता बताते हुए संसद लोकपाल विधेयक के प्रावधानों पर तत्क्षण विचार करते ,जिसके लिए पूरा देश बैचेन है | इसके लिए सरकार के प्रस्तुत विधेयक पर ही विमर्श होता और फिर सर्वसम्मति से इसके सभी धाराओं पर बहस करते हुए वस्तुपरक तरीके से मतदान के जरीये आगे बढती ,जिसमे पक्ष -विपक्ष के चेहरे सामने आते ,जिससे मालूम  होता कि आखिर अधिसंख्य सांसदों का रूख कैसा है ?
                                                   वैसे ,तीन मुद्दे पर संसद ने सर्वानुमति से अपनी मुहर लगा दी है ,जो अभी सैधान्तिक रूप में है ,जिससे कुछ आस जगी है लेकिन मात्र इतने भर से काम नहीं बनने  वाले है |अभी लंबी लड़ाई के लिए एक बार फिर देशवासियों को तैयार रहना होगा | लोकपाल के प्रस्तावित बातें संसद के स्थायी समिति को भेजे गए हैं |यह समिति कब अपना गुण -दोष के साथ प्रावैधानिक   सलाहों के साथ अपना राय पत्र देती है ,इसे देखना बाकी है |
                                               अभी की स्थिति में संतोष जनक बात यही है कि क्म से कम अन्ना हजारे के आत्म बल, सचारित्र्ता , नैतिकता ,सद भाव और त्याग के बीच एक बार फिर देश में लोक शक्ति अपने मौलिक मांगों के प्रति सचेत हुई है ,जिसका स्वागत किया जाना चाहिए | यह आन्दोलन इसलिए कामयाबी के शिखर तक पहुचने के स्थिति तक है कि  हजारे जैसे एक पवित्र आत्मा कि यह पुकार है ,जिसका अभाव आज भारतीय राजनीति में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं | एक गैर राजनितिक पुरूष ने यह स्थापित कर दिया कि यदि आपका खुद का आचरण पाक -साफ हो और सोच की दिशा  परोपकारिता से लबरेज हो तो ,दुनिया की कोई भी शक्ति आपको लक्ष्य प्राप्त करने से नहीं रोक सकती ,अभी के हालात में तो यही दिखा है |
                                                 इस देश व्यापी जन आन्दोलन में यह भी सामने आया कि विचारवान लोग भी बहस के दौरान मूल विषय -मुद्दे से भटकते नज़र आये , इनके लिए लोकपाल केवल बहस के लिए बहस करना ही शगल बना रहा ,जिसमे तथ्य की समझ कम  और अपने व्यक्तिगत सोच की बातें ज्यादा उल्लेखित रहीं | मसलन, किसी ने कहा कि निजी क्षेत्र ,गैर सरकारी संगठनों को भी इसके दायरे में लाया जाना चाहिए |शायद इस तरह के चिंतन करने वालों को यह भी पत्ता नहीं कि ,जब सरकारी कर्मी ,जिसमे संसद -विधान मंडल आ जायेंगे ,तब खुद  बी  खुद निजी संस्थाए इसके परिधि में आ जायेंगे |इनके लिए अलग से कानून बनाये जाने की क्या   जरूरत है | आखिर सार्वजनिक धन के लुट का ही मामला है न ,फिर इसमें जो व्यापारी ,उद्योगपति ,कारोबारी या अन्य लोग आयेनेग ,ठीक उसी तरह ही कारवाई के शिकार होंगे ,जैसे अधिकारी -कर्मचारी वर्ग के लोग, फिर अलग से शब्दों के डाल देने से ही समस्या का अंत तो होगा नहीं |
                                                     और अब जब लोकपाल पर सर्वानुमति है ,तो देखना है कि बनने वाली विधेयक में इसके अन्तर्निहित शक्तियों का स्वरूप कैसा होगा |मूल बात यही है |क्या यह नियंत्रण महालेखा  परीक्षक -चुनाव आयोग  जैसे संविधान से निसृत संस्था होगी ,जिसकी जाँच की प्रक्रिया  अपनी और स्वतन्त्र होगी  तथा समयबद्ध सुनवाई की बाध्यता होगी और इसके जाँच के दायरे में प्रधान मंत्री सहित उच्च -उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश आते हैं या नहीं ,इन्ही सब बिन्दुओं पर स्थायी  समिति और संसद के रूख का परीक्षण होना है भारतीय लोगों के सामने ,जिसका बेसब्री से इंतजार ह
 

Friday, 22 July 2011

अभिव्यक्ति पर जिलाधीश की टेढ़ी नज़र

                                                   अभिव्यक्ति पर जिलाधीश के टेढ़ी नज़र
                                                                       एसके सहाय
झारखण्ड में एक जिलाधीश की बक्र दृष्टि एक सांध्य  दैनिक पत्र पर पड़ गई है ,वह भी एक तस्वीर को को लेकर ,जिसमे आपति जनक ऐसी कुछ भी बात नहीं है ,जिसे लेकर हाय-तौबा मचाया जा सके ,फिर भी अपनी अकड़ को दिखलाने के लिए उस उपायुक्त ने जो नोटिस अख़बार के हाथों में थमाया  है ,जिससे गंभीर सवाल पैदा होते हैं ,जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है |
                                             यह धौंस पलामू जिले के उपायुक्त पूजा सिघंल ने समाचार वर्षा पर जमाया है, जिसने अख़बार को दिए नोटिस में पूछा है कि "किसके अनुमति से उनसे सबंधित छाया चित्र मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा  के साथ छापा गया है |" बस इतनी से हल्की बात जिला प्रशासन को नागवार गुजरी है ,जो आजकल यहाँ जन चर्चा का विषय बन गया है |
                                                   जिला प्रशासन  के  यह कारण पृच्छा नोटिस से जाहिर है कि अब पत्रकार क्या छापें  और क्या नहीं ,इस विषय पर अब प्रशासन की अनुमति  लेनी होगी ,जो अभिव्यक्ति  की  खुल्लम -खल्ला चुनौती देने जैसी  हैं ,जिसकी जमकर आलोचना हो रही है ,लेकिन उपायुक्त की जिद है कि वह अपनी " शक्ति " का इजहार करने से बाज़ नहीं आ रही |
                                                 दरअसल अखबार ने उपायुक्त के एक साल पलामू में कार्य काल पूरे करने के अवसर पर उनकी उपलब्धियों का बखान अपने पत्र में की थी ,इसी क्रम में उसने अपने मुख्य मन्त्री के साथ पूजा सिंघल कि तस्वीर को प्रकाशित किया था ,जिसमें अर्जुन मुंडा हाथ जोड़ें खडें है और बगल में वह खड़ी है |यह सामान्य फोटो था ,जो १९ जुलाई को प्रकाशित हुए थे |इसमें आपति जनक कोई भी बात नहीं थी लेकिन जो नागवार करने वाली बात थी ,उसपर जिला प्रशासन के मुखिया ने ध्यान ही नहीं दिया ,जिससे अब वह बात भी चर्चा में आई है ,जिसकी कल्पना  भी पूजा  सिंघल नहीं कर सकती थी |यह सब अनजाने में हुई या जान बुझकर   ,इस पर फ़िलहाल कुछ भी कह पाना मुश्किल है |मामला अब काफी संगीन हो चूका है | इस मामले में अख़बार प्रबंधन अब कानून की शरण लेने के प्रयास में है |
                                            लेकिन इतना तय हो गया कि देश में कोई भी व्यक्ति अभिव्यक्ति के नाम पर अपनी बात सार्वजानिक क्षेत्रों में आसीन व्यक्तियों के बारे में प्रदर्शित करने की हिमाकत कि ,तब उसे पूजा सिंघल जैसे उपायुक्तों से पंगा लेने को अपने को तैयार करना होगा |
                                      यहाँ  यह भी बताना  जरूरी है  कि फोटो के साथ जो बात ऊपर लिखी है ,उसपर उपायुक्त को कोई आपति नहीं है ,आपति सिर्फ तस्वीर पर है ,जब कि कैप्सन में लिखा हुआ है - मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा  के वरद हस्त प्राप्त उपायुक्त पूजा सिंघल |  इतना ही नहीं ,इस उपायुक्त को महिमा मंडन करने के अतिरेक में अख़बार ने यहाँ तक लिख डाला ,जिसमे उल्लेख है -  पूजा सिंघल ने पलामू में कम करते हुए "अपने जीवन " में भी खास उपलब्धि हासिल किये है ,जो जिले की खास धरोहर के तौर पर याद किया जाता रहेगा | मगर इस बिंदु पर कोई विशेष नज़र जिला प्रशासन की नहीं है |
                                          वैसे, यहाँ आपको यहाँ बता दें कि पूजा सिंघल अपने कई कारनामों से हमेशा चर्चा में रही हैं | मसलन -चतरा जिले में उपायुक्त रहते इनका बेहोश हो जाना ,खूंटी में जिलाधिकारी रहते ग्रामीण विकास की करोड़ों रुपये के घोटाले होना और अब पलामू में रहते ----
                                    यहाँ आपको यह भी  स्मरण करा दूँ कि करीब एक पखवारे पहले पलामू में ट्रेन यात्रा के साथ मुसाफिरों से मुखातिब होकर जन समस्याओ से रूबरू होना इनकी लोकप्रियता को चार चाँद लग जाने की बात हो रही  थी लेकिन एक सामान्य सी फोटो पर नाक -भौंह  सिकोड़ लेना समझ से परे की बात  है | आखिर किस तरह प्रकशित तस्वीर आपति जनक है ,वह ही सही -सही बता सकती है |इधर कई माहों  से उनका नियमित मासिक प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं हुआ है ,जिससे कि असलियत उजागर हो सके और उनके दृष्कों को समझा जा सके | इनके अख़बार को नोटिस थमाने से यह तो जाहिर हो गया कि नौकरशाह  की अकड़ अब भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बनी हुई है ,जिसे जब चाहे ,वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके अपनी गरूर को आत्मसात कर सके |
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Monday, 6 June 2011

लोकतान्त्रिक अधिकारों को दबाने की कोशिश

                                                           एसके सहाय
काला धन और भ्रष्टाचार के सवाल पर बाबा रामदेव और इनके समर्थन में जुटे सत्याग्रहियों पर गत रात देहली पुलिस के अचानक धावा बोल देने से एक बात साफ हो गई है कि विदेशों में जमा धन को लाने और भ्रष्ट तत्वों के विरूद्ध गंभीर कारवाई करने के प्रति केंद्र सरकार का रूख ठीक नहीं है |
बाबा रामदेव की पृष्ठभूमि  को लेकर संशय हो सकती है लेकिन इन्होने जिस प्रश्न को लेकर जनतांत्रिक  तरीके से भूख हड़ताल पर बैठे थे ,वह इतना बड़ा कानून व् व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करेगी ,इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती | इसलिए जो भी कुछ कल  रात रामलीला मैदान में हुआ ,उसका संकेत है कि  आने वाले दिनों में जबर्दस्त जन आन्दोलन होने वाले हैं ,जिससे निपटने की तैयारी अभी से कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों को शुरू कर देनी चाहिए |
लोकतंत्र में अपनी बात रखने और उससे सहमत होने और न होने पर अर्थात दोनों स्थिति में सरकार को संयम का परिचय देना चाहिए ,तभी सरकार टिकाऊ हो सकती है | आखिर धरना ,प्रदर्शन ,रैली ,सभा -गोष्ठी ,घेराव ,बंद ,पुतला दहन ,भूख हड़ताल ,नारेबाजी ,जन संपर्क ,सत्याग्रह , सविनय अवज्ञा जैसी प्रक्रिया लोकतंत्र के आधार स्तंभ   ही तो है ,जिसका अनुसरण करने से कैसे सरकार आपने नागरिकों को रोक सकती है ,मगर दुर्भाग्य से केंद्र सरकार में ऐसे मानसिकता वाले तत्व शामिल हैं ,जो  लोकतंत्र से अन्योन्याश्रय  रूप से जुड़े मानवाधिकारों को भी लात मारने से गुरेज नहीं करते ,यही देश की राजनितिक अनुभवों का तकाजा है ,जिसका दिग्दर्शन कल राष्टीय    राजधानी में हुआ है  ,जिसका प्रतिकार किया ही जाना चाहिए |
शांति [पूर्ण आन्दोलन में अचानक व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं को हथियार बना कर लाठी चार्ज करना और आश्रू गैस का इस्तेमाल करना जिससे लोग चोटिल हों ,ताकि भय के वातावरण तैयार करके भ्रष्टाचार पर से देश का ध्यान हट सके ,यह कोशिश प्राय: हर सत्ताधारी करता है ,विशेष कर अधिनायकवादी प्रवृति के राजनीतिज्ञों के लोकतंत्र के नाम पर सत्तासीन होने पर, ,इसके दिग्दर्शन आसानी से हो जाते है |ठीक वैसा ही कल की घटना में दिखा है ,जो जल्द ही व्यापक स्वरूप में देश के सामने आने को परिलक्षित है |
भ्रष्ट तत्व और काला धन से किसे प्रेम हो सकता है ? दो नंबर  के तत्व भी बोल -चल में इसके खिलाफ ही आपने विचार प्रकट करने को विवश होते है ,भले ही वे कितना ही निकृष्ट हों ,लेकिन लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति दिखावा प्रकट करने में वे परहेज नहीं करते, जैसे की कपिल सिब्बल ,पी चिदम्बरम ,दिग्विजय सिंह सरीखे कांग्रेसी इन दिनों कर रहे है |
अतएव , घटना को लेकर उत्पन्न राजनितिक परिद्रश्य में एक बार फिर पिछली सदी के सत्तर और नब्बे दशक की हालात सामने आ जाये ,तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए | ऐसा इसलिए कि बर्बर कारवाई से ही लोग तेजी से आपस में धुर्वीकरण के प्रति अनायास ही जुटते  रहे है  और काफी कुछ माहौल ऐसा ही प्रतिपक्ष के जाहिर भी हैं |
 
 

Wednesday, 4 May 2011

लादेन मामले पर अमरीका कभी कमजोर नहीं था

                                                               एसके सहाय
अमरीका और ओसामा बिन लादेन के सन्दर्भ में इन दिनों कूटनीतिक क्षेत्रों में शक्ति और इसके तीखे उपयोगिता को लेकर चल रही बहस में गुमराह होने वाली बातों को ज्यादा प्रमुखता से तवज्जो दिया जा रहा है | इससे भारत सहित कई उदीयमान महा शक्तियों को अमरीका के तर्ज़ पर अपने राष्टीय हितों के संवर्धन को लेकर बहस -चर्चा काफी तेज़ है |इसलिए जरूरी है कि "भारत भी अपने दुश्मनों को साफ करने के पूर्व यह भली भांति समझ ले ,कि राष्ट हित से बड़ा और महत्वपूर्ण चीज किसी भी राज्य -देश के लिए कुछ भी नहीं होती |"
सर्व प्रथम यह आप याद करें कि ९/११ उस काल में उआ था ,जब बराक ओबामा के स्थान पर जार्ज डब्ल्यू . बुश वहां के राष्टपति थे, तब इनकी गर्जना कि खौफ से पूरी दुनिया दहशत जादा था ,इनकी पहली घोषणा  थी कि विश्व अपना -अपना मित्र चुन ले ,और हमसे युद्ध के लिए तैयार हो जाय तथा आतंकवाद कि लड़ाई में जो हमारे साथ नहीं हैं ,वे हमारे शत्रु है और दूसरी मुख्य घोषणा थी कि "लादेन" जहाँ भी होगा ,उसे हम खोज निकालेंगे ,चाहे वह किसी भी "बिल " में छुपा हो |
मतलब स्पष्ट था कि अमरीका के लिए लादेन का पकड़ा जाना या इसके मारे जाने का खास अर्थ था और इसके लिए उसने हर उस कूटनीतिक  प्रक्रिया का अवलंबन किया जो उसके राष्टीय हितों के लिए जरूरी था ,लेकिन  ठीक वैसा ही भारत के लिए संभव क्यों नहीं ? इसी बिंदू पर भारत कोई ठोस कदम उठा पाने में चुकता रहा है अबतक , जिसे लेकर अब भी संप्रग और राजग सरकारों की आलोचना होती आ रही है |
इन सारी स्थितियों को जानने के लिए थोड़ा देश की राजनीतिक माहौल को भी देखना होगा ,तब जाकर स्थिति साफ होगी | पहला यह  है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का लुफ्त तो हम लेते हैं लेकिन राष्टीय सवालों पर येन मौके पर "वोट " दायें -बाएं हमारी सोच हो जाया करती है ,जिसका लादेन के मारे जाने के बाद इसके अंतिम संस्कार किए जाने के तरीकों पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने धार्मिक प्रश् खड़ा करने कि जुर्रत कि ,हालाकिं समय रहते सोनिया गाँधी ने इनको फटकार लगाने में जरा भी देर नहीं की, लेकिन वोट पिपासु व्यवस्था का इससे अच्छा चित्रण देखने को देशवाशियों को मिल ही गया | इसे नहीं समझ पाने का ही आलम है कि "आजादी के बाद से ही हम लगातार आतंकवाद को झेल रहे हैं ,इसके लिए "मत " कि उपयोगिता को ही सबसे मुख्य उपकरण समझा गया है ,ऐसे में यदि कोई ठोस कारवाई भारत नहीं कर पाता, तब  स्पष्ट है कि हमारे जन प्रतिनिधियों में  "इच्छा शक्ति " का घोर अभाव है और जिनके पास दृढ इच्छा शक्ति है ,भी वे शासन सत्ता से कोसो दूर है ,यही भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है |
 भारत एक जन तांत्रिक व्यवस्था वाला राष्ट है लेकिन यहाँ "राष्ट हित को पहचान करने वाले राजनेताओं का घोर अभाव है और यदि वे सत्ता में हैं ,तब उनकी कोई पूछ भी नहीं है| " केन्द्रीय मंत्री मंडल में प्रणव मुखर्जी एवं एके अंटोनी की समझ अन्य की तुलना में काफी अधिक है लेकिन इनकी बातों को कोई तवज्जो नहीं ,जब तक कांग्रेसके आलाकमान उसकी इजाजत नहीं दे |लेकिन अमरीका के साथ वैसा नहीं है | लादेन को मजा चखाना था और अपने शक्ति का प्रदर्शन करके दुनिया को जाताना भी था ,सो अमरीका ने बखूबी अंजाम दिया |उस देश में रंग भेद ,नस्ल भेद ,जातिगत भेद या अन्य किसी तरह के अंदरूनी बातें जब तब सामने आती हैं लेकिन कानून के समक्ष जिस ठोस एवं विधिक तरीके से कारवाई होती है ,उसका जरा सा भी अनुकरण हम करने को तैयार नहीं दिखते ,कारण वही दुराग्रही विचार  का होना है ,ऐसे में फिर मुंबई जैसी घटना की पुनरावृति होती है ,तब आश्चर्य नहीं होना चाहिए |
जब अमरीका में अल कायदा ने ९/११ को अंजाम दिया था तब ,पूरे विश्व की जान सांसत में थी लेकिन ऐसे में भी मानवाधिकार का सम्मान उसने काफी धैर्य पूर्वक किया ,लादेन को पकड़ने या मारने में उसने लबे समय का इंतजार भी इसलिए किया की कि   यदि वह चाहता तो लाखों लोगों के बीच बमवारी कर उसे ख़त्म कर सकता था ,ऐसी क्षमता उसके पास थी भी ,लेकिन उसने समय का इंतजार किया और जब मौका आया भी तो कूटनीतिक तरीके को दर किनार करके सीधे लादेन को मार डाला ,यही उसकी कामयाबी के सकेंत को काफी बारीकी से राजनीतिक -कूटनीतिक हल्कों में अन्य देशों से अलग पहचान दिलाने में मददगार हुई ,जिसका फल भी वह भविष्य में कटेगा भी तो अपनी शर्तो पर ,क्या भारत भी वैसा कदम उठा सकता है ? मौजूदा समय में यही यक्ष प्रश्न है |
   पाकिस्तान पर दबाव ,मदद और फटकार के साथ चेतावनी की बरसात करते अमरीका ने दिखा   दिया है कि जब वह कुछ ठान लेता है तब ,उसे पूरा करके दम लेता है ,इसके लिए वह किसी के मदद की इंतजार नहीं करता  ,अपने राष्टीय हितों को ही ध्यान में रखना उसकी उच्च प्राथमिकता सूची में शामिल है | आपरेशन लादेन में उसने अपने  प्राविधिक तकनीकी इजादों को परख भी लिया है फिर वह शक्ति "गुमान क्यों नहीं करे | लोकतंत्र ,वैक्तिक स्वतंत्रता जैसी मूल भूत मानवाधिकारी बातों पर इसके जोर दिए जाने की प्रक्रिया ऐसे ही नहीं है ,भले ही अमरीका इसकी आड़ में अपने राष्टीय  हितों  का संवर्धन करता हो और आप भी करें तो इसके लिए किसने आपको रोक रखा है ?
 

Tuesday, 3 May 2011

परवर्ती समय में आतंकवाद :परिप्रेक्ष्य ओसामा बिन लादेन

            एसके  सहाय  
संयुक्त  राज्य  अमरीका  का  सबसे   बड़ा  मुजरिम  ओसामा  बिन  लादेन  के  मारे  जाने  के  बाद  स्वाभाविक  प्रतिक्रिया  में  अहिंसक  जगत  में  ,खास  कर  एक  लोकतान्त्रिक  व्यवस्था  वाले  राष्ट  -राज्य  में  ख़ुशी  की  लहर  है  ,लेकिन  यह  हर्ष  कितने  दिनों  तक  बरकरार  रहेगा  ,इसमें  संदेह  है  ,यह  शक  इसलिए  पैदा  हुआ  है  कि  "दुनिया  को  कोई  भी  बलशाली  कितना  बड़ा  क्यों  न  हो  , वह  संगठित  शक्ति  याने  राज्य  शक्ति  के  आगे  बोना  ही  है  और  ओसामा  बोना  ही  था , जिसे  मार  कर  बहुत  बड़ा  तमगा  पा  लेने  की  कल्पना  यदि  अमरीका  एवं  पश्चिम
   जगत  कर  रहा  है  तो  यह  ख़ुशी  उनके  लिए  क्षणिक  ही  है
 .
इन  बातों  को  समझने  के   लिए  आपको  "व्यक्ति  और  राज्य  शक्ति  के  बीच  के  भेद  को  जानना  होगा  ,तभी  यहाँ  लिखी  शब्दों  के  अर्थ   आप  समझ  सकेंगे . सबसे  पहले  तो  यह  अनुभूत  करें  की   जब  9/11 हुआ  था  ,तब  लादेन  कि  शक्तियों  का  बखान  इस  तरीके  से  तब  किया  गया  कि  वह  सचमुच  पाशविक  शक्तियों  में  अत्यधिक  बलशाली  है  ,मतलब  कि  जो  दुनिया  के  सबसे  ताकतवर  देश  में  अपने  खूंखार  वारदातों  को  अंजाम  दे  सकता  है  ,वह  वाकई  में  काफी  मजबूत  शक्ति   का  स्वामी  है  , न  जाने  किस - किस  तरह  कि  बातें  तब  फिजां  में  तैरती    नजर   आई  .इससे   काफी  कुछ   भ्रम   भी   विश्व  में  फैले  ,जो  सच्चाई  से  कोसों  दूर  तब भी  थे  और  आज भी   है  .
पहले   तो  यह  जानिए  कि  ओसामा  कोई  राज्य  नहीं  था  ,यह  मुठ्ठी  भर  के  धर्मांध  लोगों  का  जनूनी   शक्तियों  का  गिरोह  का  नेतृत्व   कर्त्ता  था  ,जिसमे  इस्लाम  एक  बहाना  था  अपनी  निजी  शक्ति  के  विस्तार  करने  के  लिए ,  ऐसे  में  सिर  -फिरे  लोगो  कि  सम्मिलित  ताकत  इसे  बल  दे  गई  तो  उसे  नायकत्व   प्रदान  उन  हलको  में  कर  दिया  जो , किसी  भी  सूरत  में  इस्लाम  से  इत्तर  कुछ  भी  सोचने  को  तैयार  नहीं  होते  ,जो  प्राय : हर  क्षेत्र - देश  दुनिया  में  मिल  ही  जाया  करते  हैं  .इसमें  जो  ध्यान  देने  लायक  बात  यह  कि  ,ओसामा  को  आखिर  इतने  दिन  तक  कौन  टिकाये  रखा  ,यह  किसी  देश  के  सरक्षण  में  ही  हो  सकता  है  ,इससे  अलग  नहीं   ,ऐसे  में  पाकिस्तान  का  नाम  स्वाभाविक  तौर  पर  सामने  है  ,जो  आज  भी  चिल्ला  कर  कह  रहा  है  :उसकी  व्यवस्था  में  आतंकवादियों -अपराधियों  के   लिए  कोई  जगह  नहीं  है  ,उनके  यहाँ  कानून  कि  सत्ता  है   ,इसलिए  किसी  भी  आतंकवादी को  पनाह  देने  का  सवाल  ही  नहीं  उठता है  " ऐसा  खुद  वहां  के  स्वराष्ट  मंत्री  रहमान  कई  दफे  कह  चुके हैं  . लेकिन  बात  जमती  नहीं  .
बहरहाल , ओसामा  बिन  लादेन  यदि  दस  सालों  तक  दुनिया  की  आखों  में  धुल  झोकने  में  सफल  रहा  तो  वह  इसलिए  की  उसके  सिर  पर  राज्य  शक्ति  का  वरदहस्त  था  ,जिसका  नाम  पाकिस्तान  है  ,भले  ही  अमरीका  या  इसके  पिछलग्गू  देश  इसे  khuleaam स्वीकार  करने  से  हिचकें .
साधारण  सी   बात  है  - समाज  का  उन्नत  रूप  ही  राज्य  -राष्ट  का  होता  है  ,भारत , अमरीका  पाकिस्तान  जैसे  ही  राष्ट  कम - अधिक  मात्रा   में  अलग - अलग  स्वरूपों  में  पूरे  दुनिया  में  "सह  अस्तित्व " के  तौर  पर  स्थापित  हैं , ऐसे  में  एक  आतंकी   कैसे  इतने  दिनों  तक  अपने  को  बचा  सकता  है  ,जब  विश्व  की  तमाम  पुलिस  उसकी  तोह  में  भिड़े  हों , जिसमें  खुद   उसके  आका  अर्थात   पाकिस्तान  भी  शामिल  हो  ,साफ   है  की  "बिना  राज्य  शक्ति  के  कोई  भी  ताकतवर  प्राणी  लंबे  काल  तक  अपने  को  नहीं  छिपा  सकता  "
ऐसे  में  लादेन  के   9.11 के  पश्चात    गुमनाम  तरीके  से  रह  कर  आतंकी  कारवाई  को  अंजाम  दिए  जाने  की  बात  पचती  नहीं , इसलिए  अमरीका  के  बढ़ते  दबाव  में  पाक  सरकार  झुक  कर  भविष्य  को  ध्यान  में  अपने  को  सुरक्षित  करने  की  कोशिश  की   है  ,तब  ताज्जुब  नहीं  कर्म  चाहिए , आखिर  पाकिस्तान  एक  वैध  सत्ता  ही  तो  है  ,जिससे  एक  राज्य  की  तरह  ही  कूटनीति गत  तरीके  से  व्यवहार  किए  जाते  रहें  हैं , ऐसे  में  अमरीका  हो  या  अन्य  कोई   देश   के  सरक्षण  के  बिना  कोई  भी  आतंकी  ज्यादा  समय  तक  अपने  को  दुनिया  से  छिपा  कर  नहीं  रह  सकता  .
   ऊपर  लिखित  बातों  को  यदि  आप  नहीं  समझ  पायें  तो  एक  उदाहरण  से   इसे   समझने  की  चेष्टा  करें , एक  थानेदार  को  अमूमन  अपने  इलाके  की  पल  -पल  ki जानकारी  होती  है  ,यदि  सूचना  मिलने  में   देर  है   ,तब  समझें  की  वह  जन  बुझ  कर  नौटंकी  कर  रहा  है  या  
नाकाबिल   है  या  वह  अपराध  जगत  से  उपरी  कमाई  करने  की  जुगत  में  है  , और  यदि  वह  ईमानदारी से   अपने  कर्तव्यों  का  निर्वाह  करने   शुरू   कर  दे   तब , उस  क्षेत्र  में  कोई  भी  अपराधी  लंबे  समय  तक  नहीं  शरण  ले  सकता  और  यदि  वह   है  तो साफ  मानिये  की  उसकी  अपनी  कमजोरियां  हैं  ,जिससे     वह  अपनी  डयूटी  नहीं  कर  रहा  है  ,जिसमें  रिश्वत , जातिगत  मामले  या  एक  के  लिए  दूसरे  को  छुट  देने  की  विवशता  जैसे  अपनी  -लाभ  -हानि  के  विराग   काम  करते  हैं , लेकिन  अगर  यह  ठान  ले  की  उसके  इलाके  में  अपराध  या  अन्य  कोई  गैर  क़ानूनी  काम  नहीं  हो  तो  क्या  कोई  उसे  ऐसा  करने  से  रोक  सकता  है  ,कदापि  नहीं , व्यावहारिक  तौर  पर  देखें  तो  मालूम  होगा  की  उसे  तबादले  झेलने  होंगे  ,वह  भी  अन्य  के  हितों  के  लिए  .यह  एक  मामूली  सी  एक  पुलिस  अधिकारी  का  रूख  हो  सकता  है  .
अतएव  लादेन  जब  10 वर्षों  से  टिका   रहा  ,तो  साफ   है  कि  उसके  पीछे  राज्य  शक्ति  का  ही  हाथ  है  ,इसके  इत्तर  कुछ  भीं  नहीं , लादेन  की  उपयोगिता  पाकिस्तान  के  लिए  ख़त्म  हुई  तब  इसे  पाक  ने  ठिकाने  लगा  दिया अमरीका  के  हाथों , इसमें  आश्चर्य  करने  वाली  कोई  बात  नहीं  है  , जिस  जगह  पर  लादेन  के  मारे  जाने  कि  बात  हो  रही  है  ,क्या  उसके  बारे  में  पाक  सरकार  या  सेना  या  इसके  ख़ुफ़िया  तंत्र  को  वाकई  में  कोई   जानकारी  नहीं  थी ?ऐसा  हो  ही  नहीं  सकता  ,पाक  अब  भी  लगातार  झूठ  पर  झूठ  बोले  जा  रहा  है  और  भारत  सिर्फ  अपने  ऊपर  हुए  आतंकी  हमले  की  बात  कर  रहा  है  .ऐसे  में  यदि  फिर  कोई  बड़ी  हिंसक  घटना  होती  है   तब  भी  कोई   आश्चर्य  नहीं  .
पूरे  विश्व  के  आपसी  रिश्ते  कूटनीति  से  या  दौत्य  सबंध  से  परिचालित  होते  हैं  ,जैसे  अमरीका  और  भारत  या  इससे  स्वभाव  वाले  राज्य  केवल  कुटनीतिक   तरीके  से  रिश्ते  बनाते  और  बिगड़ते  है  लेकिन  भारत  -नेपाल  ,पाकिस्तान  श्रीलंका  बंगला   देश,  Bhutan  या  अन्य  से  रिश्ते  का  आधा r "दौत्य " ही  है  ,जिसमे  हर  वक्त  कूटनीति  ही  प्रभावी  नहीं  होती  ,यदि  इसे  समझ  लेन  तो  फिर  लादेन  का  मामला  भी  आसानी  से  समझ  सकते  है  अन्यथा  नहीं .
अब  जब  लादेन  मारा  जा  चुक्का  है  तो , आने  वाले  दिनों  में  और  अधिक  सावधानियां  बरतने  की  जरूरत  hai  .यह  तो  स्पष्ट  हो  चुक्का  है  कि  एक  राज्य  भी  आधिकारिक  रूप में  अपराधी  -आतंकवादी  को  शरण - सरक्षण   दे  सकता  है  ,ऐसे  में  अस्थिरता  का  दौर  जारी  रहे  और  मार - काट  होती  रहे  ,यही  आज  संसार  कि  मुख्य  त्रासदी  है  ,जिसके  चपेट  में  भारत  लगातार  आजादी  से  जूझता  आ  रहा  है  और  अमरीका  व्  पशिचम  देश  तो  हल  में  उसके  चपेट  में   आये  है  ,फिर  वह  क्या  जाने की  'अराजक  स्थिति  में  आतंकवाद  का  दर्द  कैसा  होता  है  किसी  व्यवस्थागत  देश  में  जहाँ  कानून  की  सत्ता  सिर्फ  दिखावे   भर  की  होती  है  और  आम  नागरिक  घूंट  कर  रहने  को  विवश  होता  है   "
यहाँ  एक  बात  और  जरूरी  है  ,वह  यह  की  लादेन  की  दुनिया  के  ख़त्म  होने  का  भ्रम  विश्व  नहीं  पाले  , अब  छोटे  -छोटे  समूहों  में  उससे  भी  अधिक   खतरनाक  आतंकवादी  गिरोह  पाकिस्तान  अफगानिस्तान  जैसे  दुनिया  में विचर  रहे  है  ,जो  मौका  मिलते  ही  अपनी  ताकत  का  अहसास  कराने  से  नहीं  चुकेंगे  और  इसके  पीछे   भी  कोई  राज्य  की  शक्ति  निहित  हो  तो  उसे  अब  कुटनीतिक  तरीको  से  हल  करने  की  सोचना  बेवकूफी  भरा  ही  होगा  ,इसलिए  सख्ती  का  इल्म  ही  शांति  का  बड़ा  स्रोत  हो  सकती  है  ,जिसे  अमरीका  ने  लादेन  के  परिप्रेक्ष्य  में  दिखा  दिया  है  ,जिसे  सबक  के  तौर  पर  भारत  जितना  जल्द  ग्रहण   कर  ले  उतने  ही  हितकर  होगा   .