Saturday, 10 March 2012

युवा नेतृत्व के भरोसे पर


      युवा नेतृत्व के भरोसे पर 
                                                                            (एसके सहाय )
                                    अब ,जब उत्तर प्रदेश में युवा नेतृत्व के हाथों में सत्ता की  बागडोर कुछेक दिन में होगी ,तब यह विचारणीय प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि किस परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के नाम पर एक बार जुआ खेलने का निर्णय लेने को मजबूर  हुई ,जुआ इसलिए कि खुद अखिलेश और मुलायम सिंह यादव के निकट के साथी इस नेतृत्व के फैसले से अनमने से थे और इसका दिक्दर्शन आजम खान के रूख से परिलक्षित हुआ भी ,इसके बावजूद ,इस युवा नेतृत्व के मुख्य मंत्री बने का मार्ग साफ हुआ | अतएव ,एक बार फिर नए सिरे से अनुभव शून्य नेतृत्व का साबका ठीक उस प्रकार देश के सबसे बड़े सूबे में दिखने को मिलेगा ,जैसा कि राजीव गाँधी के प्रधान मंत्री बनने  के वक्त था |
                                  फ़िलहाल , अखिलेश, मुख्य मंत्री के पद संभालेंगे और मुलायम छाया की तरह उनके मार्गदर्शन करेंगे | भारतीय राजनीति का  यह चेहरा  अगले छ माह तक काफी दिलचस्प होगा | रोचक इसलिए कि इतिहास को देखें ,तब आय काफी कुछ -कुछ राजीव गाँधी के सिंहासनारूढ़ की तरह है ,वह ऐसा इसलिए कि ,जब राजीव गाँधी प्रधान मंत्री  बने थे , तब कांग्रेस के अगले वर्ष शताब्दी वर्ष था और इसके उपलक्ष्य में 1985 में पार्टी के आयिजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि " देश के विकास मद की 100     फीसदी राशि र्मे से मात्र पांच प्रतिशत ही निर्धनों  याने आम देश वाशियों के पल्ले पड़ती है ,बाक़ी बिचौलिये रास्ते में ही खा जाते हैं और इस स्थिति को बदलना उनकी सरकार का प्रथम कर्तव्य है "  परवर्ती काल में क्या हुआ और क्या हस्र कांग्रेस की सरकार को प्रचंड बहुमत रहते झेलना पड़ा ,इसे बताने की जरूरत यहाँ नहीं है |
                               बहरहाल , अखिलेश ,राजीव के बनिस्पत ज्यादा खुशहाल हैं ,वह इसलिए कि इनके प[इत मुलायम अभी जीवित हैं और सक्रिय राजनीति में पूरे -दम -ख़म के साथ  मौजूद भी है ,जो राजनीति के उचित -अनुचित परिणामों के प्रति आगाह करते रहेंगे लेकिन क्या इतने से भर से अखिलेश का काम चल जायेगा  ? कदापि नहीं | फिर तो हल क्या है ? हल है .लेकिन उसके लिए "दृढ इच्छा "  की जरूरत है और यह  फौलादी इरादा वैसे अखिलेश में चुनावी दौरे और भाषणों के दौरान दिखा भी है  .जिसे मूर्त रूप होते देखना भी प्रान्त के लोग चाहते भी है |
                                उत्तर प्रदेश  के लिए ,वर्तमान  समय में "कानून एवं व्यवस्था " ही मुख्य समस्या है ,जिसे सत्ता से ख़ारिज किए गए मायावती ने हार के बाद बहुत ही स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है कि " बसपा के कार्यकर्त्ताओं को निराश होने की जरूरत नहीं है ,सपा के राज -काज में कानून -व्यवस्था के हालात बिगड़ेगी ,2007 की तरह ही स्थितियां , राज्य में गुंडागर्दी का नजारा होगा  ,जिससे लोगों का मोह भंग होना निश्चित है " इस नपे -तुले बयान के बाद ही तुरत जीत के बाद पहले संवाददाता सम्मलेन में अखिलेश ने भी अपनी और सपा के सर्वोच्च प्राथमिकता कानून -व्यवस्था को ही बनाये रखने की बात की है ,इससे उम्मीद है कि बसपा और सपा  याने दोनों को यह पत्ता है कि यदि राज्य में शांति बनी रहती है ,तभी उनका टिकाऊपन   होगा ,सो इसके खतरे से पक्ष -विपक्ष वाकिफ हैं | इस मुदे कि गंभीरता का अहसास अखिलेश को है ,तभी तो विधायक दल एक नेता चुने के बाद अपनी पहली बोल में ही "कानून -व्यवस्था को पुन: रेखांकित किए |इसलिए ,अभी तो भरोसा ही किए जाने के क्षण हैं |
                               इन परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट होगा कि देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीति पर इन दिनों राजनीतिक समीक्षकों का ध्यान स्वाभाविक तौर पर है और अगले कदम का इंतजार है कि अखिलेश की रहनुमाई में कैसे कार्यक्रम का प्रदर्शन यहाँ होता है ? यह इसलिए भी भारतीय राजनीति में वंशवाद अब प्रयोग की उतनी महत्पूर्ण विधा नहीं रही ,जैसा कि नेहरू -गाँधी के ज़माने में हुआ करती थी और अब लोकप्रियता है तो योग्यता  भी है ,जिसका निर्धारण मतदाता ही अपने मनोयोग से कर रही है और यदि ऐसा नहीं होता तब , राहुल गाँधी को यूपी के लोग नहीं ठुकराते बल्कि अच्छी -खासी वोट देकर कम से कम विपक्ष में बैठने लायक बहुमत तो देते ही .लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि सिर छुपाने के लिए भी  जगह नहीं दी ,जिसका मतलब बहुत ही साफ है और यह कि केवल  हवाबाजी के बातों से काम नहीं चलने वाला ,वरन कथनी  -करनी  में साम्य का भी दिक्दर्शन होना चाहिए ,जैसा कि अखिलेश ने डी पी यादव ,अमर सिंह और  अपने चाचाओं    के प्रति किया है  और यही पूंजी भरोसे का अभी अखिलेश के पास है ,जिसका अभाव अन्य युवा नेतृत्व को  हैं |
                            वैसे में अखिलेश की बातों में अभी भरोसा किया ही जाना चाहिए ,ताकि इनके प्रवृतियों  का परीक्षण हो सके |किसी भी राज्य का पहला दायित्व कानून -व्यवस्था को बनाये रखने का है फिर विकास की गति को धैर्यपूर्ण  तरीके से अमली जामा पहनने से है ,जिसका बैचेनी से उत्तर प्रदेश को इंतजार है | इसके लिए अखिलेश के पास समय भी काफी है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह दूसरों के मीन-मेख निकलने में अपना वक्त जाया करें ,वक्त किसी का इंतजार नहीं करता बल्कि लोग समय की प्रतीक्षा करते है ताकि अपनी सोची योजना को मूर्त स्वरूप   दिया  जा सके .ठीक उसी  प्रकार जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने पांच साल का इंतजार किए और इन वर्षों में समूचे सूबे में मायावती के खिलाफ अलख जगाते रहने में अपने को कभी अकेला नहीं माने और अब यही तेवर -धैर्य  अखिलेश में देखना बाक़ी है |
                          और एक सलाह अखिलेश को ,वह यह कि आपराधिक तत्वों से दोस्ती मत करो और न ही प्रोत्साहन दो ,केवल जन कल्याण के मद्देनजर समग्रता में निर्णय लो ,फिर सिर्फ पानी -बिजली और सडक के विकास को फिलवक्त प्राथमिकता दो .देखो भविष्य के रास्ते और सुखद एवं आश्चर्यित होंगे | फ़िलहाल इतना ही --
                               

Thursday, 8 March 2012

झारखण्ड की राह पर उत्तराखंड


उत्तराखंड भी अब झारखण्ड की राह पर है | खबर है कि कांग्रेस भी अब राज्य में सरकार बनाने के लिए कमर कस चुकी है |ऐसे में सरकार के स्थायित्व का संकट बराबर रहेगा ,जो इस खुबसूरत वादियों वाले  प्रान्त को बर्बाद कर देगी |जोड़ -तोड़ और धूर्त चालें अब इसके मुख्य अस्त्र होगें ,जिसमे आम लोग पीसने के लिए अभिशप्त होगें |यही संसदीय प्रणाली के लोकतंत्र का विद्रूप चेहरा है ,जो कई प्रदेशों में भी दिखता रहा है |इसके बावजूद भी कोई धीर -गंभीर शक्ति जनहितों के अनुरूप सार्वजनिक क्षेत्र में राजनीति को एक ठोस दिशा देने के लिए आगे बढ़ने से कतराती है और यह स्थिति व्यवस्था से ही चिढ लोगों को पैदा करने में योगदान  दे रही है ,जो किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए भविष्य में नुकसान दायक हो सता है |
                                  आकंड़े और  वह भी प्रतिनिध्यात्मक संख्या संसदीय व्यवस्था में समूचे जन विश्वास को अपने में नहीं समेटती ,बल्कि टुकड़े -टुकड़े में स्थानीय "मनो इच्छा "को अभिव्यक्त करती है ,इसे  समझने की जरूरत है |इसे ही समझ कर और अनुभूत करके कांग्रेस के ही एक दिबगंत नेता बसंत साठे ने  इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्रित्व काल में और खुद मंत्री रहते अध्यक्षात्मक प्रणाली की सरकार  अर्थात व्यवस्था की जोरदार वकालत की थी लेकिन 1982 में उठाई गई बात अब भी देश के लिए प्रासंगिक है और बहस की मांग करते है ,जिस पर वाकई में गौर करने की आवश्यकता है | यह विषय जब साठे ने आम लोगों के बीच विचार करने के लिए रखा ,तब इसे हल्के से लिए गए और तत्कालीन सता और प्रतिपक्ष मतलब सभी पक्षों ने इसे अपने -अपने तरीके से शंकालू होकर अपनी  बातें ,दबी जबान से की थी ,इसलिए यह बहस आगे नहीं बढ़ सकी |खुद इंदिरा गाँधी ने ही इसे उस वक्त ध्यान नहीं दी थी ,अन्यथा परवर्ती दिनों में कुछेक परिवर्तन देखने को मिल सकता था |
                                          खैर, अब .जब उतराखण्ड में कांग्रेस और भाजपा की संख्या एक -दो से पीछे है और राज्य में संघ सरकार द्वारा पदस्थापित कांग्रेस चरित्र के राज्यपाल मार्गरेट अल्वा मौजूद है ,तब एक बार फिर देश को सरकार बनाने के लिए हो रहे नौटंकी देखने का मौका मिल सकती है और इन दलों से अलग जीत कर आए दलों में भी टूट -फुट  और बागीपन के तेवर दिखेंगे ,जिसमें पद और मुद्रा ही सत्ता की चाभी इनके बीच स्थायित्व का मानक बनेगा ,इससे इतर कुछ भी नहीं और यदि कोई चतुर नेता खासकर भाजपा और कांग्रेस से गोल - गोल बातें करते हैं तो उसका कोई मतलब यथार्थ राजनीति से नहीं होता ,सिर्फ "सत्ता " ही इनके येन -केन -प्रकारेण लक्ष्य होते हैं .जहाँ सैधान्तिक , आदर्श और चरित्र के लिए कोई जगह नहीं होती |ऐसे में अब देखने लायक यह होगा कि राज्यपाल किसे सरकार बनाने के लिए सर्व  प्रथम बुलावा देती है ,वैसे दावे तो दोनों कर ही चुके हैं |
                                         उत्तराखंड और झारखण्ड समेत छतीशगढ प्रदेश का गठन एक साथ थोड़े -थोड़े अन्तराल के बाद 2000 में हुआ |इतफाक से झारखण्ड को छोड़कर इन दोनों  राज्यों में  स्थायित्व का संकट प्राय: नहीं रहा लेकिन इस बार उतराखंड फंस गया है .इसे अब झारखण्ड की तरह ही अराजक स्थिति से गुजरने के लिए तैयारी कर  लेनी होगी ,इसमें कोई संशय नहीं | जो विधायक ,विशेष कर निर्दल सरकार बनाने में अपना समर्थन देगा ,वह इसकी पूरी कीमत वसूलेगा |यह आज की राजनीति का दस्तूर बन गया है और ऐसा नहीं हुआ ,तब समझे कि खंडूरी जैसे नेता अब भी राज्य में मौजूद हैं ,भले ही मुख्य मंत्री खंडूरी खुद चुनाव हर गए हो लेकिन इनकी ईमानदारी का कोई जोड़ नहीं | ऐसे नेता हारते भी है ,तो अपनी व्यापक सोच को लेकर जिसमे  क्षेत्रीयता,जातीयता और सांप्रदायिकता    के लिए कोई जगह नहीं होती .यदि ऐसा होता तो वह चुनाव नहीं हारते ,जैसे कि आप जानते है -सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सरीखे नेता अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर विकास के प्रति समग्र सोच रखते ही नहीं ,केवल अपने ही चुनाव हल्कों में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं ताकि चुनावी युद्ध में उनको कोई परेशानी भविष्य में नहीं हो सके |इसका नतीजा क्या हो सकता है ,खंडूरी सामने हैं ,अगर यह भी अपने चुनावी इलाकों को ध्यान में रखकर राजनीति की भौतिकवादी प्रवृतियों के अनुकूल सरकार का नेतृत्व करते तो हर का यह सामना इनको नहीं करना पड़ता |
                                        बहरहाल ,उत्तराखंड के जनादेश का संकेत काफी साफ है और काफी हद तक निरपेक्ष है ,वह यह कि सरकार में सभी की भागीदारी हो ,ताकि स्थायित्व के संकट से यह राज्य बचा रहे | यदि ऐसा संभव नहीं है ,तो राष्टपति शासन ही इसकी नियति है ,ऐसा इसलिए भी बेहतर होगा कि बहुमत पर आधारित सरकार  का स्वरूप ढीला -ढाला होगा ,और बात -बात पर "सनक " पूर्ण राजनीति का शिकार होने के लिए यह विवश होगा ,जैसा कि झारखण्ड में प्राय; रोज दिखता है | राष्पति शासन इसलिए कि कम से कम एक व्यक्ति याने राज्यपाल के हुक्म की तामिला होगी  .जिससे प्रशासनिक अराकता से प्रान्त बच जायेगा | हाँ ,इसके लिए लोगों को खासकर., राजनीतिक प्राणियों को सब्र करना होगा ,अगर लोक कल्याण की भावना में विश्वास करते हों तब , वह भी इसलिए कि परोक्ष रूप से केंद्र की सरकार ,जो संयोग से कांग्रेस नेतृत्व वाली है |
                                     लेकिन प्रश्न है कि क्या  भाजपा -कांग्रेस ऐसा होने देगी  खासकर , केंद्र में बैठी संप्रग सरकार के स्वभाव में जनतांत्रिक मूल्यों और जनहितों के स्थायी समझ को ठोस रूप देने की मादा   है  |कांग्रेस सरकार का सीधे सँचालन करती हो या अप्रत्यक्ष तौर से केंद्र के सहारे ,कलेजे पर सांप भाजपा के ही लोटेंगे न ,फिर जनहित -लोकहित कहाँ है ? यही बात कांग्रेस के साथ भी लागू है ,जो केंद्र में होने के लाभ राज्यपाल के जरीये लेने से नहीं हिचकेगी |ऐसे में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का यह विद्रूप चेहरा देश को हमेशा चिढाता रहेगा और हम बराबर "अट्ठाहस " करते  रहेंगे |
                                          
                                   

Tuesday, 6 March 2012

इन चुनाव परिणामों का क्या


 
                                                                                 एसके सहाय 
                          देश में संपन्न पांच राज्यों के विधान सभाओं के चुनाव परिणामों में मणिपुर के नतीजे चौकाते नहीं , बल्कि इसके लिए पूर्व से ही राजनीति समीक्षक उस तरह के प्रतिफल के लिए तैयार थे ,लेकिन अन्य चार राज्यों में आए परिणामों को लेकर अब ज्यादा माथा -पच्ची रजनीतिक -सामाजिक हल्कों में होने को बताब है |ऐसा इसलिए कि 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है और इसमें कांग्रेस के साथ कथित इनके युवराज राहुल गाँधी के किस्मत का फैसला होने वाला है और यह निर्णय ठीक उसी तरह के होने हैं ,जैसे इनके पिटा राजीव गाँधी के हुए थे ,यह इसलिए कि राजीव भी बिना अनुभव के सीधे प्रधान मंत्री बन गए  थे और अब काफी कुछ इसी तरह कि स्थिति राहुल की है ,जो बिना राज -काज के अनिभव लिए उस पद पर निगाहें गडा दी है ,ऐसे में गंभीर मंथन का दौर इन दिनों रजनीतिक  गलियारों में हैं ,इसलिए स्वाभाविक है कि अब वक्त आ गया है कि देश के नेतृत्व  को लेकर  दो -चार हो लिया जाय |
                           पहली बात यह कि मणिपुर देश नहीं है और इसपर ज्यादा भरोसा करके कांग्रेस भविष्य की राजनीति को धार नहीं दे सकती |अतएव , उत्तर प्रदेश ,पंजाब और उत्तराखंड के ही परिणामो को लेकर भविष्य के कयास किए जाये  तो ज्यादा बेहतर होगा |   खासकर , यूपी में राहुल के कड़ी  परिश्रम का कोई साफ परिणाम नहीं हैं ,सो आने वाले कल की तस्वीर कांग्रेस के लिए ज्यादा दुःख पहुँचाने वाली प्रतीत है | ऐसा क्यों हुआ ? शायद वह इस विचार पर  ज्यादा सोचने वाले भी नहीं हैं ,ऐसा इनकी सोच की दिशा को देख कर परिलक्षित है |वजह साफ है ,इन चुनाव परिणामों के पहले के इतिहास को देखें ,विशेष कर 2009 के लोक सभा चुनाव और 2010 विधान सभाओं के वक्त के राहुल को याद करें ,तब काफी कुछ इनके मन -मिजाज का हाल आप बेहतर तरीके से जान सकते हैं |   
                             बिहार और झारखण्ड में जब उन लोक सभा -विधान सभा के चुनाव की घोषणा हो रही थी ,तब राहुल ने पूरे जोर -शोर से कांग्रेस जनों और आम जनों के मध्य यह गर्जन किए कि दागी ,  दो बार हार चुके राजनितिक तथा किसी भाई -भतीजे या पुत्रों को कांग्रेस का टिकट नहीं मिलेगा ,इतना ही नहीं साफ -सुथरी ,ईमानदार छवि के साथ युवा तबकों को टिकट दिए जाने के पैमाने तय कर दिए जाने की बात कही थी लेकिन जब चुनाव लड़ने के मौके आए ,तब अपनी कही गई और घोषित नीतियों के विपरीत बिहार और  झारखण्ड में कांग्रेस के टिकट दिए गए ,जहाँ कांग्रेस का क्या हाल हुआ .यह अब स्पष्ट रूप में रेखांकित है | राहुल की यह मकारी  पूर्ण  बातों  को यूपी के लोग भूले नहीं थे ,सो नतीजा सामने है |
                             राहुल को थोड़ी भी सामाजिक .राजनितिक और भौगोलिक समझ होती तो तो यह अहसास होता कि झारखण्ड -बिहार की सीमा और सामाजिक सरोकार उत्तर प्रदश से बंधे हैं ,जहाँ कही गई झूठ जल्द पकड़ में आ जाएगी मगर अपने गलैमर के प्रभाव से कांग्रेस की नैया हांकने की कोशिश क्या हो सकती है ,इसका ख्याल उन्हें नहीं था ,अन्यथा ऐसा हस्र नहीं होता ,जैसा की अभी हुआ है |
                               दूसरी यह कि .कांग्रेस को तीन मोर्चे पर लड़ाई लड़नी थी लेकिन इसके लिए उसके पास अपने शत्रु पार्टियों के काट के लिए कोई शस्त्र नहीं थे | समाजवादी पार्टी ,बहुजन पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पास स्थानीय स्तर पर भी कद्दावर नेता थे ,जो कांग्रेस से कहीं पर भी उनसे बीस पड़ने कि काबिलियत से लैस थे लेकिन इनके पास वैसा कुछ भी नहीं था ,जैसा की अन्यों नके पास था |ऐसे में कांग्रेस को हारना ही किस्मत में बदा था .इससे इतर कुछ भी नहीं |
                              वैसे भी ,व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से देखें तो स्पष्ट प्रतीत है कि कांग्रेस के पास खोने और पाने के लिए  कुछ भी नहीं था | सोनिया गाँधी कभी जन मुद्दों पर आम लोगों के बीच नहीं आइ केवल बयानबाजी ही इनके अस्त्र रहे लेकिन मुलायम सिंह यादव का लंबा इतिहास संघर्ष का रहा है और लीक से हटकर बेबाकी से राजनितिक पूर्ण चतुराई से अपनी बात कह देने में माहिर रहे हैं | याद करें .वह बयान जब अयोध्या मुद्दे पर इलाहबाद उच्च न्यायालय के फैसले आए थे ,तब इस निर्णय को सपा खेमे को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों से सराहनीय फैसले की बात कहीं जा रही थी और मुलायम कुछेक दिन के लिए छुपी साध लिए थे .फिर मौका मिलते ही इन्होने जो कुछ भी कहा ,वह भाजपा ,कांग्रेस और बसपा के लिए अनमने सा था | इनका साफ तौर पर नपा -तुला विचार था कि "उक्त फैसले से देश का एक खास समुदाय ठगा सा महसूस कर रहा है " 
                                 बस, इस प्रतिक्रिया  को सामने आने भर की देर थी ,समूचे देश में  इसे लेकर सपा   और मुलायम को क्या -क्या आलोचनाओं   के तीर से भेद दिया गया  लेकिन वह स्थिर बने रहे .इतना ही नहीं अमर सिंह जैसे राजदार ने उकसाने वाली बात कई बार कही लेकिन उसका कोई प्रत्युत्तर नहीं दिए  और अपने तरीके से पूरे राज्य में राजनितिक दौरे में भिड़े रहे |ऐसे में चुनाव का लाभ इन्हें नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा ? अल्पसंख्यक समुदाय जो कल तक मायावती - बसपा के साथ थी अब सप -मुलायम के साथ दम साधे खड़े हो चुकी थी | इतना ही नहीं , इनके बेटे अखिलेश यादव ने जिस बेबाक तरीके से युवा साथियों  के साथ संपर्क साधा ,वह बेमिसाल रहा ,इसमें किन्तु -परन्तू का कोई सवाल बीच में नहीं थे  |
                                 इसी तरह काफी कुछ  उत्तराखंड और पंजाब की रही | अल्पसंख्यक वाली बातें यूपी में कांग्रेस ने की लेकिन उसके असर में पंजाब आ गया ,जहाँ अल्पसंख्यक मतदाताओं का अर्थ ही नहीं था और आजादी पूर्व के इतिहास को भाजपा -अकाली दल ने इस तरीके लोगों के बीच विस्तृत किए कि कांग्रेस जीत कर भी हार गई |कांग्रेस यह भूल गई कि तुस्टीकरण और लोक लुभावने बातों का प्रभाव भारत जैसे देश में बदलाव और स्थिरता के ठोस रह नहीं हो सकते |यह थोड़े समय के लिए फायदेमंद हो सकती है ,हमेशा के लिए नहीं | राहुल -सोनिया -प्रियंका  के भरोसे कांग्रेस में इनसे कई उम्दें राजनितिक प्राणी हैं ,फिर राहुल के रहते कैसे कोई युवा अपनी महत्वकांक्षा  को गर्त्त में मिलते देख सकता है ,वह भी तब ,जब वह राजनितिक  को  जीवन दर्शन  के लिए चुना हो |
                                   गोवा और उत्तराखंड के परिणाम शुरू  से से जुदा थे .जितना सच मणिपुर के लिए चुनाव पुर अपरिनाम कि उम्मीद थी .ठीक उसी तरह गोवा के लिए भी आशा राजनीति प्रेक्षकों की थी ,फर्क सिर्फ मात्रा का अर्थात संख्या बल का था ,जो करीब -करीब सामाजिक विज्ञानं के अनुरूप ही रहे | थोड़ा अचरज ,उत्तराखंड के लिए ही है ,जहाँ बहुमत के फासले में कांग्रेस -भाजपा पिछड़ गए लेकिन सत्ता विरोधी रूझान के बावजूद भाजपा को इतना शक्ति लोगों ने दे दी कि वह -जोड़ -तोड़ कर पुन: सरकार बना सकती है |यह अलग प्रश्न है कि इस राज्य का हस्र भविष्य में झारखण्ड जैसे दिखे ,जहाँ  अराजक सी स्थिति ही इसके अस्तित्व में आने बाद से बनी है और यही बात कांग्रेस पर भी लागू है ,जो अगर सरकार बना भी लेती है तो स्थायित्व का संकट उसे लगातार झेलने के लिए अभिशप्त रहना होया |
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Tuesday, 7 February 2012

पाक: नई सोच के कूटनीतिक आयाम


                                                          पाक: नई सोच के कूटनीतिक  आयाम 
                                                                     (  एसके सहाय )
                             पाकिस्तान के प्रधान मंत्री युसूफ गिलानी ने कहा है कि " 21 सदी में पाकिस्तान एक और युद्ध का बोझ भारत के साथ झेलने में असमर्थ है |"  यह बयान दक्षिण एशिया के लिए स्वागत योग्य तो है लेकिन इसके यथार्थ में देखें तब , यह अंदरूनी स्थितियों से उत्पन्न परिस्थितियों का समावेश  भी इसमें है ,जो पाकिस्तान को एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है ,सो इसका   समर्थन किया ही जाना चाहिए | ऐसा इसलिए भी आवश्यक है कि अंतराष्टीय सबंधों में भू: राजनीति की अपनी उपयोगिता है ,जिसे भारत कभी उपेक्षा नहीं कर सकता ,क्योकि देश की प्रतिनिध्यात्मक जनतांत्रिक पद्धति में स्वतंत्रता हासिल करने के बाद ही "अल्पसंख्यक " राजनीति के महत्त्व को एकाध राजीनीति पार्टियों को छोड़ कर सबों ने पाक के प्रति एक खास नजरिये का इजहार किया है ,जिसका सुन्दर उदाहरण पांच राज्यों के मौजूदा विधान सभा चुनाव है | ऐसे में गिलानी का कश्मीर दिवस के मौके पर दिए विचार को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए |
                             वैसे , पाक प्रधान मंत्री का व्यक्त विचार किस मकसद से स्पष्ट रूप से सामने आया है , इस बारे में थोड़ा संशय है ,संशय भी इसलिए कि पूर्व का इतिहास भारत को फूंक -फूंक कर कदम उठाने के लिए मजबूर  करता है ,फिर भी जिस हालातों में गिलानी के व्यक्त भावना पूरी दुनिया के समक्ष आई है ,उसे सकारात्मक पहल के तौर पर लिया जाने की जरूरत दोनों देशों  के हित में है | हित भी इसलिए कि भारत लोकतान्त्रिक प्रणाली वाली व्यवस्था के रूप में स्थापित है और पाकिस्तान इस प्रक्रिया के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है ,जिसे भारत के साथ की  आवश्यकता ज्यादा है |
                               भारतीय हितों के परिप्रेक्ष्य में गिलानी की बातों को फिलवक्त मनमोहन सिंह किस रूप में ग्रहण करते हैं ,इसे सामने आने में देर हो सकती है लेकिन इतना सच है कि गिलानी के बयान में "कातरता " की झलक है  ,और यही कातरता  भारत हित में है |यह स्थिति कुछ -कुछ नवाज शरीफ के प्रधान मंत्रित्व में भी  झलका था ,जिसे परवान चढाने अटल बिहारी वाजपेयी कोशिश कर ही रहे थे कि परवेज मुशर्रफ़ ने उसमे पलीता लगा दिया ,जिससे कश्मीर के मुद्दे को  भी ले -दे के ख़त्म करने  की पहल थी | यह पहल साकार क्यों नहीं ले सकी ? इस पर चिंतन करें ,तब साफ परिलक्षित होगा कि उस काल में अमरीका का भरपूर समर्थन पाक सेना को परोक्ष तौर पर हासिल था ,जिसके बूते जनरल मुशरर्फ ने शरीफ के तख्ता पलट करने की हिमाकत की | तब अमरीका के रिश्ते इस कदर बिगड़े नहीं थे .जैसा फिलवक्त पाक के साथ हैं और नवाज़ का भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते को खास प्राथमिकता दिया जाना था ,और यह अमरीका को पसंद नहीं थे  ,जिसमे शह पाकर सेना ने पाक में सत्ता हस्तगत करने में कामयाब हो गई थी |
                                      अब ,तब की स्थिति से गुणात्मक अंतर है ,जिसमे अमरीका पाक से खफा है ,अपने विश्व बिरादरी से आर्थिक मदद की किल्लत है ,ले -देकर चीन ही वह देश है ,जो कुछ सहायता दे सकता है ,मगर यह मदद उतना देने में भी सक्षम नहीं है ,जितना अमरीका उसे दे सकने में आगे रहा है | इस बात को गिलानी की सरकार भली भांति समझती है ,तभी वह खास अवसर पर एक कटु सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं की है ,जिसका भरपूर लाभ उठाये जाने की ओर भारत को पहल करना ही होगा और इसके लिए खटाई में पड़ी "मित्रता की संधि " की तरफ कदम बढ़ाने की कूटनीतिक पहल होनी चाहिए ,तभी राष्टीय हितों को साधने में मदद मिल सकती है |
                                    दरअसल , पाककिस्तान की जो मौजूदा हालात हैं ,उसमे गिलानी के व्यक्त विचार किसी क्रांतिकारी से कम प्रतीत नहीं हैं | पाक में लियाकत अली खान के बाद जुल्फिकार भुट्टो ,बेनजीर भुट्टो ,नवाज शरीफ और युसूफ गिलानी ही वैसे प्रधान मंत्री हैं ,जिनको सेना के साये में ही काम करने की विवशता रही है |विशेष कर , उस हालात में ,जब एक तरफ सेना ,दूसरी तरफ कट्टरपंथी ,तीसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय और चौथी तरफ विश्व की निगाहें पाकिस्तान पर टेढ़ी हो ,तब अचानक भारत के संदर्भ में व्यक्त विचार का विशेष मतलब होना है |   गिलानी के बयान जोखिम भरें है ,इसमें दो राय नहीं कि वह  एक बार फिर सेना और कट्टरपंथियों के नज़र में चढ़ गयें हों | लेकिन हकीकत को खुलेआम स्वीकार कर पाक प्रधान मंत्री ने साफ कर दिया है कि  वह अपने देश में "लोकतान्त्रिक मूल्यों के अस्तित्व के प्रति प्रतिबद्ध " है |
                                     बहरहाल  , पाक की अर्थ व्यवस्था  काफी दयनीय है ,आतंकवाद ,रोजमर्रे की बात है ,बाहरी मदद के रास्ते सिकुड़ गए हैं | देश की व्यवस्था में परस्पर अविश्वास का माहौल है ,जैसे -तैसे अपनी  अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के नाम पर विश्व बिरादरी से मदद की आकांक्षा उसे जिन्दा किए हुए है और इसकी पूर्ति का रास्ता भारत से ही गुजरता है ,जिसमे हिंसा  के लिए कोई स्थान हैं ,तब गिलानी ने भारत को खुश करने के लिए अनजाने में ही  एक तथ्यपरक बात  सार्वजनिक तौर पर रख दी है .जो उनके लिए तो  जोखिम भरा है ही ,साथ में इसके लपेटें में भारत को भी ले लिया है .जिसे आसानी से नज़रंदाज नहीं किया जा सकता है |
                                           गिलानी अपने विचारों से साफ कर दिए हैं कि भारत के प्रति उनके विचार दुराग्रही नहीं है ,इसलिए पाकिस्तानी अवाम को अब यह निर्णय लेना है कि  उसे कश्मीर चाहिए या इससे अधिक की ओर सोचने वाली लोकतान्त्रिक एवं सुदृढ़ अर्थ व्यवस्था वाली देश पसंद है .इन्हीं दो बिन्दुओं पर गिलानी के अस्तित्व टिके है ,यदि इसमें वह सफल हो गए तो इतिहास पुरूष कहलायेंगे और आधी शताब्दी से अधिक चले आ रहे दो देशों के झगडे को   मिटा कर नए सिरे से कूटनीति के इबारत लिख डालेंगे ,जिसकी उम्मीद अमन -चैन पसंद  दोनों देशों के लोग अरसे से कर रहे है | 
                                             भारत -पाक के संदर्भ में एक बात तो साफ हो गई है ,वह यह कि  जिस हिम्मत के साथ गिलानी ने अपनी बात रखी है ,वह तारीफे काबिल है .इसके पहले किसी प्रधान मंत्री या राष्टपति ने अपनी देश की कमजोरी का बखान खुलें आम नहीं किया ,बल्कि यह भी साफ कर दिया कि   कश्मीर समस्या का हल केवल बातचीत से ही संभव है ,हथियारों के बल पर    कदापि नहीं | इसके लिए बिना शर्त वार्ता किए जाने से ही इस समस्या का हल हो पायेगा और पाक, ऐसा ही कदम उठाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है | 
                                              संभव है ,पाक प्रधान मंत्री के बयान के बाद गिलानी के विरूद्ध राष्टीय -अंतर्राष्टीय षड्यंत्र हों ,इसमें सिर्फ खतरें ही खतरे हैं ,यह खतरा गिलानी को ज्यादा है ,भारत को कम | गिलानी को दुश्मन  देश बरगला सकते है और अपनी धन -दौलत से चका चौंध भी कर सकते है ,जिसका फ़िलहाल उसे जरूरत भी है |कश्मीर ही वह केंद्र है जिसके सहारे अबतक पाक इस्लामी जगत से आर्थिक ताकत पाता था और अमरीका समेत पशिचमी राष्ट उसे भारत के खिलाफ हर वक्त उकसाये रखने में जोर लगाये रहते थे ,जिसमे डालर की माया काफी रहा करती थी | फिर भी जब ,गिलानी ने सामरिक तौर पर यह मान ही लिया कि ,पाक हिंदुस्तान  से कभी भी पार नहीं पा सकता था ,तब एक बार फिर भारतीय कूटनीति को तेज धार देने में क्या हर्ज़ हो सकती है ?

Thursday, 19 January 2012

सेनाध्यक्ष सिंह का न्यायालय में जाना अनुशासनहीनता का परिचायक है


भारतीय थल सेनाध्यक्ष वीके सिंह का अपनी उम्र को लेकर लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत न्यायिक पद्धति के समक्ष गुहार लगाने से एक बात स्पष्ट है कि "अब राष्ट -राज्य की अवधारणा  विशिष्ट जनों के मध्य कमजोर पड़ गई है ,यदि ऐसा नहीं होता तो एक व्यवस्था के लिए गए निर्णय के विरूद्ध  वह अपनी आयू को लेकर अभियाचना कदापि नहीं करते |"
अर्थात सिंह का उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खट खटाना किसी भी राज्य -देश की व्यवस्था को चुनौती देने जैसा कदम है और यह "अनुशासनहीनता " है ,ऐसे में इनको तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना ही उचित है | ऐसा इसलिए कि हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था के नागरिक तो है लेकिन उसके पहले एक देश के व्यवस्थित एवं सभ्य नागरिक भी है ,जो भौगोलिक सीमाओं से बंधा हुआ ,राष्ट -राज्य के रूप  में मौजूद है  |
सेनाध्यक्ष का कदम लोकतान्त्रिक समाज के समष्टि में उचित और वैध हो सकता है ,परन्तू  जहाँ व्यवस्था के नेतृत्व के निर्णय को चुनौती देने जैसे प्रश्न है ,वह कदापि राष्ट--राज्य की संकल्पना  के विपरीत है ,जिसे वर्तमान सरकार ( व्यवस्था )के लिए असहनीय है |
यहाँ पूर्व में रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिज के हाथों बर्खास्त नौ सेनाध्यक्ष विष्णु भागवत का दृष्टान्त   सामने है |
तात्पर्य यह कि  जनतांत्रिक व्यवस्था में ही कुछेक विषय ऐसे होते हैं ,जिसे देशकाल के दृष्टिकोण से कभी चुनौती दिए जाने की प्रक्रिया को ,कोई भी सत्ता बर्दाश्त  नहीं कर सकती  ,जैसा कि संघ सरकार ने  उच्चतम न्यायालय में अपनी बात रखने की पहल की है |
 

Sunday, 16 October 2011

भगवा लहर के वो लाल दिन

                                                            एसके सहाय 

                         भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवानी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के तहत जन चेतना यात्रा शुरू करने के पूर्व इनके मुखार विंद से यह उच्चरित होना कि "अगले लोक सभा में प्रधान मंत्री का चयन पार्टी करेगी "  का राजनितिक निहितार्थ अब साफ है कि खुद उनको भरोसा  नहीं है कि 
भाजप उनको उस पद पर रखकर चुनाव लड़ेगी |
                               उम्र के अंतिम पहर  में अडवानी के अवचेतन मन में  आज भी प्रधान मंत्री के पद की ललक है ,सो, इन्होने स्पष्ट कर दिया है कि वह आसानी से मैदान छोड़ने वाले नहीं हैं ,बल्कि अपने रणनीतिक कौशल पर पूरा भरोसा है ,तभी तो पत्रकारों दो टुक शब्दों में बताया कि  फिलवक्त उनका मकसद भ्रष्टाचार के प्रति देशवाशियों को जागरूक करना है ,जिसके लिए जन चेतना  रथ की   पहिया देश के तेईस राज्यों में अपने विचार रखेगी |
                              वास्तव में , जब अडवानी को यह कहना पड़ा कि     --       पार्टी ही तय करेगी कि      प्रधान मंत्री कौन होगा ? तब यह जाहिर है कि वह नब्बे के दशक  से अभी उबरें नहीं है ,और इस मुगालते में है कि उनकी चिर -परिचित रथ यात्रा से एक बार फिर उनके पक्ष में भाजपा के लिए माहौल बनेगा ,जो कि  ,तब और अब के बीच के फर्क को समझ पाने के फेर में है | इस यात्रा का सन्देश पहले कि भांति लोगों के बीच जायेगा या इसके उलटे परिणाम सामने आयेंगे ,यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है |
                           वैसे , व्यावहारिक तौर पर आज की सामाजिक -राजनितिक फिजां में गुणात्मक परिवर्तन पिछले नब्बे के दशक से है , जिसका भान शायद अडवानी को नहीं है ,तब उदारवादी चेहरा के तौर पर भाजपा में अटल बिहारी बाजपेयी थे , जिनको नेता घोषित करने में इन्होने कोई गुरेज नहीं की ,बल्कि कई बार जोर   देकर घोषणा किए कि भाजपा के प्रधान मंत्री बाजपेयी ही होगें |इसका असर यह था कि उस काल में इस स्वयंमेव घोषणा के विरूद्ध दलीय आवाज कभी नहीं उठी ,लेकिन अडवानी के साथ कभी वैसी स्थिति नहीं रही  
,खुद बाजपेयी भी सक्रिय राजनीति नसे हटे तो अडवानी के नाम पर खुलकर बातें कहने से बचते रहे ,जबकि हकीकत में जब भाजपा की उगाई फसल में अडवानी के ही मेहनत थे ,जिसे बाजपेयी काट ले गए |
                            अतएव ,अडवानी के पुन: रथ पर सवार होकर देश व्यापी भ्रमण का मतलब दल के अंदरूनी शक्तियों को अपनी ताकत का इजहार कराना है ,ताकि उनकी स्वीकार्यता भाजपा में बनी रहे |ऐसा इसलिए भी कि हल में भाजपा के राष्टीय कार्य समिति की बैठक में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी भाग नहीं लेने को लेकर " नेतृत्व " पर काबिज होने की होड़ के रूप में देखे जाणे की प्रवृति राजनितिक हल्कों में है | यह हालात  अडवानी को उस स्वंयसेवक से देखने की विवशता है ,जिसे अपनी अध्यक्षता में मोदी को महासचिव  बनाया था और इनके ही बूते केशु भाई और शंकर सिंह बाघेला के बीच हुए झगडे के हल में नरेन्द्र मोदी को मुख्य मंत्री बनाने में योग दिए थे |
                               दरअसल ,भाजपा का वर्तमान परिदृश्य पिछली  सदी के अंतिम दो दशकों से बिल्कुल भिन्न है | जनता पार्टी  से नाता तोड़कर पूर्व जनसंघ के नेताओं  ने भाजपा का गठन जब 1980  में किया था ,तब इसके गिनती के ही सांसद थे ,ऐसे में बाजपेयी के नेतृत्व में " गांधीवाद और एकात्म मानववाद " के मिश्रण से बनी अवधारणा के तहत पार्टी को आम लोगों के बीच ले जाणे की बातें पूरे जोर -शोर से हुई ,लेकिन यह देश वाशियों के बीच परवान नहीं चद्ग सका और इसके नतीजे १९८५ के  लोक सभा के चुनाव में सिफर रहे 
.इसका फल यह था कि इसके दो उम्मीदवार ही लोक सभा में पहुँच सके और बाजपेयी स्वयं चुनाव हार  गए |
                             भाजपा की यह दुर्गति त्रासदपूर्ण थी कि ऐसे ही जीर्ण  -शीर्ण  सांगठनिक हालातों के बीच लालकृष्ण अडवानी अध्यक्ष के रूप में अवतरित हुए और इसे संयोग कहें या दुर्योग ,उसी काल में तलक सबंधी शाहबानों प्रकरण का मामला राष्टीय राजनितिक क्षितिज में उछल गया ,जिसमें राजीव गाँधी के प्रधान मंत्रित्व में कांग्रेस सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए संसद से 
वैसा विधेयक पारित करवा दिया ,जिससे बहुसंख्यक समाज काफी आहत था ,इसी को शामित करने के उदेश्य से कांग्रेस कि तत्कालीन सरकार ने 46  वर्षों से टला लटके अयोध्या में श्रीराम मंदिर के दरवाजे खोल दिए ,जिसका नतीजा यह था कि इस विषय को विश्व हिन्दू परिषद् ने लपक लिया और वहां पर भव्य मंदिर निर्माण किये जाने की घोषणा कर डाली , जिसे इस बढती शक्ति को भाजपा का मौन समर्थन प्राप्त तो था, लेकिन इसका खुला समर्थन 1989  इसने किया ,तबतक बोफोर्स ,फेयर फैक्स जैसे मामले  देश की राजनीति में  गरमा चुकी थी और कांग्रेस   सरकार बुरी तरह से प्रतिपक्ष के बिछाए व्यूह में घिर चुकी थी | 
                                    इन्हीं ,राजनीतिक -सामाजिक स्थितियों के बीच आडवानी का  करिश्माई नेत्रित्व चमक गई ,जिसमे राम मंदिर के मुद्दे इसके कार्य सूचि में सबसे ऊपर  थे | इस काल में अडवानी ही एकमात्र व् एकछत्र भाजपाई नेता थे जिनके खुला विरोध की हिम्मत किसी में नहीं थी |इस क्रम में छः दिसम्बर 1992  को विवादित राम मंदिर - बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ | इसके पूर्व 1090 में   अडवानी ने सोमनाथ मंदिर से  इस राम मंदिर आन्दोलन को गति देने के लिए रामरथ के नाम पर ठीक उसी तरह दौरे किये ,जैसा की अब सिताबदियारा से एक बार फिर इन्होने भ्रष्टाचार के विरूद्ध अलख जगाने की शुरूआत की है लेकिन तब पूरा भाजपा में विभ्रम की स्थिति नहीं थी ,जैसी कि इस बार परिलक्षित है |
                       यह ,वह काल था ,जब पुरे देश में भगवा की लहर थी और इसमें सवार अडवानी का दमकता   चेहरा की टूटी बोलती थी ,जिसका असर यह हुआ कि भाजपा के संग गलबहियां करने को मध्यमार्गी और क्षेत्रीय दल उतावले थे ,जिसमे जनता दल से जुड़े कई दल अलग -अलग नाम वाले,  बसपा,  अकाली दल, एडीएम के लोकदल असम गण परिषद् और बाद में तृणमूल कांग्रेस -बीजू जनता दल ,तेलगु देशम ,शिव सेना,  नॅशनल कांफ्रेंस सरीखी पार्टियों में होड़ थी |इस कड़ी में बाजपेयी के छ वर्षों का कार्यकाल (1998 -2004  )स्थायित्व को प्राप्त करता रहा |
                               कालांतर   में अडवानी का  पाकिस्तान जाना और वहां के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना  के सम्मान में कसीदे पढ़ा जाना इनको  भाजपा में अपच बना दिया | जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष व् उदार के साथ महान घोषित करना इनके लिए मंहगा पड़ गया और यहीं से इनकी चमक खोती गई  ,जिसका प्रभाव यह रहा कि पार्टी के अध्यक्ष के पद से भारी मन से हटना पड़ा और यही बात आज संघ विचार धारा के उग्र भाजपाई  को  रह -रह कर चिढाती रही है \ऐसे में इनकी मौजूदा यात्रा का क्या हस्र होगा ,वह देखने लायक होगी |





       

Wednesday, 14 September 2011

अमर के पैरवीकार जेठमलानी

                                              एसके सहाय
राम जेठमलानी ,अब अमर सिंह को नोट के वोट मामले में पैरवी करेंगे ,यह  वह शख्स है जो भाजपा का सांसद है और अपने व्यावसायिक वसूलों केलिए किसी विचार धारा और सिन्धांत को मानता नहीं , ऐसे में इसकी निष्ठा दलगत और देश हित से परे है ,सिर्फ इस दलील पर कि  "वकालत उसका पेशा है " इसलिए वह इससे समझौता नहीं कर सकता ,तब प्रश्न है कि फिर राजनीति के नियमीकरण में इनकी क्या उपयोगिता है ,यह सवाल भाजपा के नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए ,यह इसलिए जरूरी है कि दलगत लोकतंत्र में सिन्धांत और विचार धारा ही किसी रजनीतिक दल के मुख्य शक्ति होते हैं और उसके एक जिम्मेदार सदस्य जेठमलानी है |
                                   बेशक कोई भी अधिवक्ता व्यावसायिक कार्यों में किसी दखलंदाजी को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं , लेकिन यदि वह किसी खास विचार धारा के वाहक भी  बनने  का ढोंग करे  और ठीक उसके आदर्शों के विपरीत आचरण करे ,तब इसकी गंभीरता बढ़ जाती है ,ऐसे में जेठमलानी का निर्णय एक बार फिर अवसरवादी राजनीति का परिचय दिया है ,यदि यह निर्दलीय होते ,तब बात कुछ और होती मगर भाजपा के संग होकर ठीक इसके वसूलों के विपरीत काम करने से जाहिर है कि ,इस शख्स के लिए राजनीति का कोई मतलब नहीं है सिर्फ नाम-- पैसा ही महत्वपूर्ण है ,जिसका परिचय इन्होने अमर सिंह के मामले में दिया है |
                                                 वैसे ,जेठमलानी के लिए यह पहला मौका नहीं है ,जो व्यवस्थागत खामियों से जुड़े मामलों में  अपने मुव्वकिल के लिए अदालत में खड़े हुए हों ,,इसके पूर्व भी कई ऐसे मामले हैं ,जिनकी पैरवी इन्होने किया है और क़ानूनी नुक्ताचीनी के बीच कामयाबी भी हासिल की है ,चाहे इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी से जुड़े मुकदमे हों या फिर वैसे विषय ,जिसमे राज्य की शक्ति को नीचा दिखाने का अवसर मिल सकने की गुंजाईश हो  ,प्राय: चर्चित मामलों में एक वकील के रूप में यह हमेशा मौजूद रहे है , २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में करूणानिधि की सांसद बेटी कनिमोझी के भी यही पैरवीकार हैं |
                                                 नाम ,दाम और यश के चक्कर  में जेठमलानी ने अपनी एक अलग ही छवि बनाई है ,जिसका कोई जवाब नहीं , राजनीति में भी अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शख्स के विरूद्ध  चुनाव लड़ने से परहेज नहीं ,जब मन में आया भाजप में घुस गए और जब दिल भर गया ,इससे अलग हो गए ,यह इनकी फितरत में है ,फिर भाजपा क्या सोच कर राजनीतिक तौर पर विचारहीन जेठमलानी को आत्मसात करती रही है ,,यह आम लोगों के लिए समझ से परे है |
                                             यहाँ  सिर्फ इतना ही कहना है कि दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में  राजनीति का सामान्यीकरण ,दल के  आदर्श होते हैं ,जिससे सिन्धांत ,विचार धारा ,कार्यक्रम ,नीति का उदभव स्वभाविक तौर  पर ,निसृत होती है ,ऐसे में अगर भाजपा को शर्मिन्दिगी झेलनी पड़े तो कोई अचरज नहीं , ,आखिर उसने ही जेठमलानी जैसे अराजक वकील को अपने यहाँ पनाह दे रखी है ,जिसका अपना कोई वसूल सामुदायिक हितों के परिप्रेक्ष्य  में नहीं है ,फिर भी वह व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप को स्वीकारता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं है ,यही आज देश के समक्ष रोना है ,जिस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं !