Thursday, 19 January 2012

सेनाध्यक्ष सिंह का न्यायालय में जाना अनुशासनहीनता का परिचायक है


भारतीय थल सेनाध्यक्ष वीके सिंह का अपनी उम्र को लेकर लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत न्यायिक पद्धति के समक्ष गुहार लगाने से एक बात स्पष्ट है कि "अब राष्ट -राज्य की अवधारणा  विशिष्ट जनों के मध्य कमजोर पड़ गई है ,यदि ऐसा नहीं होता तो एक व्यवस्था के लिए गए निर्णय के विरूद्ध  वह अपनी आयू को लेकर अभियाचना कदापि नहीं करते |"
अर्थात सिंह का उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खट खटाना किसी भी राज्य -देश की व्यवस्था को चुनौती देने जैसा कदम है और यह "अनुशासनहीनता " है ,ऐसे में इनको तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना ही उचित है | ऐसा इसलिए कि हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था के नागरिक तो है लेकिन उसके पहले एक देश के व्यवस्थित एवं सभ्य नागरिक भी है ,जो भौगोलिक सीमाओं से बंधा हुआ ,राष्ट -राज्य के रूप  में मौजूद है  |
सेनाध्यक्ष का कदम लोकतान्त्रिक समाज के समष्टि में उचित और वैध हो सकता है ,परन्तू  जहाँ व्यवस्था के नेतृत्व के निर्णय को चुनौती देने जैसे प्रश्न है ,वह कदापि राष्ट--राज्य की संकल्पना  के विपरीत है ,जिसे वर्तमान सरकार ( व्यवस्था )के लिए असहनीय है |
यहाँ पूर्व में रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिज के हाथों बर्खास्त नौ सेनाध्यक्ष विष्णु भागवत का दृष्टान्त   सामने है |
तात्पर्य यह कि  जनतांत्रिक व्यवस्था में ही कुछेक विषय ऐसे होते हैं ,जिसे देशकाल के दृष्टिकोण से कभी चुनौती दिए जाने की प्रक्रिया को ,कोई भी सत्ता बर्दाश्त  नहीं कर सकती  ,जैसा कि संघ सरकार ने  उच्चतम न्यायालय में अपनी बात रखने की पहल की है |
 

Sunday, 16 October 2011

भगवा लहर के वो लाल दिन

                                                            एसके सहाय 

                         भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवानी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के तहत जन चेतना यात्रा शुरू करने के पूर्व इनके मुखार विंद से यह उच्चरित होना कि "अगले लोक सभा में प्रधान मंत्री का चयन पार्टी करेगी "  का राजनितिक निहितार्थ अब साफ है कि खुद उनको भरोसा  नहीं है कि 
भाजप उनको उस पद पर रखकर चुनाव लड़ेगी |
                               उम्र के अंतिम पहर  में अडवानी के अवचेतन मन में  आज भी प्रधान मंत्री के पद की ललक है ,सो, इन्होने स्पष्ट कर दिया है कि वह आसानी से मैदान छोड़ने वाले नहीं हैं ,बल्कि अपने रणनीतिक कौशल पर पूरा भरोसा है ,तभी तो पत्रकारों दो टुक शब्दों में बताया कि  फिलवक्त उनका मकसद भ्रष्टाचार के प्रति देशवाशियों को जागरूक करना है ,जिसके लिए जन चेतना  रथ की   पहिया देश के तेईस राज्यों में अपने विचार रखेगी |
                              वास्तव में , जब अडवानी को यह कहना पड़ा कि     --       पार्टी ही तय करेगी कि      प्रधान मंत्री कौन होगा ? तब यह जाहिर है कि वह नब्बे के दशक  से अभी उबरें नहीं है ,और इस मुगालते में है कि उनकी चिर -परिचित रथ यात्रा से एक बार फिर उनके पक्ष में भाजपा के लिए माहौल बनेगा ,जो कि  ,तब और अब के बीच के फर्क को समझ पाने के फेर में है | इस यात्रा का सन्देश पहले कि भांति लोगों के बीच जायेगा या इसके उलटे परिणाम सामने आयेंगे ,यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है |
                           वैसे , व्यावहारिक तौर पर आज की सामाजिक -राजनितिक फिजां में गुणात्मक परिवर्तन पिछले नब्बे के दशक से है , जिसका भान शायद अडवानी को नहीं है ,तब उदारवादी चेहरा के तौर पर भाजपा में अटल बिहारी बाजपेयी थे , जिनको नेता घोषित करने में इन्होने कोई गुरेज नहीं की ,बल्कि कई बार जोर   देकर घोषणा किए कि भाजपा के प्रधान मंत्री बाजपेयी ही होगें |इसका असर यह था कि उस काल में इस स्वयंमेव घोषणा के विरूद्ध दलीय आवाज कभी नहीं उठी ,लेकिन अडवानी के साथ कभी वैसी स्थिति नहीं रही  
,खुद बाजपेयी भी सक्रिय राजनीति नसे हटे तो अडवानी के नाम पर खुलकर बातें कहने से बचते रहे ,जबकि हकीकत में जब भाजपा की उगाई फसल में अडवानी के ही मेहनत थे ,जिसे बाजपेयी काट ले गए |
                            अतएव ,अडवानी के पुन: रथ पर सवार होकर देश व्यापी भ्रमण का मतलब दल के अंदरूनी शक्तियों को अपनी ताकत का इजहार कराना है ,ताकि उनकी स्वीकार्यता भाजपा में बनी रहे |ऐसा इसलिए भी कि हल में भाजपा के राष्टीय कार्य समिति की बैठक में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी भाग नहीं लेने को लेकर " नेतृत्व " पर काबिज होने की होड़ के रूप में देखे जाणे की प्रवृति राजनितिक हल्कों में है | यह हालात  अडवानी को उस स्वंयसेवक से देखने की विवशता है ,जिसे अपनी अध्यक्षता में मोदी को महासचिव  बनाया था और इनके ही बूते केशु भाई और शंकर सिंह बाघेला के बीच हुए झगडे के हल में नरेन्द्र मोदी को मुख्य मंत्री बनाने में योग दिए थे |
                               दरअसल ,भाजपा का वर्तमान परिदृश्य पिछली  सदी के अंतिम दो दशकों से बिल्कुल भिन्न है | जनता पार्टी  से नाता तोड़कर पूर्व जनसंघ के नेताओं  ने भाजपा का गठन जब 1980  में किया था ,तब इसके गिनती के ही सांसद थे ,ऐसे में बाजपेयी के नेतृत्व में " गांधीवाद और एकात्म मानववाद " के मिश्रण से बनी अवधारणा के तहत पार्टी को आम लोगों के बीच ले जाणे की बातें पूरे जोर -शोर से हुई ,लेकिन यह देश वाशियों के बीच परवान नहीं चद्ग सका और इसके नतीजे १९८५ के  लोक सभा के चुनाव में सिफर रहे 
.इसका फल यह था कि इसके दो उम्मीदवार ही लोक सभा में पहुँच सके और बाजपेयी स्वयं चुनाव हार  गए |
                             भाजपा की यह दुर्गति त्रासदपूर्ण थी कि ऐसे ही जीर्ण  -शीर्ण  सांगठनिक हालातों के बीच लालकृष्ण अडवानी अध्यक्ष के रूप में अवतरित हुए और इसे संयोग कहें या दुर्योग ,उसी काल में तलक सबंधी शाहबानों प्रकरण का मामला राष्टीय राजनितिक क्षितिज में उछल गया ,जिसमें राजीव गाँधी के प्रधान मंत्रित्व में कांग्रेस सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए संसद से 
वैसा विधेयक पारित करवा दिया ,जिससे बहुसंख्यक समाज काफी आहत था ,इसी को शामित करने के उदेश्य से कांग्रेस कि तत्कालीन सरकार ने 46  वर्षों से टला लटके अयोध्या में श्रीराम मंदिर के दरवाजे खोल दिए ,जिसका नतीजा यह था कि इस विषय को विश्व हिन्दू परिषद् ने लपक लिया और वहां पर भव्य मंदिर निर्माण किये जाने की घोषणा कर डाली , जिसे इस बढती शक्ति को भाजपा का मौन समर्थन प्राप्त तो था, लेकिन इसका खुला समर्थन 1989  इसने किया ,तबतक बोफोर्स ,फेयर फैक्स जैसे मामले  देश की राजनीति में  गरमा चुकी थी और कांग्रेस   सरकार बुरी तरह से प्रतिपक्ष के बिछाए व्यूह में घिर चुकी थी | 
                                    इन्हीं ,राजनीतिक -सामाजिक स्थितियों के बीच आडवानी का  करिश्माई नेत्रित्व चमक गई ,जिसमे राम मंदिर के मुद्दे इसके कार्य सूचि में सबसे ऊपर  थे | इस काल में अडवानी ही एकमात्र व् एकछत्र भाजपाई नेता थे जिनके खुला विरोध की हिम्मत किसी में नहीं थी |इस क्रम में छः दिसम्बर 1992  को विवादित राम मंदिर - बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ | इसके पूर्व 1090 में   अडवानी ने सोमनाथ मंदिर से  इस राम मंदिर आन्दोलन को गति देने के लिए रामरथ के नाम पर ठीक उसी तरह दौरे किये ,जैसा की अब सिताबदियारा से एक बार फिर इन्होने भ्रष्टाचार के विरूद्ध अलख जगाने की शुरूआत की है लेकिन तब पूरा भाजपा में विभ्रम की स्थिति नहीं थी ,जैसी कि इस बार परिलक्षित है |
                       यह ,वह काल था ,जब पुरे देश में भगवा की लहर थी और इसमें सवार अडवानी का दमकता   चेहरा की टूटी बोलती थी ,जिसका असर यह हुआ कि भाजपा के संग गलबहियां करने को मध्यमार्गी और क्षेत्रीय दल उतावले थे ,जिसमे जनता दल से जुड़े कई दल अलग -अलग नाम वाले,  बसपा,  अकाली दल, एडीएम के लोकदल असम गण परिषद् और बाद में तृणमूल कांग्रेस -बीजू जनता दल ,तेलगु देशम ,शिव सेना,  नॅशनल कांफ्रेंस सरीखी पार्टियों में होड़ थी |इस कड़ी में बाजपेयी के छ वर्षों का कार्यकाल (1998 -2004  )स्थायित्व को प्राप्त करता रहा |
                               कालांतर   में अडवानी का  पाकिस्तान जाना और वहां के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना  के सम्मान में कसीदे पढ़ा जाना इनको  भाजपा में अपच बना दिया | जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष व् उदार के साथ महान घोषित करना इनके लिए मंहगा पड़ गया और यहीं से इनकी चमक खोती गई  ,जिसका प्रभाव यह रहा कि पार्टी के अध्यक्ष के पद से भारी मन से हटना पड़ा और यही बात आज संघ विचार धारा के उग्र भाजपाई  को  रह -रह कर चिढाती रही है \ऐसे में इनकी मौजूदा यात्रा का क्या हस्र होगा ,वह देखने लायक होगी |





       

Wednesday, 14 September 2011

अमर के पैरवीकार जेठमलानी

                                              एसके सहाय
राम जेठमलानी ,अब अमर सिंह को नोट के वोट मामले में पैरवी करेंगे ,यह  वह शख्स है जो भाजपा का सांसद है और अपने व्यावसायिक वसूलों केलिए किसी विचार धारा और सिन्धांत को मानता नहीं , ऐसे में इसकी निष्ठा दलगत और देश हित से परे है ,सिर्फ इस दलील पर कि  "वकालत उसका पेशा है " इसलिए वह इससे समझौता नहीं कर सकता ,तब प्रश्न है कि फिर राजनीति के नियमीकरण में इनकी क्या उपयोगिता है ,यह सवाल भाजपा के नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए ,यह इसलिए जरूरी है कि दलगत लोकतंत्र में सिन्धांत और विचार धारा ही किसी रजनीतिक दल के मुख्य शक्ति होते हैं और उसके एक जिम्मेदार सदस्य जेठमलानी है |
                                   बेशक कोई भी अधिवक्ता व्यावसायिक कार्यों में किसी दखलंदाजी को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं , लेकिन यदि वह किसी खास विचार धारा के वाहक भी  बनने  का ढोंग करे  और ठीक उसके आदर्शों के विपरीत आचरण करे ,तब इसकी गंभीरता बढ़ जाती है ,ऐसे में जेठमलानी का निर्णय एक बार फिर अवसरवादी राजनीति का परिचय दिया है ,यदि यह निर्दलीय होते ,तब बात कुछ और होती मगर भाजपा के संग होकर ठीक इसके वसूलों के विपरीत काम करने से जाहिर है कि ,इस शख्स के लिए राजनीति का कोई मतलब नहीं है सिर्फ नाम-- पैसा ही महत्वपूर्ण है ,जिसका परिचय इन्होने अमर सिंह के मामले में दिया है |
                                                 वैसे ,जेठमलानी के लिए यह पहला मौका नहीं है ,जो व्यवस्थागत खामियों से जुड़े मामलों में  अपने मुव्वकिल के लिए अदालत में खड़े हुए हों ,,इसके पूर्व भी कई ऐसे मामले हैं ,जिनकी पैरवी इन्होने किया है और क़ानूनी नुक्ताचीनी के बीच कामयाबी भी हासिल की है ,चाहे इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी से जुड़े मुकदमे हों या फिर वैसे विषय ,जिसमे राज्य की शक्ति को नीचा दिखाने का अवसर मिल सकने की गुंजाईश हो  ,प्राय: चर्चित मामलों में एक वकील के रूप में यह हमेशा मौजूद रहे है , २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में करूणानिधि की सांसद बेटी कनिमोझी के भी यही पैरवीकार हैं |
                                                 नाम ,दाम और यश के चक्कर  में जेठमलानी ने अपनी एक अलग ही छवि बनाई है ,जिसका कोई जवाब नहीं , राजनीति में भी अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शख्स के विरूद्ध  चुनाव लड़ने से परहेज नहीं ,जब मन में आया भाजप में घुस गए और जब दिल भर गया ,इससे अलग हो गए ,यह इनकी फितरत में है ,फिर भाजपा क्या सोच कर राजनीतिक तौर पर विचारहीन जेठमलानी को आत्मसात करती रही है ,,यह आम लोगों के लिए समझ से परे है |
                                             यहाँ  सिर्फ इतना ही कहना है कि दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में  राजनीति का सामान्यीकरण ,दल के  आदर्श होते हैं ,जिससे सिन्धांत ,विचार धारा ,कार्यक्रम ,नीति का उदभव स्वभाविक तौर  पर ,निसृत होती है ,ऐसे में अगर भाजपा को शर्मिन्दिगी झेलनी पड़े तो कोई अचरज नहीं , ,आखिर उसने ही जेठमलानी जैसे अराजक वकील को अपने यहाँ पनाह दे रखी है ,जिसका अपना कोई वसूल सामुदायिक हितों के परिप्रेक्ष्य  में नहीं है ,फिर भी वह व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप को स्वीकारता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं है ,यही आज देश के समक्ष रोना है ,जिस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं !
 
 
                      

Wednesday, 31 August 2011

इन्दर सिंह नामधारी के चेहरे को देखिये

                                                                         एसके सहाय                                                                                                                                            सांसद इन्दर सिंह नामधारी को ओमपुरी - किरण बेदी के कहे शब्द काफी बुरे लगे हैं इसलिए इनके खिलाफ विशेषाधिकार का नोटिस दिए जाने को उचित मानते हुए कहते हैं कि सांसदों कि सरेआम तौहीन करना संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में  उनके मर्यादा के विरूद्ध है इनको दंडित किया ही जाना चाहिए |वह रे नामधारी ,लगता है मर्यादा ,नैतिकता ,सत्य निष्ठां ,सचरित्र्ता के तीर उनके ही तरकश में है और किसी के पास यह नहीं है | अब यहाँ इनकी ब्लेकमेलिंग और कायरपन का झलक दिखा दिया जाय तो कैसा रहेगा ? खैर  छोडिये इन सब बातों को ----,   
 फिर भी दो कारनामे यहाँ इनके देना मौजूं है - पहला यह कि झारखण्ड में विधान सभा के अध्यक्ष रहते अपनी ही सरकार के विरूद्ध इन्होने साजिश की,यह उस वक्त की बात है ,जब बाबूलाल मरांडी मुख्य मंत्री थे ,यह षड्यंत्र जब उजागर हुआ ,तब छ: माह के लिए अपने मुंह सिल लिए थे ,इनके कारनामों की तब इनके ही तत्कालीन अध्यक्ष शरद यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता रवि राय ने इनके क़दमों की तीखी आलोचना की थी याने चारों तरफ से थू -थू इनकी हुई थी ,इस फजीहत के बाद काफी दिनों तक इनके मुंह पर ताले लटके रहे और जाकब मुंह खोला तो बड़ी मासूमियत से कहा " आखिर में भी तो राजनितिक प्राणी हूँ ,सो मुख्य मंत्री की लालसा किसे नहीं होती "
                                          यह है नामधारी का दिलचस्प बातें और कारनामें | अब इनकी डरपोकपन को देखिये -यह वाक्यां मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा के विरूद्ध लाये जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव से है ,तब विपक्ष ने पहली बार एकजुट होकर तत्कालीन मंत्रिमंडल में शामिल कथित निर्दलीय मंत्रियों    के सहयोग    से मुंडा को पदच्युत  करने  की रणनीति  बनाई  थे और नामधारी सरकार को लगातार  विश्वास  दिलाते  रहे कि उनिकी  सरकार को कोई  खतरा  नहीं  है ,वह इनके बागी  मंत्रियों  को डाल  -बदल  अधिनियम  के तहत  अयोग्य  करार  देंगे  |इसके  लिए नामधारी ने लगातार सिंह गर्जना करते हुए  तारीख  डर  तारीख  सुनवाई  के  तहत  अदालत  लगाते  रहे लेकिन  जब फैसले  देने  की  घडी  आई  तो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए | इन्होने बारह  घंटे  पूर्व  अपना  इस्तीफा  विधान  सभाध्यक्ष  के पद  से देकर  मुंडा को बता  दिया कि "निर्णय  देने  के जोखिम   वह नहीं उठा  सकते  "  ये वही मंत्री हैं ,जो अब मधु कोड़ा के साथ जेल में चक्की पीस रहे है |
                              यही है नामधारी  का असली चेहरा ,जो बातें तो बड़ी गोल-गोल करते  है और अपनी पर जब बन आये , तब एहसास होता है की दर्द कैसा होता है | ठीक यही बयान किया है ,इन्होने एक टीवी चैनल को दिए बयान में ,जिसमे इनको "विशेषाधिकार ही लोकतंत्र में सुरक्षा  कवच नज़र आता है ,यह दिखता ही नहीं कि -- भारत के संविधान के प्रस्तावना में ही पहली पक्तिं कि शुरूआत -" हम भारत के लोग" से होती है ,जिसकी झलक अभी -अभी देशवासियों ने देखा है और अगर इनके नज़र टेढ़ी हो गई ,तब क्या होगा ,कह पाना मुश्किल होगा | यह तो गनीमत समझिये कि अन्ना हजारे का भूख हड़ताल लंबा नहीं खीचा और इतफाक से यह लंबा होता ,तब  भीड़ की क्या मानसिकता होती है ,यह तो देहली देखता और पूरी दुनिया इसकी गवाह होती | आखिर पक्ष -विपक्ष ने इसे "भीड़ " ही घोषित करके वाजिब लोकतान्त्रिक मांग को बारह दिन तक टालते रहे थे | फ़िलहाल  इतना ही ------
 
     

Saturday, 27 August 2011

संसद को अपनी शक्ति का भान नहीं

                                                                                         एसके सहाय                                                                                                                              वाह  रे भारतीय संसद , प्रक्रिया, संविधान और इसकी सर्वोच्चता के बीच प्रक्रियागत प्रविधियों के सहारे लोकपाल के मुड़े को फ़िलहाल टालने में कामयाब हो ही गई | माननीय सांसदों को इसका भी भान नहीं रहा कि वे राइ को पहाड़ और पहाड़ को राइ बनाने की सामर्थ्य रखते हैं जैसा कि 1973 में दिए एक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने दिया था | इसमें साफ निर्णय थे कि संसद सविधान सहित अन्य मामले में प्रयाप्त बहुमत के बूते कोई भी निर्णय  ले सकती है सिर्फ संविधान के मूल भावना को बदल नहीं सकती | यह मूल भावना क्या है ?इसकी व्याख्या उस संविधान पीठ में शामिल न्यायधीशों ने अलग -अलग किए थे लेकिन इनके फैसले का मूल तत्व था - लोकतान्त्रिक व्यवस्था में परिवर्तन संसद हरगिज नहीं कर सकती |
                                               इस अपनी ताकत को पहचानते हुए भी संसद ने जाहिर कर दिया है कि उसे अपने हितों से ज्यादा प्यारा कुछ भी नहीं है | यदि ऐसा नहीं होता , तब सभी नियमों -परिनियमों को धत्ता बताते हुए संसद लोकपाल विधेयक के प्रावधानों पर तत्क्षण विचार करते ,जिसके लिए पूरा देश बैचेन है | इसके लिए सरकार के प्रस्तुत विधेयक पर ही विमर्श होता और फिर सर्वसम्मति से इसके सभी धाराओं पर बहस करते हुए वस्तुपरक तरीके से मतदान के जरीये आगे बढती ,जिसमे पक्ष -विपक्ष के चेहरे सामने आते ,जिससे मालूम  होता कि आखिर अधिसंख्य सांसदों का रूख कैसा है ?
                                                   वैसे ,तीन मुद्दे पर संसद ने सर्वानुमति से अपनी मुहर लगा दी है ,जो अभी सैधान्तिक रूप में है ,जिससे कुछ आस जगी है लेकिन मात्र इतने भर से काम नहीं बनने  वाले है |अभी लंबी लड़ाई के लिए एक बार फिर देशवासियों को तैयार रहना होगा | लोकपाल के प्रस्तावित बातें संसद के स्थायी समिति को भेजे गए हैं |यह समिति कब अपना गुण -दोष के साथ प्रावैधानिक   सलाहों के साथ अपना राय पत्र देती है ,इसे देखना बाकी है |
                                               अभी की स्थिति में संतोष जनक बात यही है कि क्म से कम अन्ना हजारे के आत्म बल, सचारित्र्ता , नैतिकता ,सद भाव और त्याग के बीच एक बार फिर देश में लोक शक्ति अपने मौलिक मांगों के प्रति सचेत हुई है ,जिसका स्वागत किया जाना चाहिए | यह आन्दोलन इसलिए कामयाबी के शिखर तक पहुचने के स्थिति तक है कि  हजारे जैसे एक पवित्र आत्मा कि यह पुकार है ,जिसका अभाव आज भारतीय राजनीति में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं | एक गैर राजनितिक पुरूष ने यह स्थापित कर दिया कि यदि आपका खुद का आचरण पाक -साफ हो और सोच की दिशा  परोपकारिता से लबरेज हो तो ,दुनिया की कोई भी शक्ति आपको लक्ष्य प्राप्त करने से नहीं रोक सकती ,अभी के हालात में तो यही दिखा है |
                                                 इस देश व्यापी जन आन्दोलन में यह भी सामने आया कि विचारवान लोग भी बहस के दौरान मूल विषय -मुद्दे से भटकते नज़र आये , इनके लिए लोकपाल केवल बहस के लिए बहस करना ही शगल बना रहा ,जिसमे तथ्य की समझ कम  और अपने व्यक्तिगत सोच की बातें ज्यादा उल्लेखित रहीं | मसलन, किसी ने कहा कि निजी क्षेत्र ,गैर सरकारी संगठनों को भी इसके दायरे में लाया जाना चाहिए |शायद इस तरह के चिंतन करने वालों को यह भी पत्ता नहीं कि ,जब सरकारी कर्मी ,जिसमे संसद -विधान मंडल आ जायेंगे ,तब खुद  बी  खुद निजी संस्थाए इसके परिधि में आ जायेंगे |इनके लिए अलग से कानून बनाये जाने की क्या   जरूरत है | आखिर सार्वजनिक धन के लुट का ही मामला है न ,फिर इसमें जो व्यापारी ,उद्योगपति ,कारोबारी या अन्य लोग आयेनेग ,ठीक उसी तरह ही कारवाई के शिकार होंगे ,जैसे अधिकारी -कर्मचारी वर्ग के लोग, फिर अलग से शब्दों के डाल देने से ही समस्या का अंत तो होगा नहीं |
                                                     और अब जब लोकपाल पर सर्वानुमति है ,तो देखना है कि बनने वाली विधेयक में इसके अन्तर्निहित शक्तियों का स्वरूप कैसा होगा |मूल बात यही है |क्या यह नियंत्रण महालेखा  परीक्षक -चुनाव आयोग  जैसे संविधान से निसृत संस्था होगी ,जिसकी जाँच की प्रक्रिया  अपनी और स्वतन्त्र होगी  तथा समयबद्ध सुनवाई की बाध्यता होगी और इसके जाँच के दायरे में प्रधान मंत्री सहित उच्च -उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश आते हैं या नहीं ,इन्ही सब बिन्दुओं पर स्थायी  समिति और संसद के रूख का परीक्षण होना है भारतीय लोगों के सामने ,जिसका बेसब्री से इंतजार ह
 

Friday, 22 July 2011

अभिव्यक्ति पर जिलाधीश की टेढ़ी नज़र

                                                   अभिव्यक्ति पर जिलाधीश के टेढ़ी नज़र
                                                                       एसके सहाय
झारखण्ड में एक जिलाधीश की बक्र दृष्टि एक सांध्य  दैनिक पत्र पर पड़ गई है ,वह भी एक तस्वीर को को लेकर ,जिसमे आपति जनक ऐसी कुछ भी बात नहीं है ,जिसे लेकर हाय-तौबा मचाया जा सके ,फिर भी अपनी अकड़ को दिखलाने के लिए उस उपायुक्त ने जो नोटिस अख़बार के हाथों में थमाया  है ,जिससे गंभीर सवाल पैदा होते हैं ,जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है |
                                             यह धौंस पलामू जिले के उपायुक्त पूजा सिघंल ने समाचार वर्षा पर जमाया है, जिसने अख़बार को दिए नोटिस में पूछा है कि "किसके अनुमति से उनसे सबंधित छाया चित्र मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा  के साथ छापा गया है |" बस इतनी से हल्की बात जिला प्रशासन को नागवार गुजरी है ,जो आजकल यहाँ जन चर्चा का विषय बन गया है |
                                                   जिला प्रशासन  के  यह कारण पृच्छा नोटिस से जाहिर है कि अब पत्रकार क्या छापें  और क्या नहीं ,इस विषय पर अब प्रशासन की अनुमति  लेनी होगी ,जो अभिव्यक्ति  की  खुल्लम -खल्ला चुनौती देने जैसी  हैं ,जिसकी जमकर आलोचना हो रही है ,लेकिन उपायुक्त की जिद है कि वह अपनी " शक्ति " का इजहार करने से बाज़ नहीं आ रही |
                                                 दरअसल अखबार ने उपायुक्त के एक साल पलामू में कार्य काल पूरे करने के अवसर पर उनकी उपलब्धियों का बखान अपने पत्र में की थी ,इसी क्रम में उसने अपने मुख्य मन्त्री के साथ पूजा सिंघल कि तस्वीर को प्रकाशित किया था ,जिसमें अर्जुन मुंडा हाथ जोड़ें खडें है और बगल में वह खड़ी है |यह सामान्य फोटो था ,जो १९ जुलाई को प्रकाशित हुए थे |इसमें आपति जनक कोई भी बात नहीं थी लेकिन जो नागवार करने वाली बात थी ,उसपर जिला प्रशासन के मुखिया ने ध्यान ही नहीं दिया ,जिससे अब वह बात भी चर्चा में आई है ,जिसकी कल्पना  भी पूजा  सिंघल नहीं कर सकती थी |यह सब अनजाने में हुई या जान बुझकर   ,इस पर फ़िलहाल कुछ भी कह पाना मुश्किल है |मामला अब काफी संगीन हो चूका है | इस मामले में अख़बार प्रबंधन अब कानून की शरण लेने के प्रयास में है |
                                            लेकिन इतना तय हो गया कि देश में कोई भी व्यक्ति अभिव्यक्ति के नाम पर अपनी बात सार्वजानिक क्षेत्रों में आसीन व्यक्तियों के बारे में प्रदर्शित करने की हिमाकत कि ,तब उसे पूजा सिंघल जैसे उपायुक्तों से पंगा लेने को अपने को तैयार करना होगा |
                                      यहाँ  यह भी बताना  जरूरी है  कि फोटो के साथ जो बात ऊपर लिखी है ,उसपर उपायुक्त को कोई आपति नहीं है ,आपति सिर्फ तस्वीर पर है ,जब कि कैप्सन में लिखा हुआ है - मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा  के वरद हस्त प्राप्त उपायुक्त पूजा सिंघल |  इतना ही नहीं ,इस उपायुक्त को महिमा मंडन करने के अतिरेक में अख़बार ने यहाँ तक लिख डाला ,जिसमे उल्लेख है -  पूजा सिंघल ने पलामू में कम करते हुए "अपने जीवन " में भी खास उपलब्धि हासिल किये है ,जो जिले की खास धरोहर के तौर पर याद किया जाता रहेगा | मगर इस बिंदु पर कोई विशेष नज़र जिला प्रशासन की नहीं है |
                                          वैसे, यहाँ आपको यहाँ बता दें कि पूजा सिंघल अपने कई कारनामों से हमेशा चर्चा में रही हैं | मसलन -चतरा जिले में उपायुक्त रहते इनका बेहोश हो जाना ,खूंटी में जिलाधिकारी रहते ग्रामीण विकास की करोड़ों रुपये के घोटाले होना और अब पलामू में रहते ----
                                    यहाँ आपको यह भी  स्मरण करा दूँ कि करीब एक पखवारे पहले पलामू में ट्रेन यात्रा के साथ मुसाफिरों से मुखातिब होकर जन समस्याओ से रूबरू होना इनकी लोकप्रियता को चार चाँद लग जाने की बात हो रही  थी लेकिन एक सामान्य सी फोटो पर नाक -भौंह  सिकोड़ लेना समझ से परे की बात  है | आखिर किस तरह प्रकशित तस्वीर आपति जनक है ,वह ही सही -सही बता सकती है |इधर कई माहों  से उनका नियमित मासिक प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं हुआ है ,जिससे कि असलियत उजागर हो सके और उनके दृष्कों को समझा जा सके | इनके अख़बार को नोटिस थमाने से यह तो जाहिर हो गया कि नौकरशाह  की अकड़ अब भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बनी हुई है ,जिसे जब चाहे ,वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके अपनी गरूर को आत्मसात कर सके |
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Monday, 6 June 2011

लोकतान्त्रिक अधिकारों को दबाने की कोशिश

                                                           एसके सहाय
काला धन और भ्रष्टाचार के सवाल पर बाबा रामदेव और इनके समर्थन में जुटे सत्याग्रहियों पर गत रात देहली पुलिस के अचानक धावा बोल देने से एक बात साफ हो गई है कि विदेशों में जमा धन को लाने और भ्रष्ट तत्वों के विरूद्ध गंभीर कारवाई करने के प्रति केंद्र सरकार का रूख ठीक नहीं है |
बाबा रामदेव की पृष्ठभूमि  को लेकर संशय हो सकती है लेकिन इन्होने जिस प्रश्न को लेकर जनतांत्रिक  तरीके से भूख हड़ताल पर बैठे थे ,वह इतना बड़ा कानून व् व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करेगी ,इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती | इसलिए जो भी कुछ कल  रात रामलीला मैदान में हुआ ,उसका संकेत है कि  आने वाले दिनों में जबर्दस्त जन आन्दोलन होने वाले हैं ,जिससे निपटने की तैयारी अभी से कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों को शुरू कर देनी चाहिए |
लोकतंत्र में अपनी बात रखने और उससे सहमत होने और न होने पर अर्थात दोनों स्थिति में सरकार को संयम का परिचय देना चाहिए ,तभी सरकार टिकाऊ हो सकती है | आखिर धरना ,प्रदर्शन ,रैली ,सभा -गोष्ठी ,घेराव ,बंद ,पुतला दहन ,भूख हड़ताल ,नारेबाजी ,जन संपर्क ,सत्याग्रह , सविनय अवज्ञा जैसी प्रक्रिया लोकतंत्र के आधार स्तंभ   ही तो है ,जिसका अनुसरण करने से कैसे सरकार आपने नागरिकों को रोक सकती है ,मगर दुर्भाग्य से केंद्र सरकार में ऐसे मानसिकता वाले तत्व शामिल हैं ,जो  लोकतंत्र से अन्योन्याश्रय  रूप से जुड़े मानवाधिकारों को भी लात मारने से गुरेज नहीं करते ,यही देश की राजनितिक अनुभवों का तकाजा है ,जिसका दिग्दर्शन कल राष्टीय    राजधानी में हुआ है  ,जिसका प्रतिकार किया ही जाना चाहिए |
शांति [पूर्ण आन्दोलन में अचानक व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं को हथियार बना कर लाठी चार्ज करना और आश्रू गैस का इस्तेमाल करना जिससे लोग चोटिल हों ,ताकि भय के वातावरण तैयार करके भ्रष्टाचार पर से देश का ध्यान हट सके ,यह कोशिश प्राय: हर सत्ताधारी करता है ,विशेष कर अधिनायकवादी प्रवृति के राजनीतिज्ञों के लोकतंत्र के नाम पर सत्तासीन होने पर, ,इसके दिग्दर्शन आसानी से हो जाते है |ठीक वैसा ही कल की घटना में दिखा है ,जो जल्द ही व्यापक स्वरूप में देश के सामने आने को परिलक्षित है |
भ्रष्ट तत्व और काला धन से किसे प्रेम हो सकता है ? दो नंबर  के तत्व भी बोल -चल में इसके खिलाफ ही आपने विचार प्रकट करने को विवश होते है ,भले ही वे कितना ही निकृष्ट हों ,लेकिन लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति दिखावा प्रकट करने में वे परहेज नहीं करते, जैसे की कपिल सिब्बल ,पी चिदम्बरम ,दिग्विजय सिंह सरीखे कांग्रेसी इन दिनों कर रहे है |
अतएव , घटना को लेकर उत्पन्न राजनितिक परिद्रश्य में एक बार फिर पिछली सदी के सत्तर और नब्बे दशक की हालात सामने आ जाये ,तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए | ऐसा इसलिए कि बर्बर कारवाई से ही लोग तेजी से आपस में धुर्वीकरण के प्रति अनायास ही जुटते  रहे है  और काफी कुछ माहौल ऐसा ही प्रतिपक्ष के जाहिर भी हैं |