Monday, 13 June 2022

कुवैत: प्रवासी निष्कासन

 ●कुवैत सरकार का पैगंबर पर टिप्पणियों को लेकर प्रदर्शन करने वाले प्रवासियों को निष्कासित करने का फैसला●

                कुवैत सरकार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो पदाधिकारियों द्वारा पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ की गयी विवादित टिप्पणियों के विरोध में एक प्रदर्शन में भाग लेने वाले प्रवासियों को गिरफ्तार करने तथा उन्हें निष्कासित करने का फैसला किया है। खाड़ी देश के कानूनों में ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति नहीं है।


सऊदी अरब में अंग्रेजी भाषा के दैनिक अखबार ‘अरब न्यूज’ में प्रकाशित एक खबर में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि शुक्रवार की नमाज के बाद फाहाहील इलाके से पैगंबर मोहम्मद के समर्थन में प्रदर्शन करने वाले प्रवासियों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया गया है। देश के कानूनों के अनुसार खाड़ी देश में प्रवासियों द्वारा धरना या प्रदर्शन करने की मनाही है।


कुवैती अखबार अल राई ने खबर दी है, ‘‘अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने तथा उनके देश वापस भेजने के लिए निर्वासन केंद्र ले जाने की प्रक्रिया में हैं और उनके फिर से कुवैत आने की अनुमति नहीं होगी।’’


खबर में प्रदर्शन में भाग लेने वाले प्रवासियों की नागरिकता का जिक्र नहीं है।


कुवैत सरकार उन कुछ देशों में से एक है जिसने पूर्व भाजपा पदाधिकारी की टिप्पणियों को लेकर भारतीय दूत को समन भेजा था।


कुवैत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि कुवैत में भारत के राजदूत सिबी जॉर्ज को सम्मन भेजा गया और एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री ने उन्हें एक आधिकारिक विरोध पत्र सौंपा।


मंत्रालय ने भारत की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा जारी बयान का स्वागत किया, जिसमें उसने नेताओं को निलंबित करने की घोषणा की।


गौरतलब है कि कई मुस्लिम देशों ने पूर्व भाजपा पदाधिकारी की विवादित टिप्पणियों की निंदा की है।


आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, कुवैत में कानूनी रूप से रह रहे भारतीय नागरिकों की संख्या 2019 में 10 लाख से ऊपर हो गई थी। कुवैत में हर साल भारतीय समुदाय के लोगों की संख्या में पांच-छह प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।

Tata Steel

 ●Tata Steel unveils green investment plan for UK steel tube mill●

        Tata Steel has unveiled a 7-million pound investment plan for its Hartlepool Tube Mill in north-east England that the Indian steel major says will cut carbon emissions, improve capacity and reduce costs to strengthen its UK business.


The investment will go into a new slitter which will allow the Hartlepool site to process coils of steel delivered from Tata's Port Talbot steelmaking site in South Wales. All of the steel products made at the site, where almost 300 people work producing up to 200,000 tonnes of steel tubes a year, are 100 per cent recyclable and the investment is forecast to pay for itself in less than three years.


This project will allow us to bring a vital process on site, which in turn will free up thousands of tonnes of capacity at the Port Talbot site, Andrew Ward, Works Manager of Tata Steel in Hartlepool, said last week.


This will improve our efficiency and reduce overall CO2 emissions from our steel processing as well as reducing the total costs across the business, he said.


Currently, wide steel slabs are slit in Port Talbot before being rolled and sent to Hartlepool to be turned into steel tubes, which are then used in a wide range of products such as agricultural machinery, sports stadiums, steel-framed buildings and the energy sector.


The new project is expected to take more than a year to complete and is the second major investment announced by the Indian company in the UK this year after an investment plan for its site at Corby in the north-eastern England region. Both projects will further strengthen the UK business, improving services to customers and using the latest available technology to reduce environmental emissions, Tata Steel UK said.


Andrew Ward added: Above all, safety will be a key factor in this investment both during the construction phase and when the new slitter is up and running. It will feature the latest computer-controlled technology, which reduces the need for our employees to be close to any hazardous operations and it will be as energy-efficient as possible.


The new slitter line will optimise the UK value chain for our smaller tube product range, allowing steel coil to flow through the chain and provide flexibility with on-site slitting . This investment will support the ongoing drive to improve customer delivery performance and responsiveness which the Hartlepool 20 Mill team pride themselves upon.


Tata Steel in the UK says it has the ambition to produce net-zero steel by 2050 at the latest and to have reduced 30 per cent of CO2 emissions by 2030. The vast majority of that work will need to happen in South Wales, where the company's largest operational site is.


Tata Steel says it is developing detailed plans for this transition to future steelmaking based on low CO2 technologies and is close to knowing which will best help achieve its ambitions.


The steel giant is one of Europe's leading steel producers, with steelmaking in the Netherlands and the UK, and manufacturing plants across Europe. The company's tube products are used across a broad range of industries, including construction, machinery fabrication, energy and automotive. Next week, the company will be at the Wire and Tube 2022 fair in Dusseldorf, Germany, after a long gap due to the coronavirus pandemic.


After the last few years, we are really looking forward to this opportunity to connect with so many customers in one place and showcase our broad tube portfolio, said Anil Jhanji, Chief Commercial Officer for Tata Steel UK.


We are making major investments to further strengthen our Tubes business and, as we come out of the coronavirus pandemic, I look forward to meeting all our customers to demonstrate how we can help them succeed in their markets, added Tony Waite, Tata Steel Director of Sales Tubes and Engineering.

राहुल से ईडी की पूछताछ

 ●धनशोधन मामले में राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ●

         कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ‘नेशनल हेराल्ड’ से जुड़े कथित धनशोधन मामले में सोमवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समक्ष पेश हुए और जांच एजेंसी द्वारा उनसे पूछताछ जारी है।


अधिकारियों ने बताया कि राहुल गांधी सुबह करीब 11.10 बजे एपेजी अब्दुल कलाम रोड स्थित ईडी के मुख्यालय पहुंचे और संभावना है कि वह अपना बयान लिखित रूप से दें।


राहुल गांधी कांग्रेस मुख्यालय से ईडी दफ्तर पहुंचे। इस मौके पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पहुंचे और राहुल गांधी के प्रति अपना समर्थन जताया।


राहुल गांधी का काफिला जब ईडी मुख्यालय पहुंचा तो गाड़ी में उनके बगल में प्रियंका गांधी भी बैठी हुईं थीं।


एजेंसी धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) की आपराधिक धाराओं के तहत राहुल गांधी का बयान दर्ज करेगी।


अधिकारियों के अनुसार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और गांधी परिवार से पूछताछ ईडी की जांच का हिस्सा है ताकि ‘यंग इंडियन’ और ‘एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड’ (एजेएल) के हिस्सेदारी पैटर्न, वित्तीय लेनदेन और प्रवर्तकों की भूमिका को समझा जा सके। ‘यंग इंडियन’ के प्रवर्तकों और शेयरधारकों में सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी सहित कांग्रेस के कुछ अन्य सदस्य शामिल हैं।


राहुल गांधी से ‘यंग इंडिया’ की स्थापना, ‘नेशनल हेराल्ड’ के संचालन और धन के कथित हस्तांतरण को लेकर सवाल किए जा सकते हैं।


कांग्रेस ने राहुल गांधी की पेशी के मद्देनजर देश भर में ईडी कार्यालयों के बाहर ‘सत्याग्रह’ का फैसला किया था और दिल्ली में भी बड़े पैमाने पर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी कर रखी थी।


कांग्रेस के यहां प्रस्तावित मार्च के मद्देनजर पुलिस ने कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया और पार्टी मुख्यालय के आसपास धारा 144 लगा दी।


मुख्य विपक्षी दल के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ईडी को भाजपा का ‘इलेक्शन मैनेजमेंट डिमार्टमेंट’ करार दिया और आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने कांग्रेस के ‘सत्याग्रह’ को रोकने के लिए नयी दिल्ली के इलाके में अघोषित आपातकाल लगा दिया है।


ईडी ने इससे पहले राहुल गांधी को दो जून को पेश होने के लिये कहा था, लेकिन उन्होंने पेश होने के लिए कोई दूसरी तारीख देने का अनुरोध करते हुए कहा था कि वह देश से बाहर हैं।


जांच एजेंसी ने इसी मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 23 जून को तलब किया है। पहले उन्हें आठ जून को पेश होने के लिए नोटिस दिया गया था। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष ने पेश होने के लिए और समय मांगा था क्योंकि वह कोरोना वायरस से संक्रमित हैं तथा अब तक स्वस्थ नहीं हुई हैं।


कांग्रेस का कहना है कि उसके शीर्ष नेताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं तथा ईडी की कार्रवाई प्रतिशोध की राजनीति के तहत की जा रही है। उसने यह भी कहा है कि वह एवं उसका नेतृत्व झुकने वाले नहीं है।


पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सुरजेवाला ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ लगे आरोपों को निराधार करार देते हुए कहा, ‘‘कांग्रेस एक राजनीतिक दल है और एक राजनीतिक दल किसी कंपनी में हिस्सेदारी नहीं खरीद सकता। इसलिए, ‘यंग इंडियन’ के नाम से एक गैर-लाभकारी कंपनी (नॉट फॉर प्रॉफिट कंपनी) को ‘नेशनल हेराल्ड’ एवं एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के शेयर दिए गए, ताकि 90 करोड़ रुपये का कर्ज खत्म हो सके।’’


उन्होंने कहा, ‘‘इस 90 करोड़ रुपये में से 67 करोड़ रुपये कर्मचारियों के वेतन एवं वीआरएस के लिए दिए गए तथा बाकी सरकार का बकाया, बिजली के बिल तथा भवन के लिए भुगतान हुआ। यह अपराध कैसे हो सकता है? यह तो कर्तव्य का बोध है। हमने मोदी सरकार की तरह देश की संपत्ति अपने उद्योगपति मित्रों को नहीं बेच डाली।’’


सुरजेवाला के अनुसार, ‘नेशनल हेराल्ड’ के स्वामित्व वाले एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के पास आज भी सारी संपत्ति हूबहू सुरक्षित है।

terrorists killed in Kashmir

 ●100 terrorists killed in Kashmir in 2022 so far●

      Security forces have killed 100 terrorists in Kashmir during counter insurgency operations since the beginning of this year with Lashkar-e-Taiba outfit bearing the maximum brunt as it lost 63 cadres, officials said here on Monday.


"Security forces have eliminated 100 terrorists, including 29 foreigners, since the beginning of this year in Kashmir," the officials said.


They said this was double the number of ultras killed during the corresponding period last year.


"Fifty terrorists including one foreigner were killed in the counter terrorism operations last year in the first five months and 12 days," the officials said.


While 63 of the slain terrorists belonged to banned Lashkar-e-Taiba, 24 others were affiliated with Jaish-e-Mohammed (JeM), they said.

कर्नाटक: शिलालेख

 ●बैंदुर में 15वीं सदी का शिलालेख पाया गया●

        कर्नाटक के उडुपी जिले के बैंदुर तालुक में नंदनवन गांव में 15वीं सदी के विजयनगर साम्राज्य का शिलालेख बरामद किया गया है। एक बयान में इसकी जानकारी दी गयी है ।


एक विज्ञप्ति में यहां कहा गया है कि सेंट एलॉयसियस कॉलेज के निदेशक श्रुथेश आचार्य ने सेवानिवृत्त शिक्षक के. श्रीधर भट और ओरिएंटल अभिलेखागार अनुसंधान केंद्र के निदेशक प्रोफेसर एस ए कृष्णैया के मार्गदर्शन में शिलालेख का अध्ययन किया।


यह शिलालेख संजीव प्रभु नाम के व्यक्ति की जमीन पर पाया गया और काना पत्थर में खुदा हुआ था। पांच फुट लंबे और 2.5 फुट चौड़े शिलालेख में कन्नड़ भाषा में 38 पंक्तियां लिखी हुई है।


शीर्ष छोर पर बने वामन प्रतिमा के दोनों ओर शंख, चक्र, सूर्य और चंद्रमा गुदा हुआ है। इसमें ‘स्वस्ति श्री गणाधिपताये नम:’ शीर्षक लिखा है और तारीख 21 अगस्त, 1519 ईसवी की है।


शिलालेख पर तारीख स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यह विजयनगर साम्राज्य के तुलुवा शासक कृष्णदेवराया के वक्त का है। इस काल के दौरान बाराकूरा प्रांत पर रत्नप्पा ओडेया के बेटे विजयप्पा ओडेया का शासन था।

Sunday, 1 May 2022

युक्रेन-रुस युद्ध, यूरोप और गैस

      -रूसी गैस का खेल और अमेरिका का प्रतिबंध दांव फेल-



यूरोप का ऊर्जा संकट अब एक आर्थिक समस्या से राजनीतिक चुनौती में बदल गया है। पश्चिमी देश खुलेआम रूस पर 'गैस वॉर' छेड़ने का इलज़ाम लगा रहे हैं, जबकि क्रेमलिन इन आरोपों से इनकार करता है।


रूस ने पश्चिमी देशों के सामने एक तरह से अंतिम शर्त रख दी है कि यूरोप को अलग अलग प्रभाव क्षेत्र वाले खांचों में बांटा जाए और गैस मार्केट में खेल के नियम बदले जाएं। यूरोपीय देश अपनी आबादी और उद्योग, दोनों को ही बचाने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी कर रहे हैं और अमेरिका इस बात से खुश लग रहा है कि वो यूरोप को रूसी गैस के बदले ऊंची क़ीमतों पर इसकी सप्लाई का मौका मिलेगा।


वैश्विक ऊर्जा संकट की शुरुआत बीते पतझड़ के साथ ही शुरू हो गई थी। सर्दियां आते आते हालात और बिगड़ गए। पहले गैस और अब तेल की क़ीमतों को भी आग लग गई है। यूरोप में ऊर्जा संसाधनों की इतनी कमी है कि आम लोगों से लेकर उद्योगों तक का बिजली और गैस बिल बेहिसाब बढ़ गया है।


ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि यूरोप में अचानक क्यों गैस संकट गहरा गया और वो सर्दी में ठिठुरकर जम जाने की इंतेहा पर पहुंच गया? इसके कई कारण हैं।


दो वजहें तो अस्थाई किस्म की हैं। पहली कोरोना महामारी और दूसरा मौसम और बाक़ी तीन वजहें ऐसी हैं जो काफी लंबे समय से अनसुलझी हैं। इसकी बुनियाद एनर्जी मार्केट में प्रतिस्पर्धा, यूक्रेनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और भविष्य की अर्थव्यवस्थाओं में हाइड्रोकार्बन की भूमिका को लेकर रूस और यूरोप के बीच जो सैद्धांतिक मतभेद हैं, उसी में है। यूरोप का ऊर्जा संकट कब तक चलेगा? यूरोप को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा? गैस मार्केट में खेल के नियम कैसे बदलेंगे? और रूस की कमाई का प्रमुख स्रोत माने जाने वाले हाइडोकार्बन के इस्तेमाल को कम करने के लिए जिस ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा दिए जाने की बात की जा रही है, उसका भविष्य क्या है?


इन तमाम सवालों के जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि यूरोप और रूस के बीच जिन बुनियादी सवालों को लेकर मतभेद हैं, उसे कितनी जल्दी सुलझा लिया जाता है। यूरोप को जितने प्राकृतिक गैस की ज़रूरत पड़ती है, उसका तकरीबन एक तिहाई रूस सप्लाई करता है। लेकिन बीते बसंत के बाद उसने गैस की आपूर्ति में बड़ी कटौती कर दी है।


15 अप्रैल तक यूरोपीय देश क्रेमलिन पर 'गैस वॉर' शुरू करने का आरोप सीधे तौर पर लगाने से बचते दिख रहे थे लेकिन जैसे ही यूक्रेन को लेकर व्लादिमीर पुतिन के इरादे सामने आने लगे,और उन्होंने रूबल में पेमेंट करने के लिए कहा तो पश्चिमी देशों ने यूरोप के ऊर्जा संकट के लिए रूस को सीधे जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।


कुछ समय पहले ही इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने साफ़ लफ़्जों में रूस को चालबाज़ करार दिया था। उनका कहना था कि यूरोप को रूस की ओर से गैस सप्लाई में कटौती और यूक्रेन को क्रेमलिन से बढ़ती धमकियों के बीच का कनेक्शन दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा, हमारा मानना है कि यूरोप के गैस मार्केट की समस्याएं रूस ने पैदा की हैं। पिछले तीन महीनों में गैज़प्रोम ने रिकॉर्ड क़ीमतों के बावजूद यूरोप को सप्लाई की जाने वाली गैस में 25 फीसदी की कटौती की है। इतना ही नहीं यूरोप में जिन जगहों पर गैस स्टोर करके रखा जाता है, वहां भी सप्लाई रोकी गई ताकि क़ीमतें और बढ़ जाएं।


आईईए के प्रमुख का कहना है कि साल 1973-74 के ऐतिहासिक तेल संकट के बाद ये यूरोप के सामने सबसे बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है।


साल 1973 के यॉम किप्पुर युद्ध में पश्चिमी देशों ने इसराइल का समर्थन किया था जिसके बाद अरब देशों ने पश्चिमी देशों को तेल बेचने से इनकार कर दिया था।

फातिह बिरोल की बात में काफी वजन है क्योंकि वे पश्चिमी देशों की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाले संगठन के प्रमुख हैं। आईईए का गठन इन्हीं हालात से निपटने के लिए किया गया था कि वो आने वाले संकट से विकसित देशों को आगाह कर सके और संकट से बचने के लिए साझा कोशिशों को अंज़ाम दे सके और अगर संकट पैदा हो जाए तो उसे जल्द से जल्द निपटाया जा सके।


पिछली आधी सदी में ये केवल तीन बार हुआ। दो बार जंग की सूरत में (1991 का खाड़ी युद्ध और साल 2011 का लीबिया संकट) और एक बार साल 2005 में कटरीना चक्रवात के बाद के हालात में।


एक ओर जहां पश्चिमी देश रूस पर संकट खड़ा करने का इलज़ाम लगा रहे हैं तो दूसरी ओर क्रेमलिन का कहना है कि यूरोप खुद इन हालात के लिए जिम्मेदार है।


रूस पश्चिमी देशों के आरोपों से इनकार करता है। उसका कहना है कि यूरोप के ऊर्जा संकट से उसका कोई लेना देना नहीं है। रूस की दलील है कि यूरोपीय संघ, गैस सप्लाई करने वाली कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा लाने की कोशिशें और जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ लड़ाई इसके लिए जिम्मेदार हैं।


रूस के उपप्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर नोवाक कहते हैं,  मैं इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के प्रमुख से ऐसी बातें सुनकर हैरत में हूं। वे यूरोपीय उपभोक्ताओं की समस्याओं के लिए हम पर दोष मढ़ रहे हैं। न तो रूस और न ही गैज़प्रोम इसके लिए जिम्मेदार है। 


उधर, रूस की सरकारी गैस कंपनी गैज़प्रोम यूरोप को अतिरिक्त गैस आपूर्ति करने को लेकर कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखा रही है जबकि क़ीमतें अपने रिकॉर्ड स्तर पर हैं। पश्चिमी देशों के मन में ये विचार मजबूत हो रहा है कि रूस ने अपने कान बंद कर लेने का फ़ैसला कर लिया है।


व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा,  इसका बाज़ार से कोई लेना देना नहीं है। इसमें बाज़ार की शक्तियों की कोई भूमिका नहीं है। ये पूरी तरह से चालबाज़ी है।


यूरोपीय संघ के एंटी ट्रस्ट नीतियों के लिए जिम्मेदार मार्ग्रेट वेस्टागेर भी कुछ ऐसी ही शंकाएं जाहिर करती हैं। वो कहती हैं, जब मांग बढ़ने पर एक कंपनी आपूर्ति कम कर देती है तो बात समझ में आ जाती है। प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ार में ऐसा बर्ताव शायद ही कोई करता है।


गैज़प्रोम की गैस सप्लाई का मॉडल लंबी अवधि वाले ठेकों के आधार पर चलता है। इस तरह के करार में क़ीमतें और आपूर्ति की मात्रा साल दर साल तय की जाती है। इसमें नए गैस फील्ड के विकास और नई पाइप लाइन बिछाने के लिए कर्ज़ें दिए जाने का भी प्रावधान रहता है। लेकिन यूरोप चाहता है कि क़ीमतें बाज़ार की ताक़तें तय करें और वो खुले बाज़ार की व्यवस्था में गैस की खरीद बिक्री का मॉडल अपनाना चाहता है जहां क़ीमतों और वॉल्यूम की कोई गारंटी नहीं होती है। इस व्यवस्था में मांग और आपूर्ति के आधार पर बाज़ार क़ीमत तय की जाती है। तेल बाज़ार भी इसी तरह से काम करता है। तेल बाज़ार में भी लंबी अवधि वाले कॉन्ट्रैक्ट काम करते हैं और यूरोप की ख़्वाहिश है कि उसके यहां का गैस बाज़ार भी इसी तरह से काम करे।


साल 2050 से यूरोपीय संघ ने सब कुछ स्टॉक एक्सचेंज के हवाले कर देने का लक्ष्य रखा है लेकिन रूस इस मॉडल का सख़्ती से विरोध करता है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई मौकों पर अपना विरोध जाहिर कर चुके हैं और रूस अपने स्टैंड पर कायम है। उसके उपप्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने भी एक दिन पहले यही बात दोहराई है।


उन्होंने कहा, यूरोपीय संघ का नज़रिया संकीर्ण है। वो लॉन्ग टर्म के कॉन्ट्रैक्ट वाली व्यवस्था की जगह शॉर्ट टर्म के स्पॉट कॉन्ट्रैक्ट वाला मॉडल अपनाना चाहता है। हमारे पास बहुत बड़े संसाधन हैं और हम आपूर्ति कर सकते हैं लेकिन उत्पादन के लिए किसी प्रोजेक्ट में निवेश की ज़रूरत होती है और किसी प्रोजेक्ट के मुनाफे वाली स्थिति में पहुंचने में वक़्त लगता है। और ये हमारी स्पष्ट रणनीति है। रूस इस बात से भी नाराज़ है कि जर्मनी यूक्रेन को नज़रअंदाज़ करके बाल्टिक सागर से गुजरने वाली नॉर्डस्ट्रीम2 गैस पाइपलाइन की दूसरी परियोजना की मंज़ूरी को अटका रहा है। राष्ट्रपति पुतिन ने अक्टूबर में कहा था कि जैसे ही इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिलेगी यूरोप को गैस की आपूर्ति अगले ही दिन से बढ़ जाएगी।


चूंकि यूरोप ने अपने ऊर्जा संकट को बाज़ार की समस्या की जगह राजनीतिक समस्या के तौर पर देखा है इसलिए इससे लड़ने के लिए वो आपातकालीन उपाय भी कर रहा है। मुद्रास्फीति, अर्थव्यवस्था में सुस्ती और असंतोष रोकने के लिए जनता और उद्योगों को सब्सिडी का आश्वासन दिया गया है। इटली ने इसके लिए चार अरब डॉलर और स्वीडन ने 20 लाख परिवारों के लिए 50 करोड़ डॉलर का बजट रखा है। जर्मनी भी उद्योगों को सब्सिडी का वादा किया है। उसने रूस यूक्रेन संकट में यूरोपीय मूल्यों की रक्षा के लिए नॉर्डस्ट्रीम2 गैस पाइपलाइन छोड़ने की संभावना को भी खारिज नहीं किया है। अभी तक यूरोप इस बात को लेकर आश्वस्त है कि भले ही रूस गैस की आपूर्ति न बढ़ाए तो भी बसंत के आने तक वो ठंड से जम नहीं जाएगा, लेकिन सवाल क़ीमत का है। ऊंची क़ीमतों ने अमेरिका को बाज़ार तलाशने का मौका दे दिया है। अभी तक मध्य पूर्व और अमेरिका की लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) के लिए एशिया प्रमुख बाज़ार रहा था लेकिन यूरोप का बाज़ार इस समय इतना आकर्षक है कि मेक्सिको की खाड़ी से एशिया की ओर रवाना किए गए एलएनजी कैरियर्स प्रशांत महासागर के आधे रास्ते में रूट बदलकर पनामा नहर के रास्ते अटलांटिक की ओर रुख कर रहे हैं। चीन और ब्राज़ील के लिए गैस मार्केट में गुंजाइश दिख रही है।


इन सर्दियों में रूस ने यूरोप के लिए मुश्किल हालात पैदा करने की रणनीति बना ली है। आशंका इस बात की है कि ये संकट कहीं साल भर से ज़्यादा न खिंच जाए और यूरोप को इसकी बड़ी क़ीमत न चुकानी पड़ जाए। क्योंकि रूस के रूबल में भुगतान करने से रूबल दिनोदिन मजबूत होता जा रहा है, जिससे यूरोपीय यूनियन सहित अमेरिकी प्रतिबन्धों की धज्जियां उड़ रही हैं। 


कहा जा सकता है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस अवस्था को भांप लिया था कि उनपर पूर्व की भांति अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ प्रतिबंध लगाएगा और उन प्रतिबंधों को बेअसर साबित करने के लिए वो गैस और ऊर्जा के लिये रूबल में भुगतान लेंगे।


देखा जाये तो पुतिन अभीतक अमेरिका की हर चाल को बेअसर करते चले आ रहे हैं, जिसमे तात्कालिक प्रतिबन्धों का हश्र भी सामने दिख रहा है। जिसमे पुतिन बाइडेन पर भारी दिखाई देते हैं।

अर्थव्यवस्था:बदलते स्वरूप

    भारतीय अर्थव्यवस्था के कदम पूंजीवाद की ओर 

              -एसके सहाय-

                 आजादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को जनोन्मुखी होने और उसे आम और राष्ट्रीय हितों को गति देने के लिए नेहरू काल में ठोस पहल हुई, इसमें मिश्रित अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को साकार करने के लिए ठोस प्रबंधन किए गये, जिससे वैयक्तिक और सार्वजनिक पूंजी के बीच सामंजस्य स्थापित हो, ताकि उसके लाभ हर नागरिक एवं सरकारों को मिल सके ।

        बहरहाल, इधर 2014 से देखा गया है कि, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों-उपक्रमों को बेचने की गति में काफी तेजी आई है और इसके लिए तर्क यह ढूंढा गया है कि, सरकारी कल-कारखाने घाटे के औजार बन गये हैं, सो इसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए निजी हाथों में सौंपना जरूरी है ।

        सवाल है कि, बगैर ठोस विचार-विमर्श के सरकारी कंपनियों को औने-पौने दामों में बेचना कहां तक उचित है ? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि, सरकार अपनी जिम्मेदारियों से या समझिये अयोग्यता से बचना चाहती है और सिर्फ नफे-नुकसान के नजरिये से किसी " प्रकिया " को देखती है और  यही ' लोकतांत्रिक अवधारणा " को क्षति पहुंचाने वाली कदम है ।

        यह बात इसलिए भी विचारणीय है कि, कोई भी " जनतंत्र " की व्यवस्था में " उसके कल्याणकारी संकल्पना " स्वत, स्वाभाविक और प्राकृतिक रुप से निहित होती है ।ऐसे में एकतरफा व्यापार-व्यवसाय को निजी क्षेत्र में सुपुर्द करना आम हितों के विरुद्ध है ।

         ऐसे में नेहरूकालीन अर्थ व्यवस्था को समझने की जरूरत है, आवश्यकता इसलिए भी है कि, मिश्रित अर्थव्यवस्था की शुरुआत के नेपथ्य में आखिर उस वक्त के सरकार की मंशा विकास के संदर्भ में क्या थी?

           अतएव , एक संक्षिप्त नजर उस दौर के विश्वव्यापी अर्थ व्यवस्था की ओर दौङाना अपरिहार्य है । यह सर्वविदित है कि, दितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दुनिया दो खेमों में विभक्त थी, जिसमें एक का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका तो, दूसरे का नेतृत्व तत्कालीन सोवियत संघ कर रहा था ।इनके अर्थ व्यवस्था के स्वरूप भी एक-दूसरे के विपरीत थे ।अमेरिका जहां प्रतिस्पर्धा, खुला अर्थकीय व्यवस्था का पक्षधर था और आज भी है, तो सोवियत संघ सरकारी नियंत्रण में विकास के पैमाने गढ़ रहा था ।

          इस परस्पर विरोधी दो अर्थजगत के व्यवस्थाओं को काफी करीब से नेहरू जी ने अध्ययन किए और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि, दोनों अर्थकीय दुनिया एकांगी है और यह भारत जैसे विविधता पुर्ण देश के लिए उचित एवं हितकर नहीं हो सकती, इसलिए " समन्वय तथा तालमेल " के साथ ही भारत की आर्थिकी संरचना को बृहत स्वरुप दिया जाए, ताकि एक के पंगु होने से दूसरे की मदद से आम लोगों के दैनंदिन जीवन को संरक्षित किया जा सके ।

            सो, इसके लिए, सरकार ने भारी भरकम क्षेत्रों में खुद पूंजी के निवेश को प्राथमिकता दिए जाने की नीति क्रियान्वित करने शुरू किए, जिससे देश में एक व्यापक एवं संगठित रोजगार के सृजन आरंभ हुआ और इसके क्या फायदे हुए, वह दृष्टिगत है, इसे यहां बताने की जरूरत नहीं है ।

     आशय यह कि, नेहरूकालीन अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के साथ उसकी उपयोगिता के सिद्धांत समाविष्ट थे, कुछ व्यवसाय सरकार कर रही थी तो, कुछ व्यवसाय पूंजीपतियों के हाथों संचालित थी, इसी अवधारणा के तहत विकास के पैमाने स्वातंत्र्योत्तर भारत में अर्थ व्यवस्था को गति प्रदान की गई ।

      बदलते समय में वर्ष 1991 में  सोवियत संघ का विघटन हो गया और इस टूटते रुस को अमेरिका ने अपने कथित अर्थ व्यवस्था को विजयी के लिए उद्घोषित किया, अर्थात उदारवाद, खुलावाद और भूमंडलीकरण जैसे शब्दावली को गढ़ कर पूरे दुनिया में दुदंभि बजाने में सफल रहा कि, " बगेर वैयक्तिक पूंजी के विकास ,प्रगति एवं लोकहित संभव नहीं है, इसे तभी जनहित कारी बनाया जा सकता है, जब पूंजीवादी तरीके से अर्थ व्यवस्था को संचरण के लिए अनुकूल खाद्ध-पानी मिले ।"

        इस बहुप्रचारित झांसे में पी वी नरसिंह राव की सरकार आ गयी और उसने फूंक-फूंक कर कदम बढाने की दिशा में शुरू की, परवर्ती काल में जब बाजपेयी की सरकार केन्द्र में आई, तब बकायदा ' अलग से विनिवेश मंत्रालय " ही गठित हो गये और सार्वजनिक/सरकारी कंपनियों को विक्री के लिए बाजाप्ता कार्यक्रम बनने लगे ।

       मनमोहन युग में ऐसा नहीं हुआ, बल्कि सार्वजिनक क्षेत्र के कंपनियों की उपयोगिता एवं उसके जन अपेक्षा पर कसौटियों को तौला जाने लगा,इस दौर में सरकारी प्रतिष्ठान निजी हाथ में गये, लेकिन उसके  सांगोपांग उपयोगिता को ध्यान में रखकर ही, उसे क्रियान्वित किया गया ।

         और अब मोदी काल में हालत यह है कि, लाभप्रद कंपनी को भी चयनित तरीके से अपने पसंदीदा निजी हाथों को दिए जाने  की नीति के तहत सत्ता खुद गतिशील है ।

     कुल मिलाकर आशय यह कि, क्या सरकार व्यावसायिक तरीके से एक लोकतंत्र में नागरिकों के साथ व्यवहार कर सकती है? और यदि जन  जरूरतों के " अकाल " पैदा हो गई, तब सरकार उसके लिए धनकुबेरों पर आश्रित नहीं हो जाएगी अर्थात मोलभाव! कोविद-19 के संक्रमण वर्तमान में एक अच्छा उदाहरण है ।

     सिर्फ़ टैक्स वसूली ही, क्या सरकार के मुख्य व्यवसाय हैं? मरते लोगों को बचाने की जवाबदेही से कैसे कोई लोकतांत्रिक सरकार पल्ला झाङ सकती है?

       दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि, लोकतंत्र में शासन के होने के मतलब उत्तरदायित्व को वहन करना है, न कि, सत्ता का संचालन व्यापारिक दृष्टिकोण से, यदि ऐसा ही व्यवहार में रहा तो आने वाले कल में हम जनक्रांति को निमंत्रण देते दिखेंगे ⁉️